107. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — खत्नीकरलक्षण
खत्नीकरलक्षण
मृदुमध्योन्नतं रक्नं तलं पाएयोररन्धूकम्। प्रशस्तं शस्तरेखाव्यमल्परेखं शुभप्रदम् ॥ १ ॥ विधवा बहुरेखेण विरेखेण दरिद्रिणी। भिक्तुकी सुशिराब्येन नारीकरतलेन वै॥२ ॥ कोमल, बीच में ऊँचा, लालवर्ण, छिद्ररहित, प्रशस्त रेखायुक् नार्र का कर- तल प्रशस्त होता है। अल्परेखाओं से विभूपित हो तो शुभदायक होता है। जिसके करतल में बहुतसी रेखाएँ हों वह विधवा होती है। जिसके करतल में रेखाएँ ही न हों वह दरिद्रिणी होती है। जिसका करतल बडतसी नसों से घिरा हो वह भीख माँगनेवाली होती है । १-२ ॥ (बहुत अथवा कम रेखाओं पर हम पीछे लिख चुके हैं। सं० ) मत्स्येन सुभगा नारी स्वस्तिकेन च सुग्रजा। पझ्मेन भूपतेः पत्री जनयेदूपतिं सुतम् ॥ ३ ॥ चक्रवर्तिस्तियाः पाणौ नन्दावर्तप्रदत्िणः। शंखातपत्रकमठा राजमातृत्वसूचकाः ॥। ४ ॥ जिसके करतल में मछली का चिह्न हो वह स्त्री बड़े भाग्यवाली होती है। जिसमें त्रिकोणकार निशान हो वह अच्छी सन्नानोंवाली होती है। जिसके पद्म का निशान हो वह रानी तथा पृथ्वीपालक पुत्र की माता होती है। जिसके करतल में दत्षिणावर्त मएडल हो वह चक्रवर्ती की रानी होती है। जिसके करतलमें शंख, छत्र और धनुप का निशान हो वह स्त्री राजकुमारों की माता कहाती है# ॥ ३-४ ॥ कृपीबलस्य पत्नी स्याच्छकटेन युगेन वा। चामराङ्ुशकोदएडै राजपत्री भवेद् ध्रुवम् ॥ ५ ॥
- ऐसे चिह्नों के संबंध में भी हम पीछे टिप्पणी लिख आए हैं।-संपादक =६ अङ्ुश्वमूलान्निर्गत्य रेखा याति कनिष्ठिकाम्। यदि स्यात्पतिहन्त्री सा दूरतस्तां त्यजेत्सुधीः ॥ ६ ॥ जिसके करतल में गाड़े व जुएँ की रेखा प्रतीत हो वह किसान की पत्नी होती है। यदि कातल में चमर, अंकुश और धनुप का निशान हो तो वह निश्चय कर रानी होतो है। जिसके करतल में अँगूठे के मूल से निकलकर एक रेखा कनिष्ठा के समीप चली जावे वह स्त्री पति की मारनेवाली होती है, इसलिए एणिडतगख उसे दूर से ही त्याग करें॥ ५-६॥ (देखो चित्र नं० १३ अ. ब.) त्रिशलासिग दाशक्किदु-दुभ्याकृतिरेखया। नितम्बिनी कीर्तिमती करेण पृथिवीतले ॥७॥ जिसके करतल में त्रिशूल, तलवार, गदा, शेल या नगाड़े के आकार की रेखा हो वह स्त्री बड़ी यशस्वििनी होती है॥। ७ ॥ ध्वजचामरमालाभिः शैलकुएडलवेदिभिः॥८ ॥ शङ्गातपत्रपझ्मेश्च मत्स्यस्व्रस्तिकसद्रयैः । लक्षणैरङ्कुशादयैश्च स्त्रियः स्यू राजवल्लभाः ॥६॥ जिनके करतल में घोड़ा, हाथी, विल्वदृत्त, यज्ञस्तम्भ, वास, यव, गुर्ज, ध्वजा, चमर, माला, तुद्रपर्वत, कर्णभूपण, वेदी, शह्क, छाता, कमल, मछली, त्रिकोणकाररेखा, उत्तम रथ और अंकुशादि के लक्षण हों वे स्त्रियाँ रानियाँ होती हैं।८-॥ अल्पायुषे लघुच्छिन्ना दीर्घच्छिन्ना महायुषे। शुभं तु लक्षएं स्त्रीणां प्रोक्कं तु शुभमन्यथा ॥ १० ॥ अङ्कुशं कुरडलं चक्रं यस्याः पाणितले भवेत्। पुत्रं प्रसूयते नारी नरेन्द्रं लभते पतिम् ॥ ११॥ यदि अंगुष्ठ के निचले भाग में छोटी २ रेखाएँ छ्िन्न भिन्न हों तो अल्पायु जानना। यदि बड़ी रंखाएँ छिन्नभिन्न हों तो दार्घायु कहना। जिसके करनल में अंकुश, कुएडल और चक्र का निशान हो वह राजपति पाती तथा राजकुमार को उपजाती है॥ १०-११॥ यस्या: पाणितले रखाप्राकारं तोरणं भवेत्। अपि दासकुले जाता राजीत्वमधिगच्छति ॥१२॥ रक्ा व्यक्का गभीरा च स्निग्धा पूर्ण च वर्तुला। करगे्खाङ्गनायाः स्याच्छुभा भाग्यानुसारतः ॥१३॥। जिसके करतल में प्राकार (घेर) व तोरण के आकार की रेखाएँ हों वह स्ती यादि दासकुल में उपजी हो तो भी रानी होनी है। अगर स्त्री की हस्त- रंखाएँ लाल, रष्ट, गभीर, चिकनी, पूर्ण तथा गोलाकार हों तो भाग्या- नुसार शुभदायक होती हैं॥ १२-१३॥ तुलामानाकृतीरेखा वणिक्पत्नीत्वहेतुका। गजवाजिवृषाकारा करे वामे मृगी हशाम् ॥१४॥ पाणिपादतले रेखा ताम्रवर्णा नखानि च। जीववत्सा चिरंजीविपुत्रपोत्रसमन्विता ॥ १५ ।। यदि मृगनयनियों के करतल में तराजू तथा दएडाकृति रेखाएँ हों और वायें करतल में हाथी, घोड़ा तथा वैल के आकार की रेखाएँ हों तो वे स्त्रियाँ बनयों की रमणियाँ होनी हैं। जिसके करतल व पादतल में ताँचे के वर्ण की रेखा व नख हों वह स्त्री चिरजीवी व पुत्र-पौत्रों से युक् होती है ॥ १४-१५॥ रेखा प्रासादवज्राभा सूते तीर्थकरं सुतम् । कृषीबलस्य पत्नी स्याच्छकटेन मृगेन वा ॥ १६ ॥ यस्या: करतले पझमं पूर्णकुम्भं तथैव च। राजपत्रीत्वमाप्रोति पुत्रपोत्रेः प्रवर्तते ॥ १७॥ जिसके करतल में देवमन्दिर, राजमशल या वज्राकार निशान हो वह तीर्थकारी पुत्र की मा होती है। जिसके करतल में गाड़ी व हिरन का निशान हो वह किसान की पत्री होनी है। जिसके करतल में पद व पूर्ण कुम्भ का निशान हो वह राजपत्री होनी और पुत्र पौत्रों को पाती है॥ १६-१७ ।। בב वृद्धामूले च या रेखा भ्रातृभग्नीप्रदायिका। कृष्णा: सूच्मा: क्रमेशैव हीनाश्छिद्रपदायिकाः ॥१८॥। अँगूठे के मूल में जो रेखा हो वह भाई व बहिनों की दयोतक है। काली व क्रम से पतली रेखा भाई व भगिनियों को बिनाशती हैं॥ १८ ॥ अङ्गप्तमूलाद्यदि वै तु रेखा स्थूला तथा चक्रकृता च नारी। अवारिता पएडप्रचएडता च परान्विता शून्यहदा च खसिडता॥ जिसके करतल में अँगूठे के मूल से मध्यभाग पर्यन्त चक्राकार मोटी रेखा हो वह कुलटा, नष्ट स्व्रभाववाली, परपुरुपों में आसक्क तथा स्वाधीन रहती है॥। २६ ॥ यस्या: करतले पादे चोर्ध्वरेखा च दृश्यते। यदि नीचकुले जाता राजपत्री भवेद ध्रुवम् ॥२०॥ जिसके करतल या पादतल में ऊर्ध्बरेखा हो वह यदि नीच कुल में उपजी हो तो भी निश्चय कर राजपत्री होती है।। २० ॥ (देखो क. ख. चित्र १३ ) अनामिका भवेच्छिन्ना सा भवेत्कल हप्रिया। मध्यमा च भवेच्छिन्ना सा नारी कुलटा स्मृता ॥२१॥ तर्जनी च भवेच्छिन्ना विधवा सा प्रकीर्तिता। कनिष्ठ च भवेच्छिन्ना सा नारी दुःखभागिनी ॥२२॥ जिसके करतल में अनामिकास्थित रेखा छिन्नभिन्न प्रतीत हो तो वह बड़ी लड़ाका होती है। मध्यमास्थित रेखा कटी सी हो तो वह व्यभिचारिग्ी होती है। यदि तर्जनी स्थित रेखा टूटी सी हो तो वह विधवा कहाती है ; और यदि कनिष्ठास्थित रेखा भिन्न सी प्रतीत हो तो वह दुःखभागिनी होती है। २१-२२ ।।