Books / Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla)

105. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — कर्णलक्षण

कर्णलक्षण

लम्बौ कर्णों शुभावर्तौ सुखदौ च शुभप्रदौ। शष्कुलीरहितौ निन्धौ शिरालौ कुटिलौ कृशौ॥ १५ ॥ जो कान लम्बे हों तो सुखद होते हैं। अगर कान शष्कुली (कुचियों) रहित, नसोंवाले या टेढे, पतले हों तो निन्दनीय होते हैं॥ १५॥ ललाटलत्तण भाल: शिराविरहितो निर्लोमार्घेन्दुसन्निभः । अनिम्नस्त्रयंगुलो नार्याः सौभाग्यारोग्यकारणम् ॥१६। व्यक्कस्वस्तिकरेखं च ललाटं राज्यसम्पदे। प्रलम्बं मस्तकं यस्या देवरं हन्ति सा ध्रुवम् ॥१७॥ रोमशेन शिरालेन प्रांशुना रोगिणी मता ॥१८ ॥ जिसका भाल नसों रहित, लोमड्रीन, अर्ध चन्द्र समान तथा गहरा न हो और तीन अंगुलवाला हो तो वह सौभाग्य व आरोग्य का कारण होता है। जिसका ललाट प्रकटित त्रिकोण रेखावाला दो तो राज्यसंपदा के लिए होता है। जिसका मत्था लम्बा हो वह स्त्री निश्चय ही देवर को मारती है। जिसका भाल रोमोंवाला, नसोंवाला तथा ऊँचासा हो वह स्त्री रोगिणी यानी जाती है॥ १६-१८ ॥