106. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — सीमन्तशिरोलक्षण
सीमन्तशिरोलक्षण
सीमन्तः सरलः शस्तो मौलि: शस्तः समुन्नतः। गजकुम्भनिभो वृत्तः सौभाग्यैश्वर्यसूचकः ॥१६ ॥ स्थूलमूर्धा च विधवा दीर्घशीर्षा च बन्धकी। विशालेनापि शिरसा भवेद दौर्भाग्यभाजनम्॥२० ॥ सीधा शीश का जूड़ा स्त्री के लिए शुमदायक है। जो मस्तक ऊँचा हो तो भी शुमदायक है। जो शीश हाथी के कुम्भ सदृश गोलाकार हो तो सौमाग्य और ऐश्वर्य देता है। जिसका मस्तक मोटा हो वह स्त्री राँड़ होती है। जिसका शीश लम्बा हो वह स्त्री कुलटा होती है। जिसका शीश चौड़ा हो वह बुरे भाग्य की भाजन होती है ॥ १६-२० । वे.शल क्ष ण केशा अलिकुलच्छायाः सूक्ष्माः स्निग्धाः सुकोमलाः। किश्चिदाकुञ्चिताग्राश्य कुटिलाश्चातिशोभनाः ॥२१।। परुपा: स्फुटिताग्राश्च विरलाश्च शिरोरुहाः। पिङ्गला लघवो रूच्षा दुःखदारिद्रयबन्धदाः ॥२२।। भ्रमरसमूद के समान काले, पतले, चिकने, कोपल तथा अग्रभाग में चुँघराले केश अत्यन्त शुभदायक हैं। अगर केश कठोर, अग्रभाग में टूटे, बिरले, पीले, छोटे, रूखे हो तो दुःख, दारिद्र्य और बन्धन देते हैं॥ २१-२२ ।। भुवोरन्तर्ललाटे वा मशको राज्यसूचकः । वामे कपोले मशकः शोणो मिष्टान्नदः ब्ियाः ॥२३॥ तिलकं लाञ्छनं वापि हृदि सौभाग्यकारणम्। यस्या दक्षिणवच्षोजे शोण तिलकलाञ्छने ॥२४ ॥ कन्याचतुष्टयं सूते सूते सा च सुतत्रयम्। इस प्रकार छाँछठ अंगों के गुभाशुभ लक्षगों को कह प्रसंगवश मशका- दिकों को कहते हैं। माँहों के बीच या ललाट में ममे का चिह्न हो तो वह राज्यसूचक है। बाएँ गाल में लाल मसा हो तो मिष्टान्नदायक है। हृदय में तिल स्त्री को सौमाग्यदायक होना है। जिसके १ यस्या: कुटिल केशाश्च नेत्रमुन्पलसन्निभम् । नाभिश्च दक्षिणावर्ता सा नारी सुस्रमेधने। अतिनीला स्निग्धकेशी सुमुस्री च सुमध्यमा । सुभ्न जंघा सुनासा च सा कन्न सुखमेधते॥ या सुवर्णा प्रसन्नाक्षी सुलोमा च मृदूदरी। पद्मपत्रसमाक्ती च पुत्रैः सार्ध प्रवर्धने। पृथमखएड दाहिने स्तन में लाल तिल हो तो वह स्त्री चार कन्याओं को पैदा कर पीछे तीन पुत्रों को उपजाती है॥। २३-२४।। तिलकं लाञ्छनं शोएं यस्या वामे कुचे भवेत् ॥ २५ ॥ एकं पुत्रं प्रसूयादौ ततः सा विधवा भवेत्। गुह्यस्य दक्षिणे भागे तिलकं यदि योषितः ॥ २६ ॥ तदा च्तितिपतेः पत्नी सूते वा चितिपं सुतम्। जिसके बायें कुच पर लाल तिल हो वह स्त्री पहले एक पुत्र को पैदाकर विधवा हो जाती है। जिसकी गुदा की दाहिनी तरफ़ तिलका निशान हो वह स्त्री रानी अथवा पृथ्वीपालक पुत्र की मा होती है।। २५-२६ ।। नासाग्रे मशकः शोणो महिष्या एव जायते ॥ २७॥ कृष्णः स एव भर्तृध्न्याः पुंश्चल्याश्च प्रकीर्तितः । नाभेरधस्तात्तिलकं मशको लाञ्छनंशुभम् ॥ २८॥ मशकस्तिलकं चिह्नं गुल्फदेशे दरिद्रकृत। जिसकी नासिका के अग्रभाग में लाल मसे का निशान हो, वह पटरानी होती है। जिसकी नासिका के अग्रभाग में काला तिल हो, वह पति को मारती तथा व्यभिचारिखी हो जाती है। अगर नाभि के नीचे तिल या मसा हो तो शुभदायक होता है। अगर टखनों (गंठों) में मसा या तिल हो तो दरिद्रकारी जानना चाहिये॥ २७-२८॥। करे कर्णों कपोले वा करठे वामे भवेद्यदि॥ २६ ॥ एपां त्रयाणामेकन्तु प्राग्गर्में पुत्रदं भवेत्। भालगेन त्रिशूलेन निर्मितेन स्वयंभुवा ॥ ३०॥ नितम्बिनीसहस्राणां स्वामित्वं योषिदामुयात्। जिसके हाथ, कान, कपोल या कएठ के बाई तरफ़ मसा या तिल हो उसे पहले गर्भ में ही पुत्र प्राप्त होता है। जिसके माल में त्रिशूल का निशान हो वह स्त्री हज़ारों स्रियों की स्वामिनी होती है॥ २६-३०॥ सामुद्रकशास्त्न सुसा परस्परं या तु दन्तान् किटकिटायते॥ ३१ ॥ सुलच्मापि न सा शस्ता या किंचित्मलपेत्तथा। पायौ प्रदत्िणावर्तो धम्यो वामो न शोभनः ॥। ३२।। निद्रा ममय जो परस्पर दाँतों को किटकिटाती है वड शुभ लक्षगों- वाली होकर भी भली नहीं होती। वैसे ही सोती हुई जो चका करती है वह भी गुमहायक नहीं। जिसके हाथ में रोम दहिनावर्त हो तो वह धर्मशील होता है। अगर हाथ में रोमों का वामावर्त हो तो शुभदायक नहीं होता ।। ३१-३२ ।। नाभौ श्रुतावुरसि च दक्षिणावर्त ईडितः । सुखाय दक्ि पावर्तः पृष्ठवंशस्य दच्िणे॥ ३३ ॥ अ्न्तः पृष्ठं नाभिसमो बह्वायुः पुत्रवर्धनः। राजपतन्याः प्रदश्येत भगमौलौ प्रदत्िषः ॥ ३४।। नाभि, कान और छाती में रोमों या रेखाओं का दद्दिनावर्त प्रतीत हाना स्त्रोको गुमदायरू होता है। जो पृष्ठवंश की दाहिनी तरफ़ दहिनावर्त प्रतीत हो तो सुगदायक होता है। जिसकी पीठ के बीच में नामि के समान गोलाकार निशान हो तो वह बड़ी आयु देता तथा पुत्रों को बढ़ाता है। जिसकी योनि के ऊपर के भाग में या योनि की जड़ में दहिनावर्त पतीत हो वह स्त्रो रानी होती है।। ३३-३४ ।। स चेच्छकटभङ्ग: स्याद्वह्वपत्यसुखप्रदः। कटिगो गुह्यवेधेन पत्यपत्यनिपातनः ॥ ३५॥ स्यातामुदरवेधेन पृष्ठावर्तौ न शोभनौ। एकेन हन्ति भर्तारं भवेदन्येन पुंश्चली ॥ ३६॥। जिसकी योनिके ऊपर या नीचे के भाग में रोमों या रेखाओं का छकड़ेकासा निशान हो वह बहुन से सन्नानों का देकर सुखदायक होता है। जो गुदा को वेघकर यानी उदरपर्यन्त आकर कमर तक हो तो उस स्त्री के स्वामी व सन्तानों को मारकर गिरा देता है। अगर पीठ में उदर को वेधन कर दो आवर्त हों तो शुमदायक नहीं होते। यदि एक ही आवर्त हो तो वह स्वामी को नाशती है। जो दूमरा आवर्त प्रतीत हो तो वह स्त्री व्यभि- चारिरी होजाती है॥ ३५-३६॥ इनि स्कन्दपुराणकाशीखएडे स्त्रीणं लक्षराम्। स्कन्द उवाच सुलक्षसापि दुश्शीला कुलक्षणशिरोमणिः । अलक्षणापि सा साध्यी सर्व- लक्षणाभूस्तु सा। सुलक्षणा सुचरित्रा स्वाधीना पतिदेवता। विश्चेशानुग्रहा- देव गृहे योषिदवाष्यते।। अगस्त्यजी से स्वामिकार्त्तिकजी कहते हैं कि, अच्छे लक्षणीवाली स्त्री भी वुरे स्व्रभाव वाली होकर कुलक्षणों की शिरोमणि होजाती है। लक्षणों से हीन स्त्री भी पतिव्रता होजाती है। वह सर्वलक्षणो की भूमि (आश्रय) कहाती है। अब प्रसंगवश + ग्रन्थान्तर से लक्षणों व कुलक्षणों को कहते हैं- "पझिनी १ [ पद्मगन्धाच मीनगन्धा च ] चित्रिसी २। शब्धिनी ३[क्षार- गन्धा च मदगन्धा च ]इस्तिनी।४। इंसपुन्नागवर्णाभा या नारी रक्लोचना। अष्टौ जनयते पुत्रान्प्राप्नोति परमं सुखम् ॥ काकस्वरा काकजह्ा तथैवोर्ध्य- स्वरा तथा। लम्बोष्ठी लम्बवदना तां कन्यां परिवर्जयेत्॥ हंसतुल्यगतिर्नारी राजपत्नी च सा भवेत्। यस्या गमनमात्रेण भूमिकम्पः प्रजायते ॥ सा स्त्री दैन्यकरी शेया सामुद्रवचनं यथा। आवर्तः प्रजने यस्या मध्ये चैव प्रदत्तियः॥ एकं सा जनयेत्पुत्रं राजानं पृथिवीपतिम्।" पत्मिनी पम्म की सुगंधवाली; चित्रिसी मछली की सी गन्धवाली: शक्गिनी क्षारगन्धवाली तथा हस्तिनी मद की गन्धवाली कहाती है। जो स्त्री हंस व नागकेसर के वर्णवाली, लाल लोचनोंवाली हो तो आठ पुत्र उपजाती तथा परम सुख पाती है। काकस्वरवाली, काकजङ्गावाली, ऊँचे स्घरवाली, लम्बे होठोंवाली, और लम्बे बदनवाली स्त्री त्याज्य है। जो स्त्री हंस गमनवाली, हो तो वह रानी होती है। जिसके गमन से पृथ्वी काँपती हो वह दुःख- कारिसी जानना चाहिये। जिसके गर्भ या कमर में रोमों या रेखाओं का दहिनावर्त प्रतीत हो वह राजरूप पृथ्वीपालक पुत्र उपजाती है। यह कोकशासत्र का विषय है। सामुद्रक और इस शाखत्र से घनिष संबंध है। इसका विवेचन अन्यत्र पढ़िये। संपादक। हस्तरेखाविचार अथातः संप्रवक्षामि कररेखाविचारणय्। श्रूयतां देवदेवेशि सज्नानन्दकारणम्।। १ ॥ वामभागे तु नारीणां दक्षिण पुरुषस्य च। निर्दिष्टं लक्षणं तेषां समुद्रेण यथोदितम् ॥ २ ॥ शिवजी बोले, हे मिये ! अब इसके उपरान्त तुम्हें हस्तरेखा का विचार सुनाता हूँ। यह विद्ज्नों के आनन्द का कारण है। समुद्र के कथनानुसार नारियों के वाम हाथ तथा पुरुषों के दाहिने हाथ में रेखाओं का लक्षस बतलाया है॥ १-२॥ # पूर्वभायुः परीक्षेत पश्चाह्मक्षणमेव च। आयुर्हीनं नराणां चेल्वक्षणै: किं प्रयोजनम्॥ २॥
- यहाँ यह बात बताना अत्यावश्यक है कि भारतीय सामुद्रक मर्मशों ने पुरुषों के दाहिने तथा स्त्रियों के बायें हाथ एवं अंग-प्रत्यंगों पर विचार करना आवश्यक बताया है। इधर विदेशी विद्वानों का कथन है कि पुरुष तथा स्त्रियों के दोनों हाथ देखना आवश्यक है। पर भेद केवल यह है कि दाहिना हाथ फार्यों का द्योतक है और वायाँ हाथ विचारसमूहों का। साथ ही उनका कथन है कि यदि कोई घटना दोनों हाथों में एक समय दिखे तो उसका होना अवश्यम्भावी है। अब देखना यह है कि इनमें किसका कथन सत्य है। शरीर की रचना पर यदि विचार किया जाय तो यह ज्ञात हो सकेगा कि मस्तिष्क एवं हाथों से कितना घनिष्ठ संबंध है। कुछ स्नायु ऐसे हैं जो सीधे मस्तक के प्रधानदेश से सम्बद्ध हैं। हाँ, दाहिनी तथा वायी ओर विभिन्नता अवश्य है। उधर पुरुषों एवं स्त्रियों की शरीर-रचना में बड़ा अन्तर है। एलोपैथिक, होम्योपैथिक, क्रोमोपैथिक और आयुर्वेदिक विद्वानों के शरीर- रचना-मत पर बहुत कम अन्तर है। प्रायः प्रधान बातें एवं तथ्य वस्तुओं के पथनिर्देश की समानता है। इन सब बातों पर भलीभाँति हमने विचार किया है और देशी व विदेशी दोनों मतों में सत्य का अंश पाया है। अब तक हमें जिन सहस्रों हाथों के देखने का अनुभव हुआ है उनमें पुरुषों के दाहिने तथा स्त्रियों के बायें हाथ देखना ठीक जान पड़ा है। जिन घटनाओं का चित्रण दोनों हाथों पर मिला है वे निश्चय ही होती है। यह हमारा भी मत है। पर दोनों हाथ देखना बहुत ज़रूरी है। इस विषय पर अधिक जानने के लिए -- "-सामुद्रकशास्त्र का दूसरा खरड" देखिये। सम्पादक। मथमखरड पहले आयु की परीत्षा करे। फिर लक्षगों का विचार करे। जो आयु ही नहीं है तो लक्षणों से कौन लाभ ।। ३ ॥ प्नामिका पूर्वमूले कनिष्ठादिकमेण चेत। आयु्ष दशवर्पाणि समुद्रवचनं यथा ॥ ४ ॥ जिसके करवल में कनिष्रा अंगुली के मूल से चलकर अनाभिका- मूल के पूर्वभाग में आयुरेखा प्रतीत हो, उसकी दश वर्ष की आयु होती है।। ४ ॥ ( देखो चित्र नं० १३ अ. ब.) अङ्गप्वस्याप्यूर्ध्व रेखा वर्तते नृपतिःशुभा। सेनापतिर्धनेशश्र मध्यमायुर्नरो भवेत् ॥ ५ ॥ जिसके करतल में अँगूठे के ऊपर शुभलक्षणाङ्गित ऊर्ध्बरेखा (फेटलाइन) हो तो वह राजा तथा सेनापति (फ़ीज का सरदार) और धनशाली हो- कर मध्यम आयु (६४।६०।५० वर्ष की उमर) वाला होता है॥ ५ ॥ येषां पारायूर्ध्वरेखा स्यात्कनिष्ठामूलसंस्थिता। ते नराः परदेशेषु शतमायुर्लभन्ति वै॥ ६॥ जिनके करतल में ऊर्ध्बरेखा कनिष्ठा अंगुली के मूल में हो वे परदेश में बसते और सौ वर्ष की आयु पाते हैं ॥ ६ ॥ आयुष्मती भवेदेखा तर्जनीमूलसंस्थिता। शतवर्ष भवेदायुः सुखमृत्युर्न संशयः।।७। जिसके करतल में आयुरेखा चलकर तर्जनी अंगुली के मूल तक हो वह सौ वर्ष जीता तथा सुख से मरता है ॥ ७ ॥ (देखो अ ल. चित्र११) मध्यमामूलपर्यन्तमायुरेखा च दृश्यते। चतुर्दशचतुर्विशत्यायुर्बलविनाशनम् ॥८ ॥ जिसके करतल में आयुरेखा मध्यमा अंगुली के मूलपर्यन्त हो तो वह अड़तीस वर्ष जीता है ॥८ ॥ (देखो अ. ग. चित्र ११) आयुर्वलं भवेद्रेखानामिकामूलसंस्थिता। त्रिदशं वा त्रिषष्टिं वा आयुर्बलविनाशनम्॥ ६॥ सामुद्रकशास्त्न जिसके करतल में आयुरेखा अनामिका अंगुली के मूल तक हो वह तीस वर्ष या तिरसठ वर्ष जीता है।। ६ ॥ (देखो अ्. स. चित्र ११) आयुर्हीनं यथास्वल्पं बहुदीर्घ च दृश्यते। ते नरा: सुखदुःखेन चाल्पमृत्युर्न संशयः ॥१० ॥ जिनके हाथ पर आयुरेखा बहुत छोटी हो वे आयुहीन होते हैं। जिनकी आयुरेखा बड़ी हो वे सुख अथवा दुःख से जीते हैं ॥ १०॥ कनिष्ठामूलरेखा तु कुर्याचैव शतायुषम्। अनामिकामध्यमाभ्यामन्तरे संयुता सती ॥११॥ जिसकी आयुरेखा अनामिका व मध्यमा के बीच में संयुक्क होती हुई प्रतीत हो, वह सौ वर्ष की आयुवाला है। ११ ।। ऊना ऊनायुषं कुर्याद्रेखाश्चाङ्गष्ठमूलगाः । बृहत्यः पुत्रदाः चीणाः प्रमदाः परिकीर्तिताः ॥१२॥ जिसकी आयुरेखा अनामिका व मध्यमा के बीच कम हो वह कम उमर वाला है। यदि अँगूठे के मूल में बड़ी रेखायें हों तो वे पुत्रदायक होती हैं। जो चीख रेखा हों तो कन्यायें कहाती हैं। यानी अँगूठे के मूल में जितनी बड़ी रेखा हो उतने ही पुत्र और जितनी छोटी रेखा हों उतनीही कन्याएँ जन्मती हैं। उन रेखाओं में छोटी या जड़ी रेखा जितनी कटीसी हों उतनेही कन्या व पुत्र मरजाते हैं ॥। १२ ॥ (क. ख. ग. देखो चित्र नं० ११ ) कनिष्ठाङ्गलिदेशात्तु रेखा गच्छति तर्जनीम्। अविच्छिन्ना भवेद्यस्य शतमायुर्विनिर्दिशेत् ॥१३॥ जिसकी आयुरेखा अविच्छिन हो तथा कनिष्ठा अंगुली से तर्जनी तक हो उसकी सौ वर्ष की आयु कहे। १३ ॥ (देखो त्र. ख. चित्र ११) कनिष्ठङ्गलिमध्यस्था रेखा चेदवतिष्ठति। ऊर्ध्वच्छिन्ना भवेद्यस्य विंशत्यायुर्विनिर्दिशेत्।१४।। जिसकी आयुरेखा कनिष्ठा अंगुली के बीच में हो और उसका ऊपर का भाग कटासा हो वह बीस वर्ष पर्यन्त जाता है ॥ १४॥ पथमखएड कनिष्ठाङ्कुलिमूलं वा रेखा गच्छति मध्यमाम्। अविच्छिन्ना भवेद्यस्याशीतिस्तस्य विनिर्दिशेत्॥ १५॥ जिसकी आयुरेखा कनिष्टा अंगुली के मूल से चलकर मध्यमा पयन्त पहुँचकर छ्िन्न भिन्न हो वह अस्सी वर्ष पर्यन्त जीता है॥ १५ ॥ कनिष्ठाङ्गलिमूले तु रेखा गच्छत्यनामिकाम्। अविच्छिन्ना भवद्यस्य चत्वारिंशत्स जीवति ॥१६॥ जिसकी आयुरेखा कनिष्टा अंगुली के मूल से अनामिका पर्यन्त गई हो और यदि वह रेखा छ्विन्न-भिन्न हो तो वह चालीस वर्ष पर्यन्त जीता है ॥१६॥ तर्जन्या मध्यमाङ्गल्या आयुरेखा तु मध्यतः। संप्राप्ता या भवेच्चैव स जीवेच्छरदः शतम् ॥१७॥ जिसकी आयुरेखा तर्जनी व मध्यमा के बीच तक भलीमाँति पहुँची हो वह सौवर्प पर्यन्त जीता है॥ १७ ।। प्रदेशिनीगता रेखा कनिष्ठामूलगामिनी। शतायुषं च कुरुते छिन्नया तरुतो भयम् ॥ १८ ॥ जिसकी आयुरेखा कनिष्ठा के मूल से तर्जनी के मूल पर्यन्त हो तो वह उसको सौ वर्ष की उमरवाला करती है। यति आयुरेखा छिन्न-भिन्न हो तो उसको वृक्ष से गिरने का भय होता है॥ १८ ॥ कनिष्ठा तर्जनी यावद्रेखा भवति चाक्षता। विंशत्यब्दादिकशतं नरो जीवत्यनामयः ॥१६॥ जिसकी आयुरेखां अच्छिन होकर कनिष्ठा अंगुली के मूल से आरम्भ होकर तर्जनी तक हो तो वह निरोगी तथा एक सौ बीस वर्ष पर्यन्त जीता है। १२ ॥ ( देखो अ्र्प्र. म. चित्र ११) कनिष्ठनामिकायां चेद्रेखा भवति चाक्षता। पष्टिं पञ्चाशदब्दं वा नरो जीवत्यसंशयः ॥२०॥ जिसकी आयुरेखा कनिष्ठा अंगुली के मूल से चलकर अनामिका के मूल में जा मिले वह निस्सन्देह पचास वर्प पर्यन्त जीता है॥ २० ॥ (देखो अ्र. भ. चित्र ११) रेखया भिद्यते रेखा स्वल्पायुश्च भवेन्नरः । यत्संख्या भिद्यते रेखा अपमृत्युश्च तङ्भवेत् ॥ २१ ॥ जिसकी आयुरेखा किसी छोटी रेखा से कटी हो वह थोड़ी उमरवाला होता है। जितनी छोटी रेखाओं से आयुरेखा कटी हो उतनीही उस पाखी की अल्पायु होती है।। २१ ॥ (देखो ड. उ. चित्र ११) यस्य मीनसमा रेखा कर्मसिद्धिश्च जायते। धनाव्यश्च स विज्ञेयो बहुपुत्रो न संशयः ॥२२॥ जिसके करतल में मछली के समान रेखा हो, उसके कमी की सिद्धि होती है, और उसे निस्संदेह धन व पुत्रोंवाला जानना चाहिये॥ २२॥ (देखो छ. छ. चित्र ११) तुला ग्रामं तथा वञ्रं करमध्ये च दृश्यते। तस्य वाणिज्यसिद्धिः स्यात्पुरुषस्य न संशयः॥२३॥ जिसके करतल में तराज, चतुष्कोणचिह्न तथा वज्र का चिह्न हो तो वह बनिये का व्यापार करता है॥ २३॥ पद्मचापादिखज्ञश्च अष्टकोणादि दृश्यते। स्रियाश्च पुरुषस्यापि धनवान्स सुखी नरः ॥ २४ ॥ जिसके करतल में पद, धनुप आदि तथा खज्ग और अष्टकोणदि चिह्न पतीत हों वह धनी व सुखी होता है। गदि खी के करतल में पूर्वोक़ पदम आदि निशान हों वह स्त्री धनी व सुखशालिनी होती है। परन्तु विशे- पता से जिस स्त्री-पुरुप के करतल में पद्म का ही निशान हो वह खी रानी व पुरुप राजा होता है। जिसके करतल में धनुप का निशान हो वह पुरुप महावीर होता है। तलवार का निशान हो तो वह पुरुप महा योद्धा होता है। यदि अष्टकोण हो तो वह भूपति या ग्रामपति होता है॥ २४ ॥ शङ्गचक्रध्वजाकारो नासाकारश्च दृश्यते। सर्वविद्याप्रदानन बुद्धिमान्स भवेन्नरः ॥ २५ ॥ जिसके करतल में शंख, चक्र, ध्वजाकार या नासाकार निशान हों, वह सकलशास्त्रपारदर्शी तथा ज्ञानी कहाता है॥ २५॥ त्रिशूलं करमध्ये तु तेन राजा प्रवर्तते। यज्ञे धर्मे च दाने च देवद्धिजप्रपूजने ॥ २६ ॥ जिसके हाथ में त्रिशून का निशान हो वह राजा होता तथा यज्ञ, धर्म, दान व देवता तथा व्राह्मणों के पूजन में लगा रहता है॥ २६॥ शक्कितोमरवाश्चेत्करमध्ये प्रदृश्यते। रथचक्रध्वजाकारः स च राज्यं लभेन्नरः ॥२७॥ जिसके करतल में शक्ति (बरछी, सांग, भाला या यष्टि), तोमर (गुर्ज), बाय, रथ, चक्र और ध्वजा ( पताका, फएडी) के निशान हों वह राज्य पाता है।। २७ ॥ अङ्कशं कुरडलं छत्रं यस्य पाणितले भवेत्। तस्य राज्यं महाश्रेष्ठं सामुद्रवचनं यथा ॥२८॥ जिसके करतल में अङ्डश, कुएडल और छाता इन तीनों का निशान हो वह चक्रवर्ती महाराजा होता है। ऐसा नीरसमुद्रवासी भगवान् नारायण ने कहा है।। २८ ।। गिरिकङ्कणयोनीनां नरमुडघटस्य च। करे वै यस्य चिह्नानि राजमन्त्री भवेन्नरः॥ २६ ॥ जिसके करतल में पर्वत, कङ्ण, योनि, नरमुएड और घट (घड़ा) के निशान हों, वह राजमन्त्री होता है॥ २६॥ सूर्य चन्द्रलतानेत्रमष्टकोणत्रिकोणकम्। मन्दिराश्वगजेन्द्राणां चिह्ने स्यात्स सुखी नरः ॥३०॥ जिसके करतल में सूर्य, चन्द्र, लता, नेत्र, अष्टकोण, त्रिकोण, मन्दिर, घोड़ा और गजराज इनका निशान हो वह सुखी रहता है।। ३०। गता पाषितले या च सोर्ध्वरेखा स्मृता बुधैः। स्त्रीणां पुंसां तथा चैव राज्याय च सुखाय च।। पुत्र पौत्रादिसम्पन्ना चोर्ध्वरेखा शुभप्रदा ।। ३१ ॥। मशिबन्ध (कब्ज़े) से निकली रेखा को सामुद्रकशास्त्रवेरेत्ता पषिडतगणों ने ऊर्ध्वरेखा (फेट लाइन) कहा है। यदि स्त्रियों व पुरुषों के करतल में ऊर्ध्वरेखा देखी जाय तो राज्य और सुख के लिए होती है। वह पुत्र पौत्रादिकों से सम्पन्न करती तथा शुभदायक होती है ॥ ३? ॥ भाई तर्जनीमूलपर्यन्तमूर्ध्वरेखा च दृश्यते। राजदूतो भवेत्तस्य धर्मनाशो हि जायते ॥ ३२ ॥ जिसके करतल में ऊर्ध्वरेखा तर्जनी की मूल तक दिखे वह राजाओं का दूत होता है और उसके ध का विनाश भी हो जाता है॥ ३२॥ (देखो क. ख. चित्र नं० १२) मध्यमामूलपर्यन्तमूर्ध्वरेखा व दृश्यते। पुत्रपोत्रादिसम्पन्नो धनवान्स सुखी नरः ॥ ३३ ॥ जिसके करतल में ऊर्ध्बरेखा (भाग्यरेखा) मध्यमा अंगुली के मूल- पर्यन्त हो तो वह पुत्र पौत्रादिकों से संपन्न, धनवान् तथा सुखी रहता है।३ ॥ (देखी भ. छ. चित्र नं० ११) अ्नामिकोर्ध्वरेखायां व्यवसायधनागमः । सुखदुःखेन जीवेत पुत्रपौत्रगृहादिमान् ॥ ३४॥ जिसके करतल में ऊर्ध्वरेखा अ्रनामिका के मूल में हो वह रोजगार से धन पाता और पुत्रों व पौत्रों से सम्पन्न शुभ गृहवाला होता और सुख व दुःख से जीता है॥ ३४ ॥ ( देखो ग. ख. चित्र नं० १२) रखाभिर्वहुभिर्दुःखं स्वल्पाभिर्धनहीनताम्। रक्काभिः श्रियमाप्नोति कृष्णाभिः प्रेष्यतां ब्रजेत् ॥३५॥ जिसके करतल में बहुत सी रेखाएँ हों वह दुःख पाता है। जिसके कर- तल में थोड़ी रेखाएँ हों वह निर्धन होता है। जिसके करतल में रक्र- वर्ग रेखाएँ होँ वह सुखी होता एवं लक्ष्मी पाता है। जिसके करतल में काली रेखाएँ हों वह क्लेशभागी तथा दासत्व पाता है॥ ३५॥ अङ्कशं कुलिशं छत्रं यस्य पाणितले भवेत्। तस्येश्वर्य विनिर्दिष््मशीत्यायुर्भवेद्ध्रुवम् ॥ पुत्रं प्रसूयते नारी नरेन्द्रं लभते पतिम्॥ ३६ ॥ जिसके करतल में अक्कुश, वज्र और छाते का निशान हो उसको ऐश्वर्य मिलता है। निश्चय ही वह अस्सीवर्ष की उमरवाला होता है। यदि स्त्री के करतल में पूर्वोक निशान हों तो वह नरेन्द्रपत्री तथा राजकुमार की माता होती है।। ३६ ॥ धनुर्यस्य भवेत्पाणौ पङ्कजं वाथ तोरणम्। तस्यैश्वर्य च राज्यं च अशीत्यायुर्भवेद्ध्रुवम्॥३७॥ जिसके करतल में धनुप, कमल और तोरण का निशान हो उसको विदेशी विद्वानों का मत है कि अधिक रेखावाला विचारसमूहाँ अथया कल्पनाओं का घर है। साथ ही वह कमज़ोर दिल का तथा भावुक भी होता है। इस पर साधारश घटनाएँ भी काफ़ी घसर करती हैं। दरिद्र होने की वात का वे पुष्टीकरण नहीं करने। संपादक सामुद्रकशास्त् ऐश्वर्य व राज्य प्राप्त होता है। वह निश्चय कर अस्सी वर्ष की उमरवाला होता है।। ३७ ।। कनिष्ठायां स्थिता रखा संख्या यावतिका: स्मृताः। तावत्यः पुरुषाणं च नार्यः सन्ति विनिश्चितम् ॥३८॥ करतल में कनिष्ठा अंगुली के नीचे जितनी रेखाएँ हों उतनी ही उन पुरुषों की स्त्रियाँ होती हैं। ऐसे ही स्त्रियों की कनिष्ठा में जितनी रेखाएँ प्रतीत हों उनके उतने ही पुरुप होते हैं ॥ ३८ ॥ (देखो ज.ज.चित्र नं० ११ ) करमध्यगता रेखा ध्रुवा ऊर्ध्वम्भवेद्यदि। नृपो वा नृपतुल्यो वा चिरंख्यातोर्थवान्भवेत्॥ ३६। जिसके करतल में मशिबन्ध से उठी रेखा पूर्ण ऊपरले भाग में चली जाय वह राजा अथवा राजा के समान तथा बहुत कालपर्यन्त विख्यात एवं धनवान् होता है॥ ३६॥ मत्स्यपुच्छप्रकीर्षन विद्यावित्तममन्वितः । पितुः पितामहादीनां धनं स लभते नरः॥ पितामहस्य वा किञ्चिद्धनं च लभते ध्रुवम्॥ ४० ॥ जिसके करतल में मछली की पूछ का निशान हो वह विद्या व धन से युक्क होता एवं पिता व पितामहादिकों का धन पाता है॥ ४० ॥ अयवस्य कुतो विद्या मत्स्यहीने कुतो धनम्। अपुच्छस्य कुतो विद्या अयवस्य कुतो धनम्॥ ऊर्ध्वरेखाविहीनस्य कुतो राज्यं कुतो यशः ॥। ४१ ॥ जिसके करतल में यव का निशानन हो उसकोविद्या कहाँ से मिल सकनी है। जिसके करतल में मत्स्यरेखा न हो उसको कहाँ से धन मिल सकता है। जिमके करतल में मद्दली की पूँछ का निशान नहीं हो उसको कहाँ से विद्या मिल सकती है। जिसके करवल में यत (जौ) का निशान नहो उसको कहाँ से धन मिल सकता है। जिमके करतल में ऊध्रेखा न हो उसको कहाँ से राज्य अथवा यश मिल सकता है ॥ ४॥ पथमखएड एकमुद्रो भवेद्राजा द्विमुद्रो धनवान्नरः। त्रिपुद्रो रोगसंपन्नो बहुमुद्रो बहुप्रजः ॥ ४२ ॥ जिसके करतल में एक मृद्रा का निशान हो वह राजा होता है। जिसके करतल में दो मुद्राओं का चिह्न हो वह धनवान होता है। जिसके करतल में तीन मुद्राएँ हों वह रोगी होता है। जिसके करतल में बडडत सी मुद्राएँ हों वह बहुत सी सन्तानोंवाला होता है॥ ४२॥ तर्जनीमूलगामिन्यां रेखायां छिद्रता यदि। श्वाविन्मूषिकमार्जारसर्पदष्टो भविष्यति॥४३॥ जिसके करतल में तर्जनी के मूल में गमन करती रेखा में यदि बेदसा हो वह साही, मूसा, विलार या साँप से डसा जाता है।। ४३॥ यस्य पाणितले रेखा पीवरा दृश्यते यदि। अविच्छिन्ना पादसौख्यं संपूर्ण च सुशोभनम् ॥४४॥ जिसके करतल में रेखा मोटी हो और यदि छ्िन्-भिन्न न हो तो वह पादसौख्य (पदोन्नति) पाता है। यदि सम्पूर्ण रेखा प्रतीत हो तो वह सुख सम्पत्ति पाता है॥ ४४ ॥ कनिष्ठामूलरेखाया: परतश्च तथाहि वै। भवन्ति रेखास्तावत्यः पुत्राः कन्याश्च निश्चिताः ॥ कन्या द्विमुखरेखायां एकस्यायां तथात्मजः॥ ४५ ॥ कनिष्टा के मूल (व्याह रेखा के अधोदेश) में जितनी खड़ी रेखाएँ हों उतने ही पुत्र अथवा कन्याएँ होती हैं। द्विमुखी रेखाओं में कन्या उपजती हैं और एकमुखी रेखा में पुत्र (देखो घ. घ. चित्र १२)।। ४५। ज्ञानरेखा च प्रथमा अङ्डष्टादनुवर्तते। मध्यमायां करे रेखा आयूरेखा प्रकीर्तिता॥।४६।।
- विदेशी अनेकों विद्वानों ने भी इसी स्थान पर की रेखाओं को पुत्र तथा कन्याओं की रेखाएँ माना है। किन्तु सामुद्रक में कहीं कहीं अँगूठे के मूल में भी इसी प्रकार पुत्र-पुत्रियों की रेखा मानी गई हैं। यह मतान्तर है। हमारा अनुभव है कि कनिष्ठा के मूल की रेखाओं से मानना अच्छा है। संपादक सामुद्रकशास्त्न अँगूठे के मूलदेश की पहली ज्ञानरेखा होती है। इसके बाद कनिष्ठा के मूल से चली मध्यमामूल पर्यन्त जो रेखा होती है उसको परिडतों ने आयु- रेखा कहा है।। ४६ ॥ ( मतान्तर में इसे हृदय सम्बन्धी अथवा संभोगरेखा भी कहते हैं। संपादक) घनाङ्कलिश्च सघनस्तिस्रो रेखाश्र यस्य वै। नृपते: करतलगा मणिबन्धे समुत्थिता ॥४७।। जिसकी अंगुलियाँ घनी हों वह धनी होता है। जिसके करतल में मणि- बन्ध से उठी तीन ऊर्ध्वरेखाएँ हो वह राजा होता है॥ ४७ ॥ युगमीनाङ्ितो यो वै भवेन्मन्त्रपदो नरः । वज्राकाराश्र धनिनां मत्स्यपुच्छनिभा वुघैः ॥४८॥ जिसके करतल में दो मछलियों की रेखाएँ हों वह मन्त्रों का मदाता अथवा याजिक होता है। जिनके करतल में वज्राकार निशान हों वे धनी होते हैं। जिनके करतल में मछली की पूँछ का निशान हो वे पलिडत होते हैं॥। ४८ ॥। यस्य पाणितले रेखा दीर्घाकारद्वयं भवेत्। युग्मे मुखे सुजातश्च अयुग्मे जारजो ध्रुवम्॥४६॥ जिसकी मातृ व पितृरेखा दोनों दीर्घाकार हों तथा आपस में जुड़ी सी हों वह निजवंश से उपजा हुआ होता है। यदि दोनों रेखाएँ भिन्न हों तो वह जारजात कहाता है।। ४६ ॥ (देखो त्र. त्र. चित्र नं० ११ और १२)# करमध्यस्थिता रेखा त्रयादूर्ध्वं भवेद्यदि। नृपो वा नृपतुल्यो वा चिरं ख्यातोऽर्थवान्भवेत्॥ ५० ॥ जिसके करतल में आयुरेखा, मातरेखा और पितृरेखा की अपेक्षा एक *"अङ्गष्ठमूलगा रेखा भ्रातृदा सुम्वदायिका" (इति समीचीनः पाठः) कनि- ष्ठांगुलिमू लाधोभागे वृहत्यः पुत्ररेखाः प्रतीयन्ते क्षद्रा: कन्यारेखाश्र दश्यन्ते तस्मान्मदुक्कपाठएवादर्तव्य इति दीर्घाकार ऊर्ध्वरेखा हो वह राजा अथवा राजा के समान बहुत विख्यात एवं धनी होता है॥ ५० ॥ *
- यद्यपियह कथन यहाँ कहा गया है, किन्तु आज तक हमें इसका अनुभव नहीं हुआ। इसके अतिरिक़ हमें ऐसे हाथों में जिनमें ऐसी रेखाएँ हो, अनेक विशेषताएँ मिली हैं। विदेशी विद्वान् भी उक्क मत नहीं मानते। हमारा तथा उनका मत बहुत कुछ मिलता है। एक अँग्रेज़ स्री का कथन है कि जिसकी आयुरेखा (पितृरेखा) तथा मस्तकरेखा (मातुरेखा) प्रारम्भ में न मिली हों वे बहादुर और दिलेर होते हैं। एक प्रसिद्ध अमेरिकन विद्वान् का मत है कि जब उक्कदोनों रेखाएँ अलग २ होतो पहले तो उसे आत्मविश्वासी समझना। ऐसा व्यक्ति स्वावलंबी तथा दूसरों के विचारों पर कभी निर्भर नहीं रहता, स्वयं सोच सकता है। स्वतंत्र तथा अपने बुद्धियल के भरोसे कार्य करता है। अपने विचारों में डढ़ होता है। और इस प्रकार यदि उक्क दोनों रेखाओं में बड़ा अन्तर न हो तो यह बहुत अच्छा चिद्न है। यदि वड़ा अंतर हो तो हिम्मत और स्व- विचार-प्रबलता के कारण कभी कभी वह कुछ का कुछ कर बैठने से मूर्ख कहाता है।. एक फ्रेंच विद्वान् कहता है कि ऐसा मनुष्य शीब्र विचार स्थिर कर लेता है और अपनी स्पष्टवादिता के कारण उसे कभी कभी पछताना पड़ता है। तुरन्त निर्णय कर लेने के स्वभाव के कारण उससे कभी २भयानक भूर्लेभी हो जाती हैं। यह बड़ा आत्मविश्वासी ोता है। इस प्रकार विभिन्न रूप में ये दोनों रेखाएँ लगभग सभी अमेरिकानिवासियों के हाथों में पाई जायँगी। ऐसे व्यक्ि बड़े यतशील होते हैं। यह चिह्न वकील या कानून-विशारदों, कलाविदों, प्रसिद्ध वक्ाओं, नाख्थकलाविदों और पंडितों ( पादरियों) के बड़े लाभ का है। या यों कहिए कि वे सभी लोग, जो जनता के समक्ष अपने विचारों को भावपूर्ण दिलेरी और माननीय युक्कियों द्वारा उपस्थित करें, उनके लिए यह चिह्न एक खास सहायता है। एक और दूसरे फ्रेंचशास्त्र-अनु- यायी अमेरिकन का कथन है कि कभी-कभी ऐसे व्यक्ति पत्रकार होते हैं। साथ ही ज़रा हठीले व भंभटी स्वभाव के भी होते हैं। यदि दोनों रेखाओं में अधिक अंतर हो तो आत्मविश्वास तथा शीघ्र-निर्राय-शक्ति के कारण उन्हें भंभट उठाना पड़े तथा वे मूर्ख कहावें। इस प्रकार तो हुए पाश्चात्य विद्वानों के मत। हमारा स्वयं अनुभव है कि ऐसे व्यक्ति आत्मविश्वासी तथा शीघ्र विचारक होते हैं। यह चिह्न उपर्युक व्यक्तियों को बड़ा लाभप्रद है। कभी कभी जल्दबाज़ी में ऐसे व्यक्ति भयानक भूलें कर बैठते हैं और फिर मूर्ख बनते हैं। अब प्रश्न उठता है कि यहाँ जारजात क्यों कहा गया। हमारे क़्याल से चूँकि ये दोनों रेखाएँ पिता-माता की रेखाएँ कही गई हैं, इसलिये जान पड़ता है कि इनकी विभिन्नता पिता-माता की विभिन्नता समझ ली गई है। सामुद्रकशास्त्न अङभुष्ठोदरमध्ये तु यवो यस्य विराजते। उत्पन्नावधिभोगी स्यात्स नरः सुखमेधते॥ ५१ ॥ मध्यमातर्जनीमूले यवो यस्य पदृश्यते। धनवान्सुखभोगी स्यात्पुत्रदारगृहादिमान् ॥ ५२ ॥ जिसके करतल में अंगूठे के भध्यभाग में जब का निशान हो वह जन्म पर्यत मोगी तथा सुखी होता है। मध्यमा व तर्जनी अंगुली के मूल में जब का निशान हो तो वह धनी सुखभोगी, पुत्र, ख्री व घरवाला होता है।५१-५२।। इन रेखाओं की उद्गम स्थान पर विभिन्नता देखकर इस प्रकार शायद जार- जात माना गया है। पर उपयुंक विदेशी मत देखने से तथा प्रत्यक्ष अनुभव करने से ऐसा जान नहीं पड़ता। हाँ, यह कहा जा सकता है कि ऐसी स्थिति में उस बालक के जन्म समय उसके पिता माता मेंन पटती होअथवा वे एक दूसरे से बहुत दूर हों। संभव है, पिता घर पर न हो, कहीं बाहर गया हो। हमारा यह कथन वैज्ञानिक मत से भी पुष्ट होता है। हथेली की रेखाएँ रक्कप्रवाह की धाराएँ है। प्रत्येक प्रधान रेखा मस्तिष्क प्रदेश के एक एक स्थल से एक विशेष संबंध रखती है, और उसी का परिणाम-स्वरूप उन रेखाओं का नामकरण है। पितृरेखा (आयुरेखा)तथा मातृरेखा (मस्ति- एक रेखा) एक विशेष प्रकार की विभिन्न धाराओं की प्रवाहिनी हैं। जय ये दोनों मिली होंगी तब उक्क दोनों धाराओं का प्रवाह मिलकर उसमें एक खास बात पैदा कर देता है। पर यदि दोनों अलग अलग हों तो उनमें अपने उद्गम स्थान में स्वतंत्र-प्रवाह-शक्ति है, अर्थात् वे स्वतंत्र रूप से अपनी शपनी क्रियाएँ करने में सफल हो सकती हैं। मस्तिष्क रेखा (मातृरेखा) स्वतंत्र प्रवाहिनी होने से उसमें स्वतंत्र विचार-विनिमय, स्वतंत्रता प्रियता तथा स्वा- वलंबन होना ही चाहिए। इसी प्रकार जीवनरेखा (पितृरेखा) स्वतंत्र होने से जीवनधारा की स्वतंत्रगति होनी चाहिए। मस्तिष्क का उस पर अधिकार न रहेगा। दोनों की स्वतंत्रता से मनमौजी होना और कभी कभी त्रुटि कर बैठना स्वाभाविक है। इससे यह ज्ञान हुआ कि जन्म समय उस व्यक्ति के माता पिता अलग अलग रहे हीं। अब ज़रा उयोनिप पर टष्टिडालिए। आपको ज्ञात छोगा कि कुछ नक्षत्र तथा ग्रह ऐसे हैं जो एक दूसरे के घिरोधी हैं और कुछ मैत्री भाववाले हैं। वे नक्षत्र जो परस्पर विरोधसृचक हैं, यदि जन्म समय में आबेतो पिता-माता में अ्वश्य विरोध होता है अ्रथवा पिता उस स्थान से अन्यत्र कहीं दूर पर होता है। इसका यह अर्थ नहीं कहा जा सकता कि वह उत्पन्न वालक जारजात है।पिता-माता को उसके जन्म समय मनमुटाव रखने से जारजात का कथन सिद्ध नहीं होता। कुछ भी हो, यह एक विचारपूर्ण विषय है। इस पर अन्य-अन्य विद्वान् पंडितों का मत भी सर्वथा वांछुनीय है। सम्पादक पथमखएड अङ्गष्ठोदरमध्ये तु रेखा यस्य यवाकृतिः । पद्मरखा भवेद्यस्य स नरः सुखमेधते॥ ५३ ॥ अङ्गष्ठांदरमध्ये तु कुणडलं यस्य दृश्यते। भोज्यमुत्पाद्यते तस्य प्रचुरं च सुखं भवेत्॥ ५४ ॥ जिसके करतल में अँगूठे के बीच यवाकार रेखा या कमल का निशान हो वह सुख पाता है। अँगूठे के बीच में कुएडल का निशान हो तो उसे भोग मिलता है॥ ५३-५४॥ दीच्षादानं यथाधर्म पदवीसुखमेव च। विद्यामानोपमानं च अङ्गुल्यामूलसंस्थिताः॥५५॥। कनिष्ठामूलसंयुक्का त्रिरेखा यस्य दृश्यते। एकं युग्मं तृतीयं च चतुर्थ बाएसम्मितम्। युग्मं वापि पृथग्वापि विपुलं भोगदायकम्॥ ५६ ॥ करतल में कनिष्ठा के मूलदेश में जितनी रेखाएँ हों उनका यह फल है कि एक रेखा हो तो वह दीक्षा देता है। दो रेखा हों तो दानी, तीन रेखाओं से धर्मात्या, चार से चौधरी, पाँच से सुखी, छः से विद्वान, सात से मानी और आठ से साधारख जन हठोता है। जिसके करतल में. कनिष्ठा के मूल से संयुक्त आयु-रेखा के वाम भांग में तीन रेखाएँ हों या एक, टो, तीन. चार व पाँच तथा दो ही रेखाएँ हों यानी जितनी रेखाएँ देखी जावें उतनी ही रमखियों के साथ वह विहार करता है। ऐसे ही यदि स्त्रियों के करतल में जितनी रेखाएँ हों उतने ही पुरुपों के साथ वे स्त्रियाँ भोग करती हैं ।। ५५-५६ ॥( देखो चित्र ११ ज. ज.) अङ्गष्ठानां पृथगरेखात्रितयं गरायते पृथक्। रखाद्वादशकं सौख्यं धनधान्यप्रदायकम् ॥५७ ॥ अङ्ुलीनां पृथग्रेखा गणने चेत्त्रयोदश। महादुःखं मनःक्ेशं सामुद्रवचनं यथा ॥ ५८ ॥ अँगूठे की रेखाओं को अलग कर अंगुलियों के पर्वों की तीनों स्थान सामुद्रकशास्न की रेखाएँ गिनी जावें और यदि गिनने में बाग्ह रेखाएँ हों तो उसे मौख्य, धन व धान्य देनी हैं। यदि तेरह हों तो वह महादुःख पाता है और यदि चौदह हें तो वह क्लेश भोगता है॥ ५७-५८॥ रखापञ्चदशे चौरः षोडशे दूतवञ्चरः। पापी सप्तदशे ज्ञेयो धर्मात्माउष्टादशे भवेत्॥ ५६ ॥। ऊनविंशे भवेन्मान्यो गुणज्ञो लोकपूजिनः । तपस्वी विंशतौ ज्ञेयो महात्मा चैकविशतौ ॥६० ॥ यदि पन्द्रह रेखाएँ हों तो वह चोर होना है। यदि मोलड हो तो आगी तथा छलिया होता है। यदि सत्रह हाँ तो पापी जानना चाहिए। यदि अट्ठारह हों तो धर्मात्मा होता है। यदि उत्नीस हों तो मान्य व गुगज्ञ तथा लोक में पूजित होना है। यदि बीम हों तो तपन्दी जानना चाहिए और यदि अंगुलियों के पोरों की रेखाएँ इकीस हों तो वह महात्मा होता है।। ५६-६० ॥ ताम्रेर्भूपो धनाव्यश्च अङ्ञशैः सयवैस्तथा। अङ्गष्ठमूलजैः पुत्री स्याद्ीर्घाङ्गलिपर्वकः ॥ ६१॥ दीर्घायुः सुभगश्रैव सधनो विरलाङ्गलिः। घनाङगलिश्च अधनस्तिस्रो रेखाश् यस्य वै। अ्ङुष्ठमूलगा रेखाः पुत्राश्र सुखदायकाः ॥६२ ॥ जिसके करतल में जब युक्त अँगूठा (देखो चित्र १२ ज.व.) ताम्रवर्ण हो वह घनशाली होता है। जिसके करतल में अंगुलियों को पोरें पढ़ी हों वह अधिक पुत्रोंवाला होता है। जिसकी अंगुलियाँ बरली हॉ वह धनशाली, बढ़भागो तथा दीर्घायु होता है। जिपका अंगुलियाँ घनी हों आर उनमें तीन २ रेखाएँ देखी जावें वह निर्धनी होता है। अँगूठे के मूल में बड़ी २ रेखाएँ पुत्रदायक व सुखायक होती हैं॥ ६१-६२॥ अङ्गछोदरमध्ये तु यतरो यस्य विराजितः । उन्नतं शोभनं तस् शतं जीवति मानवः ॥६३।। पथमखएड मध्यमायां यदि यवा दृश्यन्तेऽत्यन्तशोभनाः । तदान्यमंचिनं वित्तं प्रामोत्यङ्गष्ठगे यवे ॥ ६४ ॥ जिसके करतल में अँगूठे के बीच में जब का निशान हो वह ज्ञान, ध्यान व मान आदि में ऊँचा होता तथा सौ चरम जाता है। जिसक करतल में मध्यमा व अँगूठे में जब क निशान होँ वह दूसरे का जोड़ा हुआ धन पाता है॥ ६३-६४ ॥। यस्याथ चक्रमङ्गष्ठे यब: पझमं च दृश्यते। तदा पितामहादीनामर्जितं धनमामुयात्॥ ६५॥ जिसके अँगूठे में चक्र, जब या पझ का निशान देखा जावे वह पितामहा- दिकों के जोड़े हुए धन को गाता है॥ ६५ ॥ तर्जन्यामथ चक्रं च पितृद्वारा धनं लभेत्। तेनैव विपरीतन्तु व्ययो भवति निश्चितम् ॥ ६६ ॥ जिसके करतल में तर्जनी के पहले पर्व में चक्र का निशान हो वह मित्र द्वारा वा पितृ द्वारा धन पाता है, और यदि तर्जनी में चक्र का निशान न हो तो उसके धनका खर्चा पितृद्वाराया मित्रद्वागा निश्चयकर होता है।। ६६ ।। मध्यमायां स्थिते चक्रे देवद्वारा धनं लभेत्। तेनैत्र विपरीतं तु व्ययो भवति निश्चितम् ॥ ६७ ॥ अ्ररनामिकायां चक्रे तु सर्वद्वारा धनं लभेत्। तेनैव विपरीतं तु व्ययो भवति निश्चितम् ॥ ६८ ॥ जिसके करतल में मध्यमा की पहली पोर में चक्र का निशान हो वह देवद्वारा धन पाता है। यदि चक्र का निशान हो नो उसके धन का खर्चा देवद्वारा होता है। यदि अनामिका में चक्र का निशान हो तो मर्वजन द्वारा धन पाता है। यदि चक्र का निशान हो तो उसके धन का खर्चा सर्वजन द्वारा निश्चय कर होना है॥ ६७-६=॥ कनिश्यां भवेचकं वाणिज्येन धनं लभेत्। तेनैव विपरीतन्तु व्ययो भवति निश्चितम् ॥६६॥ अङ्गष्ठे कुलिशं चिह्नं यस्य पाशितले भवेत्। तोरणं पुयडरीकं च राज्यं तस्य भविष्यति॥७० ॥ जिसके करतल में कनिष्ठा के पहले पर्व में चक्र का निशान हो वह वनियों के व्यापार से धन पाना है; और यदि चक्र का निशान हो तो उसके धन का खर्चा वाशिज्य में निश्चय होता है। जिसके करनल में अँगूठे के चीच वज्र, तोरण व कमल का निशान हो उसे राज्य मिलता है॥६६-७०॥ मत्स्येनैकेन चैश्वर्यं सहस्रं लाभसंपदम्। पदमं शङ्धं विजानीयाद् व्यजनं चक्रमेव च॥ ७१॥ पझ्मे कोटिर्भवेच्छत्रे शङ्क कोटिशतानि च। लक्षाधिपश्च व्यजने चक्रे राजा न संशयः॥७२॥ जिसके करतल में एकमात्र मछली का निशान हो वह ऐश्वर्य पाता है। ऐसे ही पद, शङ्, पंखा और चक्र का निशान हो तो वह हज़ारों की संपत्ति पाता है। यदि छाता व पद का निशान हो तो वह 'कोटीश्वर' होता है। यदि शङ्ध का निशान हो तो वह 'शतकोटीश्वर' होना है। यदि पंखे का निशान हो तो वह 'लन्तेश्वर' होता है और यदि चक्र का निशान हो तो वह निस्सन्देह राजा होता है॥ ७१-७२ ॥ समस्ताङ्गुलिकानान्तु कोष्ठरेखा भवेद्यदि। तदा स्वर्णाङ्करीं दिव्यां चिरं स लभते ध्रुवम् ॥ ७३॥ पञ्चभिः सव्यकरगा नृपानैः पूरिताङ्गलीः । नृपाधिकारमाप्ोति बहुलाभकरः पुमान्॥७४॥ जिसके करतल में सारी अंगुलियों के बीच प्रकोष्ठ रेखा प्रतीत हो वह प्रागी बहुन समय तक दिव्य, स्वर्णमयी अँगूठी निश्चय कर पाता है। जिसके बायें हाथ की अंगुलियों में पाँच नृपान्त चिह्न हों वह राजाधि- कार को पाता है॥ ७३-७४॥