108. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — नरनारीणं पढ़ायक्गादिलक्षणं
नरनारीणं पढ़ायक्गादिलक्षणं
चन्द्रार्ध कलशं त्रिकोणधनुषी खं गोष्पदं प्रोष्ठिकं शद्धं सव्यपदेऽथ दक्षिणपदे कोणाष्टकं स्वस्तिकम्। चक्रं छत्रयवाङ्कुशं ध्वजपवीजम्बूर्ध्वरेखाम्बुजं विभ्राणो हरिरूनविशति महालच्म्यार्चिताङ्गिर्भवेत् २३।। जिसके वामपाद में अर्धचन्द्र, कलश, त्रिकोण, धनु, शून्य, गोपद, मत्स्य शौर शङ् ये आठ चिह्न हों और दत्तियपाद में अष्टकोण, स्व्रस्तिक, चक्र, छाता, जब, अङ्कश, ध्वज, वज्र, जामुन, ऊर्ध्वरेखा और कमल ये ग्यारह चिह्न प्रतीत हों वह महालक्षमीसेवित चरखोंगला होता है, जैसे कि इन्हीं उन्नीस लक्षणों युक्त श्रीहरि श्रीलक्षमीजी द्वारा पूजित चरणोंवाले हैं ॥ २३॥ यस्य पादतले पद्मं चक्रं वाप्यथ तोरणम्। अङ्कुशं कुलिशं वापि से राजा भवति ध्रुवम् ॥२४॥ जिसके पादतल में पद, चक्र, तोरण, अंकुश और वज्न का निशान हो वह निश्चय राजा होता है॥ २४॥ यस्य वृद्धाङ्गुलेमूलात्पादे रेखा च दृश्यते। स राज्यं लभते नूनं भुङ्के निष्करटकां महीम् ॥ २५॥ असमं मूलदेशे तु वञ्रं यस्य तु दृश्यते। सामुद्रकशास्त् अविच्छिन्नं पदं चैव कुलश्रेष्ठो भवेन्नरः। अपरं पर्वरेखायां राज्यं च परिकीर्तितम्॥२६॥ जिसके पैर में ऊर्ध्वरेखा अँगूठे वे. मून से चलकर पादतल में फैली दिखे वह निश्चय ही राज्य पाता है। जिसके पादमूल में असमानाकार तथा अविच्छिन्न वज्र का चिह्न हो वह अपने वंश में प्रधान हाता है। यदि पैर के पोरों की रेखाओं के बीच दूसरी रेखा हो तो उसे राज्य मिलता है॥२५-२६॥