109. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — स्त्रीपद्तललक्षण
स्त्रीपद्तललक्षण (Part 1)
यस्याः पादतले रेखा सा भवेत्वितिपाङ्गना ॥२७॥ यस्याः पादतले रेखा सा भवेत्वितिपाङ्गना।। भवेदखएडभोगा च या मध्याङ्कुलिसंगता॥२८।। स्त्री के पादतल में चक्र, स्व्रस्तिक, शङ्ग, पद्म, ध्वरजा, मछली और छाना का निशान हो तो वह रानी होती है। जिसके पादनल में मध्यमा अंगुली पर्यन्त ऊर्ध्वरेखा हो वह राजरानी तथा अखसिडत भोगों को भोगनेवाली हो॥ २७-२८॥ निगूढगुल्फो चरणौ पद्मकान्तितलौ शुभौ। अस्वेदिनौ मृदुतलौ मत्स्याङ्कमकराहितौ॥ २६ ॥ वज्राब्जहलचिह्नं च दास्याः पादे सदा स्थितम्। राजपत्री तु सा ज्ञेया राजभोगप्रदायकम् ॥ ३०॥ छिपे गएठोंवाले, पदमकान्ति समान तलवाले, तथा पसीने से रहित, कोमल तलवेवाले एवं मछली व मगर के चिह्न से अद्कित चर स्त्री के लिए शुभदायक होते हैं। यदि दासी के पादतल में वज्र, कमल और हल का निशान हो तो भी उसे राजपत्नी जानना चाहिए। पूर्वोक वज्रादि चिह्न उस स्त्री के लिए राजभोगदायक होते हैं ॥ २६-३०॥ स्निग्धोन्नतौ ताम्रनखौ नार्याश्च चरणौ शुभौ। मत्स्याङ्कशाव्जचिह्नो च चक्रलाङललच्ितौ॥ ३१॥ पथमखएड चिकने, ऊँचे तथा ताम्रसरीखे नग्वोंवाले चर्ण और जिनमें मजली, ङ्कुश, कगल, चक्र और उल के निशान हों वे स्त्री को शुभदायक होते हैं ।३१॥ भवेदखएडभोगायोर्ध्वा मध्याङ्कलिसंगताः। रेखाखुमर्पकाकाभा दुःखदारिद्र्यसूचकाः ॥ ३२ ॥ स्निग्धाः समुन्नतास्ताय्रा बृत्ता: पादनखाः शुभाः। वाणिज्यसूचका स्त्रीणां पादपृष्ठसमुन्नतिः॥३३।। प्रदेशिनी भवेदयस्या अङ्गष्ठादतिरककिणी। कन्यैव कुलटा सा स्यादेष एव विनिश्चयः॥ ३४॥ अगर पादतल में ऊर्ध्वरेखा मध्यमा अँगुली में मिली हो तो वह अखएड भोग देती है। यदि मूषक, सर्प और कौए के समान रेखाएँ हों तो वे दुःख व दारि्द्रिय देनी हैं। अगर पैरों के नख चिकने, ऊँचे, ताम्रवर्ण व गोलाकार हों तो शुभदायक हाते हैं। खियों का पादपीठ ऊँचा हो तो वह वागिज्य सूचक है। जिसके पैर की तर्जनी अंगुली अँगूठे से बड़ी हो वह खरी कन्या की दशा में ही व्यभिचारिखी होजाती है॥ ३२-३४ ॥ राइ्या: स्निग्धौ समौ पादौ तलौ ताम्रनखौ तथा। श्लिष्ट ङ्गुजी चोन्नताग्रौ तां प्राप्य नृपतिर्भवेत् ॥ ३५॥ समपाष्णी शुभा नारी पृथुपाष्णी सुदुर्भगा। कुलटोन्नतपारष्णी स्याद्दीर्धपार्ष्णी च दुःखभाकृ॥ ३६॥ जिसके पैर चिकने तथा समानाकार प्रतीत हों, पैर के तलवे तथा नख ताम्र सरीखे लालवर्ण हो, अंगुलियाँ सटी हुई हों, उनके अग्रमाग ऊँचे से हों, ऐसी स्त्री रानी होती है। समानाकार एँड़ी स्त्री को शुमदायक होती है। जिसकी एँड़ी चकलीसी हों वह बुरे भाग्यवाली होती है। जिसकी एँड़ी ऊँचीमी हों वह व्यभिचारिणी होती है। जिसकी एँड़ी दीर्घाकार हो वह जन्मपर्यन्त दुःख ही भोगती है॥ ३५-३६॥ यस्या: संचरमाणाया भूमिशब्दः प्रजायते। सा नारी विधवा ज्ञेया सामुद्रवचनं यथा॥३७॥ सामुद्रकशासत यस्या: संस्पृशते भूमिमङ्गली न कनिष्ठिका। भर्तारं प्रथमं हन्ति द्वितीयं चैव विन्दति ॥ ३८ ॥ जिसके चलने में पृथ्वी में धमधम शब्द हो उसे विधना जावना। जिसके पैर की कनिष्ठा अंगुली भूमि को न छूनी हो वह स्त्री प्रथम पति को भारती और दूमरे को पाती है॥ ३७-३८ ॥ यस्यास्त्वनामिकाङ्गत्यौ प्रथिव्यां नोपसर्पतः । पति नाशयते च्िप्रं सा रक्ा चिरजीविनी॥ ३६ ॥ यस्या गमनमात्रेण भूमौ कम्पः प्रजायते। बह्वाशिनीं प्रलोभां च तां नारीं परिवर्जयेत् ॥४० ॥ जिसके दोनों पैर की अनामिका अंगुलियाँ भूमि को न हूनी हों वह स्त्री शीघ्र स्त्रपति को मारती है। यदि अ्ररनामिकाएँ लालवर्ण हों तो वह स्त्री चिरजीबिनी होनी है। जिसके चलने से पृथ्वी हिलने लगे वह बहुत मोजन करती तथा महालोमिनी होती है॥ ३६-४०॥ चरणानामिका यस्या: च्िरति न स्पृशते यदि। द्वितीया च तृतीया वा सा कन्या सुखवर्जिता ॥४१ ॥ कनिष्ठिकानामिका वा यस्या न स्पृशते महीम्। अङ्कछ्ठं वागतातीता तर्जनी कुलटा हि सा ॥ ४२॥ जिसके पैर की अनामिका अंगुली भूमि स्पर्श न करती हो अथवा तर्जनी व मध्यमा अंगुली भूमि को न छूती हो वह कन्या-सुखरहित होती है। जिसके पैर की कनिष्ठिका व अनामिका अंगुली भूषि को न छूती हो अथवा जिसके पैर की तर्जनी अंगुली अँगृठे पर चढ़ी हो अथवा आगे बढ़ी हो वह स्त्री व्यभिचारिखी होती है॥ ४१-४२॥ यस्या अनामिकाङ्गष्ठौ पृथिव्यां नैव तिष्ठतः । पतिं मारयते सापि स्वतन्त्रेणैव वर्तते ॥ ४३ ॥ स्त्रीणां पादतलं स्निग्धं मांसलं मृदुलं समम्। अस्वेदमुष्णमरुणं बहुभोगोचितं स्मृतम् ॥४४ ॥ प्रथमखणड जिसके पैर की अनामिका तथा अँगूठा पृथिवी में न टिकते हों वह स्त्री स्वपति को मार अदनी इच्छानुसार बर्तती है। चिकने, मांसल, कोमल, समानाकार, पमीनारहित, गरम तथा लालवर्ण स्त्रियों के पैर के तलवे घने भोगों के लिए कहाते हैं।। ४३-४४॥ रून्ं विवण परुषं खसिडतं प्रतिबिम्बकम्। सूर्पाकारं विशुष्कं च दुःखदौर्भाग्यसूचकम्।४५॥ उन्नतो मांसलोङ्कषो वर्तुलोऽतुलभोगदः । वक्रो हस्वश्च चिपिटः सुखसौभाग्यभञ्जकः ॥४६॥ स्त्री के पैर का तलवा रूखा, विवर्स, कठोर, खसिडत प्रतिबिम्बवाला सूप के आकार का तथा सूखा सा प्रतीत हो तो वह दुःख दौर्भाग्य का द्योतक है। अँगूठा ऊँचा व मांसल तथा गोलाकार हो तो अतुल भोग देता है। जो अँगूठा टेढा व छोटा सा तथा चपटा पतीत हो वह सुख व सौमाग्य को विनाशता है।। ४५-४६॥ विधवा विपुलेन स्याददी र्घाङ्गुष्ठेन दुर्भगा। मृदवोऽ्ड्ुलयः शस्ता घना वृत्ताः समुन्नताः॥४७॥ दीर्घाङ्डुलीभि: कुलटा कृशाभिरतिनिर्धना। इस्वायुष्या च इस्वाभिर्भुग्नाभिर्भुग्नवर्तिनी ॥४८॥ जिसका अँगूठा चौड़ा हो वह स्त्री विधवा होनी है। जिसका अँगूठा लम्बा हो वह बुरे भाग्यवाली होती है। यदि अंगुलियाँ घनी, गोलाकार, ऊँची तथा कोमल हों तो शुभदायक होती हैं। जिसकी अंगुलियाँ लम्बी- सी हो वह व्यमिचारिखी होती है। जिसकी अंगुलियाँ पतली हों वह निर्धन होती है। जिसकी अंगुलियाँ छोटीसी हों वह थोड़ी उम्रवाली होती है। जिसकी अंगुलियाँ टेकी हों वह ठेढे वर्ताववाली होती है।।४७-४=।। चिपिटाभिर्भवेद्दासी विरलाभिर्दरिद्रिणी। परस्परं समारूढा: पादाङ्डल्यो भवन्ति हि॥ हत्वा बहूनपि पतीन्परप्रेष्या तदा भवेत् ॥ ४६॥ सामुद्रकशास्न दरिद्रा मध्यनग्रेण शिरालेन मदाध्वगा। रोमाव्येन भवेहासी निर्मामेन च दुर्भगा॥ ५० ॥ जिसके पैर की अंगुलियाँ चपटी हों वह दामी होनी है। यदि अंगुलियाँ बिश्ली हों तो दरिद्रिग्ी होती है। यदि पैरों की अंगुलियाँ परस्पर चढ़ी हों तो वह स्त्री बहुत से पतियों को मारकर पराई दामी होनी है। जिसका पैर बीच में लचा सा पनीत हो वह दरिद्रा होनी है। जिमका पैर नसों से घिरा हो वह स्ी सदैव मार्गगामिनी होती है। जिसका पैर गे-ेयुक हो वह दाखी होती है। जिसका पैर निर्मास हो वह बुरे भाग्यवाली होती है।। ४६-५० ॥ गूढौ गुल्फौ शिवायोक्कावशिरालौ सुवर्तुलौ। सुपुटौ शिथिलौ दृश्यौ स्यातां दौर्भाग्यसूचकौ॥५१॥ यस्या न स्पृशते भूमिमङ्कलिश्च कनिष्ठिका। भर्तारं प्रथमं हन्ति मृतो भवति पुत्रकः ॥ ५२ ॥ अगर पैर के गएठे ( टखने ) नसों से रहित, गोलाकार, अच्छे पुटों- चाले तथा छिपे से हों तो कल्याणदायक होन हैं। जिसके गएठे ढाले से देख पढ़ें तो बुरे माग्य को बताते हैं। जिसके पैर की कनिष्ठाअंगुली भूमि को न छूती हो वह़ पहले पति को मार डालनी है और पीछे से उसका पुत्र भी मर जाता है।। ५१-५२ ॥ (यह कथन हमने प्रत्यन्ष देखा है। संपादक) नखारुणाश्च या नार्यों भोगिन्यः सुखसयुताः । श्यामनख्यः स्त्रियो या वै कुशीला: पापमंगताः॥५३।। श्वेतनख्यः स्त्रियो या वै महादुःखममन्विताः । पीतनख्यः प्रवासिन्यः पापिन्यश्च धनोज्फिना:।।५४।। हरिन्नख्यो हतधना दुराचारपरायणाः। सुखसन्तानरहिताः सामुद्रेण यथोदितम्॥ ५५ ॥ जिनके नख रक्वर्ण हों वे ख्रियाँ भोगिनी तथा पुत्रपोत्रादि सुग्ों से संयुत होती हैं। जिनके नख काले हां वे बुरे स्व्रभाववाली, प्रापकर्य में पथमखएड पशायगा रहती हैं। जिनके नख सफ़ेद हों वे बड़े दुःगों से संयुक्क होती हैं। जिनके नख पीले हों वे परदशिनी, पापिनी तथा निर्धन रहती हैं। जिनके नख हरे हों वे दुगचारों में परायख तथा मुख व सन्तानों से रहित होती हैं।। ५ ३-५२॥ ललाटरेखालक्षग ललाटे यस्य दृश्यनते तिस्रो रेखाः समाहिताः । सुखी पुत्रममायुक्क: स षष्टि जीवते नरः ॥५६ ॥ जिमके ललाट में नीन रेमा अच्छिन हों वह सुखी, पुत्रों से संयुत तथा साठवर्ष पर्यन्त जीवत रहता है॥ ५६॥ चत्वारिंशच्च वर्षाणि दिरेग्वादर्शनाननरः । विंशत्यव्दमेकरेखा आकर्ण च शतायुषः॥५७॥ सपत्यायुर्द्धिरेखे तु पष्ट्यायुस्तिसृभिर्भवेत्। जिसके ललाट में दो रेखाएँ दिखें वह चालीस वर्ष पर्यन्त जीता है। जिसके ललाट में एक रेखामात्र हो वह बीस वर्ष पर्यन्त जीना है। जिसके ललाट में एक रेखा कानों तक चली गई हो वह सौ वर्ष तक जीता है। जिसके ललाट में दो रेखाएँ हों वह सत्तर वर्ष पर्यन्त जीता है। जिसके ललाट में तीन रेखाएँ हों वह साठ वर्ष पर्यन्त जीता है। जिसके ललाट में व्यक् अथवा अव्यक्त बहुतसी रेखाए हों वह बीस वर्ष पर्यन्त जीता है॥। २७-५८ ॥ चत्वारिंशच वर्षाणि हीनरेखस्तु जीवति। भिन्नाभिश्चैव रेखाभिरपमृत्युर्नरस्य हि॥ ५६ ॥ त्रिशूलं बडिशं वापि ललाटे यस्य दृश्यते। धनपुत्रममायुक्कस्म जीवेच्छरदःशतम्॥ ६० ॥ जिसके ललाट में रेग्वाएँ ही न हों वह चालीस वर्ष तक जीता है। जिपके ललाट में छित्र-भिन्न रेव्वाएं हों वह अपमृत्यु से मग्ता है। जिसके
- आगे चलकर इस विषय पर विशेषरूप से कहा गया है। संपादक ललाट में त्रिशूल व मछली पकड़नेवाली बंसी का निशान हो वह धन क् पुत्रों से संयुक्र होता और सौ वर्ष पर्यन्त जीता है॥ ५६-६० ॥ उन्नतैर्विपुलैः शङ्गैर्ललाटैर्विषमैस्तथा। निर्धना धनवन्तश्च अर्धेन्दुमदशैर्नराः॥६१॥। आचार्या: शुक्किविशालेः शिरालैः पापकारिणः। उन्नताभिः शिराभिश्च स्वस्तिकाभिर्घनेश्वराः॥६२।। जिनके ललाट ऊँचे, विशाल, शङ्ाकार, विपम तथा अर्धचन्द्राकार हों वे निर्धनी होकर धनवान् होते हैं। जिनके ललाट सीपियों के निशानों से विशाल प्रतीत हों वे आचार्य (अध्यापक) होते हैं। जिनके ललाट नसों से व्याप्त हों वे पापकारी होते हैं। जिनके ललाट में ऊँची नसे हों अथवा स्वस्तिक (त्रिकोणकार) निशान दिखें वे धनेश्वर होते हैं॥६१-६२।। निम्नैर्ललाटैर्वधार्हा: क्रूरकर्मरतास्तथा। संवृतैश्च ललाटैश्च कृपणा उन्नतैर्नृपाः ॥६३॥ ललाटोपसृतास्तिस्रो रेखा: स्युः शतवर्षिणाम्। नृपत्वं स्याच्चतसृभिरायुः पञ्चनवत्यथ ॥ ६४॥ जिनके ललाट निचले हों वे बध योग्य होते और क्ररकर्मों में परायण रहते हैं। जिनके ललाट गोलाकार हों वे कृपय होते हैं। जिनके ललाट ऊँचे से हों वे राजा होते हैं। जिनके ललाट में तीन रेखाएँ हों वे सौ वर्ष पर्यन्त जीते हैं। जिनके ललाट में चार रेखाएँ हों वे राजा होते और पंचानवे वर्ष पर्यन्त जीते हैं ॥ ६३-६४॥ केशान्तोपगताभिश्च अशीत्यायुर्नरे भवेत्। नवतिः स्यादरेखाभिविच्छिन्नाभिश्च पुंश्चलः॥६५॥ पञचभिः सप्ततिः षड्भिः पञ्चाशड्बह्डुभिस्तथा। चत्वारिंशच रक्ाभित्रिंशदूतलगामिभिः । विंशतिर्वामवक्राभिरयुः चुद्राभिरल्पकम् ॥६६ ॥ जिसके ललाट में रेखाएँ विस्तीर्ण हों तथा केशोपर्यन्त चली गई हों वह अस्सी वर्ष की उमरवाला होता है। जिसके ललाट में रेखा ही न हों वह Thth नब्बे वर्प की उमरवाला होता है। जिसके ललाट में रेखाएँ छ्विन्नभिन्न हो वह व्यभिचारी होता है। जिसके ललाट में पाँच रेखाएँ हों वह सत्तर वर्ष पर्यन्त जीता है। जिसके ललाट में छः, सात, आठ या बहुतसी रेखाएँ हों वह पचास वर्प पर्यन्त जीता है। जिसके ललाट में रेखाएँ रकवर्ण हों वह चालीस वर्प पर्यन्त जीता है। जिसके ललाट में ेखा भौंहों तक हों वह तीस वर्प पर्यन्त जीता है। जिसके ललाट में रेखाएँ बार्ड तरफ़ टेबीसी हों वह बीस वर्ष की आयु पाता है। जिसके ललाट में टूटी-फूटी छोटीसी रेखाएँ हों वह अल्पायु होता है।। ६५-६६।। ललाटे दृश्यते यस्य वक्ररेखाचतुष्ट्यम्। अशीत्यायुः समाप्ोति पञ्चरेखाः शतं समाः॥६७॥ यस्योन्नतं ललाटं च ताम्रवणं च दृश्यते। रखाहीनं च रूक्षं च स चोन्मत्तो महीं भ्रमेत् ॥ ६८ ॥ जिसके ललाट में चार टेबी रेखाएँ हों वह अस्सी वर्ष की आयु पाता है। जिसके ललाट में पाँच रेखाएँ हों वह सौ वर्ष की आयु पाता है। जिसका ललाट ऊँचा, ताम्रवर्णवाला दिखे अथवा रेखाहीन, रूखासा हो वह पागल होकर पृथ्वी में घूमता फिरता है॥ ६७-६८॥ शुभमर्धेन्दुसंस्थानमतुङ्गं स्यादलोमशम्। नृपतीनां भवेचिह्नं ललाटे शुभदर्शनम्॥६६॥ उन्नतेन ललाटेन धनाढ्यो जायते नगः। विषमेन ललाटेन दुःखितो दुर्जनो नरः। ललाटे चार्धचन्द्राद्यैजायते पृथिवीपतिः॥७० ॥ जिनके ललाट में उच्चतारहित. लोमविषीन, शुभ दर्शनवाला, अर्चन्द्रा- कार चिह्न चमकता हो वे गाजा होने हैं। जिमका ललाट ऊँचासा हो वह धनवान् होता है। जिसका ललाट विषम (कहीं ऊँचा व कहीं नीचा) हो वह दुर्जन होता और दुःखित रहता है। जिसके ललाट में अर्धचन्द्राकार आदि निशान हों वह पृथ्वीपालक होता है॥ ६६-७० ॥ सामुद्रकशासत् त्रिशूलं कुलिशं चापं ललाटे यस्य दृश्यते। ईश्वरं तं विजानीयात्ममदाजनवल्लभम्॥ ७१॥ रखा: पञ्चललाटस्थाः समा: कर्णान्तलोचनः। भवेत्तं यस्य गंभीरं तं विद्यात्सफलायुषम्॥।७२॥ जिस के ललाट में त्रिशूल, वज्र व धनुप का निशान हो उसे सबका स्वामी जानना चाहिए। वह ममदाओं का प्यारा होता है। जिसके ललाट में समानाकार पाँच रेखाएँ हों तथा दोनों लोचन कानपर्यन्त चलते हों उसे सफल आयुवाला जानना चाहिए।। ७१-७२॥ रखाचतुष्टयं यस्य ललाटे च प्दृश्यते। चिरायुश्चापि विद्धांश्च सुखभोगादिभिर्युतः।।७३।। पञ्चरेखा भवेद्यस्य सुतसौख्यस्य कारणम्। हीनायुश्च त्रिरेखायां रेखैकेन नृपो भवेत् ॥।७४ ॥ जिसके ललाट में चार रेखाएँ हों वह चिरजीवी, विद्वान्, सुखी, भोगी तथा सम्पत्तिशाली होता है। जिसके ललाट में पाँच रेखाएँ हों वह पुत्र- पौत्रादि से संपन्न तथा सुखा रहता है। जिसके ललाट में तीन रेखाएँ हों वह आयुहीन होता है। जिसके ललाट में एक रेखा हो वह राजा होता है॥ १ ३- ७४॥ विपुलेन ललाटेन धनाढ्यो जायते नरः। अल्पेन च ललाटेन चाल्पायुर्जायते नरः। खरक्रयकरो नित्यं प्रामोति वधबन्धनम् ॥ ७५॥ जिसका ललाट विशाल हो वह धनवान होता है। जिसका ललाट छोटासा हो वह अल्पायु होता है और गर्दभादि के क्रय-चिक्रय द्वारा अपना जीवननिर्वाह करता तथा वध व चन्धन पाता है।। ७५॥ ललाटे दृश्यते यस्य समरेखाचतुष्ट्यम्। ्रीवारेखा: पञ्च यस्य शुभं तस्य विनिर्दिशेत्॥ ७६॥ प्थमखड दृश्यन्ते भालगा रखाश्चतस्त्रः पारडुरूपिकाः । अविच्छिन्ना विवर्णास्स्युरशीत्यायुः प्रकीर्तितः।७७॥ जिसके ललाट में चार रेखाएँ समानाकार हा, जिसकी ग्रीवा में पाँच रेखाएँ हों उसे शुभ कहना। जिसके ललाट में चार रेखाएँ पीली, अविच्छिन्न तथा मैलीसी हों वह अस्सी वर्ष की उमरवाला होता है॥ ७६-७७॥ भालगेन त्रिशूलेन निर्मितेन स्वयंभुवा। नितम्विनीसहस्त्राणां स्वामित्वं योषिदाप्नुयात् ।।७८ ।। जिसके ललाट में त्रिशूल का निशान हो उस स्त्री की हज़ारों ख्ति्रियाँ हाथ जोड़े हुए सेवा करती और आज्ञा मानती हैं॥। ७८॥ एकरेखा भवेद्यस्या ललाटे शोभना भवेत्। श्रीवत्सं स्वस्तिकं चैव ललाटे दृश्यते सदा ॥७६॥ प्रलम्बिनि ललाटे तु देवरं हन्ति चाङना। स्मिते कूपे गएडयोश्च सा ध्रुवं व्यभिचारिणी॥ ८० ॥ ललाट में एक रेखा मात्र अथवा श्रीवत्स या स्वस्तिक (त्रिकोग्णाकार) निशान सदैय शुभदायक होता है। जिसका ललाट लम्बा होवह स्त्री निश्चय देवर का बिनाशती है। जिसके हँसने पर गालों में गढे से देखे जायँ वह स्त्री निश्चय व्यमिचारिगी होती है॥ ७६-८० ॥ ललाटे दृश्यते यस्यास्त्रिशूलं कृष्णपिङ्गलम्। सा पञ्च जनयेत्पुत्रान्धनधान्यं विवर्धयेत् ॥८१॥ न पृथू वालेन्डुनिभे भ्रुवौ चाथ ललाटकम्। शुभमर्धेन्दुसंस्थानमतुङ्कं स्यादलोमकम् ॥८२॥ जिसके ललाट में काला या पीला त्रिशूलाकार निशानहो वह स्त्री पाँच पुत्रों को उपजाती, धन-धान्य को बढ़ाती है। जिसकी मौंहॅ चौड़ी न होँ पर बालचन्द्र के समान हों, जिसका उचचतारहित, लोमत्िहीन, अर्धचन्द्राकार ललाट हो, तो शुभदायक होता है॥ ८१-८२।। भाल: शिराविरहितो निर्लोमार्घेन्दुसन्निभः । अनिम्नस्त्रयंगुलो नार्याः सौभाग्यारोग्यकारणम्॥।=३॥ व्यक्कस्वस्तिकरेखं च ललाटं राज्यसम्पदे। रोमशेन शिरालेन प्रांशुना रोगिषी स्मृता॥ ८४ ।। जिसका ललाट नसों से रहित, लोमविहीन, अर्धचन्द्राकार हो, गहरा न हो, तथा तीन अङ्गल हो वह स्त्री सुहागिन होती और आगेग्य रहती है। जिसके ललाट में स्वस्तिक (त्रिकोणकार) रेखा विशेषतः हों वह स्त्री रानी होनी तथा संपदा को भोगती है। जिसका ललाट रोमों से संयुक्त, नसों से घिरा हुआ, ऊँचासा प्रतीत हो वह रोगिखी कही जाती है यानी उस स्त्री को हमेशा रोग ही घेरे रहता है॥। ८३-८४ ।। ललाट में सप्तस्वरविचार श्रुतिभा: स्युः स्वराः षड्जर्षभगान्धारमध्यमाः। पञ्चमो घैवतश्चाथ निषाद इति सप्त ते ॥। १ ॥ कानों में सुनाई देनेवाले सात स्वर होते हैं, जिनमें पहला पड्ज, दूसरा ऋपभ, तीसरा गान्धार, चौथा मध्यम, पाँचवाँ पश्चम, छठा घैवत और सातवाँ निपाद कहाता है। पहले 'पड्ज' की व्याख्या करते हैं- "नासा कएठमुरस्तालु जिद्वा दन्ताश्च संस्पृशन् । पहम्यः संजायते यस्मात्त- स्मात्पड्ज इति स्मृतः"अर्थात् नाक, कएठ, वत्षःस्थल, तालु, जिद्दा और दाँत इनको स्पर्श करता हुआ जो छहों से पैदा होता है उसे पड्ज कहते हैं। "ऋपति बलीवर्दस्वरसादृश्यं गच्छतीति ऋपभः" जो बैल के स्वर के समान हो उसे 'ऋपभ' कहते हैं। "गन्धारदेशे भवः गान्धारः" जो गन्धार देश में हुआ है उसे 'गान्धार' कहते हैं। "तद्वदेवोत्थितो वायुरुरःकएठसमाइतः । नामि पाप्तो महानादो मध्यस्थस्तेन मध्यमः" अर्थात् वायु वक्तःस्थल व कएठ से ताडित होता हुआ नाभि में पहुँच महानादवाला बीच में रहता है इसलिए मध्यम कहा जाता है। "वायुः समुद्गतो नामेरुरोहत्कएठमूर्धसु। विचरन्पश्चम- स्थानपाप्त्या पश्चम उच्यते" अर्थात् नाभि से उठा हुआ पवन वत्तःस्थल, हृदय, कएठ और मस्तक में होता हुआ चलता है। इसलिए पाँच स्थानों की प्राप्ति से 'पश्चम' कहाता है। "धीमतामयं धैवतः" यानी धीमानों का जो यह शब्द है उसे धैत्रत कहते हैं। और "निषीदति मनो यस्मिन्निति निपादः" अर्थात् जिसमें मन लगता है उसे 'निषाद' कहते हैं। ये सातों स्वर ललाट की रेखाओं से जाने जाते हैं ; यह संगीत शास्त्रवालों ने कहा है। अब पूर्वोक़ स्वरों को कान-कौन से पराणी बोलते हैं, उसे कहते हैं ॥ ? ॥ षड्जं रौति मयूरस्तु गावो नर्दन्ति चर्षभम्। अजाविकौ च गान्धारं क्रौञ्चो नदति मध्यमम् ॥२॥ पुष्पसाधारणे काले कोकिलो रौति पञ्चमम्। अश्वस्तु घैवतं रौति निषादं रौति कुञरः ॥ ३ ॥ सामुद्रकशास्र मोर पड्ज स्वर से वोलता है। गौ ऋपम स्वर से बोलती हैं। बकरी तथा भेड़ गान्धार स्वर को बोलती हैं। क्रौंच (कराकुलनामक) पक्षी मध्यम स्वर बोलता है। पुष्पों के साधारण काल में कोकिला पञ्चम स्वर बोलती है। घोड़ा धैवतस्वर और हाथी निपाद स्वर बोलता है॥ २-३॥ पड्जाधिपग्रह षड्जाधिपः सूर्यसूनुर्ऋ्रषभेशो गुरु: स्मृतः । गान्धाराधिपतिर्भौमो रविर्मध्यमनायक: ॥४ ॥ पञ्चमेशो भृगुः प्रोक्को धैवतेशो बुधः स्पृतः । निषादाधिपतिश्चोक्ो निशानायकसंज्ञकः ॥ ५ ॥ पड्ज का स्वामी शनैश्चर, ऋपभ का वृह्स्पति, गान्धार का मङ्गल, मध्यम का सूर्य, पश्चम का शुक्र, धैत्रत का बुध और निपाद का स्वामी चन्द्रमा कहा गया है।। ४-५ ॥ १ देखिए स्वरशास्त्र, पक्षी-शास्त्र एवं ज्योतिष तथा सामुद्रक में कितना घनिष्ट एवं सूक्ष्म संबंध है।-संपादक बिन्दुजत्रुतिलमशकावर्तादि चिह्न नखेषु विन्दवः श्वेताः प्रायः स्युः स्वरैरिणीख्रियः । पुरुषा अपि जायन्ते दुःखिनः पुष्पितनखैः ॥ १ ॥ जिनके नखों में सफ़ेद बिन्दु (कौड़ीमी) हों वे स्त्रियाँ प्रायः व्यमि- चारिी होती हैं। यदि पुरुपों के नखों सें सफ़ेद बिन्दु हों तो वे भी दुखी रहते हैं।। १ ॥ विषमैर्जन्रुभिर्निःस्वा अस्थिनद्धैश्च मानवाः। उन्नतैर्भोगिनो निम्नैनिःस्वाः पीनैर्धनान्विताः॥२।। जिनकी हँसलियाँ विपम हों तथा हाड़ों से बँधी हों वे दरिद्री होते हैं। जिनकी हँसलियाँ ऊँचीसी हों वे भोगी होने हैं। जिनकी हँसलियाँ निचलीसी हों वे निर्धनी होते हैं। जिनकी हँसलियाँ मोटीसी हों वे धनवान् होते हैं ॥ २ ॥ मुखे तिलं यस्य च तस्य लिङ्गे ह्यच्णोरधस्तस्य च कुत्तिगं स्यात् । भुजे भवेत्तस्य च मूलजन्म पूर्वाद्द्वितीये जटुलं स्वदेहे॥ ३ ॥ जिसके मुख में तिल हो उसके लिङ् देश में अवश्य ही तिल होता है। यदि स्त्रियों के मुख में तिल हो तो उनकी योनि में अवश्य ही तिल होता है। जिसकी आँखों के नीचे तिल हो उस नर वनारी की कोख में अवश्य ही तिल होता है। जिसकी भुजाओं में तिल हो उसका जन्म मूलनक्षत्र में कहा जाता है। जिसकी देह में लहसुन हो उसका जन्म पूर्वापाद में जानना चाहिए ॥३॥ भ्रुवोरन्ते ललाटे वा मशको राज्यसूचकः। पुत्रदो ज्ञानदो भूत्वा दुःखदौर्भाग्यभञ्जकः॥४॥ माँहों के बीच या ललाट में मसा हो तो राज्यसूचक होता है। वह पुत्रदायक, ज्ञानदायक एवं दुःखनाशक होता है।। ४॥ वामे कपोले मशकः शोणो मिष्टान्नदः स्त्रियाः । तिलकं लाञ्छनं वापि हृदि सौभाग्यकारणम्॥ ५॥ चायें कपोल पर रक्वर्णवाला मसा हो तो वह नारी के लिए शुभकारी तथा मिष्टान्नदायक होता है। जो हृदय में तिल हो तो वह सौभाग्य का कारख होता है।। ५ ॥ यस्या दत्षिणवक्षोजे भवेत्तिलकलाञ्छनम्। कन्याचतुष्टयं सूते सूते सा च सुतत्रयम् ॥ ६ ॥ तिलकं लाञ्बन शोएं यस्या वामकुचे भवेत्। एकं पुत्रं प्रसूयादों अन्ते च विधवा भवेत्॥७॥ जिसके दाहने स्तन में तिल हो वह स्त्री चार कन्याओं एवं तीन लड़कों या दो लड़कों की माता होती है। जिसके बाएँ स्तन में लाल तिल हो वह स्त्री पहले पुत्र उपजाती और अन्त में विधवा होजाती है॥ ६-७॥ गुह्यस्य दच्षिणे भागे तिलको यदि शोभते। तदा चितिपतेः पत्नी सूते च चितिपं सुतम् ॥८ ॥ नासाग्रे मशकः शोणो महिष्या एव जायते। कृष्णः स एव भर्तृष्न्याः पुंश्चल्या वा प्रकीर्तितः ॥६ ॥ जिसके गुहदेश के दत्षिय भाग में तिल हो वह स्त्री रानी तथा राजकुमार की माता होती है। जिसकी नासिका के आगे लाल मसा हो वह स्त्री पटरानी होती है। जिसकी नासिका के आगे काला तिल हो वह स्वामीनाशक अथवा व्यमिचारिखी होजाती है॥ ८-६ ॥ नाभेरधस्तात्तिल को मशको लाञ्छनं शुभम्। मशकस्तिलकश्चिह्नं गुल्फदेशे दरिद्रकृत्॥१०॥ करे कर्णें कपाले वा करठे वामे भवेद्यदि। एषां त्रयाणामेकं तु प्राग्गर्भो पुत्रदो भवेत् ॥ ११ ॥ अगर नाभि के नीचे तिल या मसा हो तो स्त्री को शुभदायक होता है। जो गुल्फदेश (गएठों) में मसा वा तिल हो तो दरिद्री करता है। हाथ, कान, गाल व कएठ के वामभाग में लहसुन, मसा या तिल इन तीनों में एक भी हो तो उस स्त्री का पहला गर्भ पुत्रदायक होता है।। १०-११ ।। नासाग्रे दृश्यते यस्यास्तिलको मशकोपि च। कृष्णदन्ता कृष्णजिह्वा दशाहेन पतिं हरेत्॥ १२ ॥ तिलको वामतो यस्याः कुचिदेशे च जायते। मापकस्य समो वापि राजपत्री भवेद् ध्रुवम्॥१३॥ जिसकी नासिका के अग्रभाग में तिल या मसा हो, जिसके काले दाँत व काली जीभ हो वह स्त्री व्याह से दश दिन की अवधि में ही पति बिना- शती है। जिसके कुत्तिदेश (कोख) के वामभाग में तिल या मसा हो वह स्त्री निश्चय ही राजपत्री होती है ।। १२। १३ ।। पार्श्वें स्याद्दीर्घतिलको यस्याः स्निग्धश्च जायते। वामहस्ते पतिं प्राप्य पुत्रपौत्रं प्रवर्धयेत् ॥ १४ ॥ जिसके पार्श्वदेश या बाएँ हाथ में चिकना दीर्घाकार तिल हो वह स्त्री पति पाकर पुत्र-पौत्रों को बहाती है॥ १४ ॥ यस्या गएडेऽधरे वामे हस्ते कर्षो गले तथा। माषकं तिलकं विद्यात्सा कन्या सुखमेधते ॥ १५ ॥ जिसके गाल, ओठ, हाथ, कान तथा गंला इनके वामभाग में मसा या तिल हो वह कन्या सुखको पाती है।। १५ ।। आरक़कं वामके यस्याः कुचिदेशे च दृश्यते। माषकं तिलकं वापि सा कन्या सुखभागिनी ॥१६॥ जिसके कुत्तिदेश में बाई तरफ़ लाल मसा या तिल हो वह कन्या सुख पाती है॥ १६ ।। पाणौ प्रदक्विणावर्तो धम्यों वामो न शोभनः । नाभौ श्रुतावुरसि वा दक्विणावर्त ईडितः ।। १७।। हाथ में रोमों या रेखाओं का 'दहिनाकर्त' स्तरी के लिए धर्मवर्धक होता है, और 'वामावर्त' स्त्री को शुभदायक नहीं होता। तथा नाभि, कान व छाती में 'दहिनावर्त' स्त्री को शुभदायक कहाता है.।। १७ ।। सुखाय दक्षिणावर्तः पृष्ठवंशस्य दक्षिणे। अन्तःपृष्ठे नाभिसमो वह्वायुः पुत्रवर्धनः ॥१८॥। राजपत्न्याः प्दृश्येत भगमौलौ प्रदच्िणः । सचेच्छकटभङ्गः स्याद बह्पत्यः सुखप्रदः॥१६॥ पृष्ठवंश (पीठके चाँस) की दाहनी ओर दहिनावर्त सुख देता और पीठ के बीच में तोंदी के समान दहिनावर्त आयु तथा पुत्र बढ़ाता है। भग के ऊपरी भाग में दहिनावर्त निशान हो तो वह स्त्री रानी होती है। जो भग के ऊपरी भाग में शकटाकार निशान भङ्ग सा हो तो वह बहुत संतानयुक्क एवं सुखदायक होता है ॥ १८ ।१६॥ कटिगो गुह्यवेधेन पत्यपत्यनिपातनः । स्यातामुदरवेधेन पृष्ठावर्तौ न शोभनौ ॥ २० ॥ एकेन हन्ति भर्तारं भवेदन्येन पुंश्रली। करठगो दक्षिणावतों दुःखवैधव्यसूचकः ॥२१॥ कमर में गुदा को वेधन कर दहिनावर्त निशान स्त्री के पति व पुत्रों का मारनेवाला होता है। पीठ में पेट का वेधन कर दो दडिनावर्त स्त्री को शुभ- दायक नहीं होते। बरन् वह स्त्री एक निशान से पति को मारती और दूसरे निशान से व्यभिचारिणी होजाती हैं। कएठ में दहिनावर्त निशान स्त्री के लिए दुःख व वैधव्यसूचक है।। २१-२२।। सीमन्तेऽथ ललाटे वा त्याज्या दूरात्प्रयत्रतः । सा पति हन्ति वर्षेण यस्या मध्ये कृकाटिके ॥ २२ ॥ प्रदत्िणो वा वामो वा रोम्णामावर्तक: स्त्रियाः। एको वा मूर्धनि द्वौ वा वामे वामगतौ यदि। आदशाहं पतिन्नी सा त्याज्या दूरात्सुबुद्धिना ॥२३॥ जिसके शीश या ललाट में दद्िनावर्त निशान हो उस स्त्री को बढ़े यन् के साथ त्याग देना चाहिए। जिसकी घाँटी के बीच दहिनावर्त निशान हो वह स्त्री व्याह से एक ही वर्ष में पति को मार डालती है। जिसके मस्तक में एकमात्र रोमों का दहिनावर्त या वामावर्त प्रतीत हो अथवा दो वामावर्त प्रतीत हों वह स्री व्याह से दश दिवस में ही पति को मारती है। इसलिए बुद्धिमानों को वह स्त्री दर ही से त्यागना चाहिए ।। २२-२३।। कट्यावर्ता च कुलटा नाभ्यावर्ता पतिव्रता। पृष्ठावर्ता च भर्तृन्नी कुलटाप्यथ जायते ॥ २४ ॥ जिसकी कमर में आवर्तरेखा हो वह स्त्री व्यभिचारिणी होनी है। जिसकी नाभि में आवर्तरेखा हो वह पतित्रता होती है। जिसकी पीठ में आवर्तरेखा हो वह पति को विनाशती अथवा वेश्या होजाती है॥ २४॥ एकमुद्रो भवेद्राजा दशमुद्रो महाधनी। मुद्राहीनस्तु दुःखी स्याद द्वित्रिकाभ्यां तथैव च॥ २५॥ एकमुद्रो भवेद्राजा द्विमुद्रो धनवान्नरः । त्रिमुद्रो रोगसम्पन्नो बहुमुद्रो बहुपजः ॥ २६॥ जिसके करतल में एक मुद्रा हो वह राजा होता है। जिसके करतल में दश मुद्राएँ हों वह महाधनी होता है। जिसका करतल मुद्रारहित हो वह दुखी रहता है। जिसके करतल में दो व तीन मुद्राएँ देखी जायँ तो वह भी दुखी रहता है। जिसके करतल में एक पुद्रा का चिह्न हो वह राजा, दो बुद्राएँ हों तो वह धनवान, तीन हों तो रोगी, बहुतसी मुद्राएँ हों तो वह बडुत स्त्री-सन्तानवाला होता है। २५-२६ ।। सामुद्रकीयराजयोग जनने प्रबलो यस्य राजयोगो भवेद्यदि। करे वा चरणेवश्यं राजचिह्नं प्रजायते ॥ १ ॥ जन्मकाल में यदि राजयोग प्चल हो तो उसके करतल या पादतल में अवश्य ही राजचिह्न होता है ॥ ? ॥ अनामामूलगा रेखा सैव पुरायाभिधा मता। मध्यमाङ्कुलिमारम्य मणिबन्धान्तमागता ॥ २ ॥। सोर्ध्वरेखा विशेषेण राज्यलाभकरी भवेत्। खसिडता दुष्टफलदा चीणा चीणफला मता ॥ ३॥ करतल में जो रेखा अनामिका के मूल में होती है उसे पुएयनामक रेखा सामुद्रकशास्त्रवेचागणों ने माना है। (देखो ग. ख. चित्र १२) जो मध्यमा- जुली से चलकर मशिबन्ध के पास तक आती है वह ऊर्ध्वरेखा विशेषता से राज्यलाभकारिखी होती है। (देखो चित्र नं. ११ भ. छ.) यदि ऊर्ध्वरेखा खसिडत हो तो दुष्टफलदायक होती है। यदि छिन्न-भिन्न हो तो चीखफल मदान करती है।। २।३। ( ऐसा पायः सभी विद्वानों का मत है। सं०) अक्कष्मध्ये पुरुषस्य यस्य विराजते चारु यवो यशस्वी। स्ववंशभूषासहितो विभूषा योषाजनैरर्थगणैश्च मर्त्य:।।४॥ वैसारिणो वातपवारणों वा चेद्ारणो दक्िणपाषिमध्ये। सरोवरं चाडुश एव यस्य वीणा च राजा भुवि जायते सः ५॥ जिसके करतल में अँगूठे के बीच में यब का निशान हो वह विभू- पणें, स्त्रीजनों व अरथगर्णों समेत यशस्त्री होकर अपने वंश में भूपण होता है। (देखो ज. व. चित्र १२) जिसके दहने करतल में मछली, छाता, हाथी, सरोवर, अंकुश व वीखा का निशान हो वह पृथ्वी में राजा होता है। । ४ । ५ ।। मुकुरशैलकृपाणहलाङ्गितं करतलं किल यस्य स वित्तपः । कुसुममालिकया फलमीदृशं नृपतिरेव नृपालभवोयदा॥६॥ करतलेपि च पादतले नृणां तुरगपङ्कजचापरथाङ्गवत्। ध्वजरथासनदोलिकया समं भवति लच्त्म रमापरमालये॥७॥ जिसका करतल दर्पण, पर्वंत, तलवार व हल इन चिह्नों से चिह्नित हो वह धन का स्वामी होता है। जिसका करतल फूलों की माला से अङकित हो वह प्राखी धनशाली होता है। जिनके करतल व पादतल में घोड़ा, कमल, धनुप, चक्र, ध्वजा, रथ, आसन और हिंडोले या डोली के समान निशान हों उनके घर में महालक्षमीजी निवास करती हैं ॥ ६।७॥ कुम्भस्तम्भो वा तुरङ्गो मृदङ्गः पाणवङ्कोवा दुमो यस्य पुंसः। चञ्चहएडोऽखएडलदम्या परीतः किंवा सोयं पषिड़तः शौरिड- को वा ॥८ ॥ विशालभालोम्बुजपत्रनेत्रः सुवृत्तमौलि: च्िति- मएडले यः। आजानुवाहु: पुरुषं तमाहुः चोणीभृतां सौख्य- तरं महान्तम् ॥ ६।। जिसके करतल में घड़ा, खंभा, घोड़ा, मृदङ या वृक्ष अथवा दएड का निशान हो वह प्राणी अखएड लंक्षमी से पारपूर्ण तथा पशिडत होता है, अथवा शौषडक (कलवार) होता है। जिसका भाल विशाल हो, लोचन कमलदल के समान हो, मस्तक गोलाकार हो, भुजाएँ जानुओं पर्यन्त देखी जायँ उसको भूतल में पणिडितों ने राजाओं में बड़ा राजा कहा है॥८।६।। नाभिर्गभीरा सरला च नासा वच्तःस्थलं रक्ृशिलातलाभम्। आरक्रवरणौं खलु यस्य पादौ मृदू भवेतांसनृपोत्तमः स्यात्॥१०॥ जिसकी नामि गहरी हो, नाासका सीधी हो, वन्तःस्थल लालशिलातल के समान हो और जिसके पैर लाल वर्णवाले तथा कोमल हों वह शाहंशाह होता है ॥ १० ॥ राजते करगो यम्य तिलोऽतुलधनप्रदः। तथा पादतले पुंसां वाहनार्थसुखप्रदः॥११॥ राजवंशप्रजातानां समस्तफलमीदृशम्। अन्येषामल्पतां याति तथा व्यक्नं सुलक्षणम् ॥ १२ ॥ करतल में तिल अतुल धनदायक होता है। ऐसे ही पादतल में तिल सवारी, धन व सुखों का दायक होता है। यह सारा फल राजवंश में उपजे हुए महाराजों के लिए कहा है। अन्य साधारण जनों को थोड़ा फल माप्त होता है। उसी प्रकार जिनके करतल या पादतल में पूर्वोंक़ निशान साफ़ ज़ाहिर न होते हों तोमी वे प्राखी थोड़ा सा फल पाते हैं ।। ११ । १२।। इति श्रीभावकुतृहले राजयोगादि: । यस्य प्रसूतिसमये प्रबला नृपालयोगा भवन्ति यदि वा पुरुषस्य नूनम्। सद्राज्यलाञ्छनवराणि पदे तदीये यद्धा भवन्त्यपि च पाणितलेऽमलानि ॥ १३ ॥ जन्मसमय यदि मवलराजयोग हों तो उसके पैर में निश्चय श्रेष्ठ राजचिह्न होते हैं, अथवा उसके करतल में भी अमल (साफ़) राजचिह्न होते हैं ।। १३ ।। अथ वाल्मीकीयरामायणवालकाएडटीकाया: समुद्धत्य श्रीमन्महाराजाधिराज- राम चन्द्रस्य सामुद्र कीयराजलक्षणानि व्याख्ययन्ते कच्षः कृत्िश्च वक्षश्च ब्राणस्कन्धो ललाटिका। सर्वभूतेपु निर्दिष् उन्नतास्ते सुखप्रदाः ॥ १ ॥ [ इति वररुचि: ] काँख (बगल) कोख़, वक्तस्थल, नासिका, स्कन्ध और ललाट ये सब माखियों में निर्दिष्ट हुए ऊँचे से मतीत हों तो सुखदायक होते हैं। यह महर्षि चररुचि ने कहा है।। ? ॥ शंखे ललाटश्रवणे ग्रीवा वक्षश्च हत्तथा। उंदरं पाणिपादं च पृष्ठं दश महत्सुखम् ॥२ ॥ दीर्घभ्रूवाहुमुष्कश्च चिरंजीवी महीपतिः। लोके विख्यातकीर्तिः सन्महाराजो भवेन्नरः ॥ ३ ॥ [ इति ब्राहमे ] ललाट की इड्डियाँ, भाल, कान, ग्रीवा, वन्तःस्थल, हृदय, पेट, डाथ, पैर और पीठ ये दश ऊँचे से प्रतीत हों तो प्राणी के लिए सुखदायक होने हैं, और जिसकी भौंहें, वाहें और अएडकोप दीर्घाकार हॉ वह पृथ्वी का स्वामी व चिरंजीवी होकर लाक में विख्यात कीर्तिवाला महाराजा होता है। यह ब्रम्मपुराण में कहा है ॥ २ । ३ ॥। समवृत्तशिराश्चैवच्छत्रा कारशिरास्तथा। एकच्छत्रां महीं भुके दीर्घमायुश्च विन्दति॥४ ॥ [इति नारद: ] १ भोगी धनी स्यादुदर विशाल विशालक्याश्च फरी विशाले। बटुपुत्र- दारोपि विशालपादो धनान्चित: स्थाच्य विशालचक्षुः॥१॥ २ छत्राकारं नरेन्द्रायां शिरो दीर्घच्त दुःखिनाम्। अधमानां च पापानां येपां स्थूलपुट पुनः ॥ स्थूलशीपों नरो यस्तु धनवान्परिकीर्तितः। शुलाकारेयशीपेण मानवो मानवाधिपः ॥ वियमेण तु शीर्षेण नरेन्द्रः पुरायहेनुकः । दीर्घशीर्णशिरो यस्तु दुःसितरतो नात्र संशयः ॥ गजकुम्भशिरो यस्तु राजा स्यान्नात्र संशयः। शिरालमुन्नतं यस्य प्रशस्तं च शिरो यदि॥स राजापृथिवीं भुङधक्े गजबाजि- समन्वितामिति॥ जिसका शीश समान गोलाकार तथा छाते के आकार का हो वह एकछत्र- वाली पृथ्वी को भोग दीर्घायु पाता है। यह नारदजी ने कहा है ॥। ४॥ ललाटे यस्य दृश्यन्ते चतुस्त्रिषयेकरेखिकाः । शतद्यं शतं षष्टिस्तस्यायुर्विशतिस्तथा॥ ५ ॥ [ इति कात्यायन: ] जिसके ललाट में चार रेखाएँ हों वह दो सौ वर्ष पर्यन्त जीता है। जिसके ललाट में तीन रेखाएँ हाँ वह सौ वर्ष की आयु पाता है। जिसके ललाट में दो रेखाएँ हों वह साठ वर्ष पर्यन्त जाता है। जिसके ललाट में एक रेखा हो वह बीस वर्ष की आयु पाता है। यह कात्यायन ने कहा है।५॥ स्व्रोगतिश्च नाभिश्च गम्भीरः स प्रशस्यते। षरा स वत्य ङ्गुलोत्सेधो योनांशः स दिवाकसाम्॥ ६॥ [ इति ब्राहमे ] जिसका स्वर, गमन और नाभि (तोंदी) ये तीनो गंभीर प्रतीत हों वह लोक में प्रशस्त होता है। जो ६६ अंगुल ऊँचा हो वह देवताओं का अंश होता है। यानी वह देवता का अवतार माना जाता है। यह ब्रह्मपुराख में कहा है। ६ ।। भ्रुवौ नासापुटे नेत्रे कर्णावोष्ठौ च चूचुकौ। कर्परौ मणिबन्धौ च जानुनी वृषणौ कटी।। ७॥ करौ पादौ स्फिजौ यस्य समौ ज्ञेयः स भृपतिः । दानविख्यातकीर्तिः स्यादात्मज्ञानपरायणः॥८॥ जिसकी माँहे, नासापुट (नाक के पोर), नेत्र, कान, ओट, कुचाग्र, कोहनी, कब्ज़ा, घुटना, अएडकोप, कपर, हाथ-पैर और कूल्हे समानाकार हों वह पृष्वीशल होना है और दान से विखयान कीर्तिवाला आत्मज्ञान में परायगा रहता है। ७।=॥ अथ पुनरपि वाल्मीकीयरामायगायुद्ध काएडेऽट्टचत्वार्न्शत्सर्गे श्रीमनीमहाराजञी- सीतान नानिया निसामुद्रकीयगजलद्गानि त्रिजटां प्रत्युक्रवती तान्याह- इमानि खलु पद्मानि पादयोवैं कुलस्त्रियः । पथमखएड आधिराज्येऽ्रभिषिच्यन्ते नरेन्द्रैः पतिभिस्सह॥ ६ ॥ शहो मातः, त्रिजटे ! पैरों में ये जो पद्ों के निशान हैं उनसे कुलीन स्रियाँ राज्यासन में नरेन्द्रपतियों के साथ निश्चयकर अभिषिक़ होती हैं। यानी उन स्तियों का पतियों के साथ गज्यासन में अभिषेक किया जाता है।।ह।। वैधव्यं यान्ति यैर्नार्य्योऽलक्षणैर्भाग्यदुर्लभाः। नात्मनस्तानि पश्यामि पश्यन्ती हतलक्षण॥१०॥ जिन कुलक्षणों से अभागिनी स्तिरियाँ राँड़ हो जाती हैं उनको मैं अपने शरीर में नहीं देखती हूँ। ऐसा कहकर च्छित रामजी को तथा लक्षण को भी देखती हुई सीताजी इतलक्षणोंवाली होगई ॥ १० ॥ सत्यनामानि पद्मानि स्त्रीणामुक्कानि लक्षणैः। तान्यद्य निहते रामे वितथानि भवन्ति मे ॥ ११ ॥ लक्षणज्ञाता पलडतों या लक्षणप्रतिपादकशास्त्रों ने स्रियों के करतल या पादतल में जा पदों के निशान सच्चे नामवाले यानी सफल कहे थे वे आज मेरे, रामजी के निहत हो जाने पर, विफल होते हैं ॥ ११ ॥ केशा: सूचमाः समा नीला भ्ुवौ चासंहते मम। वृत्ते चारोमके जङ्गेदन्ताश्चाविरला मम ॥ १२॥ मेरे केश पतले, समानाकार तथा काले हैं। मेरी मौहं मिली हुई नहीं हैं। मेरी जाँघें गोलाकार, लोपाडित हैं, और मेरे दाँत अविरल कुन्दकली से हैं ॥ १२ । शङ्के नेत्रे करौ पादौ गुल्फावूरू समौ चितौ। अनुवृत्तनखाः स्निग्धाः समाश्चाङ्कलयो मम ॥१३॥ ललाट की इड्डियाँ, नेत्र, हाथ पैर, गंठे और ऊरू ये समानाकार, बढे से हैं। मेरे नख क्रम से गोलाकार तथा चिकने हैं। मेरी अंणुकिशें समानाकार है।। १३।। १ नाभि: स्थूला सूक्ष्मकेशी नातिदीर्घा सुमध्यमा । पीनस्तनी मृगाक्षी च सा नारी सुखमेधत इति ॥ १॥ स्तनौ चाविरलौ पीन मामकौ मग्नचूचुकौ। मग्ना चोत्सेधनी नाभि:पाश्वोरेस्कंच मेचितम्॥१४। मेरे स्तन मिले हुए, मोटे, घुसी देपुनियोंवाले हैं। मेरी जाभि मग्न हुई ऊँची सी है। मेरी पमलियाँ व छाता ऊँचा है ।। १४ ।। मम वरणों मणिनिभो मृदून्यङरुहाणि च। प्रतिष्ठितां द्वादशभिर्मामूचुः शुभलक्षणाम् ॥ १५॥ मेरा वर्ण मणि के समान है। मेरे रोम कोपल हैं। बायें पैर की पाँचों अंगुलियाँ, दाहने पैर की पाँचों अंगुलियाँ, दोनों पैरों के तलवे, इन बारह निशानों से प्रतिष्ठित मुझे मुनियों ने शुभ लक्षर्णोंवाली कहा है ॥ १५ ॥ समग्रयवमच्छिद्रं पाणिपादं च वर्णवत्। मन्दस्मितेत्येव च मां कन्यालाक्षणिका विद्ुः ॥ १६॥ मेरे हांथ पैर की सारी अंगुलियाँ यतरों के निशानों से अङ्कित छिद्ररहित हैं। मेरे हाथ पैर वर्णवाले हैं। मेरा हास्य मन्द है। इसलिए कन्यालक्षणों के ज्ञाता पसिडत लोग मुझे शुभल्नगोंवाली ही जानते हैं ॥ १६ ॥ आधिराज्येऽभिषेको मे ब्राह्मणैः पतिना सह। कृतान्तनिपुणैरुक्ं तत्सर्वं वितथीकृतम् ॥१७॥ राज्यासन में पति के साथ मेरा अभिपेक होगा, यह ज्योतिःशास्त्रवेत्ता ब्राह्मणें ने कहा था। वह सब आज श्रीरामजी के न होने पर भूठा हो गया ॥ १ ॥ इति स्त्रीणं राजयोगादि:। अथ सामुद्रकीयायुद्टाययोगा व्याख्यायन्ते- गूदसन्धिशिरास्नायुः संहताङः स्थिरेन्द्रियः । उत्तरोत्तरसुक्षेत्रो यः स दीर्घायुरुच्यते ॥१८ ॥ १ बर्साद् बहुतरो देहो देहाद् बहुनरः स्वरः। स्वराद् बहुतरं सत्वं सवें सत्वे प्रतिष्ठितमिति॥ १॥ गर्भात्प्रभृत्यरोगो यः शनैः समुपचीयते। शरीरज्ञानविज्ञानैः स दीर्घायुः समासतः ॥१६॥ जिसके शरीर में सन्धि, शिरा और स्नायु ये छिपे हुए हों, जिसका सारा अङ्ग मजबून, इन्द्रियाँ स्थिर, शरीर उत्तरोत्तर सुदृश्य हो वह दीर्घायु कहा जाता है। जो गर्भ से लगाकर आरोग्य रहे, धीरे धीरे बढ़े और जिसका शरीर ज्ञान-विज्ञान से पूर्ण बना रहे वह दीर्घायु कहाता है।। १८-१३ ॥ मध्यमस्यायुषो ज्ञानमत ऊर्ध्व निबोध मे। अधस्तादक्षयो यस्य लेखाः स्युर्व्यक्रमायताः॥२० ॥ द्वे वा तिस्रोऽधिका वापि पादो कर्णो च मांसलौ। नासाग्रमूर्ध्व च भवेदूर्ध्वलेखाश्च पृष्ठतः । यस्य स्युस्तस्य परममायुर्भवति सप्ततिः॥२१ ॥ इसके अनन्तर मध्यम आयु लक्षण सुनिये। जिसकी आँखों के नीचे साफ़ दो, तीन या अनेक रेखाएँ हों, पैर तथा कान मांसल हों, नासिका का अग्रभाग ऊँचासा हो, पीठ में ऊर्ध्वरेखा हो उसकी आयु सच्तर वर्ष की होती है।। २०-२१।। जघन्यस्यायुपो ज्ञानमत ऊर्ध्व निवोध मे। हस्वानि यस्य पर्वाणि सुमहच्चापि मेहनम् ॥२२ ॥ तथोरस्यवलीदानि न च स्यात्पृष्ठमायतम्। ऊर्ध्वञ्व श्रवणे स्थानान्नासा चोचा शरीरिणः ॥२३॥ हसतो जल्पतो वापि दन्तमांसं प्रदृश्यते। प्रेक्षते यच् विभ्रान्तं स जीवेत्पञ्चविंशतिम्॥२४॥ अब अल्पायु का ज्ञान सुनिए। जिसके करतल में अंगुलियों की पोरें छोटीसी हों, लिङ् बड़ा हो। वन्तःस्थल लोम या मांसविहीन हो, पीठ चौड़ी न हो, कान यथास्थान स्थित, कुछ् ऊपर को चढे से हों, नाक ऊँचीसी हो, जिसके हँसने व बात करने में दाँतों का मांस दिखे, जो उन्मत्त की नाई दिखे वह पच्चीस वर्ष पर्यन्त जीता है॥ २२-२४॥ पादो पाणी च पारश्वे च पृष्ठं चैव तु चूचुकम्। रदनावदनं चैव स्कन्धौ चैव ललाटिका ॥ २५ ॥ यस्यैतानि च दृश्यन्ते महान्ति च शरीरिणः । अक्ुलीनां च सर्वासां पर्वारायुच्चानि यस्य वै ॥ २६॥ विशालौ च भुजौ यस्य नेत्रे स्यातां सुदीर्घके। भुकुट्योस्स्तनयोर्मध्यं वत्तश्चैव तु विस्तृतम् ॥ २७ ॥ जङ्गे च मेहनं चैव ग्रीवादेशश्च हस्त्रक: । नाभि: स्वरश्र बुद्धिश्च गम्भीरा यस्य दृश्यते ॥२८॥ स्तनौ चानुनतौ स्यातां कर्णौं चैव तु रोमशौ। आयतौ विस्तृतौ यस्य मस्तकं चन्दनार्चितम् ॥ २६॥ विशुष्कं हृदयं यस्य शरीरं शुष्यमाणकमू। दीर्घायुषं विजानीयानं नरं धर्मधाररिणम् ॥३०॥ एतल्लक्षणहीनो यो ह्यल्पायुः स प्रकीर्तितः । मिश्रलक्षणयुक्ो यो मध्यमायुरुदाहतः ॥३१॥ जिसके पैर, हाथ, बगल, स्तनाग्र, दाँत, मुख, कन्े और भाल ये अतीब विशाल हों, सारी अंगुलियाँ व उनकी पोरें बड़ीसी हों, जिसकी भृजाएँ विशाल हों, लोचन लम्बे से हों, भौँहें व स्तनों का मध्यभाग तथा वन्तःस्थल चौड़ासा हो, जाँघ, लिङ्ग और ग्रीवा ये छोटे से हों, नाभि, स्वर और बुद्धि ये गंभीर हो, दोनों स्तन ऊँचेन हों, कान लामोंवाले लम्बे व चौड़े हों, मस्तक चन्दन से चर्चित हो, हृदय सूख गया हो, सारा शरीर सूखा हुआ हो, उस धर्मधारी को दीर्घायु जानना चाहिए। जो इन पूर्वोंक लक्षणों से हीन दिखे वह अल्पायु कहाता है। ओर जो मिले लक्षणोंवाला हो उसे आचार्यों ने मध्यमायु कहा है।। २५-३१।। १ अतिमेधातिकीर्तिश्च विक्रमश्च सुखानि च । प्रथमे वयसि दश्यन्ते ह.एपायुश्च भवेश्रर: ॥। १ ॥ हस्तपादादिकानीह ह्यङ्गानि कथितानि वै ॥ ३२ ॥ तदन्यानि च सर्वाषि प्रत्यङ्गानि विदुर्ुधाः । तेपां प्रमाएं व्यामि शृणुष्वावहिता प्रिये॥ ३३॥ अप फिर आयुर्दाय के परिज्ञानार्थ आङ्ग व प्रत्यङ्ग कहे जाते हैं। हाथ, पाँव, मस्तक आदि अङ्ग कहे। इनसे भिन्न अपन्य समस्त अवयवों को पएिडतों ने प्रत्यङ्गकहा है। उनका प्रमाख सुनिये ॥३२-३३॥ पादाङ्कुष्टपदेशिन्योरन्तरं दयब्ुलं मतम्। प्रदेशिन्याः कनिष्ठान्तं ज्ञेयं मानं मनीषिभिः ॥३४॥ यथोत्तरं प्रमाएं तु हीनं पञ्चमभागकैः। पादप्रपादतलयोरायतं चतुरङ्कलम् ॥ ३५॥ पैरों का अँगूठा व तर्जनी इन दोनों का अन्तर दो अंगुल माना है। मध्यमा का प्रमाण तर्जनी के पाँच भाग का चार भाग कहा हैं। अनामिका की दीर्घता का मान मध्यमा के पाँच भाग का चार भाग है। कनिष्ठा की दीर्घता का प्रमाण अनामिका के पाँच भाग का चार भाग है। पैरों तथा पदाग्रों के तलों की दीर्घता का मान चार अंगुल कहा है।३४-३५। पञ्चाङ्कलप्रमाणन विस्तृतं प्रोच्यते बुधैः । पञ्चाङ्कलप्रमाणन पाष्यर्योरायतमुच्यते॥ ३६ ॥ चतुर्भिरङ्डलै: प्रोक्कं विस्तृतं बुद्धिमत्तरैः । पादयोरायतं ज्ञेयं चाङ्कुलैर्मनुसंमितैः॥३७॥ पाँच अंगुल के प्रमाण से पलिडन लोग विस्तार कहने हैं। एँड़ियों की दीर्घता पाँच अंगुल के प्रमागा से कही जाती है। उनका निस्तार बुद्धिमानों ने चार अंगुल कहा है। और पैरों की दीघना चौदह अंगुल जानना चाहिए ।३६-३७।। पादगुल्फं समारभ्य यावज्ानु प्रदृश्यते। तन्मध्यविस्तृतं ज्ञेयमङ्कलैर्मनुसंमितैः ॥३८॥ सामुद्रकशास्र अष्टादशाङ्गुलैर्जङ्वा चायता मुनिसंमता। पैरों के गएठों से जानु (छुटनू) तक का विस्तार चौदह अंगुल जानना चाहिए। जङ्गाएँ चौड़ी अठारह अंगुज् दीर्घ कहाती हैं-जानुओं के ऊपर दीर्घता का पमाण बत्तीस अंगुल कहा है।। ३८-३६॥। एवं प्रमाएं पञ्चाशदङ्कलं प्रोच्यते बुधैः। ऊरुमानप्रमाणेन तुल्या जङ्डा च कीर्तिता॥४० । वृषणौ चिवुके दन्ता तथैवं कर्णमूलकम्। नासापुटौ च नयने तेषां मध्यं च द्चक्ुलम् ॥ ४१ ॥ इस प्रकार सामुद्रकशास्त्रवेत्ता पिडतलोग पचास अंगुल प्रमाणण कहते हैं। और जंघाए ऊरुओं के मान के प्रमाख से समान कही जाती हैं। अएडकोप, चित्रुक (ठोही), दाँत, कर्णणमूल, नासापुट और नेत्र का मध्यस्थल दो अुल का कहाता है।। ४०-४१॥ मेहनं वदनं चैव नासाकर्णे ललाटिका। एपां चैव शिरोधेश्च उच्चता चतुरक्ुला ॥ ४२ ॥ चन्तुषोरायतं ज्ञेयमक्कलैर्वेंदसंमितैः । लिङ्गतो यावती नाभिर्नाभितो हृदयं तथा॥ ४३ ॥ हृदयाद्यावती ग्रीवा तन्मानं द्वादशाङ्कलम्। मध्यं स्तनद्यस्यैव दीर्घतावदनस्य च ॥ ४४ ॥ द्वादशाङ्कलमानेन कथिता च सदा बुधैः। लिङ्ग, मुख, नासिका, कान, ललाट और ग्रीवा की उच्चता चार अंगुल कहाती है। नेत्रों की दीर्घता चार अंगुल कही जाती है। लिङ्ग से जहाँ तक तोंदी व तोंदी से जहाँतक हंदय रहता है, हृदय से जहाँ तक ग्रीवा (घींच) रहती है, इन सबका मान प्रत्येक वारह अंगुल कहा है। दोनों स्तनों का अन्तर तथा मुख की दीर्घता परिडतों ने बारह अंगुल कही है, और प्रकोष्ठ से मशिबन्ध पर्यन्त स्थूलता वारह अ्ंगुल कहाती है॥ ४२-४५॥ नाभेर्निम्नतलस्यापि विस्तृतं पोडशाङ्कलम्। कूर्परात्स्कन्धदेशान्तं चान्तरं पोडशाङ्कलम् ॥ ४६॥ हस्तयोदीर्घता ज्ञेया चतुर्विशाङ्कला वुधैः। बाह्वोश्चैव प्रमाएं तु द्वात्रिंशदड्डलं स्मृतम् ॥४७ ॥ नामि के निचले भाग का विस्तार सोलह अंगुल कहाता है। कोहनी से कन्धों तक बीच का भाग सोलह अंगुल होता है। हाथों की दीर्घता चौबीस अंगुल पसिडतों को जानना चाहिए और भुजाओं का प्रमाण बत्तीस अंगुल कहा है।। ४६-४७।। ऊर्वोश्चैव तथा ज्ञेयं प्रमाएं पूर्वसंमतम्। मणिबन्धात्कूर्परान्तं प्रमाएं पोडशाङ्कलम् ॥४८॥ दैध्यं पाणितलस्यैव पडङ्कुलमितं स्मृतम्। एवन्तु विस्तृतं प्रोक्कमङ्कलैर्वेदसंमितैः ॥४६ ॥ ऊरुओं का प्रमाख, जो कि पहले संमत हो चुका है, यानी बत्तीस अंगुल जानना चाहिए। करतल की दीर्घता छः अंगुल कही है। ऐसे ही करतल का विस्तार चार अंगुल कहा है।। ४८-४६।। अङ्कुष्मूलादारभ्य यावत्स्यात्तु प्रदेशिनी। तदन्तरं वुधर्ज्ञेयमक्कलद्वयमानकम् ॥ ५० ॥ कर्णतो लोचनोपान्तं पञ्चाङ्कलमितं स्मृतम्। तर्जन्यनामिकाङ्कल्योरन्तरं सार्धद्चक्कुनम् ॥५१॥ अँगूठे के मूल से लेकर जहाँ तक तर्जनी रहती है, दोनों का मध्यस्थल पषिडतों को दो अंगुल जानना चाहिए। कानों से आँखों की कोरों तक सामुद्रकशास्त्न का मान पाँच अंगुल कहा है। तर्जनी व अनामिका का अन्तर ढाई अंगुल कहाता है॥ ५०-५१॥ कनिष्ठाङ्कष्ठपर्यन्तमन्तरं सार्धत्र्यङ्कलय्। ग्रीवाया वदनस्यापि विस्तृतं द्वादशाङ्कुलम्॥ ५२॥ नासाचिद्रपरमाणन्तु त्रिभागाक्कलसंमितम्। चन्तुपोस्तारकामानं वेदभागत्रिभागकम् ॥ ५३।। कनिष्ठा से अँगूठे तक के अन्तर का प्रमाण साढ़े तीन अङ्गल कहाता है। ग्रीवा और वदन (मुँह) का विस्तार वारह अंगुल कहा जाता है। नासिका के छेदों का प्रमाण एक अंगुल के चार भाग का तीन भाग कहाता है, और नेत्रों के तारे का प्रमाण नेत्र प्रमाख के चार भाग का तीन भाग होता है।। ५२-५३॥ तारयोर्नवमो भागः पुत्तल्योर्मानमुच्यते। मस्तकं तु समारभ्य केशान्तं यावदेव हि ॥ ५४ ॥ एकादशाङ्कलैरुक्रमन्तरं बुद्धिमत्तरै: । मस्तकात्पृष्ठतो भागे केशान्तं यावदेव हि॥ ५५॥ * तन्मानं तु बुधैरुक्रमङ्कलैर्दशभिः पिये। कर्णतो घाटिकामध्यं सप्ताङ्कलकविस्तृतम् ॥५६॥। कान्ताकटिप्रमाऐन पुरुषाणमुरः स्मृतम्। अष्टादशाङ्कलै: प्रोक्कं रमणीनामुरो वुधेः ॥५७॥ ताराओं का नवाँ भाग पुनलियों का प्रमाण कहा जाता है। मस्तक से सम्मुख केशान्तों का मध्यस्थल बुद्धिमानों ने ग्यारह अ्रंगुल कहा है। मस्तक से पीछे की तरफ़, जहाँतक वाल रहते हैं -- उसका प्रमाण पसिडतगखों ने ये सब प्रमाण प्रायः प्राचीन शिल्प एवं चित्र-कला के साधारण सिद्धान्तों पर अरवलंबित जान पड़ते हैं। वर्त्तमान समय में भी इसी प्रकार चित्रकला के नियम हैं-संपादक दश अंगुल कहा है-कानों से घोंटा पर्यन्त मध्यस्थल के विस्तार का प्रमाख सात अंगुल कहा जाता है, और स्त्रियों के कमर का प्रमाख चौबीस अंगुल माना है। उसी प्रमाख से पुरुपों का वत्तःस्थल कहा जाता है। पएिडतों ने स्त्रियों के वक्षःस्थल का प्रमाण अठारह अंगुल कहा है॥। ५६-५७॥ नराणां कटिदेशस्य मानं चाष्टादशाहुलम्। एवं सर्वशरीरस्य मानं विंशाधिकं शतम् ॥५८ ॥ पञ्चविंशे ततो वर्षे पुमान्नारी तु पोडशे। समत्वागतवीर्यो तो जानीयात्कुशलः सुधीः॥ ५६॥ पुरुपों की कमर का प्रमारण अारह अंगुल कहा है। इस प्रकार समस्त शरीर का प्रमाख एक सौ बीस अंगुल मुनियों ने बतलाया है। इस प्रमाण का विचार तभी करना चाहिए, जब कि पुरुप पच्चीस नर्ष का दो और स्त्री सोलह वर्ष की। समानता से वीर्य का बल आ चुका हो, उस समय सामुद्रकशास्त्र में प्रवीण पशिडत पूर्वोक्क प्रमाण का विचार करे॥ ५८-५६-।। देहः स्वैरङ्ुलैरेप यथावदनुकीर्तितः । युक्कपमाणनानेन पुमान्वा यदि वाङ्गना ॥ ६० ॥ दीर्घमायुरवापोति वित्तं च मह्द्च्छति। मध्यमैर्मध्यमे वायुर्वित्तहीनैस्तथावरम् ॥ ६१॥ अपने संगुल्तों से यह देह सथावत् कीर्तन किया गया है। स्त्री या पुरुष जो पूर्वोक प्रमाों से
स्त्रीपद्तललक्षण (Part 2)
संयुक्त हो तो दीर्घायु भोग पड़े धन को पाता है, और जो स्त्री अथवा पुरुप मध्यम प्रमाणों से प्तीत शे वह मध्यमायु को भोग मध्यम धन को पाता है। जो पूर्वोक गमरों से हीन लक्षगावाला हो वह अल्पायु भोग थोड़े से धन को पाता है॥ ६०-६१॥ इत्यायुर्दाययोगा: । pt II इ CL CR ER ५र ac 21 १५0 ८० साने ५१६० हU o १७० १० 2.00 O3V EEC २१७ १४० Ey०y३ H3 uo ५र TO WO M O ofo FEC पथमखएड भालरेखातो वयःक्रमाब्दनिर्यय- भाले विशाले खलु सप्त सन्ति रेखा विशुद्धा मुनिभिःप्रदिष्टा। तासां स्वरूपं हृदये निधाय ब्रूयुः प्रमाएं वयसो बुधेन्द्राः ॥ १ ॥ भाल में मुनियों द्वारा कही गई सात रखायें होती हैं। उनका स्वरूप अध्ययन कर बुधवरों को वयःक्रम का प्रमाश कहना चाहिये ।।१॥ केशस्य निम्ने प्रथमां हि रेखां सौराधिनाथां कवयो वदन्ति। ततो द्वितीयां धिषणाधिपालां ततस्तृतीयां च्तितिसूनुनाथाम्२ केशों के निचले भाग की पहली रेखा का स्व्रामी शनि है। दूसरी का गुरु; तीसरी का मङ्ल ॥ २ ॥ ततश्चतुर्थी दिननाथनाथा शुक्राधिपा पञ्चमिका प्रसिद्धा। बुधाधिनाथा खलु पष्ठिका सा या सप्तमी सा क्षणदाधिपेशा ३ चन्द्र है। ३ ।। चौथी का सूर्य, पाँचवीं का भृगु, छठी का बुध और सातवीं का स्वांमी वयःक्रमस्याव्दनिरूपणोडयं संपोच्यते वै नितरामुपायः। एका कुरेखा यदि कर्णयुग्मस्नायुं समेतीह तदा विचार्यम् ४॥ एषा कुरेखा यदि वामकर्णस्नायोः समुत्था समुपैति सीमाम्। भालस्य वामां निगदेद्दशाब्दं वयःक्र्मं वा रविवर्षसम्मितम्५ वयःक्रमसम्बन्धी वर्षों के निरुपण में यह उपाय कहा है कि जब एक नुद्रारेखा कानों की नस (रग) तक हो, उस समय परिडतों को विचारना चाहिये और यदि यह नुद्रा रेखा बायें कान की रग से उठकर माल की बाम सीमा तक हो तो दश या बारहवर्ष का वयःक्रम कहना चाहिये।। ४-५॥
- यहाँ यह देखिये कि भारतीय सामुद्रकशास्त्रवेत्ताओं ने केवल भालरेखा से कैसी विचित्र युक्ति द्वारा मनुष्य की आयु का निर्य बढ़ी सुगमता से करके बताया है। आज भी इसके अनेकों परिडत हैं जो केवल भालरेखा द्वारा ही समस्त आयुनिर्य करते हैं।-संपादक आस्पष्टरूपा परिदृश्यमाना ह्वेषा कुरेखा यदि भालमध्यम्। संभेदयित्वा खलु विस्तृता चेदेकोनांन्रेशच्छरदं वदन्ति ॥ ६॥ यदि कुछ्ेक स्पष्ट हो और कपाल के मध्यनाग तक जावे तो उन्तीस वर्ष का वयःक्रम कहते हैं ॥६ ॥ एषा कुरेखा यदि हस्वरूपा वयःक्र्मं हस्वतरं वदन्ति। दीर्घा यदानीं खलु दीर्घरूपं न्यूनाधिरुंवे स्वधिया विचार्यमू७ यदि यह नुद्रारेखा छोटी सी हो तो अल्पनयःक्रम और यदि बड़ी हो तो बड़ा वयःक्रम कहते हैं। ७॥ यस्यास्ति चन्तुः खलु कालवर्णं रात्रौ द्वियामं जनने जनस्य। आश्यामवणं तदपेक्षया चेद घटीमितं वे समयं समीयात्॥=॥ जिसका नेत्र कालावर्ण-प्रतीन हो तो उसका जन्मसमय मध्यरात्रि का कहना चाहिये। यदि उसकी अपेक्षा कुछ थोड़ासा कालावर्ण प्रतीत हो-तो एक घटी का जन्म समय जानना चाहिये॥८ ॥ मधुत्रताभं यदि चेज चन्तुस्ताससमेतं यदिवा हि कृष्णम्। तदा जनन्यां जनने जनस्य दिष्टं वदेइ द्वित्रिघटीप्रमाणम्।६॥ जिसका चन्तु भौरे के समान वर्णवाला हो या तारा समेत कालावर्ण हो तो उसका जन्म समय दो या तीन घड़ी का जानना चाहिए।। ६॥ यन्नेत्रतारा परितः सिताब्या सा केवला वा विशदा सनीला। रात्रो वदेद्वेदघटीपरमाणं निरूपयेद्वाणघटीमितं वा॥ १० ॥ जिसके नेत्र का तारा चारों तरफ़ सफ़ेद हो या केवल नीलवर्ण तथा सफ़ेद सा देख पड़े तो उसका जन्म समय रात्रि में चार या पाँच घड़ी का जानना ॥ १० ॥
- देखिये गणित ज्योतिष का क्रम भी सरलता से सामुद्रक द्वारा भी मिला. कर कुएडली तक खींच दी जा सकती है।-संपादक पथमखड यल्लोचनस्था खलु चार्धनीला तारा भवेदे ससिता सपीता। प्रातर्वदे्छास्त्रघटीमितं वा प्रकाशयेत्सप्घटीप्रमाणम्॥११।। जिसके लोचनों का तारा आधा नीलवर्णवाला, सफ़ेद या पीला हो तो उसका जन्म समय पातःकाल छः या सान बड़ी का कहना चाहिये॥११॥ यस्याच्ितारामणिरेव नीलो हेको हि मिश्रो मणिभागको वा। रात्रौ वदेदष्टघटीपमाएं निरूपयेन्नन्दघटीमितं वा ॥१२ ॥ जिसके नेत्र का तारामणि ही नीलवर्गा हो या केवल मणिभाग ही मिश्रित वर्णवला हा तो उसका जन्म समय रात्रि में आठ या नत घड़ी का कहना ॥ १२ । चन्तुः समस्तं खलु नीलवएँ चुद्रं सुचिह्नं यदि वा समीपे। रत्रो वदेहिग्घटिकाप्रमाएं तथादिशेदीशघटीमितं वा॥१३॥ जिसका सारा नेत्र कालावर्ण हो या नेत्र के समीप छोटे-छोटे-से चिह्न हों तो उसका जन्म समय रात्रि में दश घड़ी या ग्यारह घड़ी का बताना चाहिये ॥ १३ ॥ नेत्रं यदेषद्धरितं च यस्य दिष्टं वदेत्सूर्यंघटीमितं वै। अर्ध पलाशं यदिवार्धनीलं कालं वदेद्दयेकघटीमितंवा ॥१४। जिसका नेत्र कुदेक हरासा हो तो उसका जन्म समय बारह घड़ी का कहना चाहिये। जिसका नेत्रआधा हरा या आधा कालावर्ण हो तो उसका जन्म समय एक या दो घड़ी का कहना चाहिये ॥ १४ ॥ ईषत्पलाशं मलिनं च यस्य विलोक्यते चेन्मनुजस्य चन्षुः। दिवा वदेदवह्निघटीप्रमाएं निरूपयेद्वेदघटीमितं वा ॥ १५॥ जिसका नेत्र कुछेक हरा या मैलासा हो उसका जन्म समय दिन में तीन या चार घड़ी का निरूपण करना ॥ १५ ॥ नेत्रस्य तारामणिरेव नीलो विद्ृश्यते वा हरितोऽपराह्णे। ब्रूयात्तदा बाणघटीप्रमाणं बुधो वदेच्छास्त्रघटीमितं वा ॥१६॥ जिमके नेत्र का तारामणि ही नील या हरितवर्ण हो उसका जन्म समय अपराह में पाँच या छः बड़ी का बताना ॥ १६ ॥ चिडालनेत्रप्रतिमं च चन्तुः प्रतीयते यस्य जनस्य नूनम्। रात्रौ वदेत्सप्तघटीप्रमाएं विचारयेन्नागघटीमितं वा ॥ १७॥ जिसका नेत्र बिलार की आँखों के समान हो उसका जन्म समय रात्रि में सात या आठ घड़ी का विचारना चाहिये । १७ ।। मार्जारदृष्टिप्रभमेव चच्तुः संरक्रमध्यं यदिवा विभाति। रात्रो नदेतनदघटीप्रमाएं विज्ञो वदेहिग्घटिकामितं वा ॥ १८॥ जिसकी आंख बिलार की आँखों के समान हो; या आँख का मध्य भाग लालवर्णवाला हो उसका जन्म समय विद्वान् को नब या दश घड़ी का बताना चाहिये ॥ १८ ॥ आरक्वर्णं यदि वा हि कृष्णं प्रतीयते यस्य नरस्य नेत्रम्। रात्रौं वदेदीशघटीप्रमाणं विचार्य सर्वं हृदये निदेशम्॥ १६॥ जिसका नेत्र लाल या कालावर्ण हो उसका जन्म समय ग्यारह घड़ी का कहना चाहिये॥। १६ ।। चिह्द्वारा जन्मलग्न नार्या यदा वा पुरुषस्य भाले संदृश्यते चेद्धिशदंच चिह्म्। दशांशमध्ये खलु मेषकस्य जन्मं वदेत्तस्य जनस्य नूनम् ॥२०॥ जिस नारी या पुरुप के ललाट में यदि साफ़ सुथरा निशान हो तो उस का जन्म मेपलग्नगन दश अंशों के बीच में यानी पहले द्रेष्काख में कहना चाडिये ॥ २० ॥ भाले विशाले वदने च नेत्रे दक्षाचिनिम्ने ह्यथवोर्ध्वभागे। ओष्ठोचदेशे यदि भाति चिह्नं कलायसाम्यं बहुलोमशं वा २१ विशालभाल, मुख, वामनेत्र, दाहने नेत्र का निचला भाग अथवा ऊपरला भाग और ओठों का ऊर्ध् भाग यदि इनमें मटर समान या घने लोमोंवाला निशान सोहता हो ॥ २१ ॥ पथमखएड दशांशमारभ्य नखांशमध्ये मेषस्य ज्ञेया जनिरेव जन्तोः । पधःस्थले वै वदनस्ययस्यविभाति चिह्नं चियुकेऽय वा स्यात् २२ तो उसका जन्म मेप लग्न के दश अंश से लेकर बीस अंश के बीच में जानना चाहिये। जिसके मुख के निचले भाग में अथवा ठोदी में निशान सोहता हो ॥ २२ ॥ नखांशमारभ्य तदैडकस्य त्रिंशांशमध्ये पुरुषस्य जन्म। वदन्ति विपाःखलु शास्त्रनिष्ठाःसाँव्वत्सरा वेदविदां वरेएया: २३ तो ज्योतिपियों ने मेप लग्नगत बीस अंशों से लेकर तीस अंशों के भीतर उसका जन्म कहा है॥ २३॥ रीत्या यदानीं खलु सूक्ष्मया चेद्विचारणां कर्तुमि हाभिवाञ्वेत्। आरम्य भालाचिबुकान्तमेवं कुर्यात्तुभागत्रयमेव धीरः॥२४॥ जब सामुद्रकशास्त्री सूच्ष्म रीति से विचार करना चाहे तो भाल से लेकर ठोदी पर्यन्त तीन भाग करे। २४ ॥ आद्यं च भागं प्रवदेदिगंशं विशांशतुल्यं खलु युग्मभागम्। त्रिंशांशसाम्यं प्रवदेत्त्िभागं विज्ञाय चेत्थं क्रिय तां विचार: २५ दश अंशवाला पहला भाग, बीस अंशवाला दूसरा और तीस अंशवाला तीसरा भाग कहना चाहिये। इस प्रकार विचार किया जावे ॥ २५ ॥ होरादिकान्वै सकलान्विचार्य ब्रूयात्फल।देशिहैवधीमान्। ध्यात्वा हि रामं कुजया समेतंन तंविना को भणितुं समर्थ:२६ होरा-द्रेष्काण-नवांशा आदि समस्त पद्दगों का विचार कर बुद्धिमान् फलादेश को एकाग्रचित्त होकर शांतभाव से भगवत्स्मरण कर कहे ॥२६।। कराठप्रदेशे यदि भाति चिह्नं चुद्रस्वरूपं यदिवा हि कोलम्। संरक्वर्णं यदि वा बिडालं जनि वदेदुक्षदिगंशमध्ये॥२७॥ यदि करठभाग में छोटे वेर के बराबर निशान हो अथवा लाल, बिलार
- देखिये चित्रकला तथा विज्ञान आदि सामुद्रक का संबंध।-संपादक सामुद्रकशास्त् के समान आकारवाला निशान हो तो वृपलग्नगत दश अंशों के बीच में जन्म कइना ॥ २७ ॥ गलैकदेशे यदि भाति चिह्न पागुक्रूपं ह्यथवा किमन्यत्। द्रेष्काणयुग्मे वृपलग्नकस्य ब्रूयाजनिं वै मनुजस्य तस्य २८ यदि कएंठ के एक देश में पूर्वोक निशान अथवा कोई अन्य निशान हो तो वृपलग्नगत दूसरे द्रेष्काण में उसका जन्म कहना चाहिये। २८॥ कराठोपरिस्थं जलबुद्दबुदाभं किंवा सरकं पिटकासमानय्। त्रिंशांशमध्ये वृषलग्नकस्य विद्याजनुर्वै पुरुपस्य तस्य ॥२६।। यदि कएठ के ऊपरले भाग में जल के बुल्ले के समान या लाल फोड़े के समान निशान हो तो वृपलग्नगत तीसरे द्रेष्काण में उसका जन्म जानना चाहिये॥ २६॥ विद्योतते चेत्खल दक्षवाहो स्कन्धदये वा यदि भाति चिह्नम्। दशांशमध्ये मिथुनस्य यस्य जनि वदेत्तस्य नरस्य नूनम् ३० जिसकी दाहिनी भुजा या दोनों कन्धों में यदि कोई निशान शे तो मिथुन लग्नगत दश अंशों के बीच में उसका जन्म कहना चाहिये।३०॥ विभाति चिह्नं यदि वामवाहो तथांसयोर्वा निकटे विभाति। द्रेष्काणयुग्मे खलु युग्मकस्य ब्रूयाज्नुर्वेमनुजस्य तस्य ३१।। यदि बाई भुन्ा या कन्धों के समीप हो तो मिथुनलग्नगत दूसरे द्रेष्कारण में उसका जन्म कहना ॥ ३१ ॥ मध्ये यदानीं खलु दक्षवा होविराजते चेद्विशदं च चिह्नम् । विंशांशतो वै शरविंशभागे युग्मस्य जन्म प्रवदेजनस्य ३२ जिसकी दाहिनी भुजा के बीच में साफ़ सुथरा निशान हो तो मिथुन लग्नगत बीस अंशों से लेकर पचीस अंशों के भीतर उसका जन्म बताना चाहिये॥ ३२॥ विद्योतते चेत्खलु वामवाहोर्मध्ये सुचिह्नं विशदं च यस्य। आरभ्य विंशं सशरंतदानीं त्रिंशांशमध्ये मिथुनस्य जन्म ३३। प्रथमखरड जिसकी बाई भुजा के बीच में यदि कोई निशान हो तो मिथुन लग्न गत पचीस अंशों से लेकर तीस अंशों के भीतर उसका जन्म कहना चाहिये।। ३३ ॥। वक्षःस्थले चेच्छशकांङ्गिसाम्यं चिह्नं सपुष्पं ससितं विभाति। आद्ये हकाणे खलु कर्कटस्य जनिं वदेद् बुद्धिवरो जनस्य ३४।। जिसके वक्षःस्थल में यदि खरगोश के पैर के समान या फूल के समान सफ़ेद निशान हो तो कर्क लग्नगत पहले द्रेष्काण में उसका जन्म बताना चाहिये॥ ३४॥ चिह्नं यदा चेत्कुचयोः समीपे कोलस्त्ररूपं कुसुमप्रभं वा। दशांशमारभ्य नखांशमध्ये कर्कस्य जन्मं प्रवदेजनस्य ॥३५॥ जिसके स्तनों के निकट यदि बेर के समान या फूल के समान निशान हो तो कर्क लग्नगत दश अंश से लेकर बीस अंशों के मीतर उसका जन्म कहना चाहिये॥ ३५॥ उरोजनिम्ने यदि भाति चिह्नं पुष्पप्रभं वा खलु फेनिलाभम्। वह्नौ हकाणे सति कर्कटस्य धीरो वदेजन्म जनस्य तस्य ॥३६॥ जिसके स्तनों के निचले भाग में यदि फूल के समान या वेर के समान निशान हो तो कर्क लग्न के तीसरे द्रेष्काण में उसका जन्म बताना चाहिये॥ ३६॥ वत्सोपरिस्थं यदि वामगं चेचिह्नं विशुद्धं नितरां विभाति। आद्ये हकाण मृगराजकस्य ब्रयाजनुर्वै मनुजस्य तस्य॥३७ यदि वामभाग में बक्ःस्थल के ऊपर शुभ चिह्न हो तो सिंहलग्न के पहले द्रेष्काण में उसका जन्म बताना चाहिये ।। ३७ ।। वत्सस्य निम्ने यदि भाति चिह्नं प्रागुकरूपं ह्यथवा किमन्यत्। युग्मे दृकाण खलुसिंहकस्य विचारयेद्वे जननंजनस्य ॥३८॥ यदि वक्षःस्थल के निचले भाग में पूर्वोक़ चिह्न अथवा अन्य कोई चिह्न हो तो सिंहलग्न के दूसरे द्रेष्काण में उसका जन्म विचारना चाहिये॥३८॥ संप्रेच्यते चेत्खलु पार्श्वभागे सातीलकामं यदि वा कुरूपम्। करठीरवस्यान्तिमिके हकाऐे जनिं प्रतीयात्पुरुषस्य तस्य ३६॥। पार्श्वभाग में यदि मटरसमान अथवा छोटासा निशान हो तो सिंहलग्न के तीसरे द्रेष्काण में उसका जन्म जानना चाहिये॥। ३६ ॥ मध्योदरे वा कुचयो: समीपे िन्दुस्वरूपं यदि नीलरक्रय्। आद्ये हकाऐ खलु कन्यकाया धीरो वदेदे जननं जनस्य ४० पेट के बीच में या स्तनों के निकट काला या लाल बिन्दु सा निशान हो तो कन्यालग्न के पहले द्रेष्काण में उस माणी का जन्म बताना चाहिये॥४०। कुचोदरे चेद्यदि नीचदेशे रक्नं सनीलं खलु बिन्दुयुक्कस्। युग्मे दकाण सति कन्यकांया विद्याजनिं वै मनुजस्य तस्य ४१ यदि स्तन या पेट के निचले भाग में लाल या काले रंगवाला बिन्दुयुक्क निशान हो तो कन्यालग्न के दूसरे द्रेष्काण में उसका जन्म जानना चाहिये॥ ४१ ॥ तुन्दस्य निम्ने यदि वा सुनाभ्याश्रिह्नं किमन्यद्विशदं विभाति। वह्नौ हकाण सति कन्यकाया ब्रूयाजनुर्वै खलु मानवस्य ४२ यदि तोंद (पेट) या तोंदी के निचले भाग में कोई अन्य निशान हो तो कन्यालग्न के तीसरे द्रेष्कारग में उस पारणी का जन्म बताना चाहिये ।४२॥ नाभौ कटो वा यदि लोमयुक्ं चुद्रस्वरूपं मृदुतासमेतम्। आद्ेदृटकाण खलु तौलिकस्य विद्याद्विदीशोमनुजस्य जन्म॥। यदि तोंदी या कमर में लोमयुक, कोमल, छोटासा निशान हो तो तुलालग्न के पहले द्रेष्काण में उसका जन्म जानना चाहिये ।। ४३॥ प्रागुकृनिह्नं यदि वामगं चेद्विभाति शुद्धं खलु नाभिनिम्ने। युग्मे दृकाण सति तौलिकस्य बुधो वदेज्न्म जनस्य तस्य४४ यदि पूर्वोक निशान वामभाग में नाभि के निचले भाग में हो तो तुला लग्न के दूसरे द्रेष्काख में उसका जन्म बताना चाहिये ॥ ४४॥ आलोच्यते चेदुदरस्य प्रान्ते चिह्नं सनीलं बहुलोमशं वा। वह्नौ हकाणे सति तौलिकस्य जनिं वदेत्तस्य जनस्य सूरि:४५ यदि उदर के प्रान्तभाग में काला या घने लोमोंवाला निशान हो तो तुला लग्नगत तीसरे द्रेष्का में उसका जन्म बताना ॥। ४५ ॥ श्रोणीप्रदेशस्य तु वामभागे विभाति चिह्नं विशदस्वरूपम् । आद्ये दकाण खलु वृश्चिकस्य विद्याजनिं वे पुरुपस्य तस्य४६ यदि कमर के वामभाग में निशान हो तो वृश्चिक लग्न के पहले द्रेष्काख में उसका जन्म जानना । ४६ । कटिप्रदेशस्य च दक्षभागे कलायसाम्यं खलु भाति चिह्नम्। युग्मे दकाण सति वृश्चिकस्य ब्रूयाजनि वै मनुजस्य तस्य४७ यदि कमर के दाहिने भाग में मटरसमान निशान हो तो वृश्चिकलग्न के दूसरे द्रेष्काख में उसका जन्म बताना॥ ४७ ॥ अपाननिश्ने यदि भाति चिह्नं हरेणुरूपं विमलस्वरूपम्। वह्नौ हकाणे सति वृश्चिकस्य वदेद् बुधेशो जननंजनस्य ४८ यदि गुदा के निचले देश में मटरसमान निशान हो तो दृश्चिकलग्न के तीसरे द्रेष्का में उसका जन्म बताना चाहिये।। ४८॥ वामोरुसंस्थं विशदस्वरूपं विभाति चिह्नं जलबुद्बुदाभम्। आाद्ये हकाणे खलु चापकस्य जनिं वदेद्बुद्धिवरो जनस्य४६ यदि बाई ऊरु में जलबुल्ले के समान निशान हो तो धनलग्न के पहले द्रेष्कार में उसका जन्म बताना ॥ ४है॥ दक्षोरुसंस्थं विमलस्वरूपं प्रागुक्तचिह्नं नियतं विभाति। युग्मे हकाणे हि धनुर्धेरस्य ब्रूयाजनुर्वै मनुजस्य तस्य॥५०॥ यदि दाहिनी ऊरु में पूर्वोक़ निशान हो तो धन लग्न के दूसरे द्रेष्काण में उसका जन्म कहना चाहिये॥ ५० ॥ ऊरुद्वयस्यापि च तूर्ध्वभागे चिह्नं यदानीं विशदं विभाति। वह्नौ हकाणे खलु कार्मुकस्य समुद्धवं वै कथयेजनस्य ॥ ५ १ ॥ सामुद्रकशास्न यदि दोनों ऊरुओं के ऊपरले भाग में निशान हो तो धनलग्न के तीसरे द्रेष्काख में उसका जन्म कहना चाहिये॥ ५१ ॥ उच्चस्थले चेत्खलु दक्षजानोरनुच्चतारासममेव भाति। आद्ये दकाणे सति नक्रकस्य विद्याज्जनुर्वे मनुजस्य तस्य ५२ यदि दाडिने घुटनू के ऊगरले भाग में, उँचाई रहिन, नाश के समान निशान हो तो मकरलग्न के पहले ट्रेष्क र में उसका जन्म जानना चाहिये ५२ ऊर्ध्वस्थले चेत्खलु वामजानो: प्रागुकचिह्नं विशदं विभाति। युग्मे हकाणे मकरस्य पुंसो ब्रूयाजानिं बुद्धिमतामधीशः५३॥ यदि चायें बुटनू के ऊपरले भाग में पूर्वोक़ निशान हो तो मकर लग्न के दूसरे द्रेष्काणण में उस पुरुप का जन्म बनाना चाहिये। ५३॥ अष्ठीवतश्चेत्खलु निम्नदेशे प्रागुक्चिह्नं यदि भाति शुद्धम्। वह्नौ दकाऐ रति नकरकस्य विद्याद वुधेशो जननंजनस्य प४॥ यदि जानुओं के निचले भाग में पूर्वोक निशान हो तो मकर के तीसरे द्रेष्काख में उसका जन्म बुधेशों को जानना चाहिये ॥। ५४॥ उच्चप्रदेशे खलु द्तजङ्गा दीर्घ त्वनुचं भजते हि भङ्गय्। आद्ये हकाणे सति कुम्भकस्य विज्ञो वदेदे पुरुषस्य जन्म ५५ यदि दाहिनी जाँघ के ऊपरले भाग में तरककार निशान हो तो कुम्भ लग्नगत पहले द्रेष्काण में उसका जन्म बताना चाहिये॥ ५५॥ वामा सुजङ्ा खलु चोर्ध्वभागे प्रागुक्चिह्नं लभते यदानीम्। युग्मे हकाणे घटलग्नकस्य विद्याज्जनिं वे मनुजस्य तस्य ५६ यदि बाई जङ्गा के ऊपर के भाग में पूर्वोंक निशन हो तो कुम्भलग्न के दूसरे द्रेष्काख में जन्म जानना चाहिये ॥ ५६ ॥ जङ्घाद्वयस्योपरिंगं विभाति चिह्ं यदानीं बदरप्रमाणम्। वह्नौ हकाण सति कुम्भकस्य व्ृयाज्जनुर्वै खलु मानुपस्य ५७ यदि दोनों जङ्गाओं के ऊपरी भाग में बेर के समान निशान हो तो कुम्भ लग्न के तीसरे द्रेष्कागा में जन्म कहना॥ ५७ ॥ अनुन्नतं चेद्यदि मांसलग्नं चोद्धाति चिह्नं खलु वामपादे। आद्ये टकाऐे सति मीनकस्य वदेत्सुधीरो जननं जनस्य पू८ यदि उँचाई रहित मांस में लगा हुआ निशान वामपाद के ऊपरले भाग में हो तो मीनलग्न के पहले द्रेष्काण में जन्म कहना चाहिये॥ ५८॥ ऊर्ध्वस्थले चैद्यदि दक्षपादे प्रागुक्कचिह्नं विशदं विभाति। युग्मे हकाण पृथुलोमकस्य जनि विपश्चित्मवदेज्जनस्य ५६ यदि दाहिने पाद के ऊपरी भाग में पूर्वोक निशान स्पष्ट हो तो मीन लग्न के दूसरे द्रेष्काख में जन्द बताना ॥ ५६ ॥ अधःस्थलस्थं पदयोर्यदानीं संप्रेच्यते चेद्विशदं च चिह्हम। वह्नौ दकाण भपलग्नकस्य ब्रूयाज्जनुर्वुद्धिवरो जनस्य ॥ ६० ॥ यदि दोनों पैरों के निचले भाग में साफ़ सुथरा निशान होतो मीनलग्न के तीसरे द्रेष्काख में जन्म कहना चाहिये ॥ ६० ॥ भाले मुखे वा यदि लच्ष्म मेषं वृषं च कराठे मिथुनं च वाह्वोः। क्क च चित्ते जठरे च सिंहं कट्यांच कन्यां कथयन्ति धीरा: ६१॥ यदि ललाट या मुख में कैसा ही निशान हो तो मेप, कएठ में हो तो छृप, भुनाओं में हो तो मिथुन, हृदय में हो तो कर्क, पेट में हो तो सिंद, और यदि कमर में हो तो कन्या जन्मलग्न कहना चाहिये ॥ ६? ॥ नाभेरधःस्थं प्रवदेत्तुलाख्यं गुह्यप्रदेशे खलु वृश्चिकाख्यम। ऊरुस्थलस्थं धंनुरेव विद्याज्जानुस्थितं वे मकरं बुधेशः॥६२॥ यदि नाभि के निचले भाग में निशान हो तो जन्मलग्न तुला कहना चाहिये। यदि गुह्यपदेश में निशान हो तो दृश्चिक, ऊरुओं में हो तो धनलग्न, बुदनुओं में हो तो मकरलग्न जानना चाहिये॥ ६२॥ जङ्गास्थितं वै कथयन्ति कुम्भं पादस्थिनं चेत्खलु मीनमाहुः। स्थूलां सुरीतिं हृदये निधाय व्याख्यायि लग्नं जनुषोजनानाम्॥। यदि निशान जाँघों में हो तो कुम्भ को जन्मलग्न कहा है। यदि पाद- सामुद्रकशास्न तलों में चिह्न हो तो आचार्यों ने मीन को जन्मलग्न बतलाया है। इस भाँति स्थूलरीति को हृदयंगम कर मनुष्यों का जन्मलग्न कहा गया है ॥ ६३ ॥ भालस्थ मेपादिस्व्र रूपज्ञान चिह्नं यदानीं विशदाकुशाभतता पोक्कं पुराणः खलु मेषकस्य। वेदाङ्कसाम्यं वृषभस्य चिह्नं गायन्ति विश्रा वरबुद्धिमन्तः ६४ अङ्कश के समान निशान को पेप लग्न का चिह्न कहा है। टृपलग्न का चिह्न चार अङ्क के समान है॥ ६४ ॥ II कोणन युक्नं सरलं द्विरेखं युग्मस्य चिह्नं कविभि: प्रयुक्कम्। सप्ताङ्कयुग्मं यदिव्यस्तरूपं प्रकाशितं वे खलु कर्कटस्य ६५॥ कोश से युक्त सीधा दो रेखाओंवाला मिथुन1 का चिह्न है। यदि सात अङ्क का जोड़ा उलटे रूप से प्रतीत होता हो तो कर्कलग्न का चिह्न है॥ ६५ ।। ऋमातृकायुक्पदं यदानीं विद्योतते चेत्खलु वृत्तकायम्। D सिंहस्य चिह्नं विशदीकृतं वै सा्वत्मरेवैंदविदां वरिष्ठैः ६६ यदि ऋकार की मात्रा से जुड़े हुए पैरोंवाला वृत्ताकार निशान हो तो उसे सिंह का चिह्न जानना ॥ ६६ ॥ यन्पीस्वरूपं सरलं विशुद्धं प्रोक्कं हि चिह्नं खलु बालिकायाः । नीचप्रदेशे कुटिलैकरेखं विज्येन युक्नं धनुपा यदोधें॥ ६७॥ सीधा व साफ़ यन्पी के समान कन्या का चिह्न है। जिसके निचले देश में टेही एक रेग्ा हो व ऊपरले भाग में रेदारहिन धन्वाकार निशान हो- वदन्ति चिह्नं खलु तौलिकस्य यमस्तरूपं दुषिकस्याm् ज्ञेयम् खर्जरशाखासममेव रूपं चापस्य चिह्नं XX भणितं प्रवीणै: ६८ तो उसे तुला काइल चिंद्र कहते हैं TA यम के रूपवाला तृश्चिक १ ऊर्ध्वभाग बिगुरेन धनुपा समतम् । प्रथमखरड का निशान जानना चाहिये। जिसका रूप खजूर की शाखा समान ही हो तो उसे धनलग्न का चिंह्न कहा है॥ ६७-६८ ॥ Pवीपीस्व रूपं कवयो वदन्ति नक्रस्य चिह्नं गदितं सुधीभिः । चक्रंद्धिरेखंखलुकुम्भकस्य पटुत्रिंश साम्यंपृथुलोमकस्य। बीपी समान मकर का चिह्न कहा है। टेही दो रेखाओंवाला कुम्भ का चिह्न कहा है। अ छत्तीस अङ सम रूपनाला निशान मीन लग्न का कहा जाता है ॥ ६६ ॥ एतानि चिह्नानि मयोदितांनि मेपादिकानां खिलराशिकानाम् विज्ञाय चेत्थं सुधिया विचार्य शुभाशुभं वै मनुजस्य नूनम् ७०॥ मेप आदि समस्त राशियों के ये चिह्न मैंने कहे हैं इस भाँति उन सर्बों को जानकर मानवगणों का शुभाशुभ पणिडतों को विचारना चाडिये॥७०।।* भाल में मेपादिवासज्ञान भालोचँदेशे वसतीह ककों मध्यस्थले वै वृषभो विभाति। दक्षभ्रेंकुत्यां भ्रमतीह सिंहो वामभ्रकुट्यां खलु कुम्भकोऽपि७१॥ ललाट के ऊपरले भाग में कर्क व भाल के मध्य में वृष, दाहिनी भौंह पर सिंह और बाई माँह पर कुम्भ है ॥ ७? ॥ दक्षाम्य कोर्ध्वे धनुरेव भाति दक्षश्रुतोध्वे धटको विभाति। वामश्रुतोध्वे मिथुनं च मेषो नासोच्चदेशे खलु वृश्चिकोपि ७२। दाहिने नेत्र के ऊपरीभाग में धन है। दाहिने कान के ऊर्ध्वभाग में तुला है। वायें कान के ऊपरले भाग में मिथुन और मेष है। और नासिका के ऊर्ध्वदेश में वृश्चिक है॥ ७२॥+ १ मकरस्य २ मीनस्य 3 कथितानि ४ ललाटोरध्यदेशे ५ दत्षिराम्रुकुटौ
- यह सभी वातें पाठकों को ध्यान में रखने से उनके फलाफल कहने में सरलता होगी।-संपोदक
- शरीर में राशियों की पहिचान तथा उनके स्थान कैसी बारीकी से कहे गये हैं।-संपादक सामुद्रकशास दक्षे तु गएडे वसतीह बाला वामे च गएडे खलु मीनकोऽपि। नक्रस्थितो वै चिवुकोर्ध्वदेशे वासो हिज्ञेयोऽखिलराशिकानाम्।। दाहिने गाल पर कन्था, वायें गाल पर सीन, ठोडी के ऊपरले भाग में मकर है। यह समस्त राशियों का वास जानना चाहिये७३(देखो चित्र नं०१) वृत्तस्वरूपं खलु बिन्दुमध्यं उच्यादिग्रहों का स्व्ररूपज्ञान मार्तएडचिंह्नं मुनयो वदन्ति। चापानुरूपं विशदस्वरूपं चन्द्रस्य चिह्नं गदितं सुधीभि:७४ मध्य में बिन्दुवाला वृत्ताकार सूर्य का चिह्न है। निर्मल धन्त्राकार चन्द्रमा का चिह्न है।। ७४ ॥ शीर्षत्रिशासं च्तितिजस्य चिह्नं ठस्यानुरूपं कवय: कुवन्ति। धनाङयुक खलु वृत्तमध्यं मस्तद्विश।खंभषितं बुधस्य७५ शीश में तीन शाखाओंवाला ठकार के अनुरूप मङल का चिह्न ह) है। धनाङ्युक्क, बीच में गोल तथा मस्तक में दो शाखाओंवाला चुध का चिह् होता है।। ७५॥ रखाविभिन्नं विशदस्वरूपं युग्माङ्कसाम्यो थ घिपणस्य चिह्नम्। धनाङ्युक्कं यदि नीचदेशे सुबृत्तकायं खलु भार्गवस्य ७६ रेखा से कटा हुआ साफ़ दो अंक के रूपवाला निशान वृहस्पति का चिह्न 1 कहा जाता है। यदि निचले भाग में धनाङयुक्, गोनाकार निशान हो तो उसे शुक्र का चिह्न कहते हैं॥ ७६ ॥ इकारसाम्पं विशदस्वरूपं चिह्नं संतोकं रविजस्य नूनम्। विज्ञाय रूपं निखिलग्रहाणं संस्थापयेदे बदने बुधेशः।७७॥। विशुद्ध ईकार के आकारवाला शनैश्वर का चिद्र ु है। इस भाँति समस्त ग्रहों का रूप हृदगगम कर लेना चाहिये।। ७७॥ ललाट में सूर्यादिवासज्ञान भाले विशाले वमतीह भौमों दक्षाम्चके वै दिनंपो विभाति। वामे सुनेत्रे चण्दाधिपेशः श्रोत्रे च दक्षे सुग्रजेवन्द्र: ७८।। १ मयोक्कमिति वा पाठः २ दक्षिगानंत्रे ३ सूर्यः ४ चन्द्रः ५ वृद्दस्पतिः॥ भथमखएड विशाल भाल में महल, दाहिने लोचन में सूर्य, वायें नेत्र में चन्द्रमा और दाहिने कान में बृहस्पति रहते हैं।। ७८॥ वामे च कर्ऐे रविजं वदन्ति नासास्थितंवै कथयन्ति काव्यम्। चन्द्रात्मजं वेदविदो मुखाबजे वासो हिज्ञेयोऽखिल खेचराणाम्।। बायें कान में शनैश्चर, नाक में शुक्र और मुख़कमल में बुध हैं। इस भाँति समस्त ग्रहों का वास जानना चाहिये। ७६ ॥ (देखो चित्र नं०२) भालस्थरेखाज्ञान भाले विशाले खलु सप्त सन्ति रेखा विशुद्धा मुनिभि:प्रदिष्टाः। तासां स्वरूपं हृदये निधाय बरूयात्फलादेशमिहैव धीमान्८०॥ विशाल भाल में मुनियों ने सात रेखायें कही हैं। उनके स्वरूप का भली भाँति अध्ययन कर फलादेश कहना चाहिये॥ ८० ॥ # केशस्य निम्ने रविजस्य रेखा ज्ेया ततो वै धिषणस्य धेया। तन्नीचभागे खलु भौमकस्य तन्निम्नतोथो दिवसाधिपस्य ८१॥ बालों के निचले भाग में शनैश्वर की रेखा जानना चाहिये। उसके बाद बृहस्पति की रेखा, उसके नीचे मङल की और फिर सूर्य का रेखा जानना चाहिये।। =१ ॥। ततो ह्यघःस्थां किल भार्गवीयां तन्नीचदेशे विवदेद् बुधस्य। तन्निम्नदेशे क्षणदाधिपस्य रेखां वदेयुःखलु पिडतेन्द्रा: ८२।। सूर्य की रेखा के नीचे शुक्र की रेखा, उसके अधःस्थल में बुध की रेख़ा और उसके नीचे चन्द्रमा की रेखा है ॥। ८२ ॥ (देखो चित्र नं० ३) सूच्मे विचारे दिनपस्य रेखां दक्ते च नेत्रे शशिनश्च वामे। भ्रूमध्यदेशे खलु भार्गवस्य ब्रूयात्सुधीरो विधुजस्य वक्रे ।=३। सूक्षम विचार करने पर दाहिने नेत्र के ऊपरी भाग में सूर्य की रेखा, वायें नेत्र के ऊर्ध्वस्थल में चन्द्रपा की रेखा, भौंहों के बीच के भाग में शुक्र की रेखा और वदन में या नासिका के अग्रभाग में बुध की रेखा कहना चाहिये ॥। =३ ।। (देखो चित्र नं० ४ )
- देखिये शरीर में कैसे गूढ़ रहस्य द्वारा ज्योतिप का समावेश है।-सं० सामुद्रकशाख यस्यास्ति भाले धिषणस्य रेखा संभुग्नमध्या विशदा विभाति। ज्ञानीधनी स्यान्मनुजस्तदानींसदृत्तशाली सरलस्वभावः=४।। जिसके भाल में वृहस्पति की रेखा बीच में टेढ़ी तथा स्पष्ट हो वह ज्ञानी, धनी, महायशस्वी तथा सीधे स्व्रमाववाला होता है।।४।। (देखो चित्र नं० ५) वृत्तेन युक्का सुरराजमन्त्रिरेखा विशुद्धा कुटिला विभाति। वित्तस्य नाशं लभते मनुष्यो भ्रान्तो भवातो भयतामुपैतिद५॥ बृहस्पति की रेखा वृत्ताकार निशानयुक्त, टेही तथा साफ़ हो तो वह भ्रान्तचित्त तथा सांसारिक दुःखों से पीड़ित ययुक्क होता है॥। ८५ ॥ (देखो चित्र नं० ६) मन्दस्य रेखा कुटिला विभाति भौमस्य रेखा धनुपाकृतिश्चेत्। दुष्टामवस्थामवलम्व्य जन्तुर्जायाविहीनो जडतामुपैति॥=६॥ शनैश्चर की रेखा ठेदी हो और मङल की रेखा धन्वाकार हो तो वह बुरी दशा का अवलम्बन करता, जायारहित तथा मूर्ख होता है॥। ८६ ॥ (देखो चित्र नं० ७) भाले विशाले सरला हितिस्रो रेखा विशुद्धा नितरां विभान्ति। सौभाग्यशाली सरलस्वभावो नीतौ रतः स्यात्सकलप्रियश्च।। प्रवञ्चानाशून्यवपुर्विलासी प्रशंसनीयो महतामुपासी। सतां चरित्रेण युतो मनस्वी सुती सुविद्यः सुखतामुपैति द८॥ जिसके भाल में लम्बी तीन रेखायें चमकदार हों तो वह सीधे स्वभाववाला, सबका प्यारा, नीति में परायण, और सौभाग्यशाली होता है। साथ ही प्रतारण रहित, विलासी, प्रशंसनीय, महात्माओं का उपासक, सच्चरित्र, मनमौजी, पुत्रवान्, विद्यावान् और सुखसमूह पाता है॥।८७ ।८८॥।(देखो चित्र नं०८) मध्ये विभिन्ना यदि मन्दरेखा स्वल्पस्वरूपा सूरपूजितस्य। भिन्ना यदानीमवनीसुतस्य सूर्याब्जयोश्चेत्खलु स्वल्परूपा दह
- यह हमारा भी अनुभव है।-संपादक सोडयं नरः स्याद् बहुकार्यकारी संमानितो मानसशक्किधारी। सौभाग्य हीनो हि यदा कदापि चिन्तान्वितो वै चपलस्वभावः।। यदि शनैश्चर की रेखा बीच में छ्विननभिन्न हो। बृहस्पति की रेखा छोटी सी हो। मङल की रेखा भिन्न हो। सूर्य तथा चन्द्रमा की रेखा छोटी २ हों तो वह बहुत से कार्यों का करनेवाला, सम्माननीय, मानसगुखशाली, जवकब सौमाग्पइीन, चपलस्वभाववाला और चिन्तायुक रहता है।।८६।ह०।। (देखो चित्र नं० ६) मन्दाररेखा सरलस्वरूपा तन्मध्यगा चेत्कुटिला गुरोश्च। सौभाग्यशाली मनुजस्तदानीं मानी महौजा धनतामुपैति ६१ यदि शनैश्चर व मङ्ल की रेखा सीधी हों और उन दोनों के बीच में गई हुई बृहस्पति की रेखा टेढी हो तो वह सौमाग्यशाली, मानी, महावली और धनसमूह को पाता है ॥ ६? ॥ (देखो चित्र नं० १०) सौरी सुरेखा विशदा विभाति सर्पानुरूपा सुरवन्दितस्य। सोयं नरः स्याद्यवसायशाली वित्ताभिलाषी जनवञ्चकश्च।। यदि शनैश्चर की रेखा साफ़ सीधी हो और वृहस्पति की रेखा सर्पाकार हो तो वह रोजगारी, धनाभिलापी तथा जनवञ्चक होता है॥ ६२॥ (देखो चित्र नं० ११) भान्तीह भाले मनुजस्य यस्य छिन्ना विभिन्ना बहुशो हि रेखाः। पीडाकराघातमुपैति देहे दौर्भाग्यशाली दयिताविहीनः ६३॥ जिसके भाल में बहुत सी रेखायें छ्िन्नभिन्न हों वह दौर्भाग्यशाली, नारी- विहीन होता तथा देह में कष्टकार क आघात पाता है ३।। (देखो चित्र नं० १२) नीचोर्ध्वभिन्ना वृजिना हि सौरी द्विच्छिन्नकरठा िषण- धिपा स्यात्। कौजी कुरेग्वा यदि भाति भाले प्राप्त्वा त्वनिष्ट धननाशमेति॥ ६४ ॥ यदि शनैश्चर की रेखा निचले तथा ऊपरी भाग में भग्न हो। बृहस्पति की रेखा टेही तथा तीन खएडवाली हो, और मङल की रेखा छोटी हो तो उसका अनिष्ट तथा धनक्षय होता है॥ ६४ ॥ (देखो चित्र नं० १३) द्विच्छिन्नमध्या सरलार्कसूनोर्मध्ये विभिन्ना गुरुमौमयोश्च। सम्पत्तिनाशं लभते मनुष्यस्तथाधिकारीकृतवस्तुहानिय ६५॥ यदि शनैश्चर की रेखा सीधी हो और बीच में छोटी छोटी दो रेखाओं से कटी हो। साथ ही बृहस्पति और महल की रेखाएँ मध्यभाग में भग्न हों तो उस पुरुप की सम्पत्ति नाश होती तथा अधिकृत वस्तु की हानि होती है।। ६५ । (देखो चित्र नं० १४) मन्दस्य रेखा धनुषाकृतिश्चेद्गीर्वाणवन्दस्य तथा विभाति। भौमी गभीरा विनता यदानीं दौर्जन्ययुक्ो मनुजोऽघमःस्यात्॥ यदि शनैश्चर व बृहस्पति की रेखाएँ धन्याकार हों और मझल की रेखा गहरी तथा लचीसी हो तो वह अधम और दुर्जनतायुक होता है॥ ६६॥ (देखो चित्र नं० १५) रखा गभीरा विशदा हि सौरी विभाति वक्रा बृहतां पतेश्च। दुष्टामवस्थामवलम्ब्य जन्तुर्जायाभिभूतो भयतामुपेति॥६७।। यदि शनैश्चर की रेखा लम्बी-गहरी हो और बृहस्पति की रेखा वक्रा- कार हो तो वह दुष्ट अवस्था का अवलम्बन कर निज नारी से अनादृत हो भय पाता है। ६७ ॥ (देखो चित्र नं० १६) भाले विशाले मनुजस्य यस्य मध्ये विभग्ना यदि भातिमान्दी। नी चोर्ध्वभग्ना वृजिना गुरोश्च सार्प्यासुभग्नाकुटिला हिकौजी सोयं मनुष्यो नरघातकारी वेश्याविहारी वनितापहारी। दुरोदराक्रान्तमना मनस्वी प्रामोति मृत्युं स्व्रयमेव भीत्या ६६॥ जिसके भाल में शनैश्चर की रेखा बीच में कटी हो; निचले तथा ऊपरी भाग में बृहस्पति की रेखा भग्न औरर टेही हो और मङल की रेखा सर्प आकार भग्न हो तो वह नरहत्याकारी, वेश्याविहारी, वनितापहारी, जुआड़ी, मन- मौजी होता और डर से आप ही माँत पाता है ६८।६६॥ (देखो चित्र नं०१७) यस्यास्ति भाले विशदा गभीरा रेखा यदैका धनुषाकृतिश्चेत्। सोयं जघन्यो मनुजो जनानां नीचस्वभावो भ्रमतेऽप्यजस्म॥ पथमखएड जिसके माल में उज्जवल, गहरी एक ही रेखा धन्वाकार हो तो वह सनुष्यों में अधम तथा नीच स्वभाववाला होता तथा हमेशा ही घूमता फिरता है। १०० ॥ (देखो चित्र नं० १८) संमध्यभग्ना रविजस्य रेखा वामात्रिशाखा धिषणस्य भाति। शनैश्चर की रेखा चीच में भग्न हो, और वृहस्पति की रेखा वामभाग में तीन शाखाओंवाली हो तो वह चपल स्वमात्रवाला, प्रदीप्त प्रभाववाला, तथा कूठा होता है ॥ १ ॥ (देखो चित्र नं० १६) रखाश्चतस्त्रो यदि भान्ति भाले संमध्यभग्ना प्रथमा चतुर्थी। सोडयं नरः स्यात्सरलस्वभावः सतां चरित्रेण युतो मनीषी॥२॥ यदि भाल में चार रेखाएँ हों और उनमें से पहली व चौथी बीच में कटी हो तो वह सीधे स्वभाववाला, बुद्धिमान्, तथा सज्जनों के चरित्र युक्ध रहता है।। २ ॥ ( देखो चित्र नं० २०) सर्पाननाभा यदि भाति मान्दी कुजेज्ययोश्रेत्कुटिला विभाति। उच्चस्थलाद्धै पतितो मनुष्यो देहाभिघातं लभते नितान्तम्। ३॥ यदि शनैश्चर की रेखा सर्पफगाकार हो और मझल व बृहस्पति की रेखा टेबी-सी हो तो वह ऊँचे स्थान से गिर देह में चोट खाता है ॥ ३ ॥ (देखो चित्र नं० २१ ) मान्दी विभुग्नायदि मध्यभग्ना नीचे विभग्नाधिषणस्यचाल्पा भिन्ना यदोर्ध्वे सरला हि भौमी संमध्यभग्ना कुटिला रवेश्च॥४।। दैत्यांर्चिताल्पा क्षणदांधिपस्य द्ाभ्यांविभिन्ना यदिभाति भाले सौभाग्यहीनो हि यदा कदापि पुनर्दरिद्री पुनरेव भोगी॥ ५॥ शनैश्चर की रेखा टेदी तथा बीच में भग्न हो, वृहस्पति की रेखा निचले भाग में भग्न और छोटी-सी हो, मङल की रेखा ऊपरी भाग में भिन्न और सीधी हो ; सूर्य की रेखा बीच में कटी, टेही हो; शुक्र की रेखा छोटी १ शुकस्य २ चन्द्रस्य ।। सामुद्रकशास्त्न और चन्द्र की रेखा दो रेखाओं से कटी हुई हो तो वह कमी सौभाग्यहीन कभी दरिद्री और कभी भोगी होता है॥ ४।५ ॥ (देखो चित्र नं० २२) अर्धेन्दुंसाम्याः खलु केशनिम्ने चुद्रस्वरूपा यदि सप्त सन्ति। भाले विशाले गुरुभौमयोश्च साप्ये द्विरेखे विशदे विभातः॥६॥ भाल में बालों के नीचे अर्धचन्द्राकार छोटी-छोटी-सी सात रेखायें हों और बृहस्पति तथा मङ्गल की रेखायें विशद एवं सर्पाकार हों ॥ ६ ॥ सोडयं नरो मजति वारिवाहे कीलालगरते पतितोऽथवास्यात्। भ्रान्तो भयातों भयतासमेतश्चिन्तान्वितो वै चपलस्वभावः ७।। तो वह जल में डूबता, अथवा पानी के कुएड में गिरता तथा भ्रान्त, दुःखार्त, भयसमूह एवं चिन्ता और चपलस्वभाववाला होता है॥। ७॥ (देखो चित्र नं० २३) मन्दाररेखा यदि मध्यभग्ना तदन्तरे चेद्विनतागुरोश्च। सौभाग्यशाली मनुजस्तदानीं व्युत्पन्नबुद्धिर्धनतामुपैति॥=। शनैश्चर एवं मङ्ल की रेखायें बीच में भग्न हों और दोनों के बीच में बृहस्पति की रेखा लची हुई हो तो वह सौभाग्यशाली, व्युत्पन्नबुद्धि तथा धनशाली होता है ॥ ८ ॥ (देखो चित्र नं० २४) लग्ने मिथश्चेद्यदि मध्यभग्ने मन्देज्यरेखे कुटिले विभातः । पाशेन मृत्युं लभते मनुष्यो हत्याप्कारडै: सहितो नराणाम्ध।। शनैश्चर एवं बृहस्पति की रेखायें परस्पर सटी हुई, बीच में भग्न एवं टेढ़ी हों तो वह हत्यारा फाँसी की सज़ा द्वारा माँत पाता है॥ है।। (देखो चित्र नं० २५) मान्दी गभीरा विनता विभाति स्वल्पस्वरूपा सुरपूजितस्य। भौमी विभुग्नाजटुलेन युक्का हत्याकरो वै पुरुषः कठोरः॥१०।। शनैश्चर की रेखा गहरी और भुकी-सी हो, बृहस्पति की रेखा छोटी- सी हो और मङ़ल की रेखा टेढी हो तथा उस पर मसा हो तो वह वज्र हृदय एवं हत्यारा होता है ॥। १० ॥ ( देखो चित्र नं० २६) १ अर्धचन्द्रसमानाकारा: २ सर्पाकारे॥ सौरी सुरेखा सरला विभाति सुरेन्द्रवन्द्यस्य च नीचभुग्ना। स्वल्पस्वरूपा धरणीसुतस्य सौभाग्यशाली धनतासमेतः॥११॥ शनैश्चर की रेखा सीधी-सी हो, वृह्स्पति की रेखा निचले भाग में टेढी हो, और मझल की रेखा छोटी-सी हो तो वह धनवान् और भाग्य- शाली होता है ॥ ११ ॥ (देखो चित्र नं० २७) सर्पाननाभा याद भाति भाले भ्रूमध्यदेशे सरला विभान्ति। सोऽयं मनुष्यो बहुभाषणाढ्यो वामा प्रसक्ो बलतासमेतः॥१२॥ यदि भाल में सर्पाकार एकही रेखा हो और भौंहों के वाच में बहुतसी सीधी रेखायें हों तो वह बड़ा बक़ा, रमणियों में रत तथा बलशाली होता है॥ १२ ॥ ( देखो चित्र नं० २८) भाले विशाले मनुजस्य रेखाश्छित्ना विभिन्ना बहुशो विभान्ति। सोडयं महेच्छो बहुकार्यकारी सामान्यमात्रोऽखिलमानवानाम् जिसके माल में बहुत-सी रेखायें छिन्न भिन्न सी हो वह महत्वाकांकी एवं अ्नेक प्रकार के कार्य करनेवाला होता है और सभी मनुष्यों में सामान्यमात्र होता है ॥ १३ ॥ (देखो चित्र नं० २६) नीचोर्ध्वभग्ने कुजमन्दरेखे दक्षे च वामे भुजगानने स्तः। तदन्तरं चेत्पविलाञ्छनाढ्यं पाशेन मत्योंमृतिमेति नूनम् १४॥ मङ्गल और शनैश्चर की रखाएँ निचले तथा ऊपरी भाग में सर्वानन की नाई हों और उन दोनों के मध्य में वज्राकार निशान हो तो निश्चयकर फाँसी से मृत्यु पाता है।। १४ ॥ ( देखो चित्र नं० ३०) सौरी सुरेखा बिनता यदानी भुग्नस्व्रूपा धिपणस्य भाति। संमध्यभग्ना धरणीसुतस्य दीर्घा गभीर कुटिला रवेश्च॥१५।। महाधनाढ्योमनुजो मनीषी सौभाग्यशाली सुखदो जनानाम्। दाता दयालदयितानुरक़ो धन्यो धरायां धरया समेतः॥१६॥ यदि शनैश्चर की रेखा लम्बी तथा लचीसी हो, वृहस्पति की टेवी हो, मङल की बीच में भग्न हो और सूर्य की दीर्घाकार व गहरी तथा टेवी सी हो तो बढ महाधनी, बुद्धिमान्, सौभाग्यशाली, जनसुखदायक, दाता, दयालु, दयिता में अनुरक् तथा धरासमेत धरामएडल में मशंसनीय होता है। १५ । १६ ॥ ( देखो चित्र नं० ३१) मन्देज्यरेखे यदि मध्यभग्ने कौजी सुरेखा सरला विभाति। स्वल्पस्वरूपा दिनपस्य भाति वामे विभुग्ना किल भार्गवीया॥ व्युत्पन्नबुद्धिर्मनुजो हि शास्त्री सौभाग्ययुक्को धनतासमेतः । प्रवञ्चनाशून्यवपुर्विलासी सदृत्तशाली चतुरोतिकोपी ॥१८। यदि शनैश्वर व बृहस्पनि की रेखाएँ बीच में भग्न हों, मङल की दीर्घा- कार सीधी हो, सूर्य की छोटीसी, शुक्र की बायें तरफ़ टेढीसी हो तो वह माखी शास्त्री, व्युत्पन्रयुद्धि, सौभाग्यवान्, धनी, छलरह्वित, अच्छे चरित्रों- वाला, चतुर तथा महाक्रोधी होता है ॥१७।१= ॥ (देखो चित्र नं० ३२) स्वल्पा विभुग्ना रविजस्य रेखा सर्पाननाव्या घिषणस्य भग्ना। शाखासमेता विनता हि भौमी मूढो मनुष्यो नरघातकारी १६॥ यदि शनैश्चर की रेखा छोटी, टेदी, वृहस्पति की बीच में भग्न तथा सर्पानन युक्त, और मङ्ल की शाखायुक्क लचीसी हो तो वह महामूर्ख, नरहत्यारा होता है।। १६ ॥ (देखो चित्र नं० ३३) मान्दी गभीरा विनता विभाति स्वत्पस्वरूपा सुरपूजितस्य। पृथ्वीतनूजस्य तनुस्वरूपा दीर्घाद्विभिन्नाघयुमणेर्नता चेत् २०।। सोडयं जनः स्यात्कलहानुरक्ो महाप्रकोपी मदनातुरात्मा। खङ्गप्रहारेण हतस्समीके शस्प्रहारैरुत खसिडतश्च ॥ २१॥ यदि शनैश्चर की रेखा गहरी, लवीसी हो, बृहस्पति की छोटीसी, मङ्गल की गहरी, पतली हो; सूर्य की झुकी, गहरी, दो रेखाओं से कटी हो तो वह कलहप्रिय, क्रोधी, कामी, तथा समर में तलवार अथवा शस्त्रों के प्रहारों से मृत्यु पाता है। २०।२१ । (देखो चित्र नं० ३४) मान्दी विभुग्ना यदिनीचभग्ना बृहस्पतेश्चेद्विनता विभाति। भौमी सुदीर्घा वृजिना यदानीं संमध्यभग्ना कुटिला रवेश्च २२।। पथमखएड सोडयं नरः स्यात्कलहानुरको रूक्षस्वभावः शठतासमेतः। उपद्रवाकान्तमना मनस्वी मन्दो मलाढ्यो जनवञ्चकश्च २३॥ रनैश्चर की रेखा टेढ़ी, निचले भाग में भग्न हो, वृहस्पति की लची-सी हो, मझल की दीर्घाकार टेढी हो, सूर्य की बीच में भिन्न वक्राकार होतो वह कलडी, कठोर स्वमाषचाला, शठ, उपद्रबी, मनमौजा, मूर्ख, मैला एवं छलने- वाला होता है।। २२ । २३ ।। (देखो चित्र नं० ३५) मान्दी विभुग्ना परितो विभग्ना दीर्घा विभिन्ना सरला गुरोश्च। मध्ये च भग्ना कुटिला कुजस्य चापानुरूपादयुम पोर्यदानीम् २४। संमध्यभग्ना किल भार्गवीया रामारतो वै रसिको मनुष्यः । सत्यपवक्का सरलस्वभावो नय्रो हिवेत्ता विनयी जयी च॥२५॥ शनैश्चर की रेखा चारों तरफ़ भग्न, टेढीसी हो; बृह्स्पति की दीर्घा- कार सीधी हो; मङल की बीच में कटी फटी टेनीसी हो और सूर्य की धन्वाकार हो और यदि शुक्र की रेखा बीच में कटी हो तो वह रमणीरत, रसज्ञाता, सत्यवक्का, सीधे स्वभाववाला, नम्र, वेत्ता, विनयी और विजयी होता है॥ २४। २५ ॥ ( देखो चित्र नं० ३६) दक्षे विभग्ना वृजिना हिमान्दी दीर्घा गभीर विनता गुरोश्च। स्वल्पा विभुग्ना धरणीसुतस्य व्याजेन व्याप्तः सरलस्वभावः२६ शनैश्चर की रेखा दाहिने भाग में भग्न, एवं टेदी हो, बृहस्पति की गहरी, लचीसी हो और महल की छोटी टेढी देख पड़े तो वह पुरुप कपटी तथा सीधे स्व्रभाववाला दिखता है॥ २६ ॥ (देखो चित्र नं०३७) मध्ये विभिन्ना कुटिला हि मान्दी दक्षे च भग्ना वृहतां पतेश्च। वक्रार्कयोश्चेत्खलु दक्षसार्प्या व्युत्पन्नबुद्धिर्धननाशमेति २७।। जिसकी शनैश्चर की रेखा बीच में भिन्न, टेढ़ी हो, बृहस्पति की बीच में कटी व टेदी तथा दाहिने भाग में भग्न हो; मङल व सूर्य की दाहिनी तरफ़ सर्पाकार हो तो वह व्युत्पन्न बुद्धिवाला एवं धनहीन होता है॥२७॥ (देखो चित्र नं० ३८) सौरी सुदीर्घा विनता गभीरा दक्ते च भागे जटुलेन युक्का। ऊर्ध्वें विभिन्ना कुटिला गुरोश्च सर्पानुरूपा यदि भाति भौमी २८ संभ्रान्तचित्तो मनुजोऽतिखिन्नो वेत्ता विशुद्धो विगताभिमानः। उच्चस्थलाद्वैपतितो भयार्तःसांघातिकार्ति लभते नितान्तम् २६ जिसकी शनैश्वर की रेखा दीर्घाकार, लची, गहरी दाहिने भाग में मसा युक्क हो, बृहस्पति की रेखा ऊपरीभाग में भिन्न, एवं टेढी हो और मङल की सर्पाकार हो तो वह पुरुप संभ्रान्त मनवाला, महाखिन्न, ज्ञाता, पचित्रात्मा, अभिमान रहित होता है तथा ऊँचे स्थल से गिरता तथा भय से घरा- कर साघातिक पीड़ा पाता है।। २८।२६ ॥ (देखो चित्र नं० ३६) अर्धेन्दुयुके खलु चोर्ध्वभागे मन्देज्यरेखे सरले विभातः। सूर्येन्दुयोगो यदि भाति भाले सौभाग्यशाली पुरुषो नितान्तम्।। जिसकी शनैश्चर व बृहस्पति की रेखाएँ ऊपरी भाग में अर्धचन्द्राकार निशान युक्क हों और यदि भाल में सूर्य व चन्द्रमा की रेखा का योग दिखे तो वह बड़ा सौभाग्यशाली होता है ॥ ३० ॥ (देखो चित्र नं० ४०) ऊर्ध्वे विभिन्ना विनता हि मान्दी दीर्घा विनम्रा धिपणस्य रेखा। संमध्यभिन्ना कुटिला हि कौजी भूमध्यदेशे लसितं त्रिशूलम् ३१ देहाभिघातं लभते मनुष्यः पातस्य हेतोरतिहानिमेति। प्रेमास्पदो वै वनिताविलासी प्रसन्नमूर्निर्जनरञ्जकश्च ॥३२। जिसकी शनैश्चर की रेखा ऊपरी भाग में कटी, तथा लचीसी हो, बृहस्पति की दीर्घाकार, लचीसी दिम्वे, मङल की बीच में कटी, टेीसी हो और यदि भौंहों के बीच में त्रिशलाकार निशान हो तो वह देह में चोट. पाता, तथा गिरने के कारण बड़ी हानि पाता है और प्रेम का घर होकर वनिताओं में विलास करता, प्रसन्नमूर्तति, और सचका मनोरञ्जक होता है॥ ३१ । ३२ ॥। ( देखो चित्र नं० ४१) सर्पायमाना यदि भाति सौरी स्वल्पस्वरूपा सुरपूजितस्य। दक्षत्रिशाखा धरणीसुतस्य वामैकशाखा विशदायदानीम३३ ऐश्वर्यहीनो मनुजोऽतिलोलो विश्वासघाती वलदर्ितश्च। प्रवञ्चकोऽयं जगतो जनानां घूर्तस्वभावोह्यतिगौरवाढ्यः ३४।। जिसकी शनैश्चर की रेखा सर्पाकार हो, बृह्स्पति की छोटी और मङल की दाहिनी तरफ़ तीन शाखावाली, बायें भाग में एक शाखावाली हो तो वह ऐश्वर्यहीन, अतिचश्चल, विश्वासघाती, बलगर्वित, छलिया, धूर्तस्वभाव- वाला और गौरवान्वित होता है । ३३। ३४ ॥ (देखो चित्र नं० ४२) धन्वाकृतिश्चेद्रविनन्दनस्य सर्पानुरूपा सुरवन्दितस्य। वामे विभग्ना महिजस्य भुग्ना स्यान्मानवोवै नरघातकारी ३५ यदि शनैश्चर की रेखा धन्वाकार हो, बृहस्पति की सर्पाकार हो और मङगल की टेढी, तथा वामभाग में कटी फटीसी हो तो वह नरघातक होता है॥ ३५ ॥ ( देखो चित्र नं० ४३) सर्पाननाभां विशदस्वरूपां गुरोश्च स्वल्पा समुपैति सौरीम। वक्रा यदानीं शशिजस्य रेखा हिंस्ो विवादी कलही नरः स्यात् जिसकी छोटीसी बृहस्पति की रेखा सर्पाकार मुखवाली; विशदरूप शनैश्चर की रेखा के पास पहुँची हो और यदि बुध की रेखा वक्राकार हो तो वह हिंसाशाली, विवादी, तथा लड़ाका होता है।।३६।।(देखो चित्र नं० ४४) मन्दस्वरूपा यदि भाति मान्दी दक्षेविभिन्ना धिषणस्यदीर्घा। करठे विभग्ना कुटिला हि कौजी नीचे गभीरा श्रुंतिमेति वामाम् शनैश्चर की रेखा पतली, वृहस्पति की दाहिने भाग में विभिन्न दीर्घा- कार हो और यदि मझल की कएठभाग में विभिन्न, नथा टेढ़ी व निचले भाग में गहरी बायें कान तक हो। ३७।। सोडयं मनुष्यो नरघातकारी ह्यनिष्टकारी प्रमेदाविहारी। द्यूताभिलाषी भ्रमते नितान्तं क्रोधाभिभूतो मदनाकुलश्च ३=॥ तो वह नरघातकी, अनिष्टकारक, प्रमदाविहारी, जुआड़ी, क्रोध से भुझलाता, काम से घबड़ाता तथा हमेशा घूमा करता है ॥ ३८ ॥ (देखो चित्र नं० ४५ ) १ स्वल्पस्वरूपा २ वृहस्पतेः ३ मङ्गलस्येयम् ४ कर्शाम् ५ रमगीरतः। स्वल्पस्वरूपा यदि भाति सौरी संमध्यभिन्ना विशदा गुरोश्च। दीर्घा विनम्रा कुटिला हि कोजी चिन्रा विभिन्ना किल भोर्गवीया शनैश्चर की रेखा छोटीसी हो, बृहस्पति की चीच में कटी और साफ़ हो और मङल की लंबी, लची, टेड़ी हो तथा शुक्र की रेखा दाहिने भाग में कटी व वीच में भग्न हो॥ ३६॥ सोऽयं नरः स्यात्सरलस्वभावो दानी चमानी च महाभिमानी। क्रोधी परसत्रीं भजतेऽप्यजसरं मित्राभिभूतो मदनातुरश्च।।४०।। तो वह साधे स्व्रभाववाला, दाता, मानी व महाभिमानी तथा क्रोधी, मित्रों से तिरस्कृत, कामातुर और परस्त्रीसेवी होता है ॥४०॥ (देखो चित्र नं० ४६ ) मान्दी गभीरा यदि भाति स्वल्पा वेत्रस्वरूपा बृहतांपतेश्च। भ्रूमध्यदेशो बहुकेशयुक: संपत्तिशाली धनिक: सुभार्यः॥४१॥ यदि शनैश्चर की रेखा गहरी व छोटी हो, व बृहस्पति की रेखा वेत्र- रूपा हो और यदि भौंडों का मन्यदेश बहुत वाल युक्र हो तो वह संपत्ति- शाली, धनी एवं अ्नेक भार्याओंवाला होता है ॥४१॥ (देखो चित्र नं० ४७) सौरस्य रेखा यदि भाति चाल्पा भुग्ना गुरोवे निकटार्धवृत्ता। दक्षभ्रकुट्यां लपितैकरेखा भ्रूमध्यदेशो बहुकेशयुक्कः॥४२॥ मस्ताभिघातं लभते मनुष्यो विदंशितः स्यात्खलु कुक्कुरादैः। विषप्रयोगैरतिशङ्कितश्च क्रोधाभिभूतो भयतामुपैति॥४३॥ निसकी शनैश्चर की रेखा छरोटीसी हो, ब्रुरसति की टेही हो, निकट- बर्तीं अरधवृत्त से युक्त हो, दाहिनी भृकुटी पर छोटीसी एक रेखा शुङ्गाकार हो और यदि भौहों के बीच का भाग घने बालयुक हो तो वह मस्तक में चोट खाता है, कूकुर आदि दुष्टजीनों से डसा जाता, विपपरयोगों से भीत, क्रोध से घबराता और भय पाता है॥ ४२४३ ॥ (देखो चित्र नं० ४८) भुग्ना गभीरा यदि भाति मान्दी दीर्घा विनम्रा विशदा गुरोश्च। १ शनैश्चरस्य २ बृहस्पतेः ३ मङ्गलस्य ४ शुकस्य रखेति यावत्॥ प्रथमखगड सर्पाननाभा विनता हिकोजी संमध्यभिन्ना दयुमणोर्यदानीम् ४४ जिसकी शनैश्चर की रेखा टेढी, गहरी हो, बृहस्पति की लंबी, लची हा, तथा मङगल की सर्पानन के समान, लचीसी हो; और यदि सूर्य की बीच में भग्न हुई हो ॥। ४४ ॥ सौभाग्यशाली सुपमासमेतः सौन्दर्ययुक्को नितरामुदारः। सुखी सुविद्यो महतामुपासी मान्यो जनानां सुखदोऽनुजानाम् तो वह सौभाग्यशाली, सुन्दरता युक्, उदार, सुखी, अच्छी विद्यावाला, महात्माश्रों का उपासी, आदरीय एवं भाइयों को सुखदायक होता है।४५॥ (देखो चित्र नं० ४६) स्वल्पा गभीरा विनता हि सौरी संमध्यभिन्ना वृजिना गुरोश्च। दीर्घा विशुद्धा विनताहि कौजी त्यागी धनी साहसिको नरःस्यात् जिसका शनैश्चर की रेखा छोटी, गहरी, लची हुई हो ; वृहस्पति की बीच में भग्न तथा टेदी हो और मझल की लंत्ी एवं लचीसी हो तो वह त्यागी, धनवान, एवं साइसी होता है।। ४६ ॥ (देखो चित्र नं० ५८) नीचोर्ध्वभिन्ना यदि भाति मान्दी संकर्तिताल्पा सुरपूजितस्य। च्िन्ना विभिन्ना वृजिना बुधस्य भूमध्यदेशो विशदो द्विशूलः।। यदि शनैश्चर की रेखा निचले तथा ऊपरी भाग में भिन्न हो, बृहस्पति की कटी हुई छोटीसी हो, और यदि बुध की द्न्न-भिन्न, टेही हो; तथा भौहों के बीच का विशुद्ध भाग दो रेखाओंवाला हो तो॥ ४७॥ सोऽयं मनुष्यश्चतुरोऽतिविज्ञो मिष्टप्रभाषी परिणामदर्शी। क्ान्त्याविहीनोऽखिल कार्यदत्तो व्युत्पन्नबुद्धि:खलुसाहसी स्यात् वह चतुर, विज्ञ, मधुरभापी, परिखामदर्शी, ग्लानिदीन, समस्त कार्यों में प्रवीख; व्युत्पन्नयुद्धि तथा साहसी होता है॥४=॥(देखो चित्र नं० ५१) चापानुरूपा रविजस्य रेखा सर्पायमाना सुरवन्दितस्य। भौमी सुदीर्घा खलु वामभुग्ना चाएडी सशाखा यदि सव्यभुग्ना जिसकी शनैश्चर की रेखा धन्वाकार हो, बृहस्पति की टेढी-मेदी हो, मङल की लंबी तथा वामभाग में टेढ़ी हो; और यदि सूर्य की रेखा शाखा युक्त बाई तरफ टेढी हो।। ४६॥ संमध्यभिन्ना किल भार्गवीया शान्त्या विहीनो मनुजोतिलुब्धः नामोति सिद्धिं सकले सुकार्ये परिश्रमं वै कुरुते नितान्तम्॥५०॥ और यदि शुक्र की रेखा बीच में कटी हो तो वह शान्तिहीन, अति- लोभी, तथा कार्यों में सिद्धि न पानेवाला, बड़ा परिश्रमी होता है॥५०॥ (देखो चित्र नं० ५२) नीचे विभग्ना सरला हि सौरी वामप्रचापा घिषणस्य भग्ना। कौजी सशाखा यदिनीचभिन्ना सार्प्या विभिन्ना दिनपस्य भाति जिसकी शनैश्चर की रेखा निचले भाग में भग्न हुई, सीधी हो; बृहस्पति की जिसके वामभाग में धन्वाकार चिह्न हो; निचले बिचले तथा ऊपरी
स्त्रीपद्तललक्षण (Part 3)
भाग में भग्न हो; मङ्गल की शाखा युक् निचले भाग में भिन्न हो, और यदि सूर्य की रेखा सर्पाकार हो और ॥ ५१ ॥ ऊर्ध्वे गभीरा यदि मध्यभग्ना काव्यस्य रेखा नितरां विभाति। सोडयं नरःस्यात्सकलप्रधानः सच्छील युक्को गुणभूपितश्र॥५२। यदि शुक्र की रेखा ऊपरी भाग में गहरी, बीच में कटती हुई हो तो वह सबका मुखिया होता एवं भले स्वभाववाला और गुणी होता है।। ५२॥ विद्वान्विदेशी खलु धार्मिकश्च दाता धनी स्यादुपदेशकर्ता। मान्यो वदान्यो ममताविहीनो विध्वस्तवाधोभ्रमतेऽप्यजस्रम्। विद्वान्, विदेशवासी, धार्मिक, दाता, धनवान्, उपदेशक, माननीय, वक्रा, ममता रहित, वाधाविहीन, निरन्तर विचरा करता है॥ ५३ ॥ (देखो चित्र नं० ५३) मालस्थतिलादिलाञ्छनादन्याङ्रेपु तिलादिज्ञानम् नार्या यदा वा पुरुषस्य भाले दक्षेच मध्ये च तथा हि वामे। तिलादिचिह्नं यदि दृश्यते चेदन्यत्र चिह्नं विदुषा विचिन्त्यम् ॥ यदि नारी या नर के भाल में दाहिने, मध्य अथवा वामभाग में तिल १५.१ आदि का चिह्न हो तो विद्वान् को अन्य अङ्गों में भी तिज्ञ आदि का चिद्न विचारना चाहिये॥ v४ ॥ (देखो चित्र नं० ५४) *१दच्े च भागे खलु मन्दनिसे चन्द्राङ्कपाश्वें तिलको विभाति स्पृशेन्न मन्दं यदि दक्षभागे बरूयाडुरस्थं तिलकं तदानीम् ॥।५५I यदि शनैश्चर की रेखा के नीचे, दाहिने भाग में "१" अङ्क के समीप तिल का चिह्न हो और वह यदि शनि रेखा का हूता न हो तो दाहिनी और वत्तस्थल में तिल कहना ॥ ५५ ॥+ २ गुरोश्च नि्ने खलु दक्षभागे युग्माङ्कपाश्वे तिल कादिकं स्यात्। नो स्पृश्यते चेत्तु गुरुर्न भौमो दक्ते च पाश्वें प्रवदेत्तिलाद्यम्५ ६ यदि बृहस्पति की रेखा के नीचे भाग में दाहिनी ओर "२" अङ्क के समीप तिल हों और यदि गुरुरेख़ा व भौमरेखा को न छूते हों तो दाहिने पार्श्व में तिल आदि को कहना॥ ५६ ॥ ३ दच्े च भागे खलु भौम निम्ने वह्नयङ्कपारश्वेयदिभाति चिह्नम्। नो स्पृश्यते वेद्धरणीतनूजो दक्षे च बाही भणितं तिलाद्यम् ५७।। यदि महल रेखा के नीचे दाहिने भाग में "३" अङ्ग के निकट तिल का चिह्न हो और यदि वह भौगरेखा को न छूता हो तो दाहिनी भुजा के ऊपर तिल का चिह्न कहा जाता है॥। ५७ ॥। ४ सूरस्य निम्ने खलु दक्षभागे वेदाङ्कपार्श्वे यदि भाति चिह्रम्। नो स्पृश्यते चेह्दिनपस्य रेखा पृष्ठस्य दज्ते तिलकं वदन्ति ॥५८॥ यदि सर्य की रेखा के नीचे दाहिनी ओर "४" अङ्क के निकट निल का चिह्न हो और यदि वह सूर्यरेखा को स्पर्श न करे तो पीठ के दाहिने भाग में तिल कहते हैं॥ ५८ ॥
- चेहरे के सबसे बड़े चित्र में इन्हीं नंबरों पर देखिये। उसीका वर्णन इन श्लोकों में आगे भी बताया गया है। इस अंक से उचित स्थान चित्र में बताया गया है। -संपादक
- यथार्थ में तिलज्ञान सामुद्रक के अंतर्गत अत्यावश्यक है। इससे मनुष्य के समस्त आचार विचार ज्ञात हो जाते हैं। यह मनन करने योग्य विपय है।-संपादक सामुद्रकशासत्न ५ काव्यस्य निम्ने खलु दक्षभागे वाणाङपाश्वें यदि भाति चिह्नम्। नो स्पृश्यते चेद्रगुजस्य रेखा विद्यात्तिलादयं जठरस्य दक्षे॥५६। यदि शुक्र की रेखा के नीचे के भाग में दाहिनी ओर "५" अङ्ध के पास तिल हो और यदि पूर्वोक़ रेखा को न छूता हो तो पेट की दाहिनी ओर तिल जानना ॥ ५६॥ ६दचे च भागे खलु सौम्यनिश्ने शाख्त्राङ्कपाश्वे यदि भाति चिह्नम्। नो स्पृश्यते चेच्छशिजस्य रेखा वत्सस्य दक्षे प्रवदेत्तिलाद्यम् ६० यदि बुधरेखा के नीचे के भाग में दाहिनी तरफ़ "६" अङ्क के समीप तिल का चिह्न हो और यदि पूर्वोक़ रेखा को न छूए तो वत्तस्थल के दाहिनी ओर तिल कहना ॥ ६० ॥ ७ दक्षे च भागे खलु चन्द्रनि्ने शैलाङ्कपाश्वेतिलको विभाति। नो कर्तिता चेत्किल सोमरेखा तुन्दस्य दक्षे तिलकंभणन्ति ६१ यदि चन्द्ररेखा के नीचे के भाग में दाहिनी ओर "9" अङ्क के समीप तिल का चिह्न हो और यदि उक़रेखा का स्पर्श न करे या कटा हुआ न हो तो पेट के दाहिनी तरफ़ तिल कहते हैं॥ ६?॥ व्वामे च भागे खलु सौरिनिम्ने नागाङपाश्वें यदि भाति चिह्नम्। स्पृशेन्न मन्दंन गुरुंयदानीं पृष्ठस्य वामे तिलकं वदन्ति ॥६२। यदि शनिरेखा के नीचे के भाग में बाई तरफ़ "" अङ्क के समीप तिल का चिह्न हो और यदि शनैश्चर व बृहस्पति रेखा को न स्पर्श करे तो पीठ के बाई ओर तिल कहते हैं ॥ ६२॥ ध्वामे च भागे धिषणस्य निम्ने नन्दाङ्कपाश्वे यदि भाति चिह्रम्। जूयात्सुधीरो जठरस्य वामे तिलादिचिह्नं भणितं सुधीभिः॥६३॥ यदि गुरुरेखा के नीचे वामभाग में "ह" अङ्क के समीप तिल का चिह्न हो तो पेट के बाई ओर तिल का चिह्न कहना ॥ ६३ ॥ १० भालस्य वामे कुजकस्यनिम्ने दिशाङ्कपाश्वेंयदि लाञ्जनं चेत्। वदेत्तदानीं खलु वामबाहौ चिह्नं तिलादं मुनिभि: प्रणीतम् ६४। जिस माणी के विशाल भाल में चाई ओर मौमरेखा के नीचे "१०" श्रद्ध के समीप यदि तिल का चिह्न प्रतीत होता हो तो उसकी बाई भुजा में तिल का चिह्न बताना ॥ ६४ ॥ ११ बध्नस्य वामे यदि नी चमागे रुद्राङ्कपाश्वे तिल कादिकं चेत्। वत्सस्य वामे प्रवदेत्तिलादं वेत्ता विपश्चित्पुरुषस्य नूनम्॥६५॥ यदि सूर्य के वाम भाग में नीचे तरफ़ "११" अङ्क के समीप तिल का चिह्न हो तो उसके वक्षस्थल में बाई ओर तिल का चिह्न कहना चाहिये।६५॥ १२ वामे च भागे भृगुजस्य निम्ने सूराङपाश्वें तिलको विभाति। नो स्पृश्यते चेच्छशिजो न शुक्रो वामांसके वै प्रवदेत्तिलाद्यम्।। यदि शुक्ररेखा के वामभाग में नीचे तरफ़ "१२" अङ्क के समीप तिल का निशान हो और यदि बुधरेखा व शुक्ररेखा को न छूता हो तो बायें स्कन्ध के ऊपर तिल को कहना चाहिये॥ ६६ ॥ १ ३ सौम्यस्य निम्ने खलुवामभागेविश्वाङ्कपाश्वेतिल कादिकं चेत् वदेद्विपश्चिन्मनुजस्य तस्य पार्श्वे च वामे विशदं तिलाद्यम्६७ जिसके भाल में बुधरेखा के नीचे बाई तरफ़ "१३" अङ्क की जगह में यदि तिल का निशान हो तो उसके वामपार्श्व में तिल का चिह्न कहना चाहिये॥ ६७ ॥ १४शक्राङ्कपाश्वें खलु वामभागे चन्द्रस्य निम्ने तिल को यदानीम् स्पृशेन्न भिन्द्ान्न हि चन्द्ररेखां त्रूयात्तिलादं जठरे च नाभ्याम् ६८ जिसके भाल में चन्द्ररेखा के नीचे बाई ओर "१४" अङ्क के समीप तिल का चिह्न हो और यदि पूर्वोक़ रेखा को न छूता हो और न भेदन करे तो उसके पेट और तोंदी में तिल कहना ॥ ६८ ॥ १५ भाले विशाले यदि मध्यदेशे मन्दस्य निम्नेतिलको विभाति। नो स्पृश्यते चेत्खलु मन्दरेखां विद्यात्तिलादं जठरस्य मध्ये ६६॥ यदि माल में शनिरेखा के नाचे मध्यभाग में तिल का चिह्न हो और यदि मन्दरेखा को न छ्ुए तो पेट के बीच में तिल का निशान कहना चाहिये॥६६॥ १६ कपालमध्ये धिषणस्य निम्ने चिह्नं तिलादं खलु दृश्यते चेत। स्पृशेन्न रेखां सुरवन्दितस्य वक्तस्थले वै प्रवदेत्तिलाद्यम्॥७०।। ललाट के मध्यभाग में बृहस्पति की रेखा के नीचे यदि तिल दिखे और यदि पूर्वोक़ रेखा का स्पर्श न करे तो वन्तस्थल में तिल कहना चाहिये॥७०॥ १७ चिह्नं य दानीमललिकस्य मध्ये भौमस्य निम्ने विशदं विभाति। स्पृशेन्न रखां धरणीसुतस्य प्रोच्यात्तिलादयं जठरस्य वामे॥७१॥ यदि लल्षाट के मध्यभाग में भौमरेखा के नीचे तिल हो और यदि मङल की रेखा का स्पर्श न करे तो पेट के वामभाग में तिल कहना चाडिये ।७१।। १८ललाटमध्ये दिनपस्य निम्ने तिलादिचिह्नं यदि दृश्यते चेत। स्पृशेन्न रेखां दिननायकस्य ब्रूयात्तिलादयं जठरस्य मध्ये॥७२॥ यदि कपाल के बीच में सूर्यरेखा के नीचे तिल दिखे और यदि पूर्वोक़ रेखा को न छूए तो उसके पेट के मध्य में तिल कहना॥ ७२॥ १६ मालस्य मध्ये भृगुजस्य निम्नेतिलादि चिह्नं यदि लच््यतेचेत् स्पृशेन्न रेखां खलु भार्गवस्य वत्सस्य मध्ये प्रवदेत्तिलाद्यम् ।।७३ ।। यदि ललाट के मध्य में शुक्र के नीचे तिल हो और यदि पूर्वोक रेखा को न छूता हो तो उसके वक्षस्थल में तिल कहना चाहिये ॥ ७३ ॥ २० सौम्यस्य निम्ने हि कपालमध्ये चिह्नं तिलादयं यदि दृश्यतेचेत् स्पृशेन्न रेखां किल भार्गवीयां वत्सस्य निम्नेतिलकंवदन्ति ७४।। यदि कपाल के मध्य में बुध के नीचे तिल हो और यदि शुक्ररेखा का स्पर्श न करे तो वन्तस्थल के नीचे तिल जानना ॥ ७४॥ २१ चिह्नं यदा चेदलिकान्तराले चन्द्रस्य निस्ने विशदं विभाति। स्पृशेन्न रेखां क्षणदाधिपस्य ब्रूयादपाने तिलकं तदानीम्।७५॥ यदि ललाट के मध्यभाग में चन्द्ररेखा के नीचे चिह्न हो और यदि पूर्वोक़ रेखा का स्पर्श न करे तो उसके गुदादेश में तिल कहना चाहिये।। ७५॥ २२ भाले विशाले खलु दक्षभागे मन्दस्य शेषेयदि भाति चिह्रम्। संस्पृश्यते चेत् खलु सौरिरेखा दक्तोरुसंस्थं प्रवदेत्तिलाद्यय्।।७६।। प्रथमखयड जिसके भाल में दाहिनी तरफ़ शनिरेखा के शेषभाग में तिल हो और यदि सौरिरेखा को भलीभाँति छूता हो तो दाहिनी ऊरु में तिल कहना चाहिये७६ २ ३ भालस्य दक्षे धिपसस्य शेषे चिह्नं तिलाद्यं यदि दृश्यते चेत्। दक्षोरुसन्धौ मनुजस्य तस्य ब्रूयात्सुधीरो विशदंतिलाद्यम् ७७।। ललाट की दाहिनी तरफ़ गुरुरेखा के शेपभाग में यदि तिल दिखे तो उसके दाहिनी ऊरु की सन्धि के ऊपर तिल कहना॥ ७७॥ २४ ललाटदच्ते खलु भौमशेषे तिलादिचिह्नं यदि लच्यते चेत। वदेद्विदीशो मनुजस्य तस्य दक्षेच बाहावमलं तिलाद्यम्।७=॥। यदि कपाल के दादिनी तरफ़ मङलरेखा के शेषभाग में तिल दिखे तो उसकी दाहिनी भुना के ऊपर तिल कहना चाहिये।। ७८ ॥। २५ शूरस्य शेषे यदि भालदच्ते चिह्नं तिलादं विशदं विभाति। कटस्य दक्षे भणितं तिलादं प्राजैः सुधी रैः खलु मानवस्थ॥७६॥ यदि ललाट के दाहिनी तरफ़ सूर्यरेखा के शेषभाग में तिल हो तो उसकी कमर के दाहिनी ओर तिल कहना ॥ ७६ ॥ २६ भालस्य दत्ते भृगुजस्य शेषेचिह्नं तिलादं यदि दीप्यतेचेत्। वत्सस्य मध्ये मनुजस्य तस्य धीरो वदेद्े तिलकादिचिह्वम् ८०॥ यदि भाल के दाहिनी तरफ़ शुक्ररेखा के शेपभाग में तिल हो तो उसके चक्षस्थल के बीच में तिल जानना चाहिये॥ ८० ॥ २७ कपालदचे खलु सौम्यशेषे तिला।दिचिहनं यदि दृश्यते चेत्। वत्सस्य दक्षे पुरुषस्य तस्य ब्रूयात्तिलादं विदुषामधीशः॥।८१।। यदि कपाल के दाहिनी ओर बुधरेखा के शेषभाग में तिल दिखे तो उसके वक्षस्थल की दाहिनी ओर तिल बताना चाडिये ॥ ८१ ॥ २८ दच्े ललाटे खलु चन्द्रशेषे विदृश्यते नेत्तिलकादिचिह्रम्। ब्रूयाद्विदीशो मनुजस्य तस्यदक्षेतिलादं जठरेच नाभ्याम्८२ यदि ललाट की दाहिनी तरफ़ चन्द्ररेखा के शेपभाग में तिल दिखे तो उसके पेट की दाहिनी ओर या तोंदी के समीप तिल कहना चाहिये॥।८२। २६ भालस्य वामे खलु मन्दशेषे चिह्नं तिलादयं यदिलच््यते चेत्। प्रोक्नं कवीन्द्र्मनुजस्य तस्य पृष्ठस्य वामे विशदं तिलाद्यम्॥३। यदि भाल की वाई तरफ़ शनिरेखा के शेपभाग में तिख्व दिखे तो उसकी पीठ के वामभाग में तिल होता है॥। ८३ ॥। ३० भाले विशाले यदि वामभागे देवेज्यशेपे तिलको विभाति। धीरो वदेद्ै पुरुषस्य वामे वत्सस्य निम्ने तिलकं विशालम्॥४॥ भाल में बाई तरफ़ गुरुरेखा के शेपभाग में तिल हो तो उसके वत्तस्थल के नीचे वामभाग में तिल बताना चाहिये॥ ८४ ॥ ३१ वामे कपाले खलु भौमशेषे तिलादिचिह्नं यदि दृश्यते चेत्। ज्रूयात्सुधीरो मनुजस्य तस्य पृष्ठस्य वामे रुचिरंतिलाद्यम्।=५।। यदि कपाल की वाई तरफ़ मौमरेखा के शेपभाग में तिल दिखे तो उसकी पाठ की बाई ओर तिल कहना चाहिये॥। ८५॥ ३२ वामे ललाटे दिनपस्य शेषे चिह्नं तिलादं यदि लच््यते चेत। बूयाड् बुधेन्द्रो मनुजस्य तस्य वामांसनिम्नेललितं तिलाद्यम्८६। यदि भाल के बायें तरफ़ सूर्यरेखा के शेपभाग में तिल हो तो उसके वायें कन्धे के नीचे तिल बताना चाहिये॥ ८६ ॥ ३३ भालस्य वामे भृगुजस्य शेपे संलच्यते चेत्तिल कादिचिह्रम्। प्रोक्कं सुधीभिर्मनुजस्य तस्य तुन्दस्य वामे विशदंतिलाद्यम्=७॥ यदि ललाट के वाम ओर शुक्ररेखा के शेपभाग में तिल हो तो उसके पेट के चायें तरफ़ उज्जवल तिल होगा॥। ८७ ॥ ३४ भाले विशाले यदि वामभागे सौम्यस्य शेपे तिलकादिकं चेत् वत्सस्य वामे खवलु पअ्जरेवा चिहनं तिलादं ध्वनितं कवीन्द्रैः।।८८।। माल में बायें तरफ़ बुधरेखा के शेपभाग में तिल हो तो उसे वन्तस्थल के वामभाग में या पाँनर में निल होगा॥ ८८ ॥ ३५ भालस्य वामे खलु चन्द्रशेपेचिह्नं तिलादं यदि दृश्यते चेत्। प्रोक्कंतिलादं पुरुषस्य तस्य नाभौ च पार्श्वें जठरस्य वामे॥८ह।। यदि ललाट के बायें तरफ़ चन्द्ररेखा के शेपभाग में तिल दिखे तो उसकी तोंदी, पार्श्व और पेट के वामभाग में तिल होता है॥। ८६ ॥। ३६क्े कपालस्य च नेत्रचुल्ल्यां संदृश्यते चेत्तिल को यदानीम्। गीतं तदानीं खलु मानवस्य चिह्नं तिलादं जठरस्य दक्षे॥६।। यदि कपाल के दाहिने तरफ़ नेत्र के ऊपर तिल दिखे तो उसके पेट के दाहिने तरफ़ तिल कहना॥ ६० ॥ ३७पाश्वें च दच्षे पुरुषस्य भाले भ्रुवः समीपे तिलको विभाति। प्रोक्कं तदानीं खलु पयिडतेन्द्रैश्चिह्वं तिलादं कटकोपरिस्थम्६ १॥ जिसके भाल में दाहिने तरफ़ भौंह के निकट तिल हो तो उसकी कमर के ऊपर तिल जानना । ६१ ॥ ३८ भाले विशाले खलु दक्षपाश्वें नेत्रान्तिके चेत्तिल कादिक स्याद्। नितम्बदक्े पुरुषस्य तस्य चिह्नं तदानीं मुनिभिःप्रणीतम ॥६ २ ॥ भाल में दाहिने नेत्र के समीप तिल हो तो उसके चूतड़ों के दाहिनी और तिल कहना ॥ ६२ ॥ ३६्भालस्य निम्ने खलु दक्षपाश्वें चन्तुस्समीपे तिल कालकः स्याद दक्षे च पाश्वें किल पञ्जरस्य प्रोक्कं तिलादं पुरुषस्य धीरैः॥ ३॥ यदि माल के नीचे दाहिने तरफ़ नेत्र के समीप तिल हो तो उसकी पाँजर के दाहिने भाग में तिल कहा है। ६३ ॥ ४०ललाटनिम्ने खलु दक्षपाश्वे नेत्रान्तिके चेत्तिल को विभाति। दक्षोरुनिम्ने लसितं तिलादं प्रोक्नं पुराणः पुरुषस्य तस्य॥६४।। यदि ललाट के नीचे दाहिने तरफ़ नेत्र के समीप तिल हो तो उसकी दाहिनी ऊरु के नीचे तिल कहा है।। ६४ ।। ४ १ वामे कपाले खलु नेत्रकोणे संदृश्यते चेत्तिल को यदानीम्। वामोरुनिम्ने कटिदेशके वा चिह्नं तिलादं कथितं कवीन्दैः॥६५॥ सामुद्रकशास्त् यदि कपाल के वामभाग में नेत्रकोण के ऊपर तिल दिखे तो उसकी बाई ऊरु के नीचे या कमर पर तिल कहा है।। ६५ ॥ ४२ वामे ललाटे खलु नेत्रपाते संलचयते चेततिलको यदानीम। नितम्बवामे मनुजस्य तस्य चिह्नं तिलावं भणितं सुधीभि:६६॥ यदि ललाट के वामभाग में नेत्रपान के समीप तिल हो तो उस भाखी के चूतड़ों के वायें तरफ़ तिल परिडतों ने कहा है।। ६६ ॥ ४ ३भाले विशाले खलु वामनेत्रे विदृश्यते चेततिल को यदानीय्। वामे नितम्बे पुरुषस्य तस्य ज्ञेयं तिलादं कथितं कबीन्द्रेः।।६७।। भाल में बायें नेत्र के ऊपर तिल दिखे तो उसके बायें चवड़ के ऊपर सिल जानना चाडिये।। ६७ ॥। ४४ वामम्वकोणे खलु निम्नभागे कर्णस्य चुल्ल्यां तिल को विभाति पृष्ठे च भागे यकटकसतस्य ख्यातंतिलादं विदुषामधीशै:॥॥ यदि बायें नेत्रकोण के निचलेभाग में कर्णचूल्हे के ऊपर तिल हो तो उसकी कमर के पीछे तिल कहा है॥। ३८ ॥ ४५ गयडोपरिस्थ खलु वामभागे कर्णस्य निम्नेतिलकादिकं चेतू। वामोरुनिम्ने पुरुषस्य तस्य चिह्नं तिलादं प्वदेत्सुधीरः॥ ६६ ।। जिसके वाई ओर कान के नीचे गाल के ऊपर टिके हुए तिल हों तो उसकी बाई ऊरु के नीचे तिल कहना चाहिये।। ६ैहै।। ४६ ऊध्वे च भागे खलु दक्षकर्णें प्रतीयते वै तिलको यदानीम्। पोक्कं तिलादं मनुजस्य तस्य दक्ते च देशे जठरस्य नूनम् २००॥ दाहिने कान के ऊपर तिल हो तो उसके पेट के दाहिने तरफ़ तिल कहा है।। २००।। ४७ विद्योतते चेद्विशदे कपाले दक्षे च कर्णे तिलको यदोध्वें। वदन्नि विपाः पुरुषस्य तस्य दक्षे च पाश्वें तिलकं तदानीम्१॥ यदि कपाल में दाहिने कान के ऊपर निल हो को उसकी दाहिने पाश्व के नीचे तिल कहा है ।। १ ।। प्रथमखयड ४=दक्षस्य कर्णस्य च कोणदेशे संलक्ष्यते चेत्तिलको यदानीम। दक्षस्य पार्श्वस्य च निम्नभागे प्रोक्कंतिलादं पुरुषस्य तस्य॥२॥ यदि दाहिने कान के कोणदेश में तिल हो तो उसकी दाहिनी पार्श्व के नीचे तिल कहा है॥ २ ॥ ४६ ऊर्ध्वे च भागे खलु वामकर्णे प्रतीयते चेत्तिल को यदानीम्। ख्यातं तिलायं पुरुषस्य तस्य वामे च भागे जठरस्य चिह्नम्॥३॥ यदि वामकर्स के ऊपरी भाग में तिल हो तो उसके पेट के बामभाग में तिल कहा है।। ३ ।। ५० वामस्य कर्णस्य च मध्यदेशे संलच््यते चेत्तिलकालको वैं। वामस्य पार्श्वस्य चनिम्रभागे चिह्नं तिलादं भणितं प्रवीणैः४।। बायें कान के मध्य में तिल हो तो उसको बाई पार्श्व के नीचे तिल कहा है।। ४।। ५१ वामस्य कर्णस्य च निम्नदेशे विराजते चेत्तिलको यदानीम्। वामस्य पार्श्वस्य चनिम्नदेशे चिह्नं तिलादं मुनयो वदन्ति॥५॥ यदि वायें कान के निचलेदेश में तिल हो तो उसकी बाई पार्श्व के नीचे तिल पुनियों ने कहा है। ५ ॥ ५२दत्ताम्नमध्ये खलु निम्नभागे संलच्यते चेतितिलको हि यस्य। ब्रूयात्तिलाद्यं पुरुपस्य तस्य दक्षे च पाश्वें किल ग्ह्यकस्य ॥६। जिसके दाहिने नेत्र के मध्यदेश में नीचे तरफ दिल हो तो उसकी गुदा की दाहिनी ओर तिल कहना चाहिगे॥ ६ ॥ ५ ३द क्षाम्वकोण मनुजस्य यस्य नासाविलग्नं यदि भाति चिह्नम्। तदा शरीरस्य च मध्यमाङ्के प्रोकं तिलादं वदतां वरेययैः॥७॥ जिसके दाहिने नेत्रकोश में नासिका के पास तिल हो वो उसके मध्य- माङ्ग में तिल कहा है॥। ७॥ ५४दच्ते च भागे खलु नासिकाया: संदृश्यते चेत्तिल को यदानीम्। गुह्यप्रदेशे मनुजस्य तस्य प्रोक्कं तिलादं मुनिभिस्तदानीम्॥=॥ सामुद्रकशास्त्न यदि नासिका के दाहिने भाग में तिल दिखे तो उसकी गुदा में तिल कहा है॥ = ॥ ५५ वामाम्चनिस्ने पुरुषस्य यस्य घ्राणस्य मध्ये तिलको विभाति। वामे च देशे खलु गुह्यकस्य चिह्नं तिलादं मुनयो वदन्ति॥६॥ जिसके वामलोचन के नीचे नासिका के बीच में तिल हो तो उसकी गुदा के वामभाग में तिल कहते हैं ॥ ६ । ५६वामाम्यपातस्य च मध्यदेशे विद्योतते चेत्तिल को यदानीम्। अपानद्वारे मनुजस्य तस्य वामे च भागे तिलकं वदन्ति॥१०। वामलोचन के पातस्थल के मध्यदेश में यदि तिल हो तो उसके गुदा द्वार पर वामभाग में तिल कहते हैं ॥ १०॥ ५७वामस्य नेत्रस्य च निम्नदेशे विराजते चेत्तिलको यदानीम्। गुदस्य द्वारे खलु वामभागे चिह्नं तिलादं त्वपरं भणन्ति।। ११।। यदि वामलोचन के निचले भाग में तिल हो तो उसके गुदाद्वार के वायें भाग में अपर तिल जानना ।। ११ ।। ५८ कपालपाश्वें खलु दक्षनेत्रपातस्य रम्भे ह्यथवा च मध्ये। विद्योतते चेत्तिल कालको वै तुन्दस्य दक्षे त्वपरं तिलाद्यम्१२।। यदि कपाल के पार्श्व में दाहिने नेत्रपात के आरम्भ में अथवा मध्य में, तिल हो तो पेट के दाहिने भाग में अपर तिल कहा है ।। १२ ।। ५६दक्षाम्चपातो परितोऽथवा चेदारम्भदेशे खलु नासिकायाः। संलच््यते वै तिलको हि तस्य नाभ्याश्च दक्षे तिलकं वदन्ति १३ जिस के दाहिने नेत्रपात के ऊपर अथया नासिका के आरम्भदेश में तिल हो तो उसकी नाभि के दाहिने भाग में तिल कहना ॥ १३॥ ६०वामाम्चपातस्य चमध्यदेशे आरम्भके वा तिल कादिकं चेद। तुन्दस्य वामे पुरुषस्य तस्य चिह्नं तिलादं कवयो भणन्ति॥१४।। जिसके दाहिने या चायें नेत्रपात के मध्य या आरम्भदेश में तिल हो तो उसके पेट के वामभाग में तिल कहना चाहिये ॥ १४॥ पृथमखएड ६१ सव्याम्बपातस्य च मध्यभागे किंवा च शेषे तिल को विभाति। जूयात्सुधीरो मनुजस्य तस्य वामे चपाश्वें कटकस्य चिह्नम् १५।। जिसके वामलोचन के पातस्थल के मध्यभाग में अथवा शेपभाग में तिल हो तो उसकी कमर के बायें तरफ़ तिल कहना चाहिये ॥ १५॥ ६२ नार्या यदा वा पुरुपस्य वक्रे दक्षाम्बपातोपरितस्तिलाद्यम्। व देत्सुचिह्नं मनुजस्य तस्य मुष्कस्य पार्श्वे कटिदक्षपाश्वें।१६।। जिस नारी या नर के वदन में दाहिने नेत्रपात के ऊपर तिल हो तो उसके गलहरी या कमर के दाहिने तरफ़ तिल कहना चाहिये । १६॥ ६३ दत्ताम्बपातस्य चमध्यदेशे संदृश्यते चेत्तिल को यदानीम्। दक्षाङ्गमध्ये विशदं तिला दं विद्धद्विरादयैर्भणितं नदानी म् । । १ ७ ।। जिसके दाहिने नेत्रपात के मध्यदेश में तिल दिखं तो उसके दाहिने अङ्ग के बीच विशद तिल कहा है ॥ १७ ॥ ६४दक्ाम्बपातस्य च शेपदेशे नासान्तिके चेत्तिल को विभाति। कटिप्रदेशस्य च निश्नभागे।चह्नं तिलादं कथितं नरस्य ॥१८॥ जिसके दाहिने नेत्रपात के शेपदेश में नासा के समीप तिल हो तो उसकी कमर के निचले भाग में तिल कहा है ॥ १८ ॥ ६५ वामान्वपातस्य च निम्नदेशे चिह्नं यदानीं विशदं विभाति। कुचस्य वामे मनुजस्य तस्य विद्यात्तिला दं विदुपामधीशः१६। जिसे वामनेत्रपात के नीचे भाग में तिल हो उसे कुच के वामभाग या गलएरी के बायें तरफ़ तिल अवश्य होना चाहिये॥ १६॥ ६ ६वामाम्चपातस्य च मध्यदेशे विराजते चेत्तिल को यदानीम्। ब्रूयाद्विपश्चित्पुरुषस्य तस्य गुदान्निके वैविशदंतिलाद्यम् २० जिसे यदि वामनेत्रपात के मध्यदेश में तिल हो उसे गुदा के निकट विशद सिल होगा ॥ २० ॥ ६७ आरम्भदेशे खलु सव्यनेत्रे प्राणस्य मूले यदि भाति चिह्नम्। ब्रूयात्तदानीं मनुजस्य तस्य कटेश्च वामे त्वपरं तिलाद्यम्॥२१॥। सामुद्रकशासत्र जिसके वामनेत्र के आरम्भदेश में या नासिका की मूल में तिल हो उसकी कमर के वामभाग में अपर तिल कहना चाहिये ॥ २२॥ ६=दकाम्व कोणस्य च निम्नदेशे समी चयते चेत्तिल को हि यस्य। वदेद् बुधेशः खलु पअ्रस्य दक्षेच पार्श्वे विशदं तिलाद्यम्२२।। जिसके दाहिने नेत्रकोग् के निचले भाग में यदि तिल हो तो उसके पाँजर के दाहिने तरफ़ विशद तिल कहना चाहिये ॥ २२॥ ६६दक्षस्य नेत्रस्य च मध्यदेशे विदृश्यते चेत्तिल को यदानीम्। विज्ञा महान्तो मनुजस्य तस्य गुदागदेशे तिलकं वदन्ति॥२३॥ जिसके दाहिने नेत्र के मध्यभाग में तिल दिखे उसके गुदा प्रदेश में तिल जानना चाहिये॥ २३ ॥ ७० वामाम्वनिम्नस्य च मध्यदेशे प्रतीयते चेत्तिलको यदानीय्। प्राज्ञैःसुधीरैः पुरुपस्य तस्य कुचस्थ वामे भणितं तिलाद्यय् २४।। जिसे वामलोचन के नीचे मध्यदेश में तिल हो उसे कुच के बामभाग में तिल होगा ॥ २४॥ ७१वामाम्वपातस्य च निम्रदेशे संलच्यते चेत्तिल को यदानीय्। गुदाप्रदेशस्य च वामपार्श्वे चिह्नं तिलादं भणितं सुधीभि:२५। जिसके वामनेत्रपात के नीचे भाग में तिल हो उसकी गुदा के बायें तरफ़ तिल कहा है। २५॥ ७२वामाम्बपातस्य च कोणदेशे तथा च मध्ये तिल को विभाति। गुह्याङ्गमध्ये मनुजस्य तस्य चिह्नंतिलादंमुनयो वदन्ति॥२६।। जिसके वामनेत्रपात के काणदेश में एवं नेत्रपात के निचले भाग में तिल हो उसकी गुदा के मध्य भाग में तिल कहते हैं॥ २६॥ ७३्वामाम्वनिम्रे खलु पातमध्ये नासान्तिके वा तिल को विभात। ब्रूयात्तदानीं पुरुषस्य तस्य मुष्कस्य वामे त्वपरंतिलाद्यम्॥।२७।। जिसे वामलोचन के नीचे पात के मध्य में या नासा के निकट तिल हो उसे गलहरी के वामभाग में अपर तिल अवश्य होगा॥ २७ ॥ पथमखएड ७४भालस्य पाश्वें पुरुपस्य यस्य दक्षाम्वमध्ये यदिभाति चिह्नम्। वत्सस्य दक्षेजठरान्तिके वा प्रोक्कं तिलादं विशदंसुधीभिः२=।। जिसके भाल के पार्श्व में दाहिने लोचन के बीच में यदि चिह्न हो उसके वक्षस्थल के दाहिने तरफ़ या पेट के पास विशद तिल कहा है॥ २८ ॥ ७५दत्ाम्वकोणो खलु नेत्र मध्ये नासान्तिके वा तिल कोविभाति। वत्सस्य दक्षे पुरुषस्य चाग्रे संकीर्तितं वै विशदंतिलाद्यम्॥२६।। यदि दाहिने नेत्र के मध्य में या नासिका के समीप तिल हो तो उसके वक्षस्थल के दाहिने या अग्रभाग में तिल कहा है॥ २६॥। ७६वामाम्वकोण पुरुपस्य भाले विद्योतते चेत्तिल को यदानीम्। वत्सस्य वामे विशदंतिलादं संभाषितं वै वदतां वरेयैः ॥३०॥ जिसके भाल में वामलोचन के कोण में तिल हो उसके वक्षस्थल के बायें तरफ़ तिल होता है॥ ३०॥ ७७वामाम्यकोषस्य तु चाग्रभागे संलचयते चेत्तिल को यदानीग् वामे च पाश्नेखलु वत्सकस्य संवर्णितं वै त्वपरंतिलाद्यम्।।३१।। जिसके वामलोचनकोण के अग्रभाग में तिल हो उसके वक्तस्थल के बायें तरफ़ अपर तिल होगा॥ ३१॥ ७=वक्त्रस्य दक्े खलुनासिकाया रन्ध्रस्यनिम्नेतिल कोविभाति ऊर्ध्वे च भागे किल दक्िणांसे चिह्नं तिलादं मुनयो भणन्ति ३२ यदि मुख के दाहिने नासिकारन्ध्र के नीचे तिल हो तो दाहिने कन्धे के ऊपर तिल होगा ॥ ३२ ॥ ७६शरष्ठस्य शेषे खलु दक्षनासाशेषेच भागे तिलको यदानीम्। ब्रूयात्तदानीं पुरुपस्य तस्य कुचोर्ध्वदेशे विशदंतिलाद्यम्।।३३।। जिसके ओष्ठ के शेपभाग या दक्षिसा नासा के शेयभाग में तिल हो तो उसके कुच के ऊपर या गलहरी के ऊपर विशद तिल कहना चाहिये॥३३॥ ८०दक्षे च भागे खलु नासिकाया ऊर्ध्वस्थितश्वेत्तिलको विभाति विद्याद्वुधेन्द्रो मनुजस्य तस्य गुह्याङ्गदत्तेत्वपरंतिलाद्यम् ३४।। जिसके दाहिने तरफ़ नासिका के ऊपर तिल हो उसकी गुदा के दाहिने तरफ़ अवर तिल जानना चाहिये॥ ३४ ॥ =१वामे च भागे खलु नासिकायाः शेपे चदेशे यदि लाञ्छनं चेत्। वत्सस्य वामे त्वपरं तिलादं गायन्ति विशा गुए गौरवाढ्या: ३५ जिसके बाईं तरफ़ नासिका के शेप देश में तिल दिखे उसके वक्षस्थल के वामभाग में अपर तिल अवश्य ही जानना ॥ ३५ ॥ =२घ्राणस्य निम्ने खलु वामभागे वक्त्रस्यमध्येह्यथवातिलश्रेत्। बूयात्तिलादयं पुरुपस्य तस्य गुह्यस्य मेदूस्य च मध्यदेशे ॥३ ६।। जिसकी नासिका के नीचे वामभाग में अथवा बदन के बीच में तिल हो उसकी गुदा व लिङ्ग के बीच में निल अवश्य होना चाहिये।। ३६ ॥ =३वामे च भागे खलु नासिकाया मध्यस्थले चेत्तिल को विभाति। गुंह्यस्य मेदूस्य च मध्यदेशे विद्धद्विरादयैर्मणितं तिला ्ययम ॥ ॥ ७ जिसे वायें तरफ़ नासिका के बिचले भाग में तिल हो उसे गुदा या लिङ् के मध्यभाग में तिल होना आवश्यक है।। ३७ ।। =४ भाले विशाले मनुजस्य यस्य नासाग्रभागेतिलकोविभाति। वदेत्तदानीं वदतां प्रधानो गुह्याग्रभागे त्वपरं तिलाद्यम् ॥३८।। जिसके विशालमाल में नासिका के अग्रभाग में तिल है उसकी गुदा के अरग्रभाग में अरप्रपर तिल कहना चाहिये ॥ ३८ ।। ८५दन्षे च भागे खलु नासिकाया नासापुटे चेत्तिल को यदानीय्। विद्यात्तदानीं पुरुषस्य तस्य गुह्याङ्गदक्ते त्वपरं तिलाद्यय्॥३६॥ नासिका के दाहिने तरफ़ नासापुट के बीच में तिल हो उसे गुदा के दाहिने भाग में अपर निल होगा। ३६ ॥ ६वामे च पाश्वें खलु नामिकाया मध्ये च नासापुटकस्य किंवा। विद्योतते चेत्तिल को यदानीं लिङ्गस्य वामे भणितं तिलाद्यम्४० नासिका के वामपार्श्व में या नासापुट के मध्य में तिल हो उसे लिङ्ग के वामभाग में तिल होगा ॥। ४० ॥ ६७दच्े च भागे खलु नासिकाया: पुटोपरिस्थस्तिलकोविभाति। विज्ञा महान्तो मनुजस्य तस्य गुह्याङ्गदेशे तिलकं वदन्ति ४१॥ दाहिने तरफ नासापुट के ऊपर तिल हा तो उसे गुह्याङ्देश में तिल होगा॥ ४१॥ दमनासोपरिस्थस्तिलको विभाति दक्षे च भागे पुरुषस्य यस्य। गुह्यस्य लिङ्गस्य च मूलमध्ये दन्ते तिलादं भणितं सुधीभि: ४२।। जिसके दाहिने तरफ़ नासिका के ऊपर तिल हो उसकी गुदा व लिङ् के मूल के मध्य में दाहिनी ओर तिल अवश्य होना चाहिये॥ ४२॥ =६घ्राणोपरिस्थः खलु वामभागे विराजते चेत्तिल कोयदानीख्। गुदस्य मेदरस्य च मूलमध्ये वामे तिलादं कवयो गदन्ति।४३।। जिसके बाई तरफ़ नासिका के ऊपर तिल हो उसको गुदा व लिङ्ग के मूल के मध्य में बाईं ओर तिल होना चाहिये ।। ४३॥ ६०प्रान्ते यदानीं खलु वामगएडे प्रतीयते चेद्धिशदं तिलाद्यय्। गुह्याङ्गनिम्ने किल दक्षभागे चिह्नं तिलादं कथितं कवीन्द्रैः४४।। वामगएड के प्रान्तदेश में उज्जवल तिल हो उसे दाहिने तरफ़ मुदा के नीचे तिल होगा॥। ४४ ॥ ६१्वामे च भागे वदनस्य यस्य चिह्नं तिलादं यदि लच्यते चेत्। ऊध्वें च भागे किल वामपाणौ वदेत्सुधीरो विशदंतिलाद्यम् ४५ जिसके वदन के वामभाग में तिल हो उसे बायें हाथ के ऊपर विशद तिल होगा।। ४५ ॥ ६२ऊर्ध्वस्थले चेदधरस्य मध्ये संलच्यते वै तिलको यदानीम्। गीतं तदानीं मनुजस्य तस्य गुह्याग्रभागे त्वपरं तिलाद्यम्४६। ओष्ठ के ऊपर मध्य भाग में तिल हो उसे गुदा के अग्रभाग में अपर तिल होगा ॥ ४६ ॥ ६३निम्नौष्ठमध्येयदि भाति चिह्नं दक्षे च जानो भणितं विलायम्। नो मध्यदेशे खलु वामजानौ दच्ते च दृष्टे किल दच्तजानौ ४७॥ सामुद्रकशास जिसके निचले ओष्ठ के मध्य में तिल हो उसकी दाहिनी जानु में और यदि मध्यदेश में न हो तो बाई जानु में तिल कहना चाहिये। यदि दाहिनी तरफ़ दिखे तो दाहिनी घुटनू में तिल होगा॥ ४७॥ ६४ मध्यस्थले चेचचिवुकस्य यस्य प्रतीयते वै तिलको यदानीम। पादोपरिस्थं तिलकं तदानीमाडडुर्मुनीन्द्रा मनुजस्य तस्य॥४८॥ जिसकी ठाढ़ी के बीच में तिल हो उसके पाँवों के ऊपर तिल होगा॥| ४८ ॥ ६५वक्रे विशाले चिवुकस्य मध्ये संदृश्यते चेत्तिल कालको वै। जङ्गोपरिस्थं त्वपरं तिलादं वदन्ति विश्रा वदतांवरेएयाः। ४६।। विशाल वदन में ठोढ़ी के बीच यदि तिल दिखे तो जाँघ के ऊपर अपर तिल जानना ॥ ४६॥ ६६दने च भागे चिबुकस्य शेषे संलच्यते चेत्तिलको यदानीय्। ब्रूयात्तदानीं पुरुषस्य तस्य ऊरोश्च संधावपरं तिलादयम्॥५। यदि दाहिने भाग में ठोढी के शेप देश में तिल हो तो उसकी ऊरु की संधि में अपर तिल कहना चाहिये॥ ५० ॥ ६७वामे च भागे चिबुकस्य यस्य प्रतीयते चेत्तिल को यदानीयू। सन्धिस्थलस्थंखलु सक्थिनोश्च चिह्नं तिलादं त्वपरं वदन्तिप१ जिसकी ठोढी के वामभाग में तिल हो तो ऊरु (निर्रोह) की सन्धि में अपर तिल होगा॥ ५१॥ ह=ऊर्ध्वस्थले चेत्खलु करठनल्या विराजते वै तिलको हि यस्य। गुह्याङ्गमध्ये किल नाभिदेशे गायन्ति चिह्नं त्वपरं तिलाद्यम्५ २ जिसकी कएठनली के ऊपरी भाग में तिल हो तो गुदा के मध्य में या तोंदी के ऊपर अपर तिल जानना ॥ ५२ ॥ दधगलस्य नल्या: खलु दक्षपाश्वें चिह्नं तिलादंविशदंविभाति। वदेत्तदानीं मनुजस्य तस्य ऊरोश्च दक्षे भषितं तिलाद्यम् ५३॥ यदि गले की नला के दाहिने तरफ़ तिल हो तो ऊरु के दाहिने भाग में भी तिल जानना॥ ५३॥ १०० कराठस्य नल्या:खलु वामपाश्वें प्रतीयते चेद्विशदं तिलादम्। ब्रूयात्सुचिह्नं पुरुषस्य तस्य ऊरोश्च सन्धेः किल सव्यदेशे॥५४॥ यदि कएठनली के वामभाग में तिल हो तो ऊरु सन्धि के बाई तरफ़ भी तिल कहना चाहिये॥ ५४ ॥# इति तिलादिज्ञानम् भालाङ्कविज्ञानमिदं मयोक्कं नारीनराणं शुभदं शिवेशे !। अभ्यासमात्रेण नराःसुपूज्या: भूयासुरुव्याँ सकलप्रियास्ते५५॥ अहो शिवेशे ! यह भालरेखा के सुलक्षणों का विज्ञान हमने कहा है, जो कि नर-नारीगणों को जानना अच्छा है। इसके अभ्यासमात्र से मनुष्य पूजनीय होते हैं और वे ही लोग भूमएडल में सब के प्यारे होंगे॥ ५५ ॥ कल्याएं कलयत्वीशः पठतस्सादरात् मिये। लोके धन्यतरो भूयान्मङ्गलानां च मङ्गलः ॥ ५६ ॥ अहो प्रिये! आदर समेत पहनेवालों को मझलों का मङलरूप हो। परमेश्वर कल्याण देवे। इसका अध्ययनकर्त्ता लोक में धन्यवाद का पात्र होगा॥ ५६॥ इति श्रीमद् द्विजवरपं०शक्रिंधरसंकलित सामुद्रकशस्त्रस्य भालरेखा- लक्षणं नाम प्रथम: खएडः समासतिं पफागोति शम् ।
- भारत देश में आज भी सैकड़ों लोग केवल तिलों को देखकर ही पुरुष अथवा स्त्री के शुभाशुभ लक्षरा शकल से जान लेते हैं। संपादक ( १ ) हस्तरेखा। रानामिका कनिष्ठका K मो म oh क 20 L ST h CHNO4 CE of ti चिच v ( २ ) हस्तरेखा। ملـ JL अनपुरेखना या भान मातु रखा पामस्तक ITalke चिश्र ६ पिल्टरेखा माशा माउप्प रेखा N पिप ७ ( ३ ) हस्तरेखा। EE वित्र 2ै. E: In न ११. A (8 ) हस्तरेखा। 3१२ १ चित्र. १४. चिप्र ₹ ४. चित १६. : ( x) हस्तरेखा। IKA fuft 93 6 &V विष १८. -. ११ C चिन १६. 11.98 चित २०. ( ६ ) हस्तरेखा। P AN मनन #F Go चिन २ :. ईपिए २२.
57a चिद्र २४. चितर २१. ( ७ ) हस्तरेखा। मे
चिच २६. 1-1 1-1= اليW दिंप २७. चित २८. 1-1
F6 9-1- 11-1- चिम ३२. ( ८ ) पिम ० In s हस्तरेखा। YX. चिप्र ३१. चिच २६. ز ٤ ) हस्तरेखा। चित्र ३१. d+'+ ١ Ye चित्र ३४. 12 1 गद १६. าจ हस्तरेखा। G 40- चित्र ३७. -13 चित्र ३८ a 1 चित्र ३६. चिप ४०. ( ११ ) हस्तरेखा। .+ निप ४१. बित्र ४२. E 1४ क चिs्र ब४ ( १२ ) हस्तरेखा। V Fo 3) OV -19 ( १३ ) इस्तरेखा। CAI M हित्र ४६ Jo संग्रहकर्ता औरर टीकाकार पं. राककिधर शुक्क
व्यास प्रकाशन, वाराणसी सामुद्रकशास्त्र के द्वितीयखएड का सूचीपत्र। विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ मङ्गलाचरए द्रव्यादि ... करतल में अंगुलिज्ञान मासिक्यादिज्ञान करतलग्रहस्थितिज्ञान वस्त्र ग्रडों के चिह्न प्रागाद्यधीश करतलद्वादशराशिस्थितिज्ञान विप्रादिजातिक्रम मेपादिनाम पुरुपादिज्ञान कालाङ्ग में मेपादिवास मजाद्यधिप उदाहरण लवणादिरस राशिस्वरूप उच्चादिज्ञान मेपादि का अधिवास मूलत्रिकोण मेपादि की हस्वादिसंक्षा ग्रहों का फलविचार पृष्ठोदयादिसंक्षा ग्रहों का स्थानविशेष से विफल चतुष्पदादिसंज्ञा दिवारात्रिवल र्यादि ग्रहों का स्वरूप ... धातुमूलजीवचिन्ताज्ान चन्द्रस्वरूप मेपादि से चिन्ताज्ञान भौमस्वरूप वर्सज्ञान युधस्वरूप अन्धवधिरादिज्ञान गुरुस्यरूप ... रक़ादिवर्णज्ञान भृ गुस्वरूप ... द्रव्य शनिस्वरूप करतल में मेपादिचिह्ह ग्रहवध मेपाधीश ... ग्रहों के मित्रादि ग्रहों का शरीरविभाग स्थिरादिसंक्षा कालात्मादिज्ञान ग्रहों का ईक्षण राजादिज्ञान रव्यादि ग्रहों से फलविचार ... सूर्यादि नाम कारक
२= वर्सजन ... अरिष्टदायक प्रकाशकादिज्ञान ग्रहों का शुभाशुभविचार पापादिज्ञान ग्रहासामरिएहर चन्द्र का बलावल रविकृतकष्ट पृष्ठोदयादिज्ञान चन्द्रकृत रोग चिहगादिस्वरूप मङ्गलकृतदोप वालाद्यवस्थानिरय बुधकृतदोष जलाशयाद्यधिवास ... गुरुभृगुकृत दुःख धातुमुलादिज्ञान शनिकेतुकृत दुःख दीप्ताद्यवस्थाक्रम राहुकृतदोप ताम्रादिवर्सज्ञान ... पुत्रलाभार्थउपाय ( २ ) य पृष्ठ विषय पृष्ठ आध्यन्तमध्यफलढायक चतुर्द शलत्तसाङ्गितकरतलफल करतलदिग्ब्षान ह२ फलों का तारतम्य ... द्वादशलक्षणाङ्गितकरतलफल करतल में रेखाज्ञान करतलभग्नरेखा करतल में परमायुरेखादिफल अँगरेज़ी मतानुसार जन्मवार- पोडशलन्राक्कितकरतलफल मासादिज्ञान ... महाराष्ट्रों के मत से करतलफल नखफल ... पोडशलक्षाङ्गितकरतलफल नखस्थचह्फल पञ्चदशलक्षाङ्गितकरतलफल ११= गुरुस्थानफल आयुप्यरेखाफल सौभाग्यरेखाफल १२= मातूरेखाफल ऊर्ध्चरेखाफल सूर्यरेखाफल चतुर्दशलक्षणाङ्गित करतलफल वलरेखाफल पञ्चदशलक्षणाक्गितकरतलफल वेलास्कियरेखाफल गर्डलरेखाफल पञ्चदशलक्षसाङ्गितकरतलफल मणियन्धरेखाफल १४= मतान्तर पुनरष्याह ... एकाद्शलक्षण युतकरतलफ ल अथनयोदशलक्षणाङ्गितकरतलफल ७० अथ पञ्चदशलक्षणाङ्गितकरतलफल ७२ पश्चदशलक्षणाङ्कितकरतलफल १६= अथ पञ्चदशलक्षणायुत करतल फल ७५ चतुर्दशलक्तणाङ्गितकरतलफल फलज्ञान १७= एकादश लक्तणाङ्गितकरतलफल फल ... ग्रंथ का उपसंहार और कवि- ... वंशवर्णन ... (हस्तरेखालक्षण) मङ्गलाचरण शान्तं शान्तिकरं सदा सुखकरं सर्वाधिपं शर्मदं कान्तं कान्तिकरं कलाधरधरं धर्म्यं धरेशं परम्। नित्यानन्दकरं महाभयहरं सौन्दर्यसत्राकरं वन्देऽहं सकलेश्वरं सुरवरं सवार्थसिद्धचै शिवम् ॥१॥ शान्त, शान्तिकर, सदासुखकर, सर्वेश, कल्यायदायक, कमनीयरूपधारी, कान्तिकर, चन्द्रशेखर, धर्मी, धरेश, परेश, नित्यानन्दकर, महाभयहारी, सौन्दर्य-सत्राकर, महादेव भगवान् शक्र की सर्वार्थसिद्धि के लिए में वन्दना करता हूँ ॥ ?॥ आदौ पाणितलव्याख्या भरयते मुनिमंमता। श्रूयतां देवि, देवेशि ! समाधाय मनोमलम् ॥२ ॥ शिवजी बोले, पहले पागितल (हाथ) की मुनिसंमन व्याग्या कही जानी है। अतएन हे देवि! अपने अमल मनको सात्रधान कर सुनिए ॥ २ ॥ *
- टिटुनी से अंगुलियों के होर तक एक विशेष स्थान है। कलाई से अंगुलियों तक दोनों और हाथ कहाता है। यह माननिक किया को क्रिया- त्मक रूप देनेवाला सर्वश्रेष्ट साधन है। मानव शरीर में गले से ऊपर का भाग समस्त शरीर का कोष है तो हाथ उसकी कुंजी है।-संपादक सामुद्रकशास्र करतल में अङ्कुलिज्ञान दङ्गुल्य: करशाखा: स्यु: पुंस्यंगुष्ठः प्रदेशिनी। मध्यमानामिका चापि कनिष्ठा चेति ताः क्रमात् ।३॥। अंगुलियाँ हाथों की शाखाएँ होती हैं; उनमें अँगूठे को पहली अंगुली जानना चाहिए। दूसरी तर्जनी है और मध्यमा तीसरी अंगुखी कहाती है। अनामिका चौथी और कनिष्ठा पाँचवीं अँगुली है। इसी क्रम से पाँनों अँगुलियों को जानना चाहिए ।। ३ ॥ देखो चि०नं. १ करतलग्रहस्थितिज्ञान कनिष्ठामूलगः सौम्यो ह्यनामामूलगो रविः। मध्यमामूलगो मन्दस्तर्जनीमूलगो गुरुः ॥४ ॥
- जिस प्रकार आजकल विज्ञान की सहायता से इंजीनियर लोग बड़े-बड़े मकानों पर नोकदार काँटे (लोहे के) बिजली आदि से बचने के लिए लगाया करते हैं, इसी प्रकार सर्वेश्वर उस महा इंजीनियर ने मानव शरार (महल ) पर हाथ की अंगुलियाँ नोकदार काँटे रूप में उत्पन्न की हैं। स्पर्श-शन का प्रधानज्ानतन्तु हाथ है, और हाथ में प्रधान अंगुलियाँ है। उन सबमें प्रधान अंगुष्ठ है।-संपादक कुछ इँगलिश, अमेरिकन, तथा फ़ॅच विद्वानों ने अँगूडे को अंगुली नहीं माना। जिस प्रकार हाथ में शुक्र ग्रह स्थान समस्त जीवन की कुंजी है, इसी प्रकार स्वभाव, गुण तथा मानसिक शक्ति का दयोतक एक यही अँग्ठा होता है। इस पर प्रायः सभी ने विशेष ज़ोर दिया है। The thumb is the greatest index to the character अर्थात् अँगूठा आचरण का सबसे बड़ा परिचा- यक है। Latin भाषा में इसे pollex (पोलेक्स) कहते हैं। इसका अर्थ है "सबसे पुष्ट"। प्रसिद्ध फ्रच विद्वान Montaigne ने इसे "Master finger" (सबमें प्रधान अंगुली) कहा है। इसमें मनोवैज्ञानिक प्रधानता है। प्रसिद्ध विद्वान् कीरो ने तो अँगूठे में हस्तरेखा-विज्ञान के समस्त सत्याश की नींव मानी है। इसी प्रकार भारतीय एवं चीन के हस्तरेखाविशारद्रों ने भी अँगूठे को आचरस तथा मानसिक शक्कियों का खास सूचक माना है। (So great a revealer of character is the thumb that many of the Hindus base their entire work uponit. The Chinese have a most minute and intrieate system based solely ... on first phalanx. )-संपादक १-इङ्लगडीयसामुद्रिकवेतएां मते वुधस्य मर्करी संज्ञा, सूर्यस्य सनसंज्ञा, शनैश्वरस्य स्यटर्न संज्ञा, गुरोर्जपिटरसंज्ञा, मंगलस्य मार्ससंज्ञा, शुक्रस्य बीनससंक्ा, चन्द्रस्य मूनसंज्ञा कथिनेति। द्वितीयखरड मातृपित्रोरुपर्य्यारः शुक्रो ह्यंगुष्ठमूलगः । मातृपित्रोरधश्चन्द्रो ज्ञेया खेटस्थितिः क्रमात् ॥५॥ कनिष्टा के मूल में बुध, अनामा के मूल में सूर्य, मध्यमा के मूल में शनि, तर्जनी के मूल में ब्ृहस्पति, माता पिता की रेखा के ऊपर व मध्य में मङल, अँगूटे के मूल में शुक्र और माता-पिता की रेखा के नीचे चन्द्र रहता है। इस क्रम से ग्रहों का स्थान जानना चाहिए। ४-५॥ (देखो चित्र नं०१व२) वृत्ताकारं रवेश्चिहनं चन्द्रस्याप्यर्द्धचन्द्रकम्
एतादृशं गुरोश्चापीद्दशं कुजस्यैव बुधस्यापीदृशं मतम् ॥६ ॥ मा ज्ञेयं भृगोश्चापीदृशं 2 स्मृतम्। शनैश्चापीदृशं प्रोक्न विद्वदिर्वेदपारगैः ॥७॥ बृत्ताकार 0 सूर्यका चिह्न, चन्द्र का अर्धचन्द्राकार, मंगल का चिह है ऐसा होता है। बुध का चिह्न ह ऐसा है।बृहस्पति का प ऐसा चिंह्न जानना चाहिए। शुक्र का Q ऐसा चिद् है, और शनि काठ ऐसा चिह्न जानना चाहिए॥ ६-७ादेखो चि नं. ३ करतलद्वादशराशिस्थितिज्ञान अङ्गुलीपु च सर्वासु पर्वत्रयमुदाहृतम्। तर्जनीपर्वके चादे मेषस्तिष्ठति सर्वदा ॥८ ॥ द्वितीये च वृषो ज्ञेयस्तृतीये मिथुनं स्मृतम्। अनामापर्वके चाद्ये सदा तिष्ठति कर्कटः ॥ ६ ॥ द्वितीये सिंहको ज्ञेयस्तृतीये कन्यका स्थिता। कनिष्ठपर्वके चाद्ये तुला ज्ञेया मनीषिभिः ॥१०॥ द्वितीये वृश्चिको ज्ञेयस्तृतीये धनुरुच्यते। मध्यमापर्वके मुख्ये मृगस्तिष्ठति सर्वदा ॥ ११ ॥
- कई पाश्चात्य विद्वानों ने उपर्युक्क ग्रहों को ज्योतिष के ग्रह नहीं माना ; किंतु यह रालत है। आप आगे चलकर ज्योतिष और सामुद्रक मे घनिष्ठ संबंध देखेंगे। इससे स्पष्ट हो जायगा कि हथेली पर के ग्रह यथार्थ में जयोिष के ग्रह ही हैं। -- संपादक द्वितीये कुम्भको ज्ञेयस्तृतीये मीनको मतः । एवं द्वादशराशीनां स्थितिः प्रोक्का मया प्रिये॥१२॥ शिवजी वोले, मिये! प्रत्येक अंगुली में तीन-तीन पर्व होते हैं, उनमें तर्जनी के पहले पर्व में मेप, दूसरे पर्व में छप, तीसरे में मिथुन है। अनामिका के पहले पर्व में कर्क, दूसरे में सिंह, तीसरे में कन्या है। कनिष्टा के पहले पर्त में तुला, दूसरे में वृश्चिक, तीसरे पर्व में धन है। मध्यमा के पले पर्व में मकर, दूसरे में कुम्भ, और तासरे पर्त में मीन माना जाता है। इस प्रकार वारह राशियों का स्थितिक्रम मैंने कक् ॥। ८-१२ ॥ ( देखो चित्र नं० १) # मेपादिनाम मेपाजविश्वक्रियतुम्बुराद्या वृपोक्षगोतावुरगोकुलानि। द्न्दं नृयुग्मं जुतुमं यमं च युगं तृतीयं मिथुनं वदन्ति॥१ ३। मेप, अज्ञ, विश्व, क्रिय, तुम्बुर और आद्य ये मेपराशि के नाम हैं। ृप, उत्षा, गो, ताबुर और गोकुल वृपराशि के नाम हैं। दून्दव, नयुग्म, जुतुम, यम, युग, तृनाय और मिथुन, मिथुनराशि के नाम आचार्यों ने कहे हैं ॥ १३ ॥ कुलीरकर्काटककर्कटाख्या: कएठीरवः सिंहमृगेन्द्रलेयाः । कुलीर, कर्काटक और कर्कट कर्कराशि के नाम हैं। कएठीरव, सिंह मृगेन्द्र और लेय सिंहराशि के नाम हैं। पाथोन, कन्या, रमखी और तरखी कन्या राशि के नाम हैं। तौलि, वखिक, जक, तुला और धट तुलाराशि के नाम है ।। १४ ॥ अल्पष्टभं वृश्चिक कोपकीटा धन्वी धनुश्चापशरासनानि। मृगोमृगास्यो मकरश्च नक्रःकुम्भो घटस्तोयधराभिधान:॥१५।।
- पाठक अ ज्योनिप और सामुड्रिक का संबंध देखें। यहाँ राशि, ग्रह आदि वही है और वही फल देने हैं, जैसा कि उयोनिष की राशि तेथा ग्रह हैं। -संपादक द्वितीयखरड अल्पष्टभ, वृश्चिक, कार्पि और कीट वृश्िकराशि के नाम हैं। धन्वी, धनु, चाप और शरासन धनराशि के नाम हैं। मृग, मृगास्य, मकर और नक्र मकरराशि के नाम हैं। कुम्भ, घट और तोयधर कुम्भराशि के नाम हैं॥ १५ ॥ मीनालिमत्स्यपृथुसेमभषा वदन्ति दस्रादिकर्च्नवपादयुताः क्रियाद्याः। चक्रस्थितादिविचरादिननाथसंख्या क्षेत्रर्च्तराशिभवनानि भसंस्थितानि ॥ १६ ॥ मीन, अलि, मत्स्य, पृथुरोम तथा अप मीनराशि के नाम आचार्यों ने कहे हैं। अश्विन्यादि नक्षत्रों के नव चरणों से संयुत व आकाश में चलने- वाली व चक्र में टिका हुई मेपादिक बारह राशियाँ होती हैं और राशियों में भली भाँति टिके हुए न्ेत्र, ऋत्त, राशि व भवन ये स्थानों के नाम होते हैं ॥ १६ ॥ कालाङ में मेपादिवास कालात्मकस्य च.शिरो मुखदेशबाडु- हत्कुच्तिभाग कटिवस्तिरहस्यदेशः। ऊरू च जानुयुगलं परतस्तु जङ्के पाददयं क्रियमुखावयवाः कमेष ॥ १७ ॥ शीश में मेप, मुख में दृप, वाहुओं में मिथुन, हृदय में कर्क, कोखों में सिंह, कमर में कन्या, बस्तिदेश में तुला, गुदा में दृश्चिक, ऊरुओं में धन, जानुओं में मकर, जंघाओं में कुम्भ और पैरों में मीन रहता है। ये क्रम से मेपादिराशियों के अवयव कहाते हैं ॥ १७ ॥ *
- पाठक! ध्यानपूर्वक देखें, समस्त शरीर में तथा हथेली में किस प्रकार ग्रह, एवं राशियों का चिचिन समावेश है। इसे भली भाँति मनन करना चाहिए।-संपादक उदाइरण द्वितीय खएड राशिस्वरूप व्यत्यस्तोभयपुच्छमस्तकयुतौ मीनौ सकुंभौ नर- स्तौलीचापधरस्तुरब्जघनो नक्रो मृगास्यो भवेत्। वीणाब्यं सगदं नृयुग्ममवला नौस्था ससस्यानला शेपा: स्वस्वगुणाभिधानसदृशाः सर्वे स्व्देशाथ्रयाः॥१८॥ उलटे-पलटे दोनों तरफ पूँछ व मस्तक युक्क दो मीन कहाते हैं। कुरुभ समेत तुला नर कहाते हैं। धन जघनदेश से घोड़े का रूप रखता है। मकर मृगमुखवाला होता है। मिथुन वीणयुक रोगी रहता है। कन्या नौका में बैठी हुई धान्यसमेत अनल से पूर्ण रहती है। शेप सभी अपने अपने नाम अंर गुण के समान अपने अपने देश का आश्रय रखते हैं#॥ १८ ॥ मेपादि का अधिवास मेपस्य धातुकररत्नधरातलं स्यादुच्षस्तु सानुकृपिगोकुलका- ननानि। द्यूतक्रियारतिविहारमहीयुगस्य वापीतटाकपुलि- नानि कुलीरराशेः॥ १ ६ ॥ धातु, रत्नों की खान और धरातल में मेप का अधिवास है। पर्वतों का किनारा या सम भूमाग, खेत, गोकुल तथा वन में छृप का अधिवास है। जुआँ, रति और विहार करने की भूमि में मिथुन का अधिवास कहा जाता है। चावली, तालाब व पुलों में कर्क का वास रहता है।। १६॥ करठीरवस्य घनशैलगुहावनानि षष्ठस्य शाद्दलवधूरति- शिल्पभूमि:। सर्वार्थसारपुरपरायमहीतुलायाः कीटस्य चाश्म- विपकीटबिलप्रवेशाः ॥ २०।। घने पहाड़ों, गुहाओं और वनों में सिंह का अधिवास रहता है। हरी घास, रमखियों के रतिस्थान तथा कारीगरी की भूमि में कन्या का अधिवास कहाता है। समग्र अर्थसार, पुर, बाजार या दूकानों की भूमि में
- राशि तथा ग्रहों के वास, स्वरूप आदि से उनके स्वभाव और फल का ज्ञान होता है। अतएव उपर्युक्क सभी बातें पाठकों को कंठस्थ कर लेनी आवश्यक है। आगे चलकर इनसे भारी काम निकलेगा।-संपादक सामुद्रकशास्र S1 तुला का अधिवास है। पत्थर, विप, कीट व िलप्रदेश में वृश्चिक का वास कहा जाता है।२० ॥ चापस्य वाजिस्थवारणवासभूमिरेणाननस्थ सरिदम्युवन- प्रदेशा:। कुम्नस्य तोयघटभाएडगृहस्थलानि मीनाधिवास- सरिदम्बुधितोयराशिः ॥२१॥ घोड़े, रथ और हाथियों के रहने की भूमि में धन का वास है। नदी, जल तथा जंगलों में मकर का बास होता है। जल, घट, भांडगृह व स्थलों में कुभ का अधिवास कहा जाता है, और नदी, समुद्र और जलराशियों में मीन का अधिवास होता है।। २१ ।। मेपाद़ि की हस्वादिसंज्ञा दीर्घावृश्चिक कन्य काहरितुला मेपादिपुंयोपितौ। प्रागादिक्रियगोन्युक्कटकभान्येतानि कोणान्विता- न्याहुः क्रूरशुभौ चरस्थिरतरद्वन्द्वानि तानि क्रमात्॥२२॥ छृप, मेप, कुम्भ ये हस्य संज्ञक हैं। मकर, मिथुन, धन, मीन और कर्क ये समसंज्ञक हैं। वृश्चिक, कन्या, सिंह और तुला चे दीर्घसंज्ञक हैं। मेपादि राशियाँ पुरुप तथा स्त्रीसंज्ञक भी कहाती हैं। यानी मेप पुरुप, छृप स्त्री, मिथुन पुरुप, कर्क स्त्री, सिंह पुरुप, कन्या स्त्री, तुला पुरुप, वृश्चिक स्री, धन पुरुप, मकर स्त्री, कुम्भ पुरुप, मीन स्त्री संज्ञक है। मेप, तृप, मिथुन व कर्क ये चार चार पूर्वादि दिशाओं में रहती हैं। अर्थात् मेप पूर्व में रहता है। दन्षिण में वृप, पश्चिम में मिथुन, उत्तर में कर्क रहता है। तथा सिंह पूर्व में, कन्या दत्षिण में, तुला पश्चिम में, वृश्चिक उत्तर में चसता है। पूर्व में धन, दक्षिग में मकर, पश्चिम में कुम्भ, उत्तर में मीन है। मेपादि बारह राशियाँ फूर व सौम्य संज्ञक भी कहाती हैं.। अर्थात् मेप क्रूर, दृष शुभ, मियुन फूर, कर्क लौम्य, सिंह क्रूर, कन्या सौम्य, तुला कूर, दृश्चिक सौम्य, धन क्रूर, मकर सौन्य, कुम्भ कर और मीन सौम्य कहा जाता है। मेपाद़ि बारह राशियाँ चर, स्थिर या दविस्त्रभावसंज्ञक कहाती हैं। यानी मेप चर, दृप स्थिर, मितुन दिस्तमाक, कर्क चर, सिंह स्थिर, कन्या द्विस्त्रभाव, तुला चर, द्वितीयख़एड चृश्चिक स्धिर, धन दिस्त्रभाव, मकर चर, कुम्भ स्थिर और मीन द्विस्वभाव संजक कडा जाता है ॥ २२॥ पृष्ठोदयादिसंज्ञा वीरयोंपेता निशि वृपनयुककर्किचापाजनक्रा हित्वा युग्मं भवनमपरे पृष्ठपूर्वोदयाश्च। शेपा: शीर्षोदयदिनवला श्रेष्ठता राशयस्ते मीनाकारदयमुभयतः काललग्नं समेति ॥ २३।। चृप, मिथुन, कर्क, धन, मेप और मकर ये राशियाँ रात्रि में बलवान् कहाती हैं। इनमें मिथुनराशि को छोड़कर अन्य राशियाँ पृष्ठोदयसंज्ञक होती हैं। सिंह, कन्या, तुला, दश्चिक व कुम्भ ये राशियाँ दिनमें बली व श्रेष्ट होकर शीर्पोदय कहाती हैं। मीनराशि दिन और रात्रि में बलवान् व उभयोदयी होकर काललग्न को प्राप्त होती है।। २३।। मीनालिकर्कैंटमृगा: सलिलाभिधानास्तोयाश्रयाघटवधूयु- गगोपसंज्ञाः । निस्तोयभूतलचराः क्रियचापतौलिकएठीर- वाश्च वहवः प्रवदन्ति सन्तः ॥२४॥ मीन, उृश्चिक, कर्क और मकर ये जलसंज्ञक कहाते हैं। कुम्भ, कन्या, मिशुन और ्वप ये जल का आश्रय रखते हैं। मेप, धन, तुला और सिंह ये निर्जल भूतल में चरते हैं। ऐसा भी बहुत से सन्तलोग कहते हैं ॥२४॥ चतुप्पदादिसंज्ञा चापापरार्धहरिगोमकरादिमेपा मीनास्थिता वलयुताश्च चतुष्पदाख्याः । कन्यान्युग्मघटतौलिशरासनाद्या लग्ना- न्विता यदि नरा द्विपदा बलाढ्याः॥ २५॥ धन का परार्ह, सिंह, वप, मकर का पूर्वार्ध, मेप और मीन ये बलचान् हाने हुए चतुप्पद संज्ञानाले होते हैं। कन्या, मिथुन, कुम्भ और धन का पूर्वाधें ये नररूपधारी दिपद कहाने हैं। यदि लग्न में हो तो चलवान कहे जाते हैं॥ २५ ॥ मृगापरार्धान्त्यकुलीरसंज्ञा जलाभिधाना वलिनश्चतुर्थे। जलाश्रयो वृश्चिकनामधेयःससप्रमस्थानगतो वलीस्यात् २६ मकर का परार्ध, मीन और कर्क ये जलचर कहाते हैं। यदि चौथे घर में हों तो चलवान कहे जाते हैं। वृश्चिक जलाश्रयी कहाता है। यदि सातबें : पर में हो तो बलवान् होना है।। २६।। दिवारात्विल केन्द्रं गतोडह्ि दविपदो बलाव्यश्चतुष्पदा: केन्द्रगता रज- न्याम्। कीटास्तु सर्वे यदि कराटकस्था: सन्धिद्रये वीर्ययुता भवन्ति॥ २७॥ दिन के समय केन्द्र में बैठा हुआ द्विपद बलवान् होता है। रात्रि के समय केन्द्र के चतुष्पद बलवान् होते
स्त्रीपद्तललक्षण (Part 4)
हैं। और समस्त कीटसंज्ञक यदि केन्द्र में हों तो दोनों सन्धियों में बली होते हैं॥ २७।। धातुमूलजीत्रचिन्ताज्ञान धातुर्मूलं जीवमित्याह्ुरार्या मेपादीनामोजयुग्मे तथैव। स्वर्णाद्धातुर्मृत्तिकान्तंतृणान्तं वृत्तान्मूलं जीवकूटःसजीव:२८ मेपादि के सम व विपम में धातु, मूल और जीव इन चिन्ताओं को आयों ने कहा है। वहाँ सोने से लेकर मृत्तिकापर्यन्त धातु कहाती है। ृक्ष से लेकर तिनकापर्यन्त मख कहाता है। जो जीव-समुदाय दिखता है, वह जीव कहा जाता है।। २ ॥ मेपादि से चिन्ताज्ञान मेपे च द्विपदां चिन्ता वृषे चिन्ता चतुष्पदाम्। मिथुने गर्भचिन्ता च व्यवसायस्य कर्कटे॥ २६ ॥ सिंहे च जीवचिन्ता स्यात् कन्यायां च स्त्रियास्तथा। तुलायां धनचिन्ता च व्याधिचिन्ता च वृश्चिके।।३०।। चापे च धनचिन्ता स्यान्मकरे शत्रुचिन्तनम्। कुम्भे स्थानस्यचिन्ता स्यान्मीने चिन्ता च दैविकी ३१ द्वितीय खराड मैप में द्विपदों की चिन्ता होती है। वृप में चौपायों की, मिथुन में गर्भ की, कर्क में रोज़गार की, सिंह में जीवों की, कन्या में स्त्रियों की, तुला में धनकी, वृश्चिक में उ्याधिकी, धन में धन की, मकर में शत्रु की, कुम्भ में स्थान की और मीन में दैवीचिन्ता जानना चाहिए॥ २६-३१ ॥ वर्सज्ञान मीनालिकर्कटा विप्राश्चापाजहरयो नृपाः । कुम्भयुग्मतुला: शूद्रा वैश्या वृपमृगाङ्गनाः॥३२॥ मीन, वृश्चिक और कर्क ये व्राह्मण कहाते हैं। धन, मेप और सिंह ये क्षत्रिय कहाते हैं। वृप, मकर और कन्या ये वैश्यवर्ण कहे जाते हैं और कुम्भ, मिथुन और तुला ये शूद्वर्स होते हैं * ॥। ३२॥। अन्धचधिरादिज्ञान महानिशान्धाः क्रियगोमृगेशा मध्यन्दिने कर्कटयुग्म- कन्याः। पूर्वाह्लकाले बधिरौ तुलाली धन्वी मृगाख्यश्च तथापराहे। ३३ ॥ मेप, छृप, मकर महानिशा में अन्धे रहते हैं। कर्क, मिथुन और कन्या मध्याह् में अन्धे कहाते हैं। तुन्ा, दश्चिक ये पूर्वाङ्क में वहरे होने हैं, तथा धन और मकर अपराह्ह में बहरे होते हैं॥। ३३ ॥ मृगाननश्चापधरश्च पङ्: सन्धिद्धये नाशकरौ भवेताम्। स्यादृक्षसन्धिः कटकालिमीनभान्तं प्रगयडान्तमिति प्रसिद्धम् मकर और धन पंगुसंज्ञक कहाते हैं। ये दोनों सन्धियों में नाशकारक हैं। कर्क, वृश्चिक और मीन पर्यन्त ऋत्सन्धि कहाती है। यहभान्त व मगएडान्त इस नाम से विखयात है॥ ३४ ॥ रका दिवर्णज्ञान पिङ्गलःशबलवभ्रुपाएडुरास्तूवरादिभवनेपु कल्पिताः॥ ३५ ॥
- इनके वर्ण-गुणादि का ज्ञान होने से हम्तरेखाएँ पढ़ने में बड़ी सहायता मिलती है। -संपादक मेप रक्त, तृप गौर, मिथुन हरित, कर्क श्वेत-रक्र, सिंह पाएडु, कन्या विचित्र, तुला कृष्ण, वृश्चिक सुनर्णसद्ृश, धन पिंगल, मकर कबुर, कुम्भ व्रु और मीन स्वच्छवर्ण कडाता है। ये मेपादि बारह राशियों में कल्पित हैं॥ ३५॥ द्रव्य वस्त्राद्ं शालिमुख्यं वनफलनिचयः कन्दलीमुख्यधान्यं त्वक्सारं मुद्रपूर्व तिलवसनमुखं त्विच्ुलोहादिकं च। शस्ताश्वं काञ्चनादं जलजनिकुमुमं तोयजातं समस्तं वस्त्रादि मेष का द्रव्य है। शालिमुख्य व्प का, वन्यफलों का समुदाय मिथुन का, कन्दली मुख्यधान्य कर्क का, त्वक्सार सिंह का, मूँग आदि कन्या का, तिल वसन तुला का, इनु लौहादि दृश्चिक का, शस्त्राश्व धन का, सुवर् आदि मकर का, जलजातपुष्प कुम्भ का, और जल से उपजा समस्त द्रव्य मीन का है। यदि मेपादि बली या अबली हो तो पूर्वोक़ द्रव्य उसी क्रम से कम अथवा अधिक जानना चाहिए॥ ३६ ॥ करतल में मेपादिचिह्न मेपस्यैतादृशं चिह्नं वृषस्यापीद्टशं मतम्। द्वन्दस्पैतादश ज्ञेयं कर्कस्यापीद्टशं स्मृतम् ॥३७॥ सिंहस्येता हशं ख्यातं कन्यायाश्चेदशं मतम् । घटस्यापीदृश व्यक्कं वृश्चिकस्यद ततः परम् ॥३=॥ चापस्यैताहश गीतं मृगस्यापीदशक्रय मतम्। प्रोक्कं मीनस्यैतादशंञ वुघैः ३६॥ यह मेप राशि कत विह्न है। यह दृप कण है। यह मिथुन जानना चाहिए। कर्क का य है। कन्या कजा यह माना है। यह तुला क है। यह सिंहराशि का है। वृश्चिक का M यह है। यह है। यह कुम्भ का धन का है। मकर का यह निशान आर मीन का ऐिसा निशान कहा है ॥ ३७-३६ ॥ देखोचि० नं० ५ मेपाधीश धराजशुकज्ञशशीन सौम्यसितारजीवार्कजमन्दजीवाः। क्रमेण मेषादिपुराशिनाथास्तदंशपाश्चेति वदन्तिसन्तः॥४०।। मेप का स्वामी मङ्ज्ञ, टृप का गुक्र, मिथुन का बुध, कर्क का चन्द्रमा, सिंह का सूर्य, कन्या का बुध, तुला का शुक्र, दृश्चिक का मङ्ल, धन का गुरु, मरतुर व कुम्म का शनैरवर और मीन का अधिपति व अंशप वृहस्पति है।। ४० ॥ ( पाठक ! देखा राशि तथा ग्रह का संबंध। यही ग्रह हाथ पर हैं।-संपादक) ग्रहों का शरीर विभाग ग्रहाणं मएडलं चैव भृण वक्ष्यामि पार्वति। नादचकरे स्थितः सूर्यो बिन्दुचक्रे च चन्दमाः ॥ ४१ ॥ लोचने मङलः प्रोक्को हृदि सोमसुतस्तथा। उदरे च गुरुश्चैव शुक्रे शुकस्तथैव च ॥ ४२ ॥ नाभिस्थितोऽथ मन्दो वे मुखे राहुस्तथा स्थितः । पादे पाणौ च केतुश्च शरीरे ग्रहमएडलम्॥ ४३ ॥ शिवजी बोले हे पार्वती! मैं ग्रहों का मएडल कहूँगा, उसे सुनिए। सूर्य नादचक्र में बैठा है। चन्द्रपा चिन्दुचक्र में है। मङ्ल लोचनों में रहता है। वुध हृदय में, उदर में बृदस्पति, शुक्र (बीज) में शुक्र, नाभि (तोंदी) में शनैश्वर, मुख में राहुऔर हाथ-पैरों में केतु है। यह शरीर का ग्रहमएडल कहाता है।४१-४३॥ (जिसपकार समस्त शरीर में हम राशि कह आये हैं इसी प्रकार ग्रहों का राज्य भी समस्न शरीर पर है। इसे ध्यान में रखना चाहिए ।-संपादक)
- ग्रहों तथा राशियों के चिह् अत्यावश्यक हैं। इनका ज्ञान होने एवं फल जानने से हाथों में स्थित उनके स्थान से फल कहने में यड़ी सुविधा मिलेगी।-संपादक कालात्मादिज्ञान कालस्यात्मा भास्करश्चित्तमिन्दुः सत्त्वं भौमः स्याबच- रचन्द्रसूनुः । देवाचार्यः सौख्यविज्ञानसारः कामः शुक्रो दुःखमेवार्कसूनुः।४४॥ सूर्य काल की आत्गा है। चन्द्रमा काल का चित्त (दिल) ह। मङल बल है। तुध वचन है। बरृहस्पति सौख्य व विज्ञान का सार है। शुक्र कामदेव है और शनैश्चर दुःखरूप कहाना है ॥ ४४॥ शनादिज्ञान दिनेशचन्द्रो राजानौ सचिवौ जीवभार्गवौ। कुमारो वित्कुजो नेता प्रेष्यस्तपननन्दनः ।। ४५ । सूर्य और चन्द्रमा राजा कहाते हैं। अर्थात् सूर्य राजा तथा चन्द्रेमा रानी कहाता है। बृहस्पति तथा शुक्र मन्त्री कहाने हैं। बुध कुमार और मङल नेता कहाता है। शनैश्चर दास कहलाता है॥ ४५ ॥ सूर्यादिनाम हेति: सूर्यस्तपनदिनकृद्धानुपूपारुार्काः सौम्यस्तारातनयबुधविद्बोधनश्चेन्दुपुत्रः॥४६॥ हेति, सूर्य, तपन, दिनकृत्, मानु, पूपा, अरुरऔर तरक सूर्य के नाम हैं। सोम, शीतद्ुति, उद्पति, ग्लौ, मृगाङ्क, इन्दु और चन्द्र चन्द्रमा के नाम हैं। आर, वक्र, नितिज, रुधिर, अङ्गारक और क्ररनेत्र मङल के नाम हैं। सौम्य, तारातनय, बुध, वित्, बोधन और इन्दुपुत्र बुध के नाम हैं।।४६।। मन्त्री वाचस्पतिगुरुसुराचार्यदेवेज्यजीवा: शुक्र: काव्यः सित भृगुसुताच्छास्फुजिद्दानवेज्याः। १. आंग्लभापा में चन्द्र को स्त्रीलिंग माना है: पर हम लोग पु'लिंग मानते हैं। "कमलाफ्ान्तेर दफ्तर" । चौघे का चिट्ठा) में श्रीवंकिमचन्द्रजी चट्टोपा- ध्याय भी चिदानंद चतुबेदी द्वागा यह निर्गाय न करा सके कि चन्द्र पु'लिंग है या स्नी-लिंग। -- संसादक छायासूनुस्तरणितनयः कोणशन्यार्किमन्दा राहुस्सर्पासुरफणितमः सैंहिकेयागवश्च ॥४७॥ मन्त्री, वाचस्पति, गुरु, सुराचार्य, देवेज्य और जीव बृहस्पति के नाम हैं। शुक्र, काव्य, सित, भृगुसुत, अच्छ, आस्फुजित् और दानवेज्य शुक्र के नाम हैं। छायासूनु, तरशितनय, कोष, शनि, आर्षि और मन्द शनैश्चर के नाम हैं। राहु, सर्प, अपुर, फणी, तम, सैंहिकेय और अगु राड्डु के नाम हैं॥ ४७॥ ध्वजःशिखी केतुरिति प्रसिद्धा वदन्ति तज्ज्ञा गुलिकश्चमान्दिः। उपग्रहा भानुमुखग्रहांशा: कालादय: कष्टफलप्रदाः स्युः॥४८॥ यमकराटककोदएडमान्दिपातोपकेतवः॥ ४६॥ ध्वन, शिरी, केतु, गुलिक और मान्दि केतु के नाम हैं। रव्यादि ग्रहों के अंश कालादिक उपग्रह कहाते हैं। ये कष्टकारी फल के देनेवाले होते हैं। उनको क्रम से कहते हैं-काल, परिधि, धूम, अर्धपहर, यमन एटक, कोद्एड, मान्दि, पात और उपकेतु उन उपग्रहों के नाम हैं॥ ४८-४६॥* वर्णज्ञान दूर्वाश्यामलकान्तिरिन्दुतनयः संरक्गौरः कुजः। मन्त्री गौरकलेवरः सिततनुः शुक्रोसिताङ्गः शनि- श्चानीलाकृतिदेहवानहिपतिः केतुर्विचित्रद्युतिः ॥५० ॥ सूर्य श्याम तथा लाल वर्वाला होता है। चन्द्रमा सफ़ेद अङ्रवाला तथा जवान रहता है। बुध दूब के समान श्याम अज्वाला होता है। मङल लाल और गोरा है। बृदस्पति गोरे रंगवाला होता है। शुक्र सफ़ेद अङ्रवाला, शनैश्वर काला, राडु नीला और केतु तिचित्र वर्णवाला कहलाता है॥५०॥ [ इस वर्ण-ज्ञान से हस्तरेखा-विशारद ग्रहों की पीड़ादि के निवारणार्थ उपाय बता सकेगा। इसके ज्ञान से हृदय के भाव का प्रवाह भी जाना जा सकेगा। अतएब यह भी आवश्यक है। संपादफ] प्रकाशकादिज्ञान प्रकाशकौ शीतकरप्रभाकरौ तारा ग्रहा: पञ्च धरासुता- दयः। तमःस्व्ररूपौ शिखिसिंहिकासुतौ शुभा: शशिज्ञामरवन्द्य- भार्गवाः ॥ ५१॥ चन्द्रमा और सूर्य प्रकाशक कहाते हैं। मङल आदि पाँच ग्रह तारा कहाते हैं। राड्ु तथा केतु दोनों तमोरूंपी कहे जाते हैं। चन्द्र, बुध, वृहस्पति और शुक्र ये शुभग्रह कहलाते हैं ॥। ५१ ॥ [ इस शुभागुम-ज्ञान से हम जान सकते हैं कि अमुक ग्रह किससे प्रमावित होकर अपना स्वभाव बदल देता है। उसी पकार उसका फल भी बदल जाता है। संपादक] पापादिज्ञान क्षीणेन्दुमन्दरविराहुशिखिक्षमाजा: पापास्तु पापयुतचन्द्र- सुतश्च पापः। तेषामतीव शुभदौ गुरुदानवेज्यौ क्रूरौ दिवा- करसुतच्ितिजौ भवेताम् ॥ ५२ ॥ प्ीए चन्द्रमा, शनैश्वर, सूर्य, राड्ु, केतु और मङल ये पापग्रह कहाते हैं। पापग्रहों से युक्त बुध पापी कहाता है। उनके बीच में वृहस्पति और शुक्र अत्यन्त शुमदायक हैं। शनैश्चर तथा मङगल दोनों क्राग्रह कहलाते हैं ॥५२॥ चन्द्र का बलाचल शुक्तादिकानि दशकेहनिमध्यवीर्य- शाली द्वितीयदशकेऽतिशुभप्रदोऽसौ। चन्द्रस्तृतीयदशके बलवर्जितस्तु साम्येक्षणदिमहितो यदि शोभनः स्यात्॥ ५३॥ शुक्लपक्ष की परेवा से दशमी तक चन्द्रमा मध्यम वीर्यवाला रहता है। दशमी से कृष्णपत्ष की पञ्चमी पर्यन्त यही चन्द्रमा शुभदायक है। पश्चमी से लेकर अमावस पर्यन्त चन्द्रमा चीण चलवाला कहाता है। यदि शुभ ग्रहों से दृष्ट तथा संयुक्त हो तो शुभदायक हो जाता है॥ ५३ ॥# • य्रहों के नाम, उपनाम, वर्ग, प्रकाश और बलावल आदि का ज्ञान हस्त- रेखा-विचारक के लिए परमावश्यक है।-संपादक। द्वितीय खएड पृष्ठोदयादिज्ञान रव्यारराहुमन्दाश्च पृष्ठेनोद्यन्ति सर्वदा। शिरसा शुक्रचन्द्रज्ञा जीवस्तूभयतो ब्रजेत् ॥५४ ॥ सूर्य, मङल, राडु और शनैश्चर सदैव पीठ से उदय होते हैं। शुक्र, चन्द्रमा और बुध शीश से, और वृहस्पति दोनों से उदय होते हैं॥ ५४ ॥ बिहगादिस्वरूप दिवाकरज्ञौ विहगस्वरूपौ सरीसृपाकारयुतः शशाङ्कः। पुरन्दराचार्यसितौ द्विपादौ चतुष्पदो भानुमुतक्षमाजौ ॥५५।। सूर्य तथा बुध दोनों पत्तीरूप हैं। चन्द्रमा सरीसृपरूपी होता है। वृहस्पति तथा शुक्र दोनों द्विपद कहाते हैं। शनैश्चर और मङल दोनों चतुष्पदसंज्ञक होते हैं॥। ५५ ॥ बालो धराजः शशिजः कुमारक- ब्रिंशड्गुरु: पोडशवत्सरः सितः। पञ्चाशदर्कों विधुरव्दसप्ततिः शताब्दसंख्याः शनिराहुकेतवः॥ ५६ ॥ मङ्गल बालक, बुध कुमार, बृहस्ति तीस वर्षवाला, शुक्र सोलह वर्षवाला, सूर्य पचास वर्गवाला, चन्द्रमा सत्तर वर्षवाला तथा शनैश्चर, राडु और केतु सौ सौ वर्ष वाले होते हैं॥ ५६॥ जलाशयाद्यधिवास जलाशयौ चन्द्रसुरारिवन्द्यौ बुधालयग्रामचरौ गुरुज्ञौ। कुजाहिमन्दध्वजवासरेशा भवन्ति शैलाटविसंचरन्तः॥५७॥ चन्द्रपा और शुक्र जलाशयों में वास करते हैं। वृहस्पति तथा बुध परिडनों के घर क गाँतों में चूमने हैं। मङल, राहु, शनैश्चर, केतु और सूर्य पहाड़ों और जङलों में विचरते रहते हैं॥ ५७ ॥ धातुमुलादिज्ञान शाखाधिपा जीवसितारबोधना धातुस्वरूपौ द्युचरौ कुजारुणौ। सामुद्रकशास् मूलप्रधानौ तुहिनाकरार्कजौ जीवौ सितार्यों तु विमिश्रमिन्दुजः ॥५८ ॥ बृहस्पति, शुक्र, मङ्ल और वुध शाखाधिप कहाते हैं। आकाशचारी मझल व सूर्य धातुरूपी कहे जाते हैं। चन्द्रमा और शनैश्चर मूलप्रधान और शुक्र व बृहस्पति जीवरूप कहाते हैं। और, बुध विमिश्ररूप कहाता है॥ ५८ ॥ दीप्ता्यवस्थाक्रम दीप्ः स्वस्थः प्रमुदितः शान्तः शक्: प्रपीडितः । दीन: खलस्तु विकलो भीतोवस्था दश क्रमात्॥ ५६॥ दीप्, स्वस्थ, प्रमुदित, शान्त, शक्, म्रपीडित, दीन, खल, विकल और भीत, येक्रम से रव्यादि ग्रहों की दस अवस्थाएँ कहाती हैं॥ ५ह ॥ स्वोच्चत्रिकोणोपगतः प्रदीप्त: स्वस्थः स्वगेहे मुदितः सुहृद्धे। शान्तस्तु सौम्यग्रहवर्गयातः शक्कोऽतिशुद्धः स्फुटरश्मिजालैः ॥ ६० ॥ जो ग्रह अपने उच्च या त्रिकोण में है वह प्रदीप्त कहाता है। जो अपने घर में है वह स्वस्थ कहा जाता है। अपने मित्र के घर में बैठा ग्रह मुदित होता है। जो शुभ ग्रहों के वर्ग में पहुँचा है वह शान्त कहाता है, और जो स्फुट- किरण जालों से अतिगुद्ध होता है वह शक्र कहाना है ॥ ६० ॥ ग्रहाभिभूतस्त्वतिपीडितः स्यादरातिराश्यंशगतोतिदीनः । खलस्तु पापग्रहवर्गयोगान्नीचोऽतिभीतो विकलोस्तयातः६१। जो ग्रहों से तिरस्कृन हुआ है वह अतिपीड़ित होना है। जो शत्रु के राश्यंश में प्राप्त है वह अनिदीन कहाता है। पाप ग्रहों के योग से खल होता है। नीच ग्रह अतिभीत कहा जाता है। अस्तंगत ग्रह विकल होता है॥ ६१॥ # • हंखिए. यहाँ उपोतिय तथा सामुद्रिक से कैसा घ्रनिष्ठ सम्बन्ध है। सं० द्वितीयखराड ताम्रादिवर्णज्ञान कृष्ण कान्तिरिनादीनां नष्टादौ च प्रकीर्तिताः ॥ ६२ ॥। सूर्य ताम्रवर्ण, चन्द्रमो श्वेतवर्ण, मङल रक्रवर्ण, बुध हरित, वृहस्पति पीतवर्ण, शुक्र कर्बुरवर्गा और शनैश्चर कृष्णवर्ण कहाता है ॥ ६२ ॥ द्रव्यादि द्रव्याषि ताम्रमणिकाञ्चनशुक्किरौप्य- मुक्ान्ययश्च दिननाथमुखग्रहाण।म्। मुख्या दिवाकरमुखादधिदेवता: स्युः॥ ६३॥ ताम्र, मशि, कांचन, सीपी, रूपा, मोती और लोहा सूर्यादि ग्रहों के द्रव्य कहाते हैं। अर्थात् सूर्य का ताम्र, चन्द्रमा का मणि, मङ्गल का सुवर्स, बुध का सीपी, बृहस्पति का रूपा, शुक्र का मोती और शनैश्र का लोह द्रव्य है। अग्नि, जल, स्वाभिकार्त्तिक, विष्णु, इन्द्र, शची और ब्रह्मा सूर्या- दिकों के अधिदेवता हैं॥ ६३॥ माणिक्यादिज्ञान माणिक्यं दिननायकस्य विमलं मुक्ाफलं शीतगो- र्माहेयस्य च विद्रुमं मरकतं सौम्यस्य गारुत्मतम्। देवेज्यस्य च पुष्परागमसुराचार्यस्य वज्रं शने- नीलं निर्मलमन्ययोश्च गदिते गोमेदवैडूर्य्यके॥ ६४॥ सूर्य का माशिक्य, चन्द्रमा का अमल मोती, मङल का मूँगा या मरकत, बुध का गारुत्मत, वृहस्पति का पुखराज, शुक्र का हीरा, शनैश्चर का नीलम, राहु का गोमेद और केतु का वैद्टर्य कहाता है॥ ६४॥
- यह माशिक्य ज्ञान बड़ा मार्के का है। जब किसी ग्रह की चाल हाथ से मालुम हो तथा वह अनिष्टकारक जान पड़े तो फिर उसी ग्रह का माशिक्य. उसकी अंगुली में नीचे की ओर भुकाकर पहनने से उस ग्रह की बंहुत कुछ शांति होती है-संपादक। सामुद्कशाख स्थूलाम्बरं नूतनचारु चेलं वस्त् कृशानुतोयाहतमध्यमानि। दृढांशुकं जीर्णमिनादिकानां वस्त्नाषि सर्वे मुनयो वदन्ति॥ ६५ ॥ सूर्य का मोटा कपड़ा, चन्द्रमा का नया, मकल का सुन्दर, बुध का रेशमी, बृहस्पति का फटा,शुक्र का मज्ञबून और शनैश्चर का पुराना कपड़ा कहा है।।६५॥ प्रागादिका भानुसितारराहुमन्देन्दुविद्देवपुरोहिता: स्युः । प्रागाद्यधीश शुकारचन्द्रज्ञसुरेज्यमन्दा वसन्तमुख्यर्त्वधिपा हगाै: ॥६६॥ पूर्व का सूर्य, आग्नेय का शुक्र, दक्षिण का मङ्गल, नैत्र्टत्य का राड, पश्रिम का शनि, वायव्य का चन्द्रमा, उत्तर का बुध और ईशान का बृहस्पति स्वामी है। शुक्र, मङ्गल, चन्द्र, बुध, बृहस्पति और शनैश्वर ये दगाणों से वसन्तादि ऋतुओं के अधिपति हैं। यानी वसन्त का शुक्र, ग्रीष्म का मङल, वर्षा का चन्द्रमा, शरत् का चुध, हेमन्त का बृहस्पति और शिशिर का अधिपति शनैश्वर कहाता है ॥ ६६ ॥ विमा दिजातिक्रम विप्रौ जीवसितौ दिनेशरुधिरौ भूपालकौ वैश्यरा- डिन्दु: शूद्रकुलाधिपः शशिसुतो मन्दोत्तराणां पतिः। आदित्यामरमन्त्रिशीतकिरणाः सत्त्वप्रधाना ग्रहाः शुकज्ञौ सरजोगुणो शनिधरापुत्रौ तमःस्वामिनो ॥६७॥ वृस्पति और शुक्र व्राझ्मणा कहाते हैं। सूर्य तथा मङल क्षत्रिय हैं। चनद्रमा वैश्य है। बुध शूद्रों का स्वामी है। शनैश्वर अन्त्यजों का अधिपति है। सूर्य, गुरु नथा चन्द्रमा सच्तगुगवाले कहाते हैं। शुक्र और बुध रजोगुखी तथा शनैथ्र और मङ्ल तमोगुणी हैं॥ ६७ ॥ पुरुपादिज्ञान नराकारा भानु्ितिजगुरः शुक्शशिनौ वधूरूपौ पराहौ प्रकृतिपुरुपौ मन्दशशिजौ। वियतक्षोणीतेजःपवनपयसामेव पतयः सुराचार्यज्ञारद्युमणिसुतदेवारिसचिवाः ॥ ६८॥ सूर्य, मङ्गल और वृह्स्पति पुरुपसंज्ञक हैं। शुक्र और चन्द्रमा स्त्रीसंज्ञक हैं। बुध तथा शनैश्वर प्रकृति पुरुप होते हुए नपुंसक कहे जाते हैं। आकाश, पृथ्वी, तेज, पवन और जल के अधिपति बृह्स्पति, बुध, मङल, शनैश्वर व शुक्र हैं॥ ६८ ।। मज्जादयधिप कच्यायां क्रमशो दिनेशतनयाज्ज्योतिर्भचक्राश्रिता: मजास्नायुवसास्थिशुक्ररुधिरत्वग्धातुनाथाः क्रमा- दारार्कीज्यदिनेशशुकशशभृत्तारासुताः कीर्तिताः ॥६६॥ कक्षा में कमसे सूर्यपुत्र के सकाश से शनैक्वर, गुरु, मङ्गल, सूर्य, शक्र, चन्द्रमा और बुध ये ज्योतिर्मचक्र में टिके हुए मनीत होते हैं। मज्जा, स्नायु, बसा, अस्थि, शुक्र, रुधिर और त्चा के स्वामी क्रमसे मङगल, शनि, गुरु, सूर्य, शुक्र, चन्द्र और बुध कहाते हैं। ६६ ॥ लबग्ादिरस लवणकटुकपायस्व।दुतिक्ाम्लमिश्राः शशिरविशनिजीवारासुरेज्यज्ञनाथाः। रविकुजसितसौम्या मन्दजीवेन्दवश्च ॥। ७० ॥। लवण, कट, कपाय, स्व्रादु, निक्क, अम्ल और मिश्र, इन रसों के चन्द्रमा, सूर्य, शनि, गुरु, मङगल, शुक्र और वुध अधिपनि हैं। अयन, दिन, पक्ष' ऋतु, अब्द (वर्प), मास और तसा, इनके सूर्य, मङल, शुक्र, बुध, शनि, गुरु और चन्द्र स्वामी हैं॥ ७० ॥ उच्चादिज्ञान मेपो वृषो मकरषष्ठकुलीरमीना- स्तौली च कुम्भभवनानि तदस्तनीचाः। नित्यांगना हरिमया मनुसारनीर- संख्यादिवाकरमुखादतितुङ्गनाथाः॥ ७१॥ मेष, तृष, मकर, कन्या, कर्क, मीन, तुला और कुम्भ ये सूर्या- दिकों के उच्च स्थान हैं। उनके सातवें २ भवन नीचसंज्ञक होते हैं। यानी, तुला, दृश्चिक, कर्क, मीन, मकर, कन्या और मेष ये सूर्यादिकों के नीच स्थान हैं। १०-३-२८-१५-५-२७-२० इन अंशों से मेपादि परमोच होते हैं। इन्हीं पूर्वोक अंंों से तुलादि परम नीच कहाते हैं ॥ ७१ ॥ * मूलत्रिकोणा हरितावुरक्रिया वधूधनुस्तौलिघटादिवाक- मूल त्रिकोण रात्। सितासितार्कांड्विरसां नखांशकास्त्रिकोणमादौ परतः स्वमन्दिरम्॥ ७२॥ सिंह, वृष, मेष, कन्या, धन, तुला और कुंभ ये मूर्य से मूलत्रिकाण होते हैं। शुक्र, शनि, सूर्य और गुरु के बीस अंश आदि में मूलत्रिकोण होकर पीछे से अपने घर को जाते हैं॥ ७२॥ वृषादिभागत्रयमुच्मिन्दोः मूलत्रिकोएं परतस्तु सर्वम्। मेषादिका द्वादशभागसंज्ञाः कुजस्य कोएं परतः शुभं स्यात्॥ दृषादि के तीन अंश चन्द्रमा का उच्च कहाता है। पीछे का सारा मूलत्रिको होता है। मेपादि के बारह अंश मङ्ज का मूलत्रिकोण होता है। पीछे का अपना घर होना है। ७३ ॥ कन्यार्धमुचं शशिजस्य कोणं दशांशका: स्वर्च्तफलं शरांशः। कुम्भस्त्रिकोएं फणिनायकस्य तुङ्ं नृयुग्मं रमणीगृहं स्यात्॥
- यदि बड़ी वारीकी से ध्यान देकर देखा जाय तो हस्त पर स्थित ग्रहों का झ़ुकाष तथा उनके अंश भी अनुमान कर बताये जाते हैं। इसी पर फिर केवल हाथ देखकर जन्मकुराडली बना लेना हस्तरेखाविशारद के लिए सरल हो जाता है। कुछ पाश्चात्य विद्वान् हस्तरेखाएँ देखकर नाम तक बता देते थे। फिर कुरडली बन जाने पर तो भविष्य बता देना सरल हो जाता है। इससे यह भी ज्ञात हो जाता है कि हस्तरेखा का सामुद्रक एवं ज्योतिषशास्त्र से वड़ा गूढ़ संबंध है। विपक्ष कहनेवालों के लिए यहाँ फिर जरा भी गुंजाइश नहीं रह जाती-संपादक। द्वितीय खराड कन्या का आधा बुध का उच्च होता है। दश अंश मूलत्रिकोगा होता है। पाँच अंश अपने राशिफल को देता है। कुम्भ राडु का मलत्रिकोण मिथुन उच्च तथा कन्या अपना घर कहाता है।। ७४॥ ग्रहों का फलविचार स्वोचे पूर्णं स्वर्ततकेद्धं सुहृद्धे पादं द्विड्भेऽल्पं शुभं खेचरेन्द्रः । नीचस्थायी नास्तगो वा न किंचिन्नूनं पादं स्वत्रिकोणे ददाति॥ अपने उच्च में बैठा हुआ ग्रह पूर्णफल देता है। अपनी राशि में स्थित आधा फल देता है। अपने मित्र के घर में चौथाई फल देता है। शत्रु के घर में थोड़ा फल देता है। नीच व अस्तंगत हुआ ग्रह कुछ फल नहीं देता। अपने मूलत्रिकोण में बैठा हुआ ग्रह चौथाई फल निश्चय देता है॥ ७५॥ ग्रहों का स्थानविशेप से चिफल सभानुरिन्दुः शशिजश्चतुर्थे गुरुः सुते भूमिसुतः कुटुम्बे। भृगुः सपत्ने रविजः कलत्रे विलग्नतस्ते विफला भवन्ति ७६ सूर्य समेत चन्द्र तथा बुध लग्न से चौथे में हों, गुरु पाँचवें घर में हो, मङल दूसरे में हो, शुक्र छठे में और शनि सातवें हो तो विफल होते हैं॥७६॥ बालाद्यवस्थाज्ञान बालाद्यवस्थाः क्रमशो ग्रहाणमोजे समे तद्विपरीतमाहुः । बाल: कुमारोजथ युवाच वृद्धो मृतो लवानामृतुभिः क्रमेण॥ वालाद्यवस्थानुगुएं त्रजन्ति तत्पाककाले दिननाथमुख्या:७७ विषम राशि में ग्रहों की क्रम से बालादि अवस्थाएँ होती हैं। सम राशियों में वे अवस्थाएँ उलटे क्रमसे हो जाती हैं। बाल, कुमार, युवा, दृद्ध और मृत ये अवस्थाएँ छः अंशों से विषम राशियों में क्रम से होती हैं। मृत, दृद्ध, युवा, कुमार और बाल इस क्रम से सम राशियों में कहाते हैं। इसलिए सूर्यादि ग्रह उक्र अवस्थाओं के पाककाल में बालादि अवस्थाओं के अनुरूप (समान) फल देते हैं॥ ७७॥ रंव्यादिग्रहों का स्व्ररूप प्रतापशाली चतुरस्रदेहः श्यामारुणाङ्गो मधुपिङ्गलाक्षः। पित्तात्मकः स्वल्पकचाभिरामो दिवाकरः सत्त्वगुणप्रधान:७८ सामुद्रकशास्त् सर्य प्रतापशाली, चौकोण देहवाला, काला तथा लाल अंगवाला, शहद के रंग के पिंगल नयनोंवाला, पित्त स्त्रभावयुक्क और थोड़े बालोंवाला और सतोगुखपधान होता है॥ ७८ ॥ चन्द्रस्व्ररूप संचारशीलो मृदुवाक् विवेकी शुभेक्षणश्चारुतरः स्थिराङ्गः। सदैव धीमांस्तनुवृत्तकायः कफानिलात्मा च सुधाकरः स्यात्॥ चन्द्र संचारशाली, कोमल वाग्विलासा, विचेकी, शोभन दृष्टिवाला, बढ़े सुन्दर तथा पुष्ट अंगवाला, सदा बुद्धिमान, छोटे गाल आकारवाला, कफ व वात प्रकतिवाला होता है।। ७६।। भौमस्वरूप पित्तात्मक: सुचपलः कृशमध्यदेशः। संरक्तगौररुचिरावयवः प्रतापी कामी तमोगुणरतस्तु धराकुमारः ॥८० ॥ मङ्ज् क्रृदृष्टिवाला, तरुणमूर्तिधारी, उदारशील, पित्तपकृतिवाला, महाचपल, त्ीय कटिवाला, लाल एवं गोरे अंगोंवाला, कामी तथा प्रतापी और तमोगुख में रत होता है॥ ८० । बुधस्व्ररूप दूर्वादलद्युतितनु: स्फुटवाक् कृशाङ्ग: स्वामी रजोगुणवतामतिहासलोलः । हानिप्रियो विपुलवित्तकफानिलात्मा सदः प्रतापविभवः शशिजश्च विद्वान् ॥ ८१॥ बुध दूर्बादल के समान शरीश्वाला, साफ़ वाखी बोलनेवाला, दुबले शरीर का, रजोगुखवालों का स्वामी, हँसने में चपल, हानि करनेवाला, महाधनी, कफी, बादी, वैमव तथा प्रतापशाली और विद्वान् होता है।।८१।।
- मनुष्य के भिन्न २ प्रकार के स्वभाव बना देने में उपयुक्त ज्ञान बड़ा सहायक होता है। अतएय यह ध्यान से पढ़ना चाहिए-संपादक। द्वितीयखरड गुरुस्वरूप बृहदुदरशरीरः पीतवर्ण: कफात्मा सकलगुणसमेतः सर्वशास्त्राधिकारी। कपिलरुचिकचाक्षः सातत्विकोतीव धीमान् अलघुनृपतिचिह्नश्रीधरो देवमन्त्री ॥८२ ॥ गुरु महोदर शरीराला, पीला, कफी, सर्वगुगायुक्र, सकलशास्त्राधिकारी, पीली आँखों तथा बालोंवाला, सतोगुखी, अत्यन्त बुद्धिमान्, अल्पराज- चिहवाला और शोभायुक् है।। ८२ ।। भृगुस्व रूप असितकुटिल केशः श्यामसौन्दर्यशाली समतररुचिराङ्ः सौम्यहक्कामशीलः । अतिपवनकफात्मा राजसश्रीनिधानः सुखवलसुगुणानामाकरश्चासुरेज्यः।।८३॥ शुक्र श्याम नथा घुँघराले केशवाला, श्यामतनुधारी, सौन्दर्यशाली, एवं सुन्दर अंगोंवाला, शोभन आँखोंवाला, कामी, अतिवादी, कफी, रजोगुख की शोभा का निधान, सुख-बल और गुण की ख़ान है ।। ८३ ।। शनिस्व रूप काठिन्यरोमावयवः कृशात्मा दूर्वासिताङ्गः कफमारुतात्मा। शनि कर्कश रोमों तथा अंरगोवाला, दुबला, काला, कफी, बादी, बड़े दाँतों- वाला, सुन्दर पीले नयनोंवाला, तमोगुफी और आलसी है#॥=४। ग्रह वध अर्करेरेण मन्दःशनिना महीसुतःकुजेन जीवो गुरुणा निशाकरः। सोम्येन शुक्रो सुरमन्त्रिण बुधो बुधेन चन्द्रः खलु वध्यतेसदा८५
- उपयुंक समस्त ग्रहों के स्वरूप का अचछी प्रकार ज्ञान आवश्यक है। यही फल हाथ देखकर कहना पड़ेगा। जितने परिमाश में अमुक ग्रह की स्थिति हाथ में दिख उसी परिमाण में फल कहना चाहिए।-संपादक, सामुद्रकशास्त्रं सूर्य से शनि, र्शान से मङ्गल, मङ्गल से गुरु, गुरु से चन्द्रमा, बुध से शुक्र, शुक्र से बुध और बुध से चन्द्र सदैव वध किया जाता है।। ८५ ॥ ग्रहों के मित्रादि मित्राणि भानो:कुजचन्द्रजीवाःशत्रू सितार्की शशिजःसमानः। चन्द्रस्य मित्रे दिननायकज्ञौ समा गुरुचमाजसितासिता:स्यु := ६ मङल, चन्द्रमा और गुरु सूर्य के मित्र हैं। शुक्र तथा शनि शत्रु हैं। बुध सम है। सूर्य एवं बुध चन्द्र के मित्र हैं; गुरु, मङ्गज्ञ, शुक्र और शनि शत्रु हैं॥=६॥ आरस्य मित्राणि रवीन्डुजीवाश्चान्द्रीरिपुःशुक्रशनी समानौ। सूर्यासुरेज्यौसुहदौ वुधस्य समाःशनीज्यावनिजास्त्वरीन्दु: ८७ सूर्य, चन्द्र एवं गुरु मङल के मित्र हैं। वरुध शत्रु है। शुक्रऔर शनि सम हैं। सूर्य तथा शुक्र बुध के मित्र हैं। शनि, गुरु एवं मङल सम हैं। चन्द्र बैरीहै॥८७। सूर्यारचन्द्राः सुहृदस्तु सूरेः शत्रू सितज्ञौ रविजः समानः। मित्रे शनिज्ञौ भृगुनन्दनस्येन्द्विनावरी जीवकुजौ समानौ दद सूर्य, महल और चन्द्र गुरु के मित्र हैं। शुक्र और बुध शत्रु हैं, और शनि सम (उदासीन) है। शनि तथा बुध शुक्र के मित्र हैं। चन्द्र तथा सूर्य शत्रु हैं। गुरु और मङ्गल सम हैं॥८८ ॥ मन्दस्य सूर्येंनदुकुजाश्च शत्रवःसमः सुरेज्यः सुहदौ सितेन्दुजौ। तत्कालनैसर्गिकतश्च पञ्चधा पुनःप्रकल्प्यास्त्वतिमित्रशत्रवः।। सूर्य, चन्द्र और मशल शनि के शत्रु हैं। गुरु सप (उदासीन) हैं। शुक्र और वुध मित्र हैं। तात्कालिक नैसर्गिक मित्रता से अतिमित्र एवं अतिशत्रु पाँच प्कार कहना चाहिए #॥ ८६ ॥ स्थिरादिसंज्ञा रवि: स्थिरः शीतकरश्चरः स्यादुग्रः कुजश्चन्द्रसुतस्तु मिश्रः। मृदुः सुरेज्यो भृगुजो लघुश्च शनिस्तु तीचणःकथितो मुनीन्द्रैः
- ग्रहों की परस्पर मैत्री भी बड़ी विचित्र तथा जानने योग्य बात हैं। आप जब हाथ में किसी ग्रह को दूसरे ग्रह की ओर झुका देखेंगे, तब उसके मैत्री भाव अथवा वैर भाव का फल कहना पड़ेगा।-संपादक द्वितीयखरड सूर्य स्थिर, चन्द्र चर, मङल उग्र, बुध मिश्र, गुरु मृद्ु, शुक्र लघु और शनि तीच्यसंज्ञक है॥ ६० ॥ ग्रहों का ईक्षय पादेक्षणं भवति सोदरमानराश्योरर्ध त्रिकोणयुगलेखिल- खेचराणाम्। पादोनदृष्टिनिचयश्चतुरस्रयुग्मे सम्पूर्णदग्बल- मनङ्गगृहे वदन्ति ॥ ६१ ॥ तीसरी एवं दसवीं राशि में समस्त ग्रहों की पाददृष्टि होती है। पाँचवें एवं नवें अर्दृष्टि होती है। चौथे एवं आठवें पादोनदृष्टि कहानी है, और सातवें घर में संपूर्ण दृष्टि होती है।। ६१ ।। शनिरतिबलशाली पाददृग्वीययोगे सुरकुलपतिमन्त्री कोणदष्टौ शुभः स्यात्। त्रितयचरणदष्ट्या भूकुमारः समर्थ: सकलगगनवासाः सप्मे दग्बलाढ्याः॥ ६२॥ पाददृष्टि बल के योग में शनि अतिबलशाली होता है। कोखृष्टि में गुरु शुभदायक है। तीन चरण की दृष्टि से मङ्ल समर्थ होता है। संपूर्ण ग्रह सातवें घर में दृष्टिपल से संपत्र रहते हैं ॥ ६२ ॥ अथोर्ध्वदृष्टी दिननाथभौमौ दृष्टिः कटाक्षेण कवीन्दुसून्वोः । सूर्य एवं महल दोनों ऊर्ध्वदृष्टिवाले हैं। शुक्र एवं बुध वटान्ष (नेत्रों की कोर से) दृष्टि रखते हैं। चन्द्र एवं गुरु दोनों सम दृष्टिवाले हैं। राड्डु एवं शनि की दृष्टि नीचे रहती है । ६३ ।। रव्यादिग्रहों से फलविचार सूर्यादात्मपितृ प्रभावनिरुजाशक्किश्रियश्चिन्तये- च्ेतोबुद्धिनृपप्रसादजननी संपत्करश्चन्द्रमाः । सत्त्वं रोगगुणानुजावनिसुताव्ज्ञातीन्धरासूनुना विद्याबन्धुविवेकमातुलसुहृद्धाकर्मकृद्बोधनः ॥ ६४ ।। सामुद्रकशास्त्न आत्मा एवं पिता का प्रभाव, नैरोग्य, शक्कि और संपत्ति या शोभा को मूर्य से विचारे। मन, बुद्धि, राजा की मसन्नना, माता और संपदा को चन्द्र से विचारे। बल, रोग, गुगा, भाई,भूमि,पुत्र और कुदुम्चको मङल से विचारे। विद्या, चन्धु,वितेक, मामा, मित्र और वाक्कर्मको बुध से वि चारना चाहिए।।ह४।। प्रज्ञावित्तशरीरपुष्टितनयज्ञानानि वागीश्वरा- त्पत्नीवाहनभूषणानि मदनव्यापारसौख्यं भृगो: । स्पेणैव पितामहन्तु शिखिना मातामहं चिन्तयेत्६५ प्रज्ञा, धन, तनुपुष्टि, पुत्र और ज्ञान को गुरुसे विचारे। पत्री, वाइन, आभू- पणा, कामकेलि, रोजगार और सौख्य को शुक्र से विचारे। आयु, जीवन, मरणकारख, सम्पत्ति और विपत्ति का दाता शनि है। बाबा का राडु से और नाना का केतु से विचार करे॥ ६५ ॥ कारक द्युमणिरमरमन्त्री भूसुतः सोमसौम्यौ गरुरिनत नयारौ भार्गवो भानुपुत्रः । दिन करदिविजेड्यौजीवभानुज्ञमन्दाः सुरगुरुरिनसूनुः कारकाः स्युर्विलग्नात्॥ ६ ६ ।। सूर्य तनुकारक, गुरु धनकारक, मङल सहजकारक, सोम एवं बुध सुख- कारक, गुरु पुत्रकारक, शनि एमङल शत्रुकारक, शुक्र स्रीकारक, शनि मृत्युकारक, सूर्य एवं गुरु धर्मकारक, गुरु, सूर्ग, चुध एवं शनि राजकारक, गुरु लाभकारक और शनि व्ययकारफ है। ये लग्न से कारक होते हैं ।। ६ ६ ।।*
- विध्ञान की दृष्टि से तथा आयुर्वेद की दष्टि से भी यह सिद्ध हो चुका है कि हाथ शगीर में प्रधान है। तथा उस पर स्थित रखाओं एवं प्रहादिकों का यथार्थ में मनुष्य के सस्तिष्क देश से धनिष्ठ संबंध है और मस्तिष्क से धारा तथा विद्युस्संचार हाथों की उँगलियों की ओर होता है और साथ ही ज्ञानकेन्द्र से विनाग्प्रवाह का सम्मिश्रण होने से हाथ पर रखाएँ तथा ग्रहों की स्थिति है। ग्रहों का पूर्ण ज्ञान होने से उन पर स्थित रेखाओं का फल कहने में सहलिपन होती है। सम्पादक। द्वितीयखयड अरिष्टदायक कामावनीनन्दनराशिजाताः सितेन्दुपुत्रामरवन्दमानाः। रिष्टदास्तेखिलजातकेषु सदाष्टमस्थःशनिरिष्टदःस्यात्॥।६७। सातवें घर में मेप, वश्चिक राशि में शुक्र, बुध और गुरु हों तो समस्त जातकों में अरिष्टदायक कहाते हैं। अष्टम शनि सदैव अभीष्टदायक है।६७।। ग्रहों का शुभाशुभविचार आकृत्यो २२ जिन २४ संमिता गजकरा २८ नेत्राग्नयः ३२ पोडश १६ तत्त्वा २५ न्यङ्गगुण ३६ द्विवेद ४२ प्रमिता: सूर्यादिकानां समाः। यः खेटः स्वग्ृहे स्वतुङ्गभवने पड्वर्ग- शुद्धश्च यस्तस्याब्दे हि नृणां भवेदतिसुखं भाग्योदयं निश्चितम् ॥ ६८ ॥ मूर्य २२ वर्ष में फल देता है। चन्द्रमा २४ में, मङ्गत् २= में, बुध ३२ में, गुरु १६ में, शुक्र २५ में, शनि ३६ में, राहु ४२ में और केतु ४८ वर्ष में फल देता है। जो ग्रह अपने घर एवं अपने उच्च में बैठा हो और जो ग्रह पद्वर्ग से शुद्ध हो उसी के वर्ष में मनुष्यों को निश्य सुख और भाग्योदय होता है।। ३८ ॥ ग्रहणमरिष्टहर राहुदोपं बुधो हन्यादुभयोस्तु शनेश्चरः। त्रयाणां भूमिजो हन्ति चतुर्णां दानवार्चितः ॥ ६६ै ॥ पञ्चानां देवमन्त्री च पराणां दोषं तु चन्द्रमाः । सप्तदोषं रविर्हन्याद्विशेपादुत्तरायणे॥ १००॥ बुध राहुदोप को विनाशता है। शनि दोनों के दोपों को हरता है। महल चारों के दोपों को हरता है। गुरु पाँचों के दोपों को विनाशता है। चन्द्र छः ग्रहों के दोपों को हरता है। सूर्य सातों ग्रहों के दोपों को विनाशता है। परन्तु उत्तरायगा में विशेषतः सातो ग्रहों के दोपों को हरता है॥ ६६-१०० ॥ रव्यादिकृत कष्ट नृपालदेवावनिदेव किङ्करैः करोति चित्तव्यसनं दिवा करः॥१॥ अग्निरोग, ज्वरवृद्धि, ज्वरदीपन, क्षय एवं अतीसार आदि रोगों से तथा राजा, देवता, व्राह्मण और किंकरों द्वारा सूर्य सदा चित्त में दोप को करता है॥ १ ॥ पायडुदोषजलदोषकामलापीनसादिरमणीकतामयैः । चन्द्रकृतरोग कालिकासुरसुवासिनीगणैराकुलं च कुरुते तु चन्द्रमाः ॥२।। पाएडुदोप, जलदोष, कामला, पीनस आदि रोग एवं नारियों द्वारा उत्पन्न रोग कालिका, देवता और सुवासिनीगणों से चन्द्र मनुष्य को ष्याकुल करता है॥ २ । मङलकृतदोप वीरशैवगणभैरवादिभिर्भीतिमाशु कुरुते धरासुतः॥ ३ ॥ स्थूलता, बीजदोप, कफ, इथियार, अग्नि एवं गिलटियों से उपजे रोग, घाव एवं दरिद्र से पैदा हुए रोग, वीरगण, शैवगण एवं मैरवादिगणों द्वारा मङ्गल-भय उत्पन्न करता है॥ ३ ॥ बुधकृतदोष गुह्योदरादृश्यसमीरकुष्ठं मन्दाग्निशूलग्रहणीरुगादयैः। बुधादिविष्णुप्रियदासभूतैरतीवदुःखं शशिजः करोति।।४।। गुदा, उदर, दृष्टि, बात, कुष्ट, मन्दाग्नि, शूल, संग्रहणी आदि रोग तथा बुधादि विष्णु के पियदास प्राणियों से बुध अत्यन्त दुःख को करता है॥ ४ ॥ गुरुभृगुकृत दुःख आचार्यदेवगुरुभूसुरशापदोषैः शोकं च गुल्मरुजमिन्द्रगुरु: करोति। द्वितीयखरड कान्ताविकारजनिमेहरुगासुरादै: आचार्य, देवता, गुरु और ब्राह्मणों द्वारा दिये शाप-दोपों से गुरु शोक और गुल्म रोग उत्पन्न करता है। तथा ख्रिरयों के विकारों से उत्पन्न म्रमेह- रोग एवं असुरादिकों व अपनी चाही अङ्गनाओं के दोपों से शुक्र भय उपजाता है॥ ५ ॥ शनिकेतुकृतदुःख दारिद्र् यदोपनिजकर्मपिशाचचौरे: क्रेशं करोति रविजः सहसन्धिरोगैः । कराडूमसूरिरिपुकत्रिम कर्मरोगैः स्वाचारहीनलघुजातिगषैश्र केतुः॥ ६ ॥ दारिद्रधदोप, अपने कर्म, पिशाच, चोर और सन्धिरोगों से शनि क्लेश उत्पन्न करता है। खाज, मसूरिका, शत्रु, कृत्रिम कर्मरोग और आचार- हीन छोटी जातिवालों द्वारा केतु कष्ट उत्पन्न करता है। ६ ॥ राहुकृतदोप उद्बन्धनाचारुचि कुष्ठरोगै विधुन्तुदश्चातिभयं नराणाम्।।७।। अपस्मार (मिरगी), मसूरिका, रज्जु, नुद् (छ्ींक या नुधा), दृष्टि- रोग, कीड़े, प्रेत, पिशाच, भूत, उद्बन्धन, अरुचि और कुप्ररोगों से राड मनुष्यों को बड़ा भय करता है।। ७ ॥ पुत्र लाभार्थ उपाय हरिवंशो रविणा शशी त्रिपुरहा भौमे च रुद्री क्रिया सौम्ये सम्पुटचसिडका च विधिवजीवे च पैत्री तिथिः । शुक्े गोप्रतिपालनं च कथितं मन्दे च मृत्युञ्जयः कन्यादानभुजङ्गकेतुकपिलासन्तानसौख्यप्रदा ॥८॥ जो पुत्र के लिए सूर्य अरिष्टठदायक हो तो हरिवंश का श्रवण करै चन्द्रमा अरिष्टडायक हो तो महादेव का आराधन करे। मङ्गल अरिष्टदायक सामुद्रकशाख हो तो रुद्राभिपेक की क्रिया करे। बुध अरिष्टदायक हो तो विधान से संपुट चएडी का आराधन करैं। बृहस्पति अरिष्टदायक हो तो पितरों की तिथि में आमान्नदान करे। शुक्र अग्ष्विदायक हो तो गौओं का प्रतिपालन करे। शनि अरिष्टदायक हो तो मृत्युञ्जय का आराधन करे। राडु अरिष्ट- दायक हो तो कन्यादान करे, और जो केतु अग्ष्विदायक हो तो संतान- सौख्यदायिका कपिला गौ का दान करे॥ ८ ॥ आाध्यन्तमध्यफलदायक इलातनूजश्र पतिर्नलिन्याः प्रवेशकाले फलदः किल स्यात्। राश्यर्धभोगे भृगुजामरेज्यौप्रान्तेशनीन्दू च सदेन्दुसूनु:॥६॥ महल और सूर्य प्रवेशकाल में फलदायक होते हैं। शुक्र एवं गुरु मध्य में फलदायक होते हैं। शनि एवं चन्द्र छांत में फलदायक होते हैं। बुध सदैव ही फल देता है ।। ₹।। यद्धातुकोपजनिताखिलरोगशान्त्यै तन्नाथमाशु जपतर्पेणहोमदानैः । संपूज्य रोगभयशोकविमुक्कचिन्ताः सर्वे नराः सुखयशोबलशालिनः स्युः॥१० ॥ जिन ग्रहों के धातुकोप से अखिल रोग उपजे हों उनकी शान्ति-के लिए जय, तर्पख, होम और दानों से उनके स्वामी को भलीभाँति पूजन करे तो मनुष्य रोग, भय और शोकत्रिमुक् होते तथा सुखी, यशस्वी और चल- शाली होने हैं ॥ १० ॥ इति जातकपारिजाते ग्रहस्त्ररूपादि: । करतलदिग्ज्ञान यत्र चाङ्ुलयः सन्ति तां दिशं विद्धि पूर्विकाम्। यत्रास्ति मणिबन्धोहिपश्चिमांबिद्धि तांदिशम् ॥११॥ वृद्धाङ्कुलिस्तु यत्रास्ति चोत्तरां विद्धि तां दिशम् । क्षपाकरस्तु यत्रास्ति तां दिशं दक्िणां विद्ुः ॥ १२ ।। जहाँ अमुलियाँ रहती हैं-उसे पूर्व दिशा जानिए। जहाँ मणिबन्ध (कब्ज़ा) द्वितीयखरांड है उसे पश्चिम जानिए। जहाँ अँगूठा है उसे उत्तर दिशा जानिए। और जहाँ चन्द्रमा रहता है उसे दत्तिण कहा है ॥ ११-१२।। फलों का तारतम्य यत्र यत्र स्थितः खेटस्तत्रस्थोऽपि यदा भवेत्। तदा शुभं फलं वाच्यमित्युक्कं गणकोत्तमैः॥१३॥ ये ग्रहा दच्िणस्थाः स्युस्ते यदा चोत्तरे स्थिताः । ये ग्रहा: पूर्वभागस्थास्ते यदा पश्चिमांगताः ॥१४।। तदा फलं ग्रहा: सर्वे विपरीतं दिशन्ति वै। तारतम्यं फलस्यैवं विज्ञेयं विदुषां प्रिये ॥ १५ ॥ अहो मिये ! करतल में जहाँ जहाँ ग्रह बैठे हैं वहीं यदि टिके रहें तो शुभ फल कहना चाहिए। जो ग्रह दत्षिण तरफ़ टिके हों वे यदि उत्तर में बैठे हों और जो अ्रह पूर्वभाग में बैठे हों वे यदि पश्चिम में चले जावें तो समस्त ग्रह विपरीत फल को देते हैं। इस भाँति फलों का तारतम्य जाननन चाहिए॥। १३-१५ ॥+ करतल में रेखाज्ञान सोम्यादधस्तिष्ठति या सुरेखा संपूर्णरूपा यदि मध्यमान्ता। आयुष्यरेखां कवयः कुवन्ति संभोगरेखां प्रवदन्ति चान्ये॥१६।। बुध ग्रह के नीचे जो रेखा है वह यदि मध्यमा पर्यन्त चली गई हो तो उसे आयुरेखा कहा है। मतान्तर में अन्य लोग उसे संभोगरेखा कहते हैं ॥ १६ ॥ आयुष्यरेखातलगास्ति रेखा तां मातृरेखां कथयन्ति धीराः।
- शास्त्रों में लिता है "कराग्रे वसते लक्षमीः करमध्पे सरस्वती। करमूले स्थितो व्रह्माऽतः प्रातः करदर्शनम्॥ संपा०।
- अथवा जो ग्रह जिसकी ओर झुका है उसी के अनुसार उसका स्वभाव फलादि बदल जायँगे। इसलिए परस्पर मैत्रीभाव का ज्ञान आचश्यक है। -संपादक सामुद्रकशासं तस्यास्त्वधस्तिष्ठति पितृरेखा तां केपि सन्तो विवदन्ति चायुः ॥१७॥ आयुरेखा के नीचे की रेखा को मातृरेखा कहा है तथा उसके नीचे पितृरेखा रहती है। उसे भी अ्रनेक विद्वानों ने आयुरेखा बताया है॥१७॥ मध्यांगता या मणिबन्धनोत्था रखा यदा पाणितले विभाति। तामूर्ध्वरेखां सुधियो भणन्ति साम्राज्यदात्री धनधान्यदां च।१८॥। यदि करतल में मशिबन्ध (कब्ज़े) से उठी रेखा मध्यमा पर्यन्त पहुँचे तो उसे सामुद्रकवेत्तागणों ने ऊर्ध्वरेखा ( भाग्यरेखा) कहा है। यह धन धान्य एवं साम्राज्य देती है ॥ := ॥ कुजान्तिकं या प्रतिभाति रेखा समागता सा मणिवन्धनान्तम्। ददाति वित्तं परपूरुषाणामतः परस्वाप्तिरियं प्रसिद्धा ॥ १६ ॥ मङल के समीप की रेखा यदि कब्ज़े तक नली आवे तो पराया धन प्राप्त होता है। इसलिये "परस्वाप्ि" नाप से प्रसिद्ध है ॥१६ । देखो चि न. ६ करतलभग्नरेखा भग्ना यदा स्यात्परमायुरेखा हासं प्रयायान्मनुजस्य चायुः। भग्न आयुरेखा अल्प आयु की द्ोतक है। यदि मातूरेखा भग्न या कटी सा प्रतीत हो तो ऐसे व्यक्ति का पायः अपपान हुआ करता है॥ २०॥ पितुः सुरेखा यदि कर्तिता स्यान्तदा पितानाशमुपैति नूनम्। यदा भवेद्धिन्नतमस्वरूपा भयं भवेनाततन सुगाढम् ॥ २१ ॥ यदि पिता की रेख्ा कटी सी प्रतीत हो तो पिता का नाश होता है। यदि पूर्वाक् रखा भिन्नरूप हो तो पिता के शगर को बड़ा भय होना है।२१॥ द्वितीय खएड संभिन्नरूपा यदि भाग्यरेखा भाग्यस्य हासं मनुजः प्रयाति। भग्ना यदा स्यात्परस्वासतिरेखा नो पारवित्तं लभते मनुष्य: २२ मिन्नरूप भाग्यरेखा वाला अल्प भाग्य पाता है। यदि परस्वाप्तिरेखा कटी हो तो पराया धन नहीं पाता॥ २२॥ देखो चि. नं.८ करनल में परमायुरेखादिफल पितुः सुरेखां परमायुरेखां शताब्दसंख्याकृतमानयुक्काम्। श्रुतिप्रमाएं हृदये निधाय वदन्ति विप्रा बहुशास्त्रविज्ञाः।२३।। अनेकानेक शास्त्रों के विज्ञाता बुद्धिमान् लोग पितृरेखा (मतान्तर में आयुरेखा) को सौ वर्ष की संख्या से विभाजित करते हैं ॥ २३॥ आायुष्यरेखा यवमात्रभागं काष्ठाव्दसंज्ञं प्रवदन्ति सन्तः । तन्मानतः स्यानुवयोविभागे कष्टादिकं चेति समूहनीयम् २४ आयुरेखा के यवमात्रभाग को दश वर्ष की संज्ञावाला कहते हैं। इसी पमाख से अवस्था के विभाग होते हैं। इसी प्रकार समस्त रेखाओं में विचार करना चाहिए। अर्थात् एक जौमर आयुरेखा दश वर्ष की होती है। इसी प्रमारण से जहाँ जहाँ रेखा कटी हो वहाँ वहाँ पीढ़ा आदि का विचार करे॥ २४॥ मातुःसुरेखा मिलिता यदा स्यान्नो जारजातं मुनयो वदन्ति। पित्रा वियुक्का यदि मातृरेखा जारोद्धवं तं मनुजं करोति॥२ ५॥ करतल में यदि मातृरेखा पितृरेखा से मिली हो तो उसे जारजात नहीं कहते। यदि मातृरेखा पिता की रेखा से जुदी हो तो उसेजारजात करती है। अथवा पिता माता में जुदाई रहती है, ऐसा फल कहना चाहिये॥ २५॥ संभोगरेखा बहुकर्तिता चेत्पूर्वोक्कमानेन विचारणीया। तस्यास्त्वधस्तिष्ठति बालभावस्ततो ह्यधो यौवनमेव ज्ञेयम् २६ यदि संभोगरेखा अनेक स्थलों में कटी हो तो पुर्वाक़ मान से यानी इस विषय पर हम इस पुस्तक के प्रथम खगड्ड में अच्छी नग्ह समझा कर लिख् आये हैं। अधिक जानने के लिए कृपया उसे पढ़िए। -- संपादक। सामुद्रकशास दश वर्ष के हिसाव से फल को विचारना चाहिए। उसके नीचे बालभाव (बालपन) रहता है। उसके नीचे यौवन जानना चाहिए ॥ २६॥ * तस्मादघस्तिष्ठति वृद्धभावो नो भिन्नरूपो नहि कर्तितः स्यात्। तत्तत्मुकाले शुभदो जनानामेवं बुधैः सर्वफलं विचिन्त्यम् २७ उसके जीचे बुहापा रहता है जो भिन्नरूप एवं कटा हुआ न हो तो अपने अपने समय में मनुष्यों को शुभदायक होता है॥ २७।देखोचिन नं: (て) अंग्रेजिमतानुसार जन्मवारमासादिज्ञान सुतर्जनी निम्नतलाचलन्ती रेखा गभीरा मणिबन्धमेति। तां वै सुपैत्रीं प्रवदन्ति सन्तो ह्यायुष्यरेखां कथयन्ति केऽपि२८ तर्जनी के निचले भाग से चली गहरी रेखा यदि मणिबन्ध के पास पहुँचे तो उसे पैत्रीरेखा कहा है। कुछ अंगरेज़ विद्वान् उसे आयुष्य रेखा (लाइफ़लाइन) मी कहते हैं॥ २८ ॥ तन्निम्नदेशाचलिता गभीरा रेखा यदा चन्द्रमसं प्रयाति। तां मातृकांवै प्रवदन्ति प्राज्ञा विज्ञा महान्तो नितरामुदारा:२६ पैत्रीरेखा के निचले देश से गहरी रेखा यदि चन्द्रालयपर्यन्त जावे तो उसे मातृरेखा (हेडलाइन) कहा है ॥ २६ ॥ एषा सुरेखा खलु दर्शनीया कुत्र स्थले वै गमनं करोति। तदन्तिके चेत्कति सन्ति वज्राश्चिन्ना न भिन्ना बहुरेखिकाभिः। निश्चयकर यह मातृरेखा किस स्थल में गमन करती है, उसके समीपवर्ती कितने वज्जाकार चिह्न प्रतीत होते हैं, और यदि वे बहुतसी रेखाओं से छित-भिन्न पतीन न हों तो वच्यमाण जन्म बारादि कहना चाहिए॥३०। समयनिएय हस्तरेखा-विज्ञान में बड़ी भारी चीज़ है। किसी भी घटना का उल्लेख करने के साथ ही उसका समय बताना अत्यावश्यक होता है। समय-क्रम में प्रायः सभी आचार्यों के विभिन्न मत है। यही एक ऐसी बात है, जो हस्नरेखाविशारद्र को हाथ देखते-देखते प्राक्टिस करते रहने पर अच्छी तरह आ जाती है। इसमें ज़रा सावधानी से काम लेना चाहिए। अन्यथा कुछ का कुछ बना देने से परिगाम में भयंकरना उपस्थित हो सकनी है। -- संपादक। रखास्वरूपं सकलं विचार्य ध्यात्वा सुदेवं गणपं गुरुंच। वारं वदेदै जनुषो विपश्चिद् प्रयात्सुमासंतु तथा तिर्थींश्च ३१ देवाधिप गणनायक और गुरुदेव का ध्यान कर और रेखा का समस्त विचार कर विद्ान् को बार, महीना एवं तिथि (तारीख) बताना चाहिए॥३१॥ -पैत्रीसमुस्था विशदा गभीरा मात्री सुरेखा शशिन समेति। तत्रस्थले चेत्खलु चैक्वञ्रं ज्येष्ठं सजूनं प्रवदेत्मसोमम् ॥३२॥ पैत्रीरेखा से उठी साफ़ सुथरी व गहगी मात्रीरेखा यदि चन्द्रालयपर्यन्त गई हो और यदि उसी स्थान में एक वज्राकार निशान हो तो ज्येप्टुमास अथवा चन्द्रवार समेत जूनमास कहना चाहिए ॥ ३२ ।। वञ्रैकचिह्ने विशदे प्रयाते दिनानि ब्रूयाद्दशसंख्यकानि। वञ्रदये चेत्खलु विंशकानि वज्रत्रये स्युःसति त्रिशकानि ३३ यदि शुद्धरूप एकही वज्राकार चिह्न हो तो दश दिन, दो वज्र हों तो बीस दिन एवं तीन वज्र हों तो तीस दिन कहना चाहिए। ३३॥ मात्रीसुरेखा विशदा गभीरा भौमालयं चेद्गजते यदा तु। आक्टूबरं चैव तथा सुमार्च ब्रूयात्सुमासं सह भौमवारम् ३४ यदि साफ़ सुथरी व गहरी मात्रीरेखा मंगलालय पर्यन्त जावे तो भौमवार समेत आक्यूपर या मार्च मास कहना ॥ ३४ ॥ सौम्यालयान्तंयदि याति मात्री रेखा गभीरा विशदस्वरूपा। आगस्टमासं सबुधं मयं वा ब्रूयान्न वज्राः खलु चेद्विभिन्नाः ३५ साफ़ सुथरी व गहरी मातृरेखा यदि बुधालय पर्यन्त जाने और यदि वज्राकार चिह्न भिन्न हो तो बुधवार सनेत आगस्टमास या मई मास कहना चाहिए॥ ३५ ॥ मात्रीसुरेखा विशदाऽविभिन्ना गंभीररूपा धिषगं प्रयाति। नवम्बरं वा खलु फ़ेत्रुआरिं बृहस्पति वारमुदाहरन्ति॥ ३६॥ यदि साफ़ सुथरी एवं गहरी मातृरेखा अन्य रेखाओं से न कटे और बृहस्पति स्थान पर्यन्त पहुँचे तो गुरुवार समेत नवम्बर मास या फरवरा मास जानना३६।। सामुद्रकशास्त रखा जनन्या विशदस्वरूपा शुक्रालयं याति गभीररूपा। एपेलमासं भृगुवासराळ्यं सेप्टेम्वरं वापवदन्ति विज्ञाः॥३७। साफ़ सुथरी एवं गहरी मातूरेखा यदि शुक्रालय पर्यन्त जावे तो शुक्रवार समेन अपरैल माम या सितम्बरमास कहना चाहिए। ३७।। धात्रीसुरेखा धवलस्वरूपा मन्दालयस्याभिमुखं प्रयाति। डिसेम्वरंवा खलु जानुवारिं सूरात्मजं वै कथयन्ति घस्रम् ३८ यदि स्पष्ट मात्रीरेंखा शन्यालय पर्यन्त जावे तो शनिवार समेत दिसम्बर या जनवरी मास कहना ॥ ३८ ॥ धात्रीमुरेखा विशदस्दरूपा सूरालयस्याभिमुखं पयाति। जौलाइमासं रविवासरात्यं वदन्ति विज्ञा वदतां वरेएयाः॥३६॥ यदि उज्ज्बल मात्रीरेखा सूर्याल्य के सामने आवेतो रविवार समेत जुलाईमास जानना ॥। ३६ै ॥ मासदयं चेत्कथितं तु यत्र कर्थ विचार्य विद्ठुपा च तत्र। एपा सुरेखा विशदा यदा स्यादाद्योहि मासो भणितः सुधीभिः॥ जिस स्थान में दो मास कहे गये हैं वहाँपर कैसे विचारना चाहिए, यह बेताते हैं। यदि यह पूर्वाक् उज्ज्वल मात्रीरेखा हो तो पहला मास कहना चाहिए॥ ४० ॥ रेखा सुमात्री मलिना यदा चेन्मासो द्वितीयो विद्ुषा विचार्यः। एपा यदा चन्द्रममं प्रयाति मातुः स्वरूपं लभते हि पराणी ४१ यदि मात्रीरंखा मैली हो नो दूमरा मास फहना चाहिए। यदि पूर्वोक़ मात्रीरेखा चन्द्रालयपर्यन्न जावे तो वह माना का स्वरूप पाता है ॥ ४१। रका मुमात्री धवलस्वरूपा रेखा गभीग समुपेति सूरम्। वप्रम्वरूपं भजने हि जन्तुर्जाज्वल्यमानो जडताविहीन: ४२ यदि मात्ररेखा लाल, उजली तथा गहगी हो और सूर्यालय पर्यन्त जावे १ शन्यालयाभिमुगम। तो वह बुद्धिशाली तथा निजतेज से प्रकाशित होता और पिता का रूप पाता है॥ ४२।। तिस्र: सुरेखा मणिबन्धसंस्था एकैकशश्चेत्खलु त्रिंशदब्दम्। वयःक्रमं वै मुनयो वदन्ति संकीर्तिताश्चेत्खलु चोनत्रिंशत्४३ मशिबन्ध में जो तीन रेखाएँ हों उनमें से प्रत्येक रेखा का वयःक्रम तीस- तीस वर्ष का है। यदि पू्वोक़ तीनों रेखाएँ कटी प्रतीत हों तो उनतीस वर्ष का चयःक्रम जानना चाहिए। ४३॥ महाराष्ट्रों के मत से करतलफल सुकोमलं पाणितलं च यस्य नरो भवेत्कामिजनप्रधानः । कलाप्रवीण: कलहेन हीनःकान्ताविलासी कमनीयकायः ४४ जिसकी हथेली बहुतहां कोमल हो वह कामी जनों में मुख्य, कलाचतुर, एवं कलश्हीन, कान्ताविलासी और सुन्दर शरीरवाला होता है॥ ४४ ॥ कठोरकं पाणितलं च यस्य नरो भवेत्कार्यकरो वलाढ्यः । परिश्रमासक्रमना मनस्वी मन्दो मदातो ममतासमेतः।।४५। जिसका हस्ततल कठोर हो वह कार्यकारी व बलो, परिश्रमी, मनमौजी, मूर्ख तथा मदार्त और ममतासंपन्न हेता है॥। ४५॥ यदा महत्योऽङ्गुलयो हि सन्ति मनुष्यपाणेस्तु तलान्तदानीम्। सोडयं जनः शिल्परतः कलाव्यःकुशाग्रबुद्धि: कृतकृत्यकःस्यात् इथेली से यदि अंगुलियाँ बड़ी हों तो वह मनुष्य कारीगरी में रत, कलायुक्, कुशाग्रबुद्धिवाला और कृतकृत्य कहलाता है॥ ४६ ॥* मनुष्यपाणेस्तु तलाद्यदानीं करस्य शाखाः खलु सन्ति हस्वाः। सोयं नरः संसृतिलाभकारी वाल्ये स्ववृत्तं नितरां प्रवेत्ति ४७ यदि करतल से अंगुलियाँ छोटी हों तो दुनिया का लाभ उठाता है, और वाल्यावस्था में ही अपनी हालन समझने लगता है॥ ४७ ॥+ संत्तेपतः सपविधा हि सन्ति नारीनराणां कथिता: कराश्च। आद्यो हि मुख्यो मुनिसम्मतोपि तथा द्वितीयः श्रुतिकोणयुक्: . Mnterinl Life. + Renl Life. सामुद्रकशास्त्न स्त्री पुरुपों के हाथ संच्ेप से सात प्रकार के कहे हैं। उनमें से पहला मुख्य कहा जाता है। उसी प्रकार दूसरा चौकोण कहलाता है॥। ४८ ॥ वक्रस्तृतीयो भणितो हि शास्त्रे कोटिस्वरूप: कथितश्चतुर्थः । कोएस्वरूप:शरसंमितश्च ज्यौतिष्यरूपः खलु पष्ठकोयम्४६॥ तीसरा टेदेरुपवाला कहाता हैं। चौथा नोकीला, पाँचनाँ कोनीला और छठ
स्त्रीपद्तललक्षण (Part 5)
ज्यौतिष्यरूप कहा है।। ४६ै ।। प्रोक्क: पुराणैः खलु सतमश्च मिश्रस्वरूपो मिलितांगुलीक:। आारक्कवर्णों मृदुतासमेतो सौमांसलो लोमशवृन्दहीनः॥।५०।। मिश्रस्वरूप, मिली अंगुलियोंवाला सातवाँ हाथ होता है। जो कुछ लालवर्ग, कोमल, मांसल और लोमहीन होता है॥ ५० ॥ स्थौल्येन युक्को दृढतासमेतो वृद्धांगुली को यदि भाति पाषिः। सोयं नरः शरतरः सुधीरः प्रोक्को हि मल्लो विदितो धरायास्प१ यदि मोटा-मजवूत बड़ी अंगुलीवाला हाथ हो तो वह सूग्या, सुधीर, तथा पहलवान कहलाता है॥ ५१ ॥ गोलांगुलीको मनुजस्य यस्य विभाति पाणिर्मदुतासमेतः। सोयं जनः शुद्धतरस्वभावो भेदस्य वेत्ता खलु गुपकस्य ५२॥ गोल अंगुलीवाला कोमल हाथ सीधे स्वभाववाले तथा गुप्त भेद-ज्ञाता पुरुप का होता है॥ ५२॥ गोलांगुली को यदिनास्तिपािःपारुष्ययुक्कोमनुजस्तदानीम्। कामी कलावान्कलहेन युको मन्दो मलाढ्यो ममताबिहीनः॥ यदि गोल अंगुलीवाला हाथ न हो तो वह कठोर, कामी, कलावान, कलही, मन्द, मलाठ्य और ममनारिटीन होना है। ५३ ॥ वकरांगुलीको यदि भाति पाणिश्चारक्वर्णें मलिनः कठोरः। परिश्रमासक्रमना मनुष्यस्त्वारामसको रमया समेतः ॥५४।
- कुछ लोगों ने चार प्रकार के भी माने है। यह कम छोटे रूपवाला कहाता है। -- संपादक द्वितीयखरड जिसका हाथ कुछ लालवर्सा, मैला, कठोर तथा टेही अंगुलीवाला हो वह मेहनती, आरामतलब और लक्षमीवान होता है॥ ५४ ॥ पालीस्वरूपो यदि भाति पाणिः प्रीत्यायुतो दिव्यतनुर्दयालः । नानांशुकालङ्करणै: समेतो मानी महोजा मदनातुरश्च॥।५५॥ यदि नोकीला हाथ हो तो वह प्रीतिमान्, दिव्यशगीर,दयावान्, अ्रप्रनेक वस्र एवं अलंकारवाला, मानी, महाचली तथा कामी होता है।। ५५ ॥ कोणस्वरूपो यदि भाति पाषिः प्रसन्नताही नवपुर्मनुष्यः। धनाभिलापी भ्रमतेऽप्यजसं भ्रान्तो भयातों धनतामुपेति ५६ जिसका कोनीला हाथ हो वह प्रसन्न, च्षीण शशीर, धनाभिलापी, निरं तर चूपता, और भ्रान्त व भयार्त होकर धन पाता है॥ ५६॥ ज्यौतिष्य रूपो मनुजस्य यस्य विभाति पाणिः खलु शुद्ध रूपः । सोऽयं नरः स्यान्निगमागमज्ञः सत्यपवक्ा निजदेवभक्कः॥५७॥ जिसका हाथ शुद्ध ज्यौतिष्य रूपवाला हो वह मनुष्य वेद एवं शास्त्र का ज्ञाता, सत्यवक्ञा तथा अरने इष्टदेव का भक्क होता है।। ५७ ॥ मिश्राङ्गुली को मलताविहीनो विभाति पाषिः पुरुषस्य यस्य। सोऽयं मनुष्यो धनतासमेतो विपत्तिमल्पां लभते कदापि ५८ जिसका हाथ साफ़ तथा मिला अंगुलीवाला हो वह धनसंपन्न होता तथा किसी समय थोड़ी विपत्ति पाता है॥ ५८ ॥ नखफल लम्वायमानानि तथायतानि संरक्तवर्णानि नखानि यस्य। सोड्यं जनःस्यात्कविवृन्दमुख्यःसाँच्वत्सरो वेदविदां वरेशय:५६ जिसके लम्बे चौड़े तथा लालवर्ण वाले नख हों वह कतियों में प्रधान, ज्योतिःशास्त्र का ज्ञाता तथा वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ होता है।। ५६ ॥ वक्रस्व्रूपाणि नखानि सन्ति दीर्घायमाणानि जनस्य यस्य। सोडयं नरो वकतरस्वभावो वेश्याप्रसक्ो वनिताविहीन:।६०।। सामुद्रकशास्त्न जिसके नख जम्बे और ेढे हो वह टेढ़े सवभाववाला, वेश्यागामी और रमखीहीन होता है। ६० ।। स्वल्पस्वरूपा मनुजस्य यस्य आ्रपीतवर्णाश्च पुनर्भवाः स्युः। सोडयं जनः स्यात्सभिकोहि धूतों मिथ्यापभाषी ममतासमेतः॥ जिस मनुष्य के छोटे तथा पीले से नख हों बह फड़याज, दगाबाज़, छलचन्दी, फूठा और ममतासम्पन्न होता है।। ६?॥ श्यामायमाना नखरा हि सन्ति चुद्रस्वरूपा: पुरुषस्य यस्य। धूर्तस्वभावो मनुजस्तदानीं व्याजेन युक्को विदितो धरायाय्६२ जिस पुरुप के नख काले और छोटे से हों वह कपटी तथा धूर्तस्वमाव का होता है॥ ६२ ।। पुनर्भवाश्चेचिपिटा हि यस्य श्यामायमाना: प्रथुताविहीना:। सोडयं मनुष्यश्ञलतासमेतो निर्लजरूपो नितरां विलासी ६३ जिसके नख चौड़ाई से विहीन व काले वर्णचालेतथा चपटे हों वह छली, निर्लज्न और चड़ा भोगी होता है।। ६३ ॥ लम्वायमानानि तथा सितानि नखानि शुद्धानि भवन्ति यस्य। सोडयंनर:स्यादुपकारकारी मान्यो वदान्योऽ्वनिराजवन्द:६४ जिसके नख लम्बे, सफ़ेद तथा स्वच्छ हों वह उपकारी, मान्य और वदान्य तथा वन्दनीय होता है॥ ६४ ।। आरक्रवरणा नखरा यदानीं भवन्ति कार्श्या मनुजस्य यस्य। व्युत्पन्नबुद्धिश्चपल: कृशाङ्गो व्याख्याकर: स्यादुपदेशकारी ६५ जिस मनुष्य के नग्व पतले, रक्रवर्गा हो वह व्युत्शन्न बुद्धिवाला, चलता पुर्जा, दुला, व्याख्याकारी और उपदेशक कहाता है॥ ६५ ॥ गोलस्वरूपा नखरा हि सन्ति श्वेतेन हीना मनुजस्य यस्य। चिन्तासमूहेन युतो मनुष्यो धनाभिलाषी भ्रमते भयार्तः॥६ ६॥ जिस पुरुष के नख गोल सफ़ेद हो वह चिन्ता से घिरा व धनामिलापी डरता और घूमा करता है॥ ६६ ॥* नखस्थचिह्नफल बृद्धाङ्गुलेश्चेन्नरोपरिस्थं विभाति चिंह्नं धवलस्व रुपय् । प्रेमी मनुष्यो रमणीसमेतो धन्यो धरायां धनतामुपैति ॥६७। यदि अंगूटे के नख पर टिका हुआ सफ़ेद निशान हो तो वह प्रेमी, पत्रीपरायण तथा धनी होता है॥ ६७ । बृद्धाङ्गुलेश्चेन्न रोपरिस्थं श्यामायमानं्िाि चिह्रम् सोऽयं जनो मन्दमतिर्महौजा मानेन हीनो ममतां प्रयाति ६८ अंगूठे के नख पर काला निशान हो तो वह मन्द-मति, महावली एवं मानहीन होता है।। ६८ ॥ आद्याङ्गुलेश्चेन्न रो परिस्थं श्वेतस्व रुपं यदि भाति चिह्रम्। सम्पत्समूहं लभते नितान्तं श्यामे तु चिह्ने धनहानिमेति ६६
- अनेकों विद्वानों का मत है कि कोमल या मुलायम नाखून कमज़ोर या शक्तिहीनतासूचक हैं। कड़े या चटकदार नाखरन अस्वास्थ्यकर कहाते हैं। पुष्ट नख सुन्दर स्वास्थ्यके द्योतक हैं। नुकीले नाखून, आलसी तथा भूठे स्वभावके द्योतक हैं। किंतु ऐसे मंनुष्प कला तथा सौंदर्य के बड़े उपासक हुआ करते हैं। बड़े चपट तथा पीठ पर गोल नाखरन चपल और चालाक स्वभाव बताते हैं। पहले सकर और अंत में (छोर पर) चौड़े नाखरून स्वा- तंत्र्यप्रिय के हुआ करते हैं। गुलाबी नाखून दृढ़तासूचक हैं। भूरे, पीले और गोल नाखतनूनवाले से सदैव सतर्क रहना चाहिए। कारए, ऐसा मनुष्य हर हालत में भयंकर हुआ करता है। रक़वर्स नाखून कम दिम्मत और उदास- प्रियता की निशानी हैं। लम्बे नाखून वारीक तवियत के तथा छोटे नाखतून शौघ्र निष्कर्पप्रय के होते हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि नखत्रों पर सफ़ेद धघ्ये शुभ नहीं; अर्थात् वे रक्कप्रवाह विकारी हो जाने से इस प्रकार धध्बे आ जाना मानते हैं। पर कुछ चिद्वानों का कथन है कि नाखूनों पर सफ़ेद धध्चे तो बड़े शुभ हैं; पर वे लोग ज़रा कमहिम्मती ज़रूर होते हैं। नाखूनों पर काले धध्चे अवश्य ही अशुभ हैं। साधारणतः एक नाखून की जड़ नोक तक आने के लिए लगभग है महीने लगते हैं। पूरे नाखून का लगभग एक तिहाई हिस्सा तो सफ़ेद शर्द्ध चन्द्राकार दिखेगा जो भविष्य-सूचक होता है। अथवा चार मास का भविष्य उस पर से कहा जा सकता है। नख का मध्य भाग वर्नमान सचक है, और अंनिम तिहाई भूनकाल बताता है। -सम्पादक सामुद्रकशाख्नं यदि तर्जनी के नखपर सफ़ेद दाग़ दिखे तो दौलत को पाता है। यदि वह निशान काला हो तो धनहानि होती है॥ ६६॥ मध्याङगुलेश्चेन्नखरोपरिस्थं गौरस्वरूपं यदि भाति चिह्नय्। सांयात्रिक:स्यान्मनुजस्तदानीमाकस्मिकं मृत्युमुपैति नीले॥ यदि मध्यमा के नख पर सफ़ेद निशान हो तो जहाज़ी होता है। यदि वह निशान काला हो तो अचानक मौत पाता है॥ ७० ॥ अरनामिकाया नखरोपरिस्थं चिह्नं यदानीमवदातरूपम्। कीर्ति च वित्तं लभते नितान्तंश्यामायमाने त्पकीर्तिमि७१ यदि अनामिका के नख पर सफ़ेद दाग़ दिखे तो नामवरी एवं दौलत पाता है। यदि काला निशान हो तो बुराई पाता है।। ७१॥ कनिष्ठिकाया नखरोपरिस्थं शुक्कस्व्ररूपं यदि भाति चिह्नय्। सा्वत्सर: कीर्तियुतो धना्यो व्यापारवृन्दाद्वहुतृद्धिमेति॥ यदि कनिष्ठिका के नखपर सफ़द निशान हो तो ज्योतिपी, कीर्तिमान्, धनवान् तथा वृद्धि पाता है॥ ७२ ॥ श्यामायमानं यदि भाति चिह्नं पीतस्वरूपं यदिवा विभाति। सोयं नरो व्याधिपरो नितान्तमल्पे वयस्के मरणं प्रयाति ७३ यदि कनिष्ठा के नखपर काला या पीला निशान हो तो अत्यन्त रोगा बना रहता है। थोढ़ी ही उम्र में मर जाता है।। ७३।। प्रदेशिनीमूलगतं विशुद्धं बृहस्पतेः स्थानमुदाहरन्ति। गुरुस्थानफल समुन्नतं यस्य करेविभाति सुखी सुविद्यो विषयी नरःस्यात् ७४ तर्जनी के मूल में वृहस्पति का स्थान है। वह जिसके हाथ में ऊँचा हो वह सुग्वी ववद्ान् नथा विपयी होना है।। ७४।।* गदेली पर सतग्रह विराजनान हैं। प्रत्येक उँगली के नीचे जो छोटी- छोटी सी पक-एक मांसल गह्दी उडी रहती है वही ग्रह स्थान है। अंगूठे के मूल में तथा कलाई के ऊपर कोने में और कनिष्ठा के नीचे तथा कोने के ऊपर भी इसी प्रकार की एक गद्दी होती है। गुरु-समाज प्रियता तथा अगम सम्मान तथा धार्मिकना का सूचक है। द्वितीयखपड अ्धोनतं चेन्मनुजस्य यस्य गुरुस्थलं वै विशदं विभाति। महालसी स्यात्पुरुषो धनाशी सुमाहसी काव्यकरो विवादी॥ जिसके पाखितल में बृहस्पति का स्थान साफ़ तथा नीचा हो वह महा- लसी, सुसाइसी, ब:सी, धनाशी और कविता करनेशला होता हैं॥७५॥ देवेन्द्रवन्द्यालयगा यदानीमृज्वी सुरेखा विशदा िभाति। सोयं मनुष्यो महतामुपासी सर्वेंषु कार्येषु च सिद्धि मेति॥७६॥। यदि बृहस्पतिस्थान में साफ़ सौधी रेखा हो तो वह बड़े आदमियों का अनुयायी होता और सब कामों में सिद्धि पाता है॥ ७६ ॥ पूज्यालयस्था विशदा यदानीं चुद्राः सुरेखाः बहुशो विभान्ति। सोयं नरो धर्मपरो नितान्तं सिद्धिं स्वकार्ये लभते कदापि ७७ जिसके बृहस्पतिस्थान में बहुतमी छोटी २ रेखाएँ हो वह अत्यन्त धर्मपगयण और कभी-न-कभी अपने कार्य में सिद्धि पाता है॥ ७७ ॥ यदि अधिक है तब गर्व और कोरी शेखी बताता है। यदि कम है तब तो नम्र स्वभाव जानना चाहिए। शनि गंभीरता तथा आकर्षण शक्ति का द्योतक है। अधिक होने पर उदा- सीन स्वभाववाला तथा कम में कुछ ज्ञानहीनता समझना चाहिए। सूर्य-दयालुता, सरलना, कलाप्रियता का सूचक है। अधिक होने पर रसिकताप्रिय और की में कद्ुताप्रिय बताता है। बुध-आशावादी तथा प्रप्तन्नचित्त, कर्रव्यशील तथा आविष्कारप्रियता का द्योतक है। अधिक होने पर असावधानी और कमी होने पर निराश तथा कम हिम्मत होना बताता है। मंगल-आत्मनियंत्रए, हिम्मत और बहादुरी का सूचक है। अधिकता में अडली और गोपनीयमंत्रणा तथा हिंसाप्रिय और कम होने पर बुज- दिली का सूचक है। शुक्र-आमोदप्रियता, स्वरप्रियता, प्रेम और कामुकता का द्योतक है। अधिक होने पर दुट विचारपूर्र तथा पयाशी बताता और न्यूनता में शुष्क, नीरस तथा भावहानता का सूचक है। चंद्र-विचारपूर्ण तथा कल्पनाशक्ि का सूचक है। अधिकता में.सनक या कल्प- नापूर् तथा न्यूनता में बोदापन, कमहिम्मती और प्रारंभिक विचार- शून्यता बताता है। विशेष रूप से प्रत्येक ग्रह के संबंध में पिछले पृष्ठों में वर्णन हो ही चुका है। - सम्पादक
- सब ग्रहों के स्थान हम पहले ही लिख आये हैं।-संपादक सामुद्रकशास्त् एका कुरेखा गुरुगा यदानीं पारंगता स्यान्मनुजस्य यस्य। शीर्षाभिघातं लभते मनुष्यो मन्दस्वभावो ममतामुपैति॥७=॥। जिस मनुष्य के करतल में बृहस्पतिस्थान में एक छोटी सी रेखा आर- पार गई हो वह सिर में चोट खाता, तथा मन्दस्वभाववाला और मोही होता है।। ७८ ।। रक्कस्वरूपा विशदैकरेखा पूज्यालयस्था विरला विभाति। वामां मनोज्ञां लभते मनुष्यो धर्मानुयायी धनतासमेतः।।७६।। जिसके बृहस्पतिस्थान में एक साफ़ रेखा हो तो वह रमणी पाता है, और धनसंपन्न तथा धर्मानुयायी होता है॥ ७६॥ देवेशवन्द्यालयगं विशुद्धं तारास्वरूपं यदि भाति चिह्रम् ! सोयं कुलीनो मनुजो महेच्छो धन्योधरायां धनदानुगः स्यात्॥ यदि बृहस्पति के स्थान में तारा के समान साफ़ निशान हो तो कुलीन, महाशय और धनेश का अनुगामी होता है॥। ८० ॥ नार्या यदा चेन्महतां जनानां तारानुरूपं गुरुगं विभाति। सा नष्टकीर्तिर्विधनाभिमाना स्वच्छन्दरूपा विचरेत्नितान्तम्।। यदि बढ़ों की रमणियों के करतल में बृहस्पतिस्थान में तारा के समान निशान हो तो उस नारी की नामबरी जाती रहती है। धन व अभिमान भी चला जाता है। वह स्वेच्छाचारिखी होकर बिचरती है।।=१ ।। गुर्वालयस्थं विशदस्वरूपं चिह्नं चतुष्कोणयुतं विभाति। बाधाविमुको मनुजस्तदानीं सौभाग्यशाली सुखतासमेत := २ जिसके बृहस्पतिस्थान में साफ़ चार कोनोंवाला निशान हो वह बाधाओं से वियुक्क, साभाग्यशाली और सुसंपन्न होता है।। = २ ।। इज्यालयस्थं विशदस्वरूपं विन्दुपयुक्तं यदि भाति चिह्नम्। आत्मम्भरिःस्यान्मनुजस्तदानीं नैजे कुटुम्बे त्वपकीर्तिमेति=३ यदि बृहस्पतिस्थान में साफ़ बिन्दु (नुक्ेवाला) चिह्न हो तो वह पेद़ होता और अपने ही कुदुम्ब में बुराई पाता है॥। ८३ ॥। चिह्न त्रिकोएं धिपणालयस्थं भिन्नं त्वयोगं यदि दृश्यते चेत्। सोयंजनोदीपशलाकिका्योदौर्भाग्यशाली जनतापकारीद४ यदि बृह्स्पतिस्थान में त्रिकोणकार निशान हो तो दियासलाई के बनाने से धनाव्य होकर दौर्माग्यशाली होता तथा जनापकारी होता है।।=४। समुनतं चेद्धिपणालयस्थं चिह्हं त्रिकोएं विशदं विभाति। सोयं नरो मन्त्रिवरो महौजा विख्यातकी तिर्विमलस्भाव: ८५ यदि बृहस्पतिस्थान में साफ़ त्रिकोग का ऊँचा सा निशान हो तो वह प्धान मन्त्री, चलवान, मर्यात कीर्तिवाला और अमल स्वभाववाल होता है।। ८ ५ ॥। पूर्वोक्कचिह्नं विशदं विशालं गम्भीररेखं यदि भ्राजमानम्। गर्वी धनाव्यो मनुजस्तदानीं स्वार्थी सहायी विमना विरोधी।। यदि पूर्वोक निशान साफ़, सुथरा, बड़ा व गहरी रेखावाला हो तो वह गर्वी, धनाव्य, स्वार्थी, सहायी, विमन और विरोधी होता है।। =६ ।। आयुष्यरेखाफल पदेशिनीमूलतल।बलन्ती चाकान्तशुक्रा मणिबन्धमेति।
- जिस प्रकार मानव शरीर पर आँख कान नाक आदि के लिए प्राकृतिक निश्चित स्थान होते है उसी प्रकार हथेली पर आयु (पितृ) मस्तक (मातृ) एवं हृदय (आयु) आदि रेखाओं के लिए भी निश्चित स्थल हैं। यदि किसी पुरुष की नाक नियत स्थान पर न होकर कहीं कान के समीप जावे तो आप तुरंत उसे "असाधारण व्यक्नि" पुकारने लगेंगे, अथवा उसे विचित्रता पूर्ण कहेंगे। इसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति की हथेली पर कोई रेखा नियत स्थान से दूसरी ओर दिखे तो वह अवश्य ही विचित्र कहावेगा। यदि ये सभी रेखाएँ स्पष्ट, सुन्दर एवं गुलाबी रंग की दिखें तो उन्हे अति- उत्तम समझना चाहिए। कटी-फटी होने से विद्युत्संचार अथवा रक्कप्रवाह में बाधा पड़ने से उस रेखा के गुणों में भी बाधा आ जाती है। यदि उस रेखा पर कोई चिह्न हो तब तो प्रवाह का उसी चिह्न के अनुसार घूम जाना अथवा अचानक रुक जाना और अनियमित रूप धारण कर लेना बताती है। फल भी उसी प्रकार परिवर्तित हो जाता है। हस्तरेम्न्ा-विशारद् को सभी रेखाएँ सूक्ष्मदर्शक यंत्र से भली भाँति देखना चाहिए। तब विचार स्थिर कर उसके गुए अवगुर कहना अच्छा है। -संपादक सामुद्रकशाखत्र आायुष्यरेखां कथयन्ति सन्तः पैत्रीं सुरेखां पवदन्ति केपि॥८७।। जो तर्जनी के मूलतल से चलनी व गुक्ालय को घेरती मणिबन्ध के पास पहुँचे उसे आयुरंखा कहने हैं। कुछ आचार्य उसे पैत्रीरेखा भी कहते हैं॥ ८७ ॥ एषा सुरेखा विशदा यदानी चिन्ना न भिन्ना खलु लम्विता चेत। शुद्धस्त्रभावो मनुजोऽतिधन्यो जैवातृक: स्याद्पदाविहीन:। यदि यह रेखा साफ कटी न हो और लब्वी हो तो वह शुद्धस्वभानवाला, धनवान्, आयुष्यवान् तथा विपदाहीन होता है॥ ८ ॥ श्यामायमाना वितता विभाति पेत्री मुरेखा पुरुपस्य यस्य। मात्सर्ययुक्तो मनुजो मलाब्यो दौर्जन्यशाली कृशतासमेत: द६ जिसके हाथ में पैत्रीरेखा चौढ़ी, काली सी हो वह डाहयुक्त, मलाव्य, दौर्जन्यशाली तथा दुघला रहता है॥ ८६ ॥ पैत्री सुरेखा यदि लम्बमाना संरक्तवर्णा विशदा विभाति। सोयं जनः क्रोधयुतो नितान्तं वन्यस्य बुद्धिं भजते बलाव्य:६० यदि पैत्री रेखा लम्बी, साफ व लाल वर्णवाली हो तो वह बड़ा क्रोधी, बली तथा वनेचबुद्धि होता है॥ ६० ॥ वपस्य रेखा मिलिता जनन्यामन्यासमेता विशदा विभाति। सोयं जनो दुर्बलतासमेतो दान्तस्व्रभावो दयितारतश्र॥६१।। यदि पैत्रीरेखा मात्रीरेखा में मिली और अन्य रेखाओं से युक्त हो तो वह दुर्वन्त, दान्तस्व्रभाववाला तथा दयिता में रत रहता है॥ ६१ ॥ हस्तद्रये चेन्मनुजस्य यस्य मध्ये विवर्णा यदि भाति पैत्री। आजन्मरोगी मनु जस्तदानीं नी चस्वभावः करानामुपैति ६२ जिप मनुष्य के दोनों हाथों में यदि पैत्रीरेखा फीके रंगवाली हो वह जन्मपर्यन्त बीमार बना रहता और नीव स्वभाववाला तथा दुर्बज्ञ होता है।। ६२ ।। गुर्वालयाचेच्चलिता सुपेत्री चाक्रम्य शुक्तं मणिबन्धमेति। यदि बृहस्पतिस्थान से चली पैत्रीरेखा शुक्रालय की परिक्रमा कर सणिबन्ध के पाल पहुँचे तो वह कुज्ीन, धनवान्, चतुर तथा चश्चलस्त्रभाव- वाला होता है।। ६३ ॥ वग्रोपरिस्था विशदस्वरूपा भौमी सुरेखा पुरुपस्य यस्य। व्यापद्विहीनो मनुजस्त्वरोगी संपत्तिशाली सुखतामुपैति६४ जिस पुरुष की पैत्रीरेखा के ऊपर साफ़ मङलरेखा हो वह विपदाहीन, नीरोगी, सम्पत्तिशाली, और सुखी होना है॥ ६४ ।* पैत्रीसुमध्याच्चलिता यदानीं शुक्रोचगा चेद्िशदा विभाति सोयं जनो गच्छति सर्वदेशं सौभाग्यशाली सरलस्वभाव: ६५ यदि पैत्रीरेखा के मध्यभाग से चली साफ़ सुथगी एक रेखा शुक्रालय में हो तो वह सब मुलकों का सफ़र करता और सौभाग्यशाली तथा सीधे स्वभाववाला होता है॥ ६५ ॥ पैत्रीसमुत्था सरलैकरेखा देवेन्द्रवन्द्योपरिगा विभाति। सोयं नरः कीर्तियुतः सुविद्यः सर्वार्थसिद्धिं लभते धनाव्य:६६ यदि पैत्रीरेखा से उठी एक सीधी रेखा वृहस्पतिस्थान के ऊपर हो तो वह यशस्व्री, विद्वान्, धनवान् तथा सर्वसिद्धि पाता है॥ ६६॥ पैत्रीसमुत्था यदि भाग्यरेखा मन्दालयं याति विशुद्धरूपा। सोयं जनो ग्रामधनादियुक्को भूम्यश्वयानादिभिरावृतः स्यात्॥ यदि पैत्रारेखा से उठी साफ़ भाग्यरेखा शन्यालयपर्यन्त जावे तो वह गाँव, धन आरादि से युक्त होता और ज़मीन, घोड़ा एवं गाड़ी आदि सवारियों का स्वामी होता है।। ६७ ।। आरम्भदशे मिलिता यदानीं चित्तादिरेखा निखिलाविभान्ति। रोगाभिभूतो मनुजस्तदानीमाकस्मिकं मृत्युमुपै्ति नूनम ६८ • इस रेखा को पाश्चात्य विद्वान् भी मंगल रंखा (Line of mars) मानते हैं। यदि यह रेखा स्पष्ट और सुन्दर हो तो निश्चय ही ऐसे मनुष्य का स्वास्थ्य अच्छा रहता है। कुछ विद्वान्, धनी एवं पश्वर्यशाली होना भी. मानने है। संपादक सामुदकशाखे यदि प्रारम्भ में सौभाग्य आदि रेखाएँ आपस में मिली हों तो वह चीमारे रहता तथा उसकी एकाएकी मृत्यु होती है।। ६८ ॥। वृद्धाक्कुते्व निकटाचलन्ती पैत्री सुरेखा रविजं प्रयाति । सन्तानहीनो मनुजस्तदानीं संतापशाली सुखतावियुक्क: ६६ यदि पैत्री रेखा अंगूटे के समीपवर्ती देश से चलकर शन्यालयपर्यन्त जाचे सो वह सन्तानरहित, संतापशाली तथा सुखहीन बना रहता है।। ६६॥ सौमाग्यरेखाफल सौम्यालयाच्चेच्चलिता यदानीं रेखा गभीरा गुरुगा विभाति। सौभाग्यरेखां प्रवदन्ति सन्तश्चित्तस्य रखांकथयन्ति केपि १०० यदि बुधालय से चली गहरी रेखा गुरुगेहगामिनी हो तो उसे विद्वानों ने सौमाग्यरेखा कहा है, और कई आचार्य चित्तरेखा भी कहते हैं॥१०॥ एषा सुरेखा विशदा यदानीं विस्तीर्णरूपा धिपएं प्रयाति। वित्ताभिलाषी मनुजोतिलुव्धःस्वार्थी सुशंकी भ्रमतेऽप्यजस्रम्।। साफ सुथरी एवं चौड़ी सौभाग्यरेखा बृहस्पतिस्थान को जाचे तो वह धनाभिलापी, लोभी, मतलवी, बड़ी शङ्का करनेवाला तथा हमेशा चूमता है॥ १०१ ॥ सौभाग्यरेखा विशदा यदानीं पीतस्वरूपा गुरुगा विभाति। सोयं नरो धूर्ततरस्व्रभावो दौर्भाग्यशाली प्रथितो धरायाम् १०२ यदि साफ़ व पीली सौमाग्यरेखा गुरुगेह तक हो तो वह धूर्तस्व्रभाववाला, दौर्भाग्यशाली, तथा पख्यात होता है॥ १०२॥ आपीतवर्ण यदि चित्तरेखा गम्भीररूपा गुरुगेहमेति। सोयं मनोव्याधियुतो मनुष्योरोगाभिभूतो रमयाविहीन:१०३ यदि चित्तकी रेखा (हार्टलाइन) कुद पीली एवं गहरी हो और बृहस्पति स्थान को पहुँचे तो वह मानसीव्याधि-संयुक् रोगी तथा लक्ष्मीहीन होता है॥ १०३ ॥। द्वितीयखरड स्वान्तस्य रेखा किल रक्वर्णा गुर्वालयस्था मनुजस्य यस्य। दौर्जन्यहीनोऽघमताविहीनः सौभाग्यशाली सुखतामुपैति॥ जिसके करतल में लाल वर्णवाली सौभाग्य रेखा बृहस्पनिस्थान तक हो वह सौमाग्यशाली, सज्जन और सुखी होता है॥ १०४॥ सूर्यालयाच्चेच्छनिगेहतो वा चित्तस्य रेखा चलिता यदानीम्। आजन्मरोगी मनुजस्तदानीं जीवेच्छवृत्या भयतासमेतः१०५ यदि सूर्यालय या शन्यालय तक ही चित्त रेखा (हार्टलाइन) हो तो जन्मपर्यन्त रोगी और श्वद्ृत्ति से जीना बताती है ॥ १०५॥ सौभाग्यरेखा यदि सर्वदेशे छित्रा विभिन्ना गुरुगेहगा चेत्। भार्यावियुक्कोमनुजस्तदानीमप्रीतिकारी धनतापहारी॥१० ६।। यदि सारी सौमाग्यरेखा करो-फटी हो और बृहस्पति के स्थान में पहुँचे तो वह मार्यावियुक्र, अमीतिकारी और धननाशक होती है॥ १०६ ॥ शाखाद्वयेनापि युता यदानीमेका गुरुस्था शनिगाऽपरा चेतू। रामासमेतः पुरुषस्तदानीमानन्दयुको रमते रसायाम् ॥१०७॥ यदि सौभाग्यरेखा दो शाखाओं से युक्र हो, उनमें से एक बृद्स्पतिस्थान में और दूसरी शनैश्चरस्थान में पहुँचे तो वह सुन्दरी समेत आनन्दयुक़ होता है।। १०७।। शाखाविहीना विशदा यदानी गम्भीररूपा गुरुगा विभाति। दौर्भाग्यशाली विधनो मनुष्यो दारिद्र्युक्को भ्रमते भयार्तः॥ यदि साफ़ सुथरी एवं गहरी सौमान्य रेखा शाखाहीन गुरुस्थान में पहुँचे तो दौर्माग्यशाली, दरिद्री, तथा डरकर घूमना बताती है॥ १०= ॥ मन्दालये चेन्मनुजस्य पाणौ सौभाग्यमत्र्यौ मिलिते यदानीम् नानार्तियुक्को मनुजस्तदानीमाकस्मिकं मृत्युमुपैति नूनम्१०६ जिसके पाखितल में शनि के स्थान में सौभाग्यरेखा और मातुरेखा मिली होवें वह नानाव्याधि संयुक्त होना तथा एकाएकी मर जाना है॥१०६॥ सामुद्रकशाखतर मातुरेखाफल * चन्द्रालयाचेच्लिता सुरेखा गंभीररूपा पितरं प्रयाति। तां शीर्षरखां कवयो वदन्ति मात्रीं तु रेखां प्रवदन्ति केऽपि१ १० चन्द्रालय से चली एक गहरी रेखा पैत्रीरेखा के पास ५हुँचे तो उसे शीर्परेखा (हेडलाइन-मस्तक रेखा) कहा है और कई आचार्य मातृरेखा भी कहते हैं ॥ ११०॥ एषा सुरेखा यदि नास्ति भिन्ना शाखाविहीना विशदा वभाति। सोयं नरो बुद्धिवरो बलाब्यो विख्यातकीर तिर्विदितो घरायामू॥ जिसकी यह 'मातृरेखा' कटी फटी न हो तथा शाखाहीन और उज्जवल रूप हो वह बुद्धिमान् व बलवान् और प्रसिद्ध होता है।। १११ ।। मात्री सुरेखा यदि पीतवर्णा विस्तीर्णरूपा जनकान्तिके चेत। सोयं जनः स्यात्कृशतासमेतः स्पृत्या विहीनः सरलस्वभावः।। पीली एवं चौड़ी मातरेखा पैत्रीरेखा के पास पहुँचे तो वह दुर्बल, स्मरण- शक्किर हित, और सीधे स्वभाववाला होता है ॥ ११२ ॥ शीर्षस्य रेखा कृशगा यदानी लम्वायमाना मनुजस्य पाणौ। सोयं नरः स्यात्सभिको हि धूर्तो नाज्ञाकर: कर्मकरः कृशाङ्गः ॥ जिस मनुष्य के करतल में पतली एवं लम्बी मातृरेखा हो वह फड़चाज़ (दगाबाज), छलछन्दी और दुर्घल होता है; आज्ञाकारी नहीं होता ११३।। विस्तीर्णरूपा यदि मातृरेखा श्यामायमाना पुरुषस्य यस्य। सोयं जनो वै जठरस्य रोगं प्राप्ोति नित्यं सुखताविहीनः॥ जिस पुरुप के पाशितल में चौड़ी एवं काली मातृरेखा हो वह सुखद्दीन रहता और हमेशा पेट की बीमारी से कष्ट पाता है ॥ ११४ ।। मातु: सुरेखोपरिगं विशुद्धं संरक्तवणं यदि भाति चिह्रम्। शीर्पाभिघातं लभते मनुष्यो गौरेतु वैद्यो विदितोधरायाम्१ १५ यदि मातृरेखा के ऊपरी भाग में साफ़ सुथरा एवं लालवर्णवाला निशान हो तो वह सिर में चोट पाता है। यदि पूर्वोक निशान सफ़ेद हो तो वैद्य- डाक्टर या हकीम तथा प्रख्यात होता है ॥ ११५॥ Line of Head. ५३े ऊर्ध्वरेखाफल# रेखा चलन्ती मणिबन्धदेशान्मध्याङ्कलिं याति गभीररूपा। तामूर्ध्वरेखांप्रवदन्ति सन्तो वित्तस्य रेखां कथयन्ति केपि ११६।। मखिबन्ध देश से गहरी जो रेखा मध्यमा के पास जाती है उसे ऊर्ध्व- रेखा कहते हैं। कई आचार्य उसे दौलत की रेखा (धनरेखा) भी बतलाते हैं ॥ ११६ ॥। माज्यस्य रखा मणिबन्धदेशाद्गम्भीररूपा यदि याति मन्दय्। सोयं धनाव्यो मनुजो मनीपी संपत्तिशाली सुखतामुपेति ११७॥ मखिबन्ध से चली यह गहरो भाग्यरेखा यदि शन्यालय पर्यन्त जावे तो धनवान, बुद्धिमान्, सम्पत्तिशाली और सुखी हाना बताती है॥११७॥ आ्ाक्रम्य चन्द्रं यदि भाग्यरेखा मन्दालयं याति विशुद्धरूपा। सोयं जनो मध्यधनो हि लोके लावएययुक़ां ललनामुपैति ११८ जब विशुद्ध रूपाली भाग्यरेखा चन्द्रालय को आक्रमण कर मन्दालय (शन्यालय ) पर्यन्त जाती है तो लोक में मध्यम धनवाला और सुन्दरता- संपन्न सुन्दरी खी पाना सूचित करती है॥ ११८ । पैत्रीसमुत्था यदि भाग्यरेखा गम्भीररूपा विशदा विभाति। नैजात्कुटुम्बात्सुखतां समेत्य संपत्तिशाली सरलस्वभावः ११६।। यदि गहरी व साफ़ भाग्यरेखा पैत्रीरेखा से उठी हो तो अपने कुदुम्ब से सुख पाना,संपत्तिशाली होना तथा सीधे स्व्रमाववाला होना बताती है ११६ भाग्यस्य रखा विशदा यदानीं देवेन्द्रवन्द्यालयगा विभाति। सोयं नरो नीतिपरो नराणां सर्वाधिकारी प्रभुतासमेत: १२० जिसकी साफ़ सुथरा भाग्यरेखा बहस्पतिस्थान में पहुँचे वह नीतिपरा- यख, सर्वाधिकारी और प्रमुनासंवत्र होता है॥ १२०।। भौमात्समुत्था यदि भाग्यरेखा मध्याङ्कुलि याति विशुद्धरूपा। भाग्येनहीनो मनुजस्तदानीं कार्येसमस्ते न हिसिद्धिमेति१२१
- Line of fate. भौमालय से उठी साफ़ सुथरी भाग्यरेखा यदि मध्यमा पर्यन्त जावे तो वह भाग्यहीन तथा कार्यों में सिद्धि नहीं पाता ॥ १२१॥ पारम्भदेशे वृजिना विभाति प्रान्ते तु भाग्या सरला यदानीम्। महादरिद्रोपि भवेद्धनाव्यो वृद्धे वपस्के सुखतामुपैति ॥१२२॥ यदि माग्यरेखा प्रारम्भ में टेही हो और आखीर में सीधी तो वह महादरिद्री, पर धनी होता तथा वृद्धावस्था में सुख पाता है॥ १२२॥ आरम्भदेशे सरला च रक्ा भिनति भाग्या यदि चित्तरेखाम्। सोयं जन: स्याच्चरमे वयस्के सौभाग्यशाली धनतामुपैति १२३ यदि आरम्भ में सीधी व लालवर्णवाली भाग्यरेखा चित्तरेखा (सौभाग्य रेखा) को भेदती है वो वह आखिरी अवस्था में सौमाग्यशाली और धनी होता है॥। १२३ ।। नो भाति पाणी मनुजस्य यस्य भाग्यस्य रेखा विशदा यदानीमू। सोयं नरः स्यादवलवीर्यहीनो दीनोघरायां न तु मांसभक्ती१२४ जिस मनुष्य के पाशितल में साफ़ सुथरी भाग्यरेखा न हो वह बल- वीर्यहीन तथा दीन बना रहता है। परन्तु मांस नहीं खाता ॥ १२४॥ सूर्यरेखाफल * चन्द्रारगेहात्खलु भाग्यतो वा रेखा यदैका दिनपं प्रयाति। तां सूर्यरखां कथयन्ति सन्तो ह्यप्नोसुरूपां प्रवदन्ति चान्ये १२५॥ चन्द्रमा या मङ्लस्थान से या भाग्यरेखा से उठी जो रेखा सूर्य के स्थान में जाती है उसे सूर्यरेखा कहते हैं ॥ १२५ ॥ एषा सुरेखा विशदा यदानीं विभाति पाणौ पुरुषस्य यस्य। जिस पुरुप के पाखितल में साफ़ मुथरी सूर्य रेखा हो वह निपुण, विज्ञ और प्रसिद्ध होता है ॥ १२६ ॥ भाग्यात्समुत्था दिनपस्य रेखा गम्भीररूपा विशदा विभाति। सोयं मनुष्यो हि महायशस्व्री विद्वान्धनाढ्यो गणितागमज्ञः।। Line of Apollo or Sun. द्वितीयखयड यदि भाग्यरेखा से उठी गहरी एवं साफ़ सूर्यरेखा हो तो वह यशस्वी, विदान्, धनवान्, गणितशास्त्र का ज्ञाता होता है। १२७।। भौमात्समुत्था तपनस्य रेखा रक्का विशुद्धा यदि भाति पाणौ। सोयं महोजा मनुजो मनस्वी नैजाङ्ुणात्संलभते हि वित्तम्॥ यदि भौमरेखा से उठी लाल एवं साफ़ सूर्यरेखा हो तो वह चलवान्, मनमौजी तथा अपने ही गुख से धन पाता है ।। १२८ ।। शैर्पीसमुत्था सवितु: सुरेखा विद्योतते चेत्पुरुषस्य पाणौ। सोयं धनाढ्यो मनुजोहि लो के विख्यात कीर्तिःकृषिकारक:स्यात् यदि शैर्पीरेखा (मातृरेखा=मस्तकरेखा) से सूर्यरेखा उठी हो तो वह धनवान्, विख्यातकीर्ति, तथा खेती-किसानी करनेवाला होता है॥१२६॥ वक्रामुले पाणितले गभीरे ऋज्वी सुरेखा दिनपस्य भाति। सोयं मनुष्यः सकले स्वकार्यें नामोति सिद्धिं सरलस्वभावः।। यदि टेदी उँगलीवाले गहरे पाशितल में सूर्यरेखा सीधी हो तो वह सीधे स्वभाववाला होता तथा अपने सारे कामों में सिद्धि नहीं पाता ॥१३०॥ ब्रध्नस्य रेखा यदि द्वित्रिशाखा गम्भीररूपा विशदा विभाति। नाना सुकार्यं कुरुते मनुष्यो नामोति सिद्धिं चरमे च कार्ये १३१ यदि सूर्यरेखा दो-तीन शाखाओंवाली एवं साफ़ तथा चटकीले रंग- वाली हो तो वह अनेक कार्य करता है। परन्तु आखिरी कार्य में सिद्धि नहीं पाता ॥ १३१ ॥ सूर्यस्य रेखोपरिगं विशुद्धं तारानुरूपं यदि भाति चिह्नम्। सोयं मनुष्यः सरलस्वभावः सख्यु. सकाशाल्वभते हि वित्तम्॥ यदि सूर्यरेखा पर तारा का साफ़ निशान हो तो वह सीधे स्वभाव- वाला तथा मित्र के द्वारा धन पाता है। १३२ । चित्तार्कयोगे यदि बिन्दुरूपं श्यामायमानं विशदं विभाति। नेत्रामयं वै लभते मनुष्यो हस्तदये चेजनुपान्धकः स्यात् १३३। चित्तरेखा (हार्टलाइन) और सूर्यरेखा (अपोलोलाइन) के योग सामुद्रकशासत्न में काला तथा साफ़ बिन्दुचिह्न हो तो वह नेत्ररोग पाता है। यदि दोनों हाथों में पूर्वोक्क निशान हो तो जन्म से ही अन्धा होता है । १३३ ।। बलरेखाफल * रेखा चलन्ती मणिबन्धदेशात्संयुज्य पैत्रीं यदि सौम्यमेति। वीर्यस्य रेखांप्रवदन्तितज्ज्ञा हैल्थस्वरूपांकथयन्ति चान्ये१३४ यदि मणिबन्धदेश से चली एक रेखा पैत्रीरेखा से मिलकर बुधालय- पर्यन्त जावे तो उसे विद्वान् वीर्यरेखा कहते हैं। कई आचार्य उसे (हिपेटिका हेल्थलाइन) या स्वास्थ्यरेखा कहते हैं ॥ १३४ ॥ एषा सुरेखा पुरुषस्य पाणौ संरक्तवर्णा विशदा विभाति। सोयं मनुष्यो बलतासमेतस्त्वारामसक्क: सुखतां प्रयाति॥१३५॥ जिस पुरुप के पाशितल में यह वीर्य रेखा साफ़-सुथरी एवं लालवर्ण- वाली हो वह बलसंपन्न, आरामतलय तथा सुखी होता है। १३५ ।। आरम्भदेशे मिलिता सुपैत्र्यां वीर्यस्य रेखा धवला विभाति। सोयं मनो व्याधियुतो मनुष्यो दौर्ब ल्ययुक्को दयितारतश्र १३६ यदि आरम्भ में वीर्यरेखा पैत्रीरेखा से मिली तथा साफ़ हो तो वह मानसी व्याधि से पीड़ित, दुर्बल और प्यारी में परायख रहता है।१३६। श्यामायमाना यदि वीर्यरेखा विद्योतते चेन्मनुजस्य पाणौ। सोयं जनो व्याधियुतो नितान्तं वृद्धे वयस्के विपदामुपैति१३७ जिस मनुष्य के पाशितल में काली वीर्यरेखा हो वह हमेशा रोगी रहता तथा छृद्धावस्था में विषदा भोगता है॥ १३७ ।। एषा सुरेखा विशदा गभीरा संरक्तवर्णा यदि भाति पूर्णा। गर्वी गुणाव्यो मनु नस्तदानीं व्यापारयुक्को व्ययतासमेतः१३८ यह स तुथरी, गहरी एवं लालवर्णनाली वीर्यरेखा यदि पूर्णरूप हो तो गर्वीला, गुखी, व्यापारी औरखर्चीला होना बताती है ॥ १३८ ॥
- Line of Liver or Health. एषोर्ध्वशाखा यदि चैकशाखा संस्पृश्य शैपी कुरुते त्रिकोणम्। सोयं सुकीर्तिः सुखतासमेतः सौन्दर्यशाली लभते धनौघम्१३६ बा रेखा ऊपरी भाग में शाखावाली हो और यदि एक शाखा मात्रीरेखा को छूरर त्रिकोणकार निशान बनाती हो ता वह बड़े नामवाला, सुख-संपत्र, सुन्दर और धनी होता है॥ १३६ ॥ संस्पृश्य शैपी तु तथा च भाग्यामेषा सुरेखा कुरुते त्रिकोणम्। सोयं जनो भाविफलस्य वक्का चाकृष्टशक्किं समवैति नूनम्१४० वीर्यरेखा, मातृरेखा तथा भाग्यरेखा (फेटलाइन) को छूकर त्रिकोण- कार निशान बना हो तो वह मविष्यद्वक्क या मिसमेरेजम बिद्या जानता है १४० एषा सुरेखा विनता यदानीं छिन्रा न भिन्ना शशिनं समेति। दौर्बल्ययुक्को मनुजस्तदानीं धातुक्षयं वै लभतेऽप्यजस्म् १४१ झुकी तथा अस्पष्ट वीर्यरेखा यदि चन्द्रालय को जावे तो वह दुबला तथा हमेशा धातुत्तीयता सूचित करती है॥ १४१ ॥ वेलास्किवरेखाफल भाग्यासमाना विशदस्वरूपा रेखा यदैका समुपैति सौम्यम्। वेलास्किवाख्यांग्वदन्तितां वै महानुभावा वदतांवरेरया:१४२ यदि भाग्यरेखा के बराबर साफ़ सुथरी एक रेखा बुधालय पर्यन्त जावे तो उसे वेल्ास्किव रेखा कहते हैं॥ १४२॥ काव्यालयाच्चेचचलिता सुरेखा वक्रस्वरूपा यदि याति चान्द्रिम्। चौये प्रतृत्तो मनुजस्तदानीं हत्याप्काएडैःसहितो नराणाम्१४३ यदि शुक्रालय से चली वेलास्कित टेदी रेखा बुधालय पर्यन्त जावे तो वह चोरी करने का आदी तथा इत्यारा होता है॥ १४३॥ एषा सुरेखा ऋजुतासमेता सोम्यालयं याति गभीररूपा। सौभाग्यशाली मनुजो मनीषी विख्यातकी तिर्विदितो धरायाम् · The Via Lasciva. सामुदकशासत्न सीधी व गहरी वेलास्किव रेखा बुधालय पर्यन्त जावे तो सौभाग्यशाली, विद्वान, विरुपातकीर्तिवाला और मसिद्ध होना बताती है॥ १४४ ।। गर्डलरेखाफल * रेखा चलन्ती शशिसूनुगेहाद्गोलार्धरूपा धिषएं प्रयाति। तां गर्डलाख्यां कवयो वदन्ति वृत्तार्धरूपां प्रवदन्तिचान्ये१४५ यदि बुधाज्य से चज्ञा गोलार्धरूप रेखा बृहस्पति के स्थान में जाये तो उसे 'गर्डज' कइते हैं। अन्याचार्य इसे 'दृत्तार्धरूप' बताते हैं ॥१४५॥ एषा सुरेखा विशदा सरका चिन्नान भिन्ना यदि भाति पायौ। सोयं नरस्तूचप दाधिकारी सौन्दर्यशाली सुखतामुपैति १४६॥ जिप के राखितज्ञ में यह साफ व लालवर्खाज्ी 'गर्डलरेखा' कटी फटी न हो तो वह ऊँचेनद का अधिकारी, सौन्दर्यशाली तथा सुखी होता है १४६ श्यामा चपीता खलु घूसरा वा छिन्ना च भिन्ना यदि भाति चैपा। सोयं बलिष्ठोहि पदाधिकारीस्वार्थी सहायी लभते धनौघम्।। यदि यूर्रोक रेखा काती, पीली या भूरी तथा कटी हो तो वह पड़ा चली, पदाधिकारी, मतजवी सहायी व धनी होता है॥ १४७।। मन्दालयाचचेच्चलिता यदानी वृत्तार्धरूपा समुपैति सौम्यम्। सोयं जनो धूर्ततरो हि दम्भी मिथ्यापभाषीमदनातुरश्च १४८ शनिस्थान (मन्द्ालय) से चली गोलार्ध रेखा यदि बुघालय पर्यन्त जावरे तो वह बड़ा धूर्न, छच्ती एवं भूंठा तथा कामी होना सूचित करती है?४८ एषा सुरेखा विशदा यदानीं ब्रध्नेन भिन्ना शशिजं समेति। सोयं मनुष्यो व्यभिचारयुक्को दुष्टस्वभावो धनतामुपैति १४६ पाखितल में यह पूर्तोक साफ़ रेखा सूर्यरेखा से कटरर बुधालय पर्यन्त जावे तो वह व्यभिचागी, बुरे स्वभाववाला और धनी होता है। १४६॥ चुद्राविभिन्ना यदि गर्डलाख्या काव्येन्दुरेखे विशदे विभातः। सोयं ह्यपस्मारयुतो मनुष्यो मान्यो वदान्यो ममताविहीनः॥ . Girdle of Venuis ५ूह यदि गर्डल रेखा छोटी छोटी रेखाओं से कटी हो और यदि शुक्र एवं चन्द्र की रेखाएँ साफ़ हों तो वह मिरगी रोगवाला होता तथा मान्य, वदान्य तथा ममताहीन रहता है॥ १५२॥ एषा विशुद्धा यदि भाति पाणे चारक्वर्ण पुरुषस्य यस्य। सोयं सुकीर्तिर्मनुजो धनाढ्यो नान्दीकरो नीतिपरो नितान्तम् जिस पुरुष के पाखितल में यह गर्डल रेखा साफ़ व कुछ लालवर्णवाली हो वह बड़ी कीर्तिवाला, धनी, नान्दी, वादी एवं बड़ा नातिपरायण होता है। १५३ ॥ आध्यापिकी वृत्तिपरा: प्रवीणा: संपादका ये किल पत्रकाणम्। तेपां हि पाणावियमेव भाति रेखा गभीरा विशदा सदैव१५४ जो लोग पढ़ाने की जीविका करते हैं तथा जो प्रवीख हैं और जो अखवारों के संपादक हैं उन्हीं लोगों के पाशितल में यह पूर्वाक्क रेखा स्पष्ट एवं गहरी होता है।। १५४ ।। नार्या यदा पाणितले विभाति रेखा विशुद्धा वितता हि यस्या:। भूतादिवाधापरिपीडिताङ्गा संगीतरक्ा प्रमदा तदा स्यात् १५५ जिस नारा के पाशितल में साफ़ व चौड़ी गर्डल रेखा हो वह भूत-प्रेत की बाधाओं से पीड़ित और गानेवाला होती है॥ १५५॥ मणिबन्धस्थरेखाफल * तिस्रो हि रेखा मणिबन्धदेशे वित्तस्य चाद्या गदिता सुधीभिः। प्रोक़ा द्वितीयाखिलशास्त्रकाणामेव तृतीया भणिता हि भक्रे:॥ मणिबन्धदेश (करब्ज़े) में तीन रेखाएँ तिरछी (आड़ी) शोती हैं। उनमें से पहली धन की, दूसरी शाख्त्रों की, और तीसरी मक्ि की रेखा कहाती है॥ १५६॥ मतान्तर रखाश्चतस्रो मणिबन्धदेशे द्रव्यस्य मुख्या द्वितयी च शास्त्री।
- पहुँचे रेखा एकधन, द्वितिये परिडत जान। तीन सुरेखा भक्कनर, चार दरिद्र वमान। १ किसी-किसी का कथन है कि ये चारों रखाएँ क्रम से अर्थ. धर्म, काम और मोन की सूचफ है। -संपादक सामुद्रकशास््न भक्केस्तृतीया भणिता वुधेन्द्र्दारिद्रययुक्का श्रुतिसंमिता स्यात्॥ मणिबन्ध देश में तिरछी चार रेखाएँ होती हैं। उनमें से पडली धन की, दूसरी शास्त्री रेखा, तीसरी मक्ि की, और चौथी दारिद्रय की रेखा कह- लाता है॥ १५७ ॥ पुनरप्याह हेल्थस्वरूपा प्रथमा हि रेखा प्रोक्का द्वितीया किल वेल्थरूपा। प्रास्पेरिटी वै भणिता तृतीया रेखा कवीन्द्रैर्वुधसंमता च १५८ पहुँचे में पहली आरोग्य का रेखा होती है। दूसरी धन दौलत की और तीसरी वदती की रेखा मानी है॥ २५८॥ एतास्तु तिस्रो मणिबन्धदेशे गम्भीररूपा विशदा विभान्ति। सोयं बलिष्ठो मनुजो धनाढ्यो गभी रुद्धिर्विदितो धरायास्१५६ जिसके पहुँचे (कब्ज़े) में ये तीनों रेखाएँ गहरी एवं साफ़ होँ वह बलवान्, धनवान्, गम्भीर बुद्धिवाला और प्रसिद्ध होता है । १५६।। आद्या तु रेखा मिलिता यदानीं विद्योतते चेत्खलु स्वल्परूपा। यत्नेन जीवेन्मनुजस्तदानीमुद्धिग्नचित्तो भ्रमतेप्यजस्रम्१६० यदि पहली रेखा कम या ज़्याद: जुड़ी और छोटी हो तो वह बड़े उपाय से जीता और उद्विग्न चित्तवाला होकर हमेशा तृमा करता है?६०॥ आंरोग्यरेखा मणिबन्धदेशे गम्भीररूपा यदि भाति भिन्ना। दौर्भाग्ययुक्ो मनुजस्तदानीमल्पं च वित्तं लभते कदापि १६१ यदि पहुँचे में आरोग्य एवं धन की रेखा गहरी और स्पष्ट हो तो वह दौर्भाग्यशाली तथा कमी थोड़ा धन पाता है।। १६१।। रखात्रयीणां यदि मध्यदेशे चिह्नं त्रिकोएं विशदं विभाति। सोऽयं जनो हृष्टमना महौजा वृद्धे वयस्के सुखतामुपैति॥१६२॥ The Bracelets- १ दध्यस्य रेखा इति वा पाठ:। द्वितीय खएड यदि पहुँचे में तीन रेखाओं के बीच त्रिकोण का साफ़ निशान हो तो वह हर्पित मनवाला, महावली होता और वृद्धावस्था में सुख पाता है॥१६२। संछिन्नकाया यदि भाति चाद्या रेखा गभीरा विशदस्वरूपा। सोयं वलिष्ठो मनुजो मदान्धो मन्दस्व्रभावो ममतामुपै त१६३ यदि कब्ज़े में पहली रेखा गहरी व साफ़ तथा कटी प्रतीत हो तो वह महावली, मदान्ध, नीच स्वभाचवाला व मोही होना है।। १६३।। रखात्रयीतश्चलिता यदानीं भाग्यस्य रेखा तनुतासमेता। मिथ्याप्रभाषी मनुजस्तदानीं संस्थाविहीनोऽप्यघमो नराणाम् यदि तीनों रेखाओं से चली तथा पतली भाग्य रेखा हो तो वह झूठा, मर्यादाहीन और अधम होता है॥ १६४॥ रखात्रयस्थं विशदस्वरूपं तारानुरूपं यदि भाति चिह्रम् । प्रापोति वित्तंभनुजोप्यलभ्यं भूमिस्थितं वा लभते धनोघम्१६५ यदि तीनों रेखाओं पर साफ़ तारा का निशान हो तो वह अज्ञभ्य धन पाता है, या भूमि में गड़े हूए धन को पाता है॥ १६५।। पूर्वोक्कचिह्नं मणिबन्धदेशे नो भाति सम्यङ्मनुजस्य यस्य। सोयं मनुष्यो व्यभिचारशाली प्रापोति वित्तं गणिकादिकेम्यः जिस मनुष्य के कब्ज़े में पूरोंक़ निशान भली भाँति हो वह व्यभि- चारी होता तथा वेश्या आदि से धन पाता है। १६६।। आक्रम्य शुक्रं यदि भाग्यभग्नी संभिध पैत्रीं शशिनं समेति। सांयात्रिकःस्यान्मनुजस्तदानी व्यापारशाली व्ययतासमेतः॥ यदि शुक्रालय को आक्रमण कर भाग्यरेखा की भगिनी रेखा पैत्रीरेखा (लाइफ़ लाइन) को भेदकर चन्द्रमा के पास पहुँचे तो वह जहाज़ी एवं व्यापारी तथा खर्चीला होता है॥ २६७।। समुत्थिता चेन्मणिमन्धदेशादज्वी सुरेखा यदि याति चान्द्रिम्। प्राज्यं धनं वैलभते मनुष्यः संपत्तिशाली सरलस्वभावः॥१६८॥ सामुद्रकशास् यदि मशिबन्ध (कब्ज़े) से उठी सीधी भाग्यभगिनी रेखा बुधाल्य पर्यन्त चली जाय तो वह सम्पत्तिशाली, सीधे स्वभाववाला और धनी होता है॥। १६८ ।। एषा सुरेखा विशदा यदानीं गम्भीररूपा दिनपं प्रयाति। सोयंजनो वित्तवतां सहायात्पामोति वित्तंसुखदो नराणाम्१६६ जब यह साफ़ गहरी रेखा सूर्यालय पर्यन्त जाय तो वह धनवानों की सहायता से धन पाता और मनुष्यों को शुभदायक होता है॥ १६६॥ अथ करतलफलानि १ संभोगरेखा यदि याति मध्यां शाखाविहीना नहि तत्र लग्ना। नेजेन दोषेण समाकुलात्मा यायाजनो मृत्युमुखं नितान्तम्१। जिसके करतल में संभोग रेखा (आयुरेखा) मध्यमापर्यन्त चली जाय और शाखाहीन होकर उस अंगुली से न मिले वह स्वकृत दोप से व्याकुल होता तथा मृत्यु पाता है॥ ? ॥ २ मातुः सुरेखा यदि खरिडता सा चापानुरूपा समियात्सु- भोगाम्। मानापमानेन युतो जनः स्यादात्मापघाती कथितः सुधीभिः॥ २ ॥ जिसकी माता की रेखा ख़लडित और धनुपाकार होकर भोगरेखा के सामने पहुँच जाय वह मान व अपमान से युक्त हो आत्मघात करना है।२॥ ३ छिद्रद्वयेनापि युता यदा स्यात्संभोगरेखा परिपूर्णदेहा। कट्यार्तियुक्नं मनुजं करोति दौर्बल्यगात्रं ह्युदरामयं तम् ॥ ३ ॥ यदि संभोगरेखा (आयुरेखा) पूर्ण हो तथा उसमें दो द्ेद हों तो उसको कमरव्याधि से युक्क, दुर्बलगात्रवाला एवं पेट का रोगी करती है।।३। ४ रखाविहीना यदिमातृरेखा मिथ्याप्रलापी मनुजस्तदा स्यात्। नैध्ठर्यभावेन युतः सलोभो वासो भवेत्तस्य च दूरदेशे ॥४ ॥ जिसकी मातृरेखा रेखाहीन हो वह मिथ्याभापी, लोभी एवं निठ्ठर होता है। उसका वास दूर देश में होता है ॥ ४ ॥ ५ भाग्यस्य रखा यदिस्वल्पगा स्यात्पितुः सुरेखा खलु वेत्ररूपा। तदन्तरं यत्प्रतिभाति सम्यक् तदा भवेन्मूढतमो व्ययी ना॥५॥ यदि भाग्यरेखा छोटीसी हो एवं पिता की रेखा वेत के समान दिखे तथा उन दोनों का अन्तर (मध्यभाग) भली भाँति दिखता हो तोवह खर्चीला और महामूर्ख होता है॥ ५ ॥ सामुद्रकशास्न ६ यदा भवेन्मध्यमिकासुमूले रेखाद्यं चुद्रतरस्वरूपम्। तदा जनं चातिश्रमं करोति शोकाकुलं तापयुतं च खर्वम॥६॥ मध्यमा के मूल में की छोटी दो रेखाएँ परिश्रमी, शोक से व्याकुल, तापयुक् व सर्वकार्य में अल्पता रखनेवाले की द्योतक हैं। ६ ॥ ७ यदा भवेत्तर्जनि कासुमूले रेखाद्वयं चुद्रतमं विभिन्नम्। तदा शिराघातयुतो जनः स्यात्पापाणकार्ये बहुलाभकारी।७।। तर्जनी के मूल की छोटी व कटी दो रेखाएँ मत्थे के आघात से संयुक्त तथा पत्थरों के कार्य में महालाभ का चिह्न हैं ॥ ७॥ =मातुः सुरेखा यदि मध्यभिन्ना वियुक्रूपा खलु पितृरेखा। तदन्तरेभाति त्रिकोणचिहनं संखसिडतं चेजनकस्य हन्ता॥=॥ यदि माता की रेखा बीच में कटी हो एवं पिता की रेखा उससे अलग से निकली हो और उन दोनों के बीच में खसिडत त्रिकोणकार निशान हो तो ऐसा मनुष्य पितृहन्ता नाम से विख्यात होता है॥८ ॥ ६अनामिकामूलगतं सुचिह्नं गकाररूपं नहि तत्र लग्नम्। चौर्ये रतं तं मनुजं करोति चित्ते कृतन्नं चपलस्वभावम्॥ ६ ॥ यदि सुव्यक्त चिह्न गकाररूप अनामिका के मूल में हो पर वहाँ लगा न हो तो उसको चौरकर्म में रत, चित्त में कृतघ्न एवं चपल स्व्रभाववाला करता है॥ ६॥ १० निशाकरस्थानगतं सुचिह्नं कञ्जानुरूपं वसुपर्णगं स्यात। बाल्ये च मध्येच तथा च वृद्धे वित्तस्य वृन्दं लभते मनुष्यः।१०॥ यदि कमल के आकार का आठपत्तोंवाला, सुव्यक् चिह्न चन्द्रमा के स्थान में हो तो वह वालपन, युवा और वृद्धावस्था में धनसमूह पाता है ॥ १०॥ ११ पितुः सुरेखोपरिंगं विशुद्धं चिह्नं गुणाख्येन युतं यदा स्यात्। कार्योन्नतं तं पुरुषं करोति संनष्टवित्तं विगतासनं च ॥। ११ ॥ यदि पिता की रेखा के ऊपर गुखनामक साफ़ चिह्न हो तो उसको कार्यों में उन्नत, नष्ट धनवाला एवं विगत पदाधिकारी करता है॥ ?१ ॥ (देखो चित्र नं० ६) १ पित्रोः सुरेखे नहि संगते चेद्रेखाद्वयेनापि युते च खगिडते। कर्तव्यकार्ये सरलं सुबोधं धत्तो जनं तं विगतारिवृन्दम् ॥१२। मातृरेखा, पितृरेखा ये दोनों आपस में न मिली हों एवं दो रेखाओं से युक्त हों तथा दो रेखाओं से खषिडत दिखें तो उसको कर्तत्र्य में सीधा, भला जाननेवाला एवं बिना शत्रुवाला करती हैं॥ १२ ॥ २ कनिष्ठिकामूलगता यदा स्यू रेखा: सुचुद्रा बहुला विपूर्णाः। विश्वासहीनं पुरुषं वदन्ति चौयें रतं घोरतरं दरिद्रम् ॥१३ ॥ जिसके करतल में कनिप्रा के मूल में अनेक छोटी एवं कटी रेखाएँ हों तो वह विश्वासहीन, चौरकर्म में परायख, भयंकर तथा दरिद्री होता है ।। १ ३ ।। ३अनामिकामूलगता यदैका रेखा सुपूर्णाऽपविखिडता स्यात्। व्युत्पन्नवुद्धिं विमलस्वगावं कुर्यान्नरं तं महदाश्रयं च ॥ १४॥ आनामिका के मूल में यदि एक पूरी अखंडित रेखा हो तो उसे शास्त्रों में व्युत्पन्नयुद्धि, उत्तम स्वभाववाला एवं राजों के आश्रित बनाती है। यदि पूर्वोक्त रेखा वज्र से खषिडत हो तो उक़क फल का अभाव होता है #॥१४॥ ४ अभ्कुष्ठमध्ये विशदा सुरेखा रेखात्रयेणापि विखिडता स्यात्। सद्वंशजातंमनुजं करोति सद्वंशहीनं यदि लम्बमाना ॥१५॥ अँगूठे के मूल में स्पष्टरूपवाली एक रेखा तीन रेखाओं से कटो हो तो उसे अच्छे वंश में उपजा हुआ जानना। यदि पूर्वोक़ रेखा तीन रेखाओं से लटकी हुई दिखे तो उसे अच्छे वंश का नहीं करती ॥१५॥ ५ मातुः सुरेखा यदि नीचभागे संकर्तिता पुच्छयुता भवेत्तु। धर्मेण हीनं मनुजं करोति पापे प्रवृत्तं पुरुपाधमं तम् ॥ १६ ॥
- इस रेखा के विषय में हम अन्यत्र टिप्पी दे चुके हैं।-सम्पादक। जिसके माता की रेखा नीचे की ओर कटी एवं पूँछ युक् हो तो उसे अधर्मी पापी एवं पुरुपों में महानीच जानना ॥ १६ ।। ६ संभोगरेखा यदि नीचदेशे संखसिडता चेत्पृथगा विभाति। पुत्रैर्वियुक्ं पुरुषं करोति रक्ाधिकं रोगयुतं चिमूढम् ॥ १७॥ जिसकी संभोगरेखा (आयुरेखा) नीचे की ओर खसिडत एवं फ़ासिले पर हो उसे सन्तानहीन, अधिक रक्रवाला, रोगी तथा मूर्ख जानना चाहिए॥ १७॥ ७ संभोगरेखोपरिगं यदा स्याद्रेखाद्वयं तर्जनिकासुमूले। व्याजेन युकं ध्रुववाक्यहीनं कुर्याजनं चातिश्रमं सदुःखम्॥।१८॥ तर्जनी के मूल के सामने संभोगरेखा के ऊपर मिली हुई दो रेखाएँ दिखें तो उसे कपटी, स्थिरवाक्यहीन, महापरिश्रमी एवं दुःखी जानना ॥। १८ ॥ ८ संभोगरेखा यदि मध्यभागे वञ्रास्ययुक्का च गभीररूपा। कुर्यान्नरं तं परुषस्वभावं नीचेन साकं कलहे प्रवृत्तम् ।। १६ ।। यदि संभोगरेखा (आयुरेखा) बीच में वज्रमुखी एवं गहरी-सी हो तो ऐसे प्राणी को कठिनहृदयवाला तथा अधम जातियों से बखेड़ा रखनेवाला बनाती है॥ १६ ॥ ६पितुः सुरेखोपरिगं यदा स्याद्रेखाद्यं रेखयुगेन भिन्नम्। भार्यासमूहेन युतं करोति भार्याविहीनं बहुखयिडतं चेत्॥२०॥ पिता की रेखा के ऊपर दो रेखाओं से खणिडित दो रेखाएँ हों तो उसे मार्यासमूहयुक्त रखती हैं। यदि पूर्वोक़ दोनों रेखाएँ अनेक रेखाओं से खसिडत हों तो उसे मार्याविद्दीन कर देती हैं॥ २०॥ १० मातुः सुरेखा यदि मध्यदेशे वज्रास्ययुक्ा च विभिन्नरूपा। वाग्वञ्रयुक्कं मनुजं करोति पुरोहितेनापि विवादवन्तम् ।।२१।। जिमके वत्रमुव के निशान से युक्त मातरेखा बीच में कटी हो वह अपने पुरोहित से लड़ाई रखता तथा कठोर वाणी बोलता है॥ २१ ॥ ११अङ्कष्ठमूले विशदं यदा स्याद्रेखाचतुष्कं च पृथक्स्वरूपम्। चित्ते कृतन्नं मनुजं करोति व्यायामसक विविधार्तियुक्कम्२२॥ यदि स्पष्ट अलग अलग अँगूठे के मूल में चार रेखाएँ दिखें तो वह अकृतज्ञं होता, कसरत करता तथा अनेक रोगों से घिरा रहता है।। २२॥। १२स्यातां गते मध्यमिकासुमूले रेखे सुरेखाद्धयखसिडते चेत्। शूलाख्यरोगण युतं दधाते कारुरायहीनं विकलं जनं तम् २३ जिसकी मध्यमा के मूल में दो रेखाएँ दो दो रेखाओं से खषिडत हों, उसको विकल, करुणाहीन तथा शूलबीड़ा से पीड़ित जानना ॥२३॥ १ ३सर्वाङ्कलीनां प्रथमे परुष्के कुम्भाख्यलग्नं यदि राजते तु। तदा जनो मजति वारिराशो विमुकसंगो विरहातुरश्च २४। यदि सप अंगुलियों के पहले पर्व में कुम्भराशि का चिह्न हो तो वह विरह-व्याकुल होता तथा तालाब या नदी में हूब जाता है॥ २४॥ (देखो चित्र नं० १०)# चतुर्दशल क्णाङ्गित करतलफल १पित्रा वियुक्का यदि मातृरेखा रख/त्रयेणापि युता च भिन्ना। हत्यासहस्रेण युतो जनः स्याद्द्वीपान्तरं चैति कुटुम्बशत्रु:२५ जिसकी माता की रेखा पिता की रेखा से जुदी हो तथा तीन रेखाओं से संयोग कर कटी सी दिखे, वह हज़ारों हत्या करनेवाला एवं भाई बन्धुओं से विरोधी होकर द्वीपान्तर-वास का दंड पाता है॥ २५॥ २मातुस्सुरेखा यदि पूर्वभागे रखाद्रयेनापि विकर्तिता स्यात्। तदा जनो गच्छति दूरदेशं चान्यायकार्ये समुपैति घातम्२६ जिसकी माता की रेखा पूर्वभाग में दो रेखाओं से कटी हो वह दूर देश में जाकर अन्याय से मारा जाता है॥ २६ ॥
- पाठकों ने अब यह देखा होगा कि पहले किया दुश राशि आदि के सिह्ध- स्वरूप-ज्ञान का विषय अय कितना महत्वपूर्ण प्रतीत होने लगा। राशियों, म्रहॉं. तथा नक्षत्रों के चिह्न यही कारण है, बड़ मार्के की बीज़ हैं। संपादक। सामुद्रकशास ३ प्रदेशिनीमूलगतं विशुद्धं चिह्नं धनाख्येन युतं यदा स्यात्। पदोन्नति वै लभते मनुष्यः शिल्पे प्रवीणो व्यवसायमान्य:२७ जिसकी तर्जनी की मूल में धन नामक (+) चिह्न दिखे वह अपने अधिकार की उन्नति पाता और शिल्पकार्य में प्रवीग, तथा रोजगार द्वारा माननीय होता है। २७ । ४ मध्यापरुष्कं तृतयं विलङ्ध्य रखा विमिश्रा यदि याति भोगाम् कारागृह वासमुपैति प्राण्ी श्यामा सुरेखा यदि चैति मृत्युम् २८ जिसकी संभोगरेखा के सामने मध्यमा की तीसरी पर्व (पोर) को नाँघ कर एक नुद्ररेखा से मिली रेखा हो तो वह जेलखाने में वास करता है। यदि पूर्वोक्क रेखा कुछ काली-सी हो तो मृत्यु पाता है॥ २८ ॥ ५. निशाकरस्थानगतं
स्त्रीपद्तललक्षण (Part 6)
सुचिह्नं कुम्भस्वरूपं यदि शोभते तु। तदा जनो मजति तोयराशौ श्लेष्मस्वभावो बहुपीडितश्च।। जिसे यदि चन्द्रमा के स्थान में कुम्भ के रूप का चिह्न हो तो वह जल में दूबता है। कफपकृति का तथा व्याधियों से घबराकर नदी आदि में डूबता है॥ २६ ॥ ६ पितुः सुरेखा मणिबन्धमेति पीना विशाखा परिपूर्णरूपा। मातापितृभ्यां परिवञ्चितस्सन्नामोति जन्तुर्विफलं समस्तम् ३० यदि पिता की रेखा पूरी, मोटी, विगतशाखावाली एवं मखिबन्ध पर्यन्त चली जावे तो वह माता-पिता से छला जाता और समस्त कार्यों में विफल होता है॥ ३० ॥ ७ मातुस्सुरेखा निकटे यदा चेन्नाक्षत्रचिह्नं विशदं विभाति। तदा जनो भूपतिवल्लभस्स्यात्स्वज्ञातिवृन्दे समुपैति मानम्॥ नन्तत्र चिह्न यदि मातृरेखा के समीप साफ़ हो तो वह राजा का प्यारा और अपने वंश में प्रतिष्ठिन होना है। ३१ ॥ =अङ्गुष्मूले ममकोणचिह्नं रेवाद्रयेनापि युतं यदा स्यात्। तदा जनो मजजति वारिगशॉ म्वल्पं धनं विन्दनि सर्वकाले॥ जिसके समकोण का निशान अँगूठा की मूल में दिखे तो वह जल में डूता और सर्वत्र थोड़ा धन पाता है।। ३२।। हमातुस्सुरेखा यदि नीचदेशे समानभावेन नतोभयत्र। मानेन युक्को मनुजस्तदा स्यात्पदाधिकारी जनवल्लभश्च ३३ जिसके नीचे माग में यदि माता की रेखा सममाव से दोनां तरफ़ लची- सी हो तो लोक में उसकी बड़ी प्रतिष्ठा होती है। और वह किसी ऊँचे अधिकार में नियुक् होता है, और उसको सब चाहते हैं॥ ३३ ॥ १० भाग्यस्य रेखा मिलिना जनन्यांसंकोणचिह्वेन युता यदा स्यात्। बुद्धया विहीनं मनुजं करोति वादे प्रवृत्तं बहुलामयं च ३४ माता की रेखा में मिलकर यदि भाग्यरेखा (ऊर्ध्बरेखा) कोण चिद्नयुक्क दिखे तो उसे बुद्धिहीन, बड़ा झगड़ाल् एवं अनेक रोगोंवाला बनाये रखती है-॥ ३४॥ १ १ भाग्यस्य रेखा निकटे विभाति चिह्नं चतुष्कोणयुतं त्रिपर्णम्। निर्वोधरूपो मनुजस्तदा स्यान्नार्या यदा चेत्कुलटा भवेत्सा।। तीन दलोवाला निशान यदि भाग्यरेखा के समीप चार कोनों से युक् हो तो वह ज्ञानहीन होना है। यदि स्त्री के करतल में पूर्वोक़ निशान दिखे तो वह व्यमिचारिखी होनी है।। ३५ ।। १२अनामिका मूलगता सुरेखा स्थूलस्वरूपा कुटिला यदा स्यात प्रसूतिकाले रमणीगणानां मृत्युं प्रदद्याद्रयदा जनानाम् ३६।। यदि मोटी एवं टेी शोमनरंखा अनामिका के मुज में हो तो मसूति काल में नारीगखों को मृत्यु देती है। और यदि पुरुषों के करतल में पूर्वोक़ रेखा दिखे तो उन्हें भयदायक होती है॥ ३६ ॥ १३कनिष्ठिका मूलगता यदा स्यू रेखा विशुद्धास्सरलाश्च तिसत्रः सर्वेषु कार्येषु महाप्रवीणो भूत्वा व वित्तं लभते मनुष्यः ३७।। जिसे कनिष्ठा की मूल में सौधी तीन रेखाएँ हों वह सत कार्य करने में समर्थ तथा धन से लाभ उठाता है॥ ३७॥ सामुद्रकशास्त्न १४प्रदेशिनीं चापि विलङ्ग्य् रखा पूर्णा विशाखा यदिभातिभो- गा।यावजनोजीवति जीवलोके हत्याप्ुतो भीतियुतश्च तावत् जिसकी प्रदेशिनी (तर्जनी) को नाँघकर पूर्ण भोगरेखा विगतशाखा- वाली हो वह जब तक जीवलोक में जीता है तब तक हत्याओं से घिरकर मयभीन रहता है। ३८ ॥ ( देखो चित्र नं० ११) अथ त्रयोदशलक्षणाङ्गितकरतलफल १ पित्रा वियुक्ा यदि मातृरेखा प्रदेशिनीमूलगता विभाति। अर्थप्रणाशं लभते मनुष्यश्चानन्दहीनो भ्रमते नितान्तम्॥ जिसके करतल में पिता की रेखा से वियुक मातुरेखा यदि तर्जनी की ल में हो तो उसका धन नाश होता और वह आनन्दहीन होफर भूतल में बहुत चूमता है॥। ३६ ।।* २ समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशाद्रेखा विभिन्ना समुपैति काव्यम्। तदा महात्मा मनुजः सुचेताः सत्ये रतः स्याद््चवहारहीनः४० यदि मशिबन्ध से उठी कटी-सी रेखा शुक्र के समाप चली जावे तो वह महात्मा एवं शोभन मनवाला होना तथा व्यवहारहीन और सत्य में परा- यण रहता है॥ ४० ॥ भिन्नत्रिकोऐन युता सुपूर्णा भाग्यस्य रेखा यदियाति भोगाम् तदा स्व्देशे मृतिमेति जन्तुः संखसिडता चेत्पतितो महोच्चात्॥ कटे हुए त्रिकोणयुक पूर्ण भाग्यरेखा यदि मोगरेखा में मिल जावे सो वह अपने देश में मौत पाता और यदि भाग्यरेखा मलीमाँति खएिडत हो तो वह ऊँचे स्थान से गिरकर मर जाता है॥ ४१॥ ४ समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशकात्पितुः सुरेखा यदि याति तर्ज- नीमू। तदा जनो गच्छति दूरदेशकं नापोतिवित्तं भ्रम तेभयार्तक:
- हम आगे यह बना चुके हैं कि चेहरे पर जिस तरह आँख-कान आदि के लिए निश्चित स्थान है उसी प्रकार हाथ पर प्रत्येक प्रधान रखाओं के लिए खास स्थान निश्चित है। यदि आँस्व कान की अधिकता से फैली हां, देखनेवाले उसे असाधारण वयक्ति कहेंगे। इसी प्रकार रंखा के स्थानान्तर होने का परिशाम होता है। संपादक। द्वितीयखड यदि मशिबन्ध से उठ पिता की रेखा तर्जनी पर्यन्त चली जाबे तो वह दूर देश को जाता है। परन्तु धन नहीं पाता, इसलिए भय से घबराता चूमता है॥ ४२ ॥ ५ अनामिकामूलगतं सुचिह्नं नक्षत्ररूपं विशदं विभाति। संपत्तिमङ्गैः सहितो नरः स्यादापोति वित्तं बहुबन्धुसौख्यम्॥ यदि अनामिका के मल में नत्तत्ररूप (नखत के आकार ) शोमन चिह्न साफ़ हो तो वह बहुत-सा धन एवं बन्धु-सौख्य पाता है॥ ४३॥* ६ संभोगरेखा यदि याति तर्जनीं शाखाविहीना मिलिता च भाग्यके।दौर्भाग्यवन्तं मनुजं करोति सा तीच्णास्त्रातेन मृतिं ददाति वै ॥ ४४ ॥ यदि संभोगरेखा माग्यरेखा से मिल शाखाहीन होकर तर्जनी पर्यन्त चली जाये तो उसको बुरे भागवाला बनाती और तीच्णा अख़ाघात से मौत देती है॥ ४४॥ ७मातुः सुरेखा यदि नीचदेशे समायुता चोर्मिकया विभाति। दारिद्र्यदोपेण युतो जनः स्याद्गुह्यामयो गौरवभावशून्यः४५ जिसके नीचे तरफ़ मातुरेखा मुँदरी के निशानयुक् हो वह दान्द्रिच से घिरा, गौरवहीन एवं गुहदेश में रोगवाला रहता है॥। ४५॥ मअ्नामिकामध्यमिकासुमध्यंह्वृणाख्यचिह्वेन युतं यदा स्यात्। तदा जनो निषठरतासमेतो दीर्घेए क्रोधेन परिप्रुतः स्यात् ४६ अनामिका एवं मध्यमा के बीच ऋण (-) नामक चिह्न हो तो वह बड़ा क्रोधी तथा निप्ठुर रहता है॥ ४६॥ हनिशाकरस्थानगता गभीर रेखा यदेका जननीमुपैति। तदा जनो निन्दनहासकारी धर्माधिपे वित्तधरो दयी चेत ४७ जिसके चन्द्र के स्थान से एक गहरा रेखा मातृरेखा के पास जाने वह
- सूर्य स्थान पर नक्षत्र चिह्न आ्कस्मिक प्राप्ति, सौख्यांदि धन जन सभी का देनेवाला है। यह चिह्न इस स्थान पर उत्तम कहाता है। संपादक। सामुद्रकशासत्र निन्दा करता हुआ हँसता रहता है। यदि दो रेखाएँ मातरेखा के समीप जातें तो नह धर्माधिप धन घरता है॥ ४७॥ १०पितुससुरेखोपरिंगं यदा स्याद्त्तार्धचिह्नं परिपूर्णरूपय्। तदा जनस्तिष्ठति स्वस्य गेहे भयप्रदः स्यात्परिवारवर्गे ४८॥ जिसके पिता की रेखा के ऊर पूर्णरूप से अरधवृत्त का निशान दिखे ह अपने घर में ही रहता और अपने परिवारसमूह में भयदायक होता है भ८ ११भाग्येन युक्का विशदा सरक्ा प्रदेशिनीं याति सुभोगरेखा। तदा जनो ब्रह्मविचारसारो जितेन्द्रियः स्यात्तु विरक्रचित्त: ४६ यदि भाग्यरेखा युक्त सुभोगरेखा साफ़ व लाल हो तथा तर्जनी पर्यन्त जावे तो वह "ब्रह्म" का विचार करता, जितेन्द्रिय और विरक् चित्त रहता है।। ४६॥ १२ महीसुतस्थानगतं सुचिह्नं खङ्गानुरूपं नहि याति मध्यम्। मिथ्यापलापी मनुजस्तदा स्याल्लोभी धनेप्सुर्धृतिधर्महीन:५० यदि मङल के स्थान में तलवार के समान शोभन चिह्न इथेली के बीच को न नाँघै तो वह मिथ्नामापी, लोभी, धनामिलापी और धारण पवं धर्महीन रहता है॥ ५० ॥ १३पितुःसुरेखोत्थित चुल्िरूपया संकर्तिता स्याजननी सुरेखया तदा जनो दुर्बलदेहधारकः प्ीहादिरोगैर्नितरां प्रपीडितः ५१॥ यदि मातृरेखा पिता की रेखा से उठी चूल्हे के आकारवाली शोमन रेखा से कटी हो तो वह दुर्बल तथा सीहा एवं यकृत् आदि रोगों से पीड़ित रहता है॥ ५१ ॥ (देखो चित्र '० १२) १संभोग रेखा यदि कर्तिता स्यात्तस्या:सुशाखा समुपैति मध्याम् सन्तानप्रीतो मनुजस्तदा स्याद्धामी सुनामी व्यवसायपूर्णः।। जब संभोगरेखा (.आयुरेखा) कटी-सी हो, और उसकी शाखा मध्यमा पर्यन्त जावे तो वह सन्तानों पर प्रसन्न रहता, धामी, बड़ा नामी और रोजगार से पूर्ण होता है॥ २।। द्वितीय खग्ड २ पितुः सुरेखोत्थितभाग्यरेखिका मध्ये गभीरा समुपति मातरम् अशीतिवर्पप्रमितं सुजीवनं लब्ध्ा जनश्रैति मृतस्य वित्तकम् जब पिता की रेखा से उठी माग्यरेखा (ऊर्ध्बरेखा) बीच में गहरी हो और माना की रेखा में मिल जावे तो वह अस्सी वर्ष की आयु पाता तथा मृतक पुरुप का धन-समूह पाता है।। ५३॥ ३सम्भोगरेखा यदि नीचदेशे वृत्ताख्यचिह्वेन युता विभाति। तदा जनो वालगणप्रियः स्यादाचारहीनो व्यभिचारशीलः॥ जब नीचे की तरफ वृत्त नामक निशान युक संभोगरेख़ा हो तो वह बालकों का प्यारा, आचारहीन और व्यभिचारपरायण होता है। ५४ ॥ 2 कनिष्ठिकामूलगते यदास्तो रेखे सुनुद्रे त्रयपर्वंगे चेत्। तदा जनः स्याद्हुभोगयुक्ो नार्या यदा चेत्सुखकारिणा सा॥ जब कनिष्टिका के मूल में छोटी सी दो रेखाएँ उसकी तासरी पोर तक पहुँच जावें तो वह अनेक भोगसंयुक्त होता है। यदि पूर्वोक़ रेखाएँ स्त्री के करतल में दिखें तो वह सुखकारिणी तथा संभोगकारिखी होती है ५५ # ५संभोगरेखा यदि मध्यमान्ता रेखाचतुष्कै: परिकर्तितास्यात्। तदा जनो भूपगणैविभीतः संव्यस्तचित्तः परितः प्रयाति५६॥ जय मध्यमापर्यन्त पहुँचकर संभोगरंखा चार रेखाओं से कटी प्रतीत हो तो वह राजगखों से डरता, चित्त डामाडोल करता और चारों तरफ़ चूमता फिरता है॥ ५६ ॥ ६मध्यापरुष्कं तृतयं विलङ्ध्य रेखा विभिन्ना यदि याति भाग्याम् वक्षश्शिराघातयुतो जनः स्याद्राधासमूहैः परिपीडिताङ्ग:५७ जिसे मध्यमा की तीसरी पर्व से एक रेखा भिन्न होकर भाग्यरेखा के समीप जावे तो वह वन्ःस्थलाघात, शिराबात संयुक्त तथा बाधा से पीड़ित रहता है॥ ५७ ॥ ७ अङ्कुष्ठमध्याद्यदि याति तर्जनीं रेखा यदैका चतुरस्रमध्यमा। • ये दो रंखाएँ कभी कभी डाक्टर या सर्जन ( चीरफाड़ कग्नेवाले) होंने की विशेपता भी बनानी है। संपादक। सामुद्रकशासत् तदा जनः स्याद्गुरुतः पुरोहितात्संपर्कहीनो बहुवादकारकः॥ जिसे एक रेखा अँगूठा के मध्य से चल चौकोगवाली तर्जनी पर्यन्त पहुँच जावे यह बहुवादी तथा अपने गुरु एवं पुरोहित का विरोधी होता है॥५८॥ =मातुः सुरेखा यदि नी चभागे चिह्नेन गोलाकृतिना युता स्यात् वामे च दक्षे च विनष्टचचुश्चिह्रदयं चेत्कथितः सदान्ध:५६॥ यदि माना की रेखा के नीचे बाई तरफ़ गोलाकार निशान दिखे तो वह बाम आँखे का काना होता है। जो दाहिनी तरफ़ हो तो दाहिनी आँख से काना होता है। जो रेखा के दोनों तरफ़ निशान हों तो वह हमेशा अन्धा रहता है॥ ५2॥ ६संभोगरेखा निकटे यदास्ति वृत्तार्धचिह्नं विशदं विशालम्। तदा जनो बान्धवमृत्युहेतुः कठोरवादी कठिनस्वभावः ६०॥। यदि संभोगरेखा के समीप साफ़ तृत्तार्ध चिह्न हो तो वह अपने बान्धवों की मौत का कारण होता तथा कठिन स्वभाववाला कहा जाता है॥६०॥ १० पितुः सुरेखा मिलिता जनन्यां मातुः सुरेखा नहि खसिडता स्यात। तदा जनो वेदविचारशीलो ज्ञानी गुणी स्यादभिमानहीनः ॥ ६१ ॥ यदि पिता की रेखा गतृरेखा में मिल जाचे और मातृरेखा खसिडत न हो तो वह वेद का विचार करता, ज्ञानी, गुगी, तथा अभिमानहीन होता है॥ ६१ ॥ ११ मातुः सुरेखा निकटे यदास्ति गुणाख्यचिह्नं परिपूर्ण रूपम्। तदा जनः स्याद्रमणीगणानां वाक्योत्तरे प्राप्तमहाधिकार: ६२ यदि माता की रेखा के समीर गुग्ण नामक चिह्न (X) साफ़ हो दो वह नारियों के वाक्यों के उत्तर देने में बड़ा चतुर होता है॥ ६२ ॥ १२चपाकरस्योपरिगा यदा स्यू रेखास्सुनुद्रा बहुला:सुपूर्णाः। तदा जनो घोरतरं सुरोगं प्राप्रोति काये कमलाविहीनः ६३॥ यदि बहुत-सी छोटी-छोटी रेखाएँ चन्द्र पर हों तो वह लनमीहीन होता तथा भयंकर रोगी भी होता है। ६३ ॥ १ ३समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशात्पितुः सुरेखा बहुवक्ररूपा। तदा जनो वह्निविदग्धगात्रो वैकल्यचित्तो विविधामयश्र ६४ यदि पिता की रेखा मशिबन्ध से उठ अनेक स्थानों में टेढी-सी हो तो वह अग्नि से जली देहवाला, विकल चित्त, और अनेक रोगोंवाला होता है॥ ६४ । १४ अङ्गष्ठमूले विशदाःसुपञ्च रेखायदा भान्ति समान्तरालाः। तदा जनस्सौख्ययुतो धनी स्याद्रेखात्रयं चेत्फलताविनाशः॥ यदि साफ़ एवं समान अन्तरवाली पाँच रेखाएँ अंगूठे की मूल में हों तो वह सुखी तथा धनी होता है। यदि तीन ही रेखाएँ हों तो फल का नाश होता है।। ६५ ।। १५ समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशाद्रेखा गभीरा समुपैति चन्द्रम्। विश्वासयुको मनुजस्तदा स्याद्विश्वासहीनो निजबन्धुवर्गे ६६ यदि मशिबन्ध से उठी एक गंभीर रेखा चन्द्र के समीप जावे तो वह विश्वासयुक होता, पर स्वबन्धुओं में विश्वासहीन रहता है ॥ ६६॥ (देखो चित्र नं० १३) अथ पुनरषि पश्चदशलक्षणाङ्गितकरतलफल १ मातुः सुरेखोपरिगं सुचिह्नं सर्पानुरूपं यदि याति पैत्रीम्। तदा जनः स्यात्सरलस्वभावो निर्लजरूपः सहसा समेतः ६७ जिसकी माता की रेखा के ऊपर से सर्पाकार चिह्न यदि पिता की रेखा के पास तक जावे, वह सीधे स्व्रभाववाला, वेशर्म और साहसी होता है६७॥ २कनिष्ठिकामूलगता विभाति रेखा सुरेखाद्वयखसिडता चेत्। तदा नरः स्याद्वयभिचारयुक्को नार्या यदा चेद्गणिका भवेत्सा ६८. यदि कनिष्ठा की मूल की रेखा दो रेखाओं से खसिहत हो तो वह व्यभिचारी होता है। यदि पूर्वोक़ रेखा स्त्री के करतल में दिखे तो वह वेश्यावृत्ति से निर्वाह करती है॥ ६८ ॥ सामुद्रकशास्र ३अनामिकामूलगतं विभाति वृत्तार्धचिह्नं विशदं विशालम्। तदा जनो बन्धुजनस्य घाती द्वेषी विषादी परनिन्दक: स्यात् यदि शनामिका की मूल में साफ़ वृत्तार्थ चिह्न हो वह बन्धुजनों का मारने- वाला, शत्रुता रखनेवाला, विपादी और सबकी निन्दा करनेवाला होता है६६ ४कनिष्ठिका मूलगतं सुचिह्नं लूतानुरूपं विशदं विभाति। तदा जनः स्यात्परिहासकारी जल्पाकरूपी विजयाभिलाषी॥ यदि कनिष्ठा की मूल में साफ़ मकड़ी के आकारवाला चिह्न हो तो वह बड़ा हँसने व चकनेवाला तथा विजय की अभिलापावाला होता है॥ ७०॥ ५आयुष्यरेखा यदि मध्यमान्ता अधःसुसच्मोपरितः सुपीना। तदा जनो वैरिगणाभिभूतो विपर्यये चेत्फलमन्यथा स्यात ७१ यदि आयुरेखा (संभोगरेखा) मध्यमापर्यन्त पहुँच नीचे तरफ़ पतली एवं ऊपरले भाग में मोटी-सी हो तो वह दुश्मनों से हारता है। यदि ऊपरले भाग में पतली तथा निचले भाग में मोटी-सी दिखे तो वैरियों को परा- जित करता है॥ ७? ॥ ६संभोग रेखा यदि नीचभाग के संकर्तिता स्यान्तु सुसू चमरेखया। तदा नरःस्यान्नरनाशकारकः संव्यस्तचित्तो निजपितृघातक:॥ यदि संभोगरेखा (आयुरेखा) नीचे की तरफ़ छोटी रेखा से कटी हो तो वह चंचलचित्त, नरहत्याकारी, और अपने चाप का मारनेवाला होता है ॥! ७२ ॥ ७पितुःसुरेखा यदि चोर्ध्वभागे चुद्रा विभिन्ना विशदा सुपूर्ण। तदा जनः सर्वजनप्रियः स्याद्व्युत्पन्नबुद्धिर्विमलस्वभावः७३ ऊपरले भाग में यदि पिता की रेखा छोटी-छोटी रेखाओं से कटी, स्पष्ट तथा भारी दिखे तो वह सबका प्यारा, व्युत्पन्न बुद्धिवाला और विमल स्व्रमाववाला होता है। ७३।। = भाग्यस्य रखा मिलिता जनन्यां संकोणचिह्नंविशदंविभाति। तदा जनो मज्जति वारिराशौ व्यायामसक्ो व्यसनातुरश्च ७४।। यदि भाग्यरेखा मातरेखा से मिल जावे एवं साफ़ को का निशान भी हो तो वह कसरती, जुआरी तथा नदी-नाले आदि में डूबनेवाला होता है।। ७४ ।। धपितुः सुरेखा यदि मध्यभागे चुद्रा विभिन्ना मणिबन्धमुक्का। रोगाभिभूतो मनुजस्तदा स्यात्पूर्वोक्कमानेन विचारणीय: ७५ मणिबन्ध से छूटी पिता की रेखा यदि बीच में छोटी छोटी रेखाओं से कटी हो तो वह रोग से पीड़ित होता है। यह पूर्वोक मान से विचार करना चाहिए। ( एक जब भर का मान दश वर्ष का होता है। इसी संकेत से विचारना चाहिए) ॥ ७५ ॥ * १० भाग्यादध: स्याच्छिविकानुरूपं चिह्नं सुपूर्णं विशदस्वरूगम् तदा नरो नादविचारशीलो मित्राभिभूतो मरणं प्रयाति ७६।। जिसके भाग्यरेखा के नीचे तरफ़ मियाना, पीनस आदि के समान साफ़ २ चिह्न दिखें तो वह सांगीतशात्त्रपरायण तथा मित्रों से अनाद्ृत हो मौत पाता है।। ७६ ॥। ११ भाग्येन भिन्ना यदि पितृरेखा संपूर्ण रूपा मिलिता जनन्याम् आयुष्ययुक्को मनुजस्तदा स्यादयुद्धाभिलाषी विजये रतश्च ७७ यदि मातृरेखा में माग्यरेखा से कटी पू्गी पितुरेखा मिल जावे तो वह आयुष्मान् होता और लड़ने की लालसा रखता तथा विजय में रत रहता है७७ १२ निशाकरस्थानगतं सुचिह्नं चुल्लीसरूपं विशदं विभाति। सम्पत्तिपूर्ण: पुरुषः प्रकाशी पारुष्यहीनो धनतामुपैति॥७=॥ यदि चन्द्र के स्थान में चूल्हे के रूपवाला स्पष्ट चिह्न हो तो वह संपदा- पूर्ण, प्रकाशमान, कठोरताहीन और ठेका आदि व्यापार से धन पाता है ७८ १३समुत्थितं चेन्मणिबन्धदेशात्सर्पानुरूपं समुपैति भाग्याम्।
- हम पहले ही बता चुफे हैं कि समय-निर्णय में अधिक सावधानी रखना चाहिए। हमने कुछ विदेशी-समय-निर्रय-मत भी चित्र नं०४ में विशेषनः दे दिये हैं। पाठकों को ध्यानपूर्वक मनन करना चाहिए। संपादक कारागृहं याति नरस्तदानीं नैजेन दोपेण समाकुलात्मा७६। यदि क़ब्ज़े से सर्प के समान निशान भाग्यरेखा के पास चला जावे तो वह स्वदोप से व्याकुल हो जेल जाता है। यानी वह अपने अपराध से ही जेल जाता है॥ ७६ ॥ १४ काव्यान्तिके तिष्ठति शुद्ध रूपं नाक्षत्रचिह्नं यदि भासमानम् वेश्यासुसक्ो मनुजस्तदास्यान्निन्दान्वितो निन्दितलोकवासी यदि नक्षत्र का स्पष्ट चिद्न शुक्र के समीप हो तो दह वेश्यासक् तथा निन्दित होता और निन्दित लोगों का सहवासी होता है॥ ८० ॥ १५आयुष्यशेषे यदि भाति चिह्नं तारानुरूपं युगलस्वरूपम्। नारीसमूहै: सहितो नरः स्यान्निन्दान्वितः कामकलाकलापी जिसकी आयुष्यरेखा (पितृरेखा) के शेपभाग में तारा के समान दो निशान हों वह स्त्रियों से घिरा, निन्दायुकत तथा कामकलाओं के समुदाय- वाला कहाता है।। ८१ ॥( देखो चित्र नं०१४) १ कनिष्ठिकायास्तृतये परुष्के विभान्ति रेखाः सरलाश्च तिसत्रः। पुत्रत्रयं वै लभते मनुष्यः संवक्ररूपा बहुकन्यकाश्चेत् ॥८२। जिसके कनिष्ठा की तीसरी पर्व में तीन सीधी रेखाएँ हों वह निश्चय तीन पुत्र पाता है। जितनी सीधी रेखाएँ हों उतने ही पुत्र और जितनी टेढी रेखाएँ हों उतनी ही कन्योओं का पिता होता है ॥। ८२ ।। २अनामिकामूलगते यदास्तो रेखे सुनतुद्रे कुटिले विशुद्धे। कट्यार्तिभीति लभते मनुष्यः कामी कलावान्कमलासमेतः॥ जिसके अनामिका की मूल में दो छोटी, टेदी व साफ़ रेखाएँ हों वह कामी, कलावान् एवं लक्ष्मीसंपन्न होता और कमर की पीड़ा पाता है =३।। ३ यदागतं मध्यमिकासुमूले रेखात्रयं चेत्कुटिलस्वरूपम्। वातार्तियुक्को मनुजस्तदा स्याद्वादी विपादी विषयानुरक्: ८४ जिसके मध्यमा की मूल में तीन टेढी रेखाएँ हो वह वातरोग से पीड़ित होता, तथा वादी एवं विपादी और विपयानुरक़ होता है॥ ८४ ॥ द्वितीयखरड ४*आयुष्यशाखा यदि याति तर्जनी वृद्धाङ्कलिं चैति तथा द्वितीयिका। सौभाग्ययुक्को मनुजो दयालुको दाता प्रियः स्याड्बहुजन्तुपालक: ॥| ८५ ॥ यदि आयुरेखा (संभोगरेखा) की एक शाखा तर्जनी पर्यन्त जावे और दूसरी अाँगूठे की ओर, तो वह सौभाग्यसंपत्न, दयावान्, दाता, सबका प्यारा और बहुपालक होता है॥ ८ ५ ॥ ५संभोगरेखा यदि नीचभागे गुणत्रयेणाप्यवकर्तिता स्यात। वातामयः स्यान्मनुजस्तदानीं वाणीविलासो वनितारतश्च।। यदि संभोगरेखा निचले भाग में तीन गुख के X निशानों से कटी हो तो वह बादी रोग से पीड़ित, वाखी का विलास कर रमणियों में रत रहता है॥ =६ ॥। ६मातुः सुरेखा यदि नीचदेशे गोलाकृतिभ्यां च युता ह्यपूर्णा। तदा नरः स्यात्पथमे वयस्के हत्याकरो हानिपरो विशोकी॥ यदि अपूर्ण माता का रेखा के नीचे की तरफ़ दो गोलाकार निशान हों, तो पहली उमर में हत्याकारी, हानि में परायख बनाती है। अर्थात् ये गोल निशान यदि निचले भाग में दिखें तो मध्य एवं वृद्धावस्था में वह प्राखी उत्याकारी होता है। और यदि आररम्मदेश में गोल निशान जितनी संख्या में हों ता पहली उमर में उतने ही आघात करता है॥ ८७॥ ७ पितुः सुरेखा यदि मध्यभागे चुद्रा विभिन्ना परिपूर्णरूपा। रागी विशगी मनुजस्तदा स्यात्पशुस्वभावो बहुहिंसकश्च।। यदि पूर्ण पिता की रेखा निचले भाग में छोटी-छोटी रेखाओं से कटी हो तो वह रागी व विरागी होता, पशुओं-सा स्वभाव रखता तथा अनेक जीवों का घातक होता है॥। ८c ॥
- हमारे देश में इसी को आयुरेखा मानते हैं, पर हमारा समस्त कार्य पितृरेखा को आयुरेखा मानकर हो रहा है। हो सकता है कि उक़रेखा संभोगरेखा Heart line ) को आयुरेखा मानकर भी समस्त जीवन की घटनाएँ ठीक-ठीक बताई जानी ।।-संपादक = आरम्भदेशे यदि पितृरेखा स्थूला सुपूर्णा विशदा सरक्का। तदा जनः स्यात्समराभिलाषी रक्काभिपाती रिपुवंशघाती दह जिसकी पिता की रेखा शुरू में मोटी, बढ़ी व साफ़ तथा रकवर्णवाली दिखे ता वह युद्धाभिलापी होता तथा रक़पात कर वैरियों का वंश विना- शता है॥ ८६ ॥ ६अङ्गुष्ठकस्य प्रथमे परुष्के रखा त्रिशाखा समुपैति पैत्रीम। तदा जनोऽयं प्रथमे प्रसङ्के भूपादिवर्षे रमणीमुपैति॥ ६० ॥ जिसके अंगूठे की पहली पोर में तीन शाखावाली रेखा पितुरेखा के समीप चली जावे तो वह सोलह आदि वर्षों के आने पर पहले मसंग में रमखी पाता है। यानी तीन शाखाओं में से पहली शाखा पितृरेखा के सामने जावे तो सोलड वर्प में, दूसरी शाखा जावे तो २० वर्ष में और तीसरी शाखा जावे तो १६ नर्ष में पहले पहल रमखी के साथ रमर करता है॥ ६० ॥ १० निशाकरस्थानगतं सुचिह्नं रेखात्रयं वेदमिताविभिन्नम। तदा जनो मज्जति वारिरशौ विद्याविहीनो विषयातुरश्च ६१ जिसके चन्द्रमा के स्थान में तीन रेखाओंवाला चिह्न चार रेखाओं से कटा प्रतीत हो तो वह विद्याहीन होता, विपयों में आतुर होकर नदी नाले आदि में डूब जाता है·।। ह? । ११मातापितृम्यां सहितां सुभोगां भित्त्वा सुभाग्या यदियाति चान्द्रिय। तदा जनो मस्तकघातमेति शेषे विभिन्ना मरणं प्रयाति॥ ६२ ॥ जिसकी पिता, माता तथा आयुरेखा को भाग्यरेखा काटकर बुध के स्थान में चली जावे तो वह मत्थे में आघात पाता है। और यदि शेषभाग में मातृरेखा, पितृरेखा व आयुरेखा ये तीनों भाग्यरेखा से भिन्र दिखें तो मौत को ही पाता है। ६२ ॥ १२चन्द्रादघस्तिष्ठति शुद्ध रूपं चिह्नं त्रिरेखं सरलस्वरूपम्। • चंद्रस्थान पर स्थित चिह्नों के संबंध में अन्यत्र भी मिलेगा। द्वितीय खएड आद्ये नरो मन्दफल प्रयाति मध्ये वयस्के शुभतामुपैति ६३। यदि सीधा एवं साफ़ तीन रेखाओंवाला चिह्न चन्द्र के निचले भाग में हो तो पहली अवस्था में मन्दफल (थोड़ा फल) पाना, तथा युवावस्था में शुभ फल यानी दौलत का पाना सूचित करता है।। ६३ ॥। १ ३ अधोविभिन्ना यदि पितृरेखा तदन्तिके स्यान्तु विसर्गचिह्नम। तदा नरो नारिनिभित्तवादी रक्काभिपातं कुरुते रणेप्सुः।।६४।। जिसकी पितृरेखा निचले भाग में कटी हो और यदि उसके समीप विसर्ग का निशान दिखे तो वह ख्त्री के निमित्त झगड़ा मचाता और युद्धा- मिलाषी होकर सामने खून गिराता है॥ ६४ ॥ १४ छङ्गुष्ठमूले विशदस्वरूपं वेदाङ्कव्यस्तं यदि भाति चिह्नम्। दौर्जन्ययुक्को मनुजस्तदा स्याद्रक्ाभिपाती निजबन्धुघाती ६५ यदि उलटे चार के अंक का सा साफ़ निशान अंगूठे के मूल में हो तो वह दुर्जन तथा अपने ही बन्धुओं को मार सामने खून गिराता है॥ ६५ ॥ १५ पितुःसुरेखा यदि नी चभिन्ना भाग्यस्य रेखा समुपैति चान्द्रिम संकोण बेह्े मनुजस्तदा स्यान्नेत्रामयो रोगचयाभिभूतः ६६। यदि पितृरेखा निचले भाग में कटी दिखे और माग्यरेखा (फेट लाइन) बुध पर्यन्त जावे, उस समय यदि संको चिह्न देखा जावे तो वह नेत्ररोगी तथा अन्य रोगों से घिर जाता है।। ६६ ॥। १ ६समुत्थितं चेन्मणिबन्धदेशात्रिकोणचिह्नं परिभाति भिन्नम्। तदा नरः स्यात्परदेशवासी त्रासी धनाशी मरणं प्रयाति ६७।। यदि कटा-सा त्रिकोखचिह्न मशिबन्ध (क्रब्ज़े) से उठा हुआ प्रतीत हो तो वह पाणी परदेश में बसता एवं डरता तथा धनामिलाषी हो मौत पाता है।। ६७ ॥ ( देखो चित्र नं० १५) अथ द्वादशलक्तणङ्गितकर तलफलज्ञान १अनामिकायास्तृतये परुष्के रखाद्यं चिह्नतमं चकास्ति। कुशाग्रबुद्धिर्मनुजस्तदा स्याज्जङ्गार्तिभीति यदि चैति भिन्नम्॥ जिसकी अनामिका की तीसरी पोर में दो रेखाओंवाला चिह्न हो तो वह सामुद्रकशास्त तीव्रबुद्धिवाला होता है। यदि पूर्वोक चिह्न कटा मतीत हो तो उसे जाँघ की पीड़ा का भय होता है।। ६८ ।। २कनिष्ठिकामूलगता विभान्ति रेखाश्र तिस्त्रः सरलस्वरूपाः । तदा नरो दक्षिणबाहुघातं प्रामोति वामे यदि वामपालौध।। जिसके तीन सीधी रेखाएँ कनिष्ठिका (छोटी) अँगुली की मूल में हों तो वड दाहिनी भुजा में चोट खाता, और यदि बायें हाथ में पूचोंक़ निशान हो तो बाई भुजा में चोट खाता है।। ६६ ॥ ३अनामिकामध्यमिकासुमूले रेखात्रयं चेत्सरलस्वरूपम्। पादाभिघातं पुरुषः प्रयाति पापी प्रतापी परुपस्वभावः १००।। जिसकी अनामिका एवं मध्यमा की मूल में सीधा तीन रेखाओंवाला निशान दिखे, वह पापी, प्तापी तथा कठोर स्वभाववाला होता और पैरों में चोट खाता है॥ १०० ॥ ४यदागतं मध्यमिकासुमूले रेखाद्यं चुद्रतरं विभाति। परिश्रमासक्कमना मनुष्य: संखसिडतं चेच्छमताविहीन: १०१ जिस समय मध्यमा की मूल में छोटा दो रेखाओंवाला निशान दिखे तो उस प्राखी को बड़ा मेहनती जानना। यदि पूर्वाक्क निशान खषडत प्रतीत हो तो उसे मेहनत से चचना यानी आलसी तथा खुदगर्जू होना बताता है॥ १०१ ॥ ५प्रदेशिनीमध्यमिकासुमध्ये रेखा यदेका यदि याति घात्रीम्। शीर्षाभिघातान्मृतिमेति जन्तुःसंभोगभिन्ना यदिनैति मृत्युम्। जिसकी तर्जनी एवं मध्यमा के बीच में से एक रेखा मातृरेखा के समीप पहुँचे वह सिर में चोट लगने से मौत पाता है। यदि पूर्वोक़ रेखा भोगरेखा से कटी दिखे तो वह केवल शीश में चोट पाता है पर मरता नहीं ॥१०२॥ ६बृहस्पतिस्थानगतं विशुद्धं रेखात्रयं चिह्नतमं चकास्ति। भूपादिकानां चसहायतः स्यात्सौभाग्यशाली मनुजो महात्मा जिसके तीन रेखाओंवाला निशान बृहस्पति के स्थान में पहुँचा प्रतीत हो तो वह महात्माहोना और राजा एवं महाराजों की सहायता से सौभाग्य- शाली होता है। १०३ ।। ७ मातु: सुरेखा पितरं प्रयाति भिन्नं तदर्ध्व यतिसंख्यकामिः। तावन्मितांश्चौरसजातपुत्रान् गामोति पाणी परवित्तपूर्ण:१०४ यदि याता की रेखा पितृरेखा में मिल जाबे और उसका ऊपरी भाग छोटी-छोटी जितनी रेखाओं से कटा दिखे तो वह पराये धन से पूर्ण होता तथा उतने ही औरसजात पुत्र पाता है ॥ १०४॥ = नुद्रासमेता जननी सुरेखा स्वल्पा गभीरा समुपैति पैत्रीम। मातुः सुमानंमनुजः करोति तन्मानतस्स्याद्ुधिरगपाती १०५॥। यदि शल्प रूपवाली एवं गहरी माता की रेखा छोटी-छोटी रंखाओयुक्त होकर पिता के पास पहुँच जाये ( यानी मिल जावे) तो वह मनुष्य माता का बड़ा मान करता है। यानी माता पर घनिष्ठ प्रेम रखता है। उसी प्रेम से चायीरोगवाला होता और मुख से खून गिराता है॥ १०५॥ ६पितुः सुरेखा मणिबन्धदेशात् संवक्रमध्या यदियाति घात्रीम्। तदा जनश्रैकमना विलासी पामोति सौख्यं विपुलं विकासी।। यदि गशिबन्ध से उठी पितृरेखा बीच में टेही होकर मातृरेखा में मिल जावे तो एकाग्र मनवाला, विलासी, प्रकाशी और बढ़े भारी सौख्य को पाने का सूचक है॥ १०६ ॥। १० पितुःसुरेखोत्थित भाग्यरेखिकास्वत्पासुवक्रा समुपैतिमातरम् आायुष्यमल्पं लभते समानवः कुपथ्यभोजी द्विजदेवनिन्दकः॥ जिसके करतल में पितृरेखा से उठी भाग्यरेखा छोटी एवं टेडी होकर मातृरेखा के समीप चली जावे तो वह कुपथ्य भोजन करनेवाला, देवता एवं ब्राह्यों की निन्दा करता और अल्पायु पाता है॥ १०७॥ ११ समुत्थितं चेन्मणिबन्धदेशात् सर्पानुरूपं समुपैति काव्यम्। तदा जनश्चौर्यपरः प्रतारी पापी प्रतापी परपक्षहारी॥१०८॥ यदि मणिबन्ध से उठा सर्पाकार चिह्न शुक्र के समीप हो तो चौरकर्म- परायण, छली, पापी, प्तापी और परपक्ष हरनेवाले का सूचक जानना?८८॥l
- चोरी के विशपरूप से चिह्न वुधालय में अथवा कनिष्ठा में रहते हैं। बुधालय से इस विषय का अधिक हाल ज्ञान होता है।-संपादक सामुद्रकशाख १२ समुत्थितं चेन्मणिबन्धदेशाद्रेखादयं याति यदा सुपित्रोः। तदा ननोऽयं जलयानयायी धनाभिधायी धनतामुपैति१०९ जिसके मणिबन्ध से उठा दो रेखाओंवाला निशान मातृरेखा तथा पितृ- रेखा के बीच में चला जाबे तो वह जहाज़ या नाव द्वारा यात्रा कर धन पाता है। यानी समुद्र का सफ़र कर बहुत-सा पैसा जोड़ता है ॥ १०६॥ अथ सप्रदशलक्ष पाङ्कितकरतलफल १ कनिष्ठिकायास्तृतये परुष्के गुणाख्यचिह्नं विशदं विभाति। चौर्ये रतः स्यान्मनुजस्तदानीं निर्बोधरूपो विगतपभाव: ११० यदि कनिष्ठा की तीसरी पर्व में गुखा का (X) निशान साफ़ हो तो वह अज्ञानी, विगतमभाववाला, तथा चोरी करनेवाला होता है॥ ११०।। २ कनिष्ठिकायास्तृतयं परुष्कं संगम्य रेखा यदि याति सूर्यम्। तदा नरः स्यादपकारकारी चौर्यापहारी कृतसंशयश्च १११।। यदि कनिष्ठा की तीसरी पोर से एक गहरी रेखा सूर्य पर्यन्त जावे तो वह सबकी बुराई करनेवाला, चोरी से धन हरनेवाला तथा शकी मिजाज़ का होता है॥ १११ ॥ ३ अनामिकामूलगतं सुवङं रेखादयं चिह्नतमं चकास्ति। ज्ञानेन पूर्ण: पुरुषस्तदा स्यात् पदाधिकारी प्रमदाग्रसक्र: ११९।। यदि अनामिका की मूल में टेढा दो रेखाओंवाला निशान हो तो वह ज्ञानी, पदाधिकारी, तथा रमखियों में आसक्क रहता है। ११२ ।। ४ प्रदेशिनीमूलगतं विभुग्नं चिह्नं द्विरेखं यदि याति मन्दम्। शीर्षाभिघातं लभते मनुष्यः संभ्रान्तचित्तो विभुतासमेतः११३ वर्जनी की मूल में टेडा दो रेखाओंवाला निशान यदि शनैश्चर के पास पहुँच जावे तो वह भ्रान्तचित्त, विभुतासंपत्न होता और सिर में चोट पाता है॥ ११३ ॥ ५ बृहस्पतिस्थानगता सुभोगा अधस्सुपीनोपरितस्सुभिन्ना। तदा नरो दीनदशामुपैति दौर्भाग्यशाली बलताविहीन:११४ =५ यदि गुरु के स्थान में सुभोगरेखा (आयुरेखा) नीचे के भाग में मोटी हो सथा ऊपरले भाग में रेखामात्र से कटी दिखे तो वह दौर्भाग्यशाली, दुर्वल और दीनदशा पाता है॥ ११४॥ ६ भोगाघरस्थं विशदस्वरूपं रेखात्रयं लच््मतरं विभाति। वातार्तियुक्को मनुजस्तदा स्याद्यायामशीलो विषयातुरश्च॥ जिसकी भोगरेखा के निचले भाग में तीन रेखाओंवाला स्पष्ट चिह्न हो वह वादी रोगवाला, कसरती और विषयातुर होता है।। ११२ ॥। ७मातुस्सुरेखा मिलितोर्ध्र्वदेश के स्पृष्टा यदा स्यादतिचुद्ररेखया। दोषातुरो लोककृताभिचारकैर्विषादिना वा मृतिमेति मानवः।। जिस समय माता की रेखा ऊपरले भाग में मिली एवं छोटी रेखा से हुई दिखे तो दोषों, मनुष्य-कृत मारसादिकों अथवा विपादिकों से मौत पाता है ११६॥ = मातुस्समीपे प्रतिभाति चिह्नं नाक्षत्ररूपं विशदस्वरूपम्। लोहाभिघातं लभते मनुष्यो भिन्नं यदा चेद् बहुस्वल्पघातम्॥। स्पष्ट रूपवाला नक्षत्र का चिह्न यदि मातृरेखा के समीप हो तो नह लोहे से चोट पाता और यदि पूर्वोक़ निशान कटा हुआ प्रतीत हो तो बहुत छोटा- सा घाव पाता है॥ ११७ ॥। ६स्पृश्वा सुधात्रीं यदि याति काव्यं रेखा गभीरा विशदा विचुद्रा धन्वादिभिर्घातमुपैति प्राणी पारुयपूर्णःपिशुनस्वभाव: ११८ गहरी एवं साफ़ एक छोटी-सी रेखा मातृरेखा को हूकर यदि शुक्क तंक चली जावे तो वह कठोर एवं चुगुलखोर होता तथा धनुप, बारग या बन्यूक् आदि से घायल होता है ॥ ११= ॥। १० पितुः सुरेखोपरिगा विभाति भग्नीसुरेखा भणिता सुधीभि: दारिद्र्ययुक्को मनुजस्तदा स्यात्कान्ताभिलाषी कमलाविहीन: यदि पितृरेखा के ऊपरले भाग में भग्नीरेखा हो तो वह दरिद्र होना तथा स्त्री की लालसा रखता है।। ११६ ।। *
- विदेशी विद्वानों का मत है कि शुकालय पर खड़ीरेखाएँ पुरुषों के हाथ में स्त्रियों का प्रभाव तथा स्त्रियों के हाथ में पुरुषों का प्रभाव और शड़ी रेम्वाएँ समवर्ग के प्रभावों को (भले या वुरे जैसे दिम्वें) बताती हैं। -संपावक सामुद्रकशासत् ११ अङ्ुष्ठमध्यं यदि वेष्ट्यन्ती फणानुरूपा परिभाति रखा। व्यापारयुक्को मनुजस्तदा स्यादाचारहीनो व्यभिचारशील:। जिसके अंगूठे के यध्यभाग को लपेटती फन के समान एक रेखा हो वह आचारहीन, व्यमिचारी और व्यापारी कहाता है॥ १२०॥ १२ निशाकरस्थानगतं सुचिह्नं वृत्तार्धरूपं विशदं विभाति। बुद्या विबुद्धो मनुजस्तदा स्याद्वामाभिलापी वनिताविलासी।। जिसके चन्द्र स्थान में अर्वृत्त का एक साफ निशान हो तो वह बुद्धिद्वारा विशेष बोध रखता तथा सुन्दरियों का अभिलापी और विलासी होता है १२१। १ ३ मात्रा समेता जनकस्य रेखा चुद्रा विभिन्ना यदि मध्यभागे। आघातपूर्ण: पुरुपस्तदा स्यादानन्दहीनो दयिताविहीन:१२२ जिसकी मातृरेखा से मिली पितृरेखा मध्यभाग में छोटी-छोटी रेखाओं से फटी दिखे वह चोटों से घायल होता, आनन्दहीन, और प्यारी से विहीन होता है।। १२२ ।। १४ अङ्गष्ठमूले विशदा विचुद्रा भग्नीसुरेखा भणिता सुधीरैः। दीनो दरिद्रो मनुजस्तदा स्याद्विद्याविहीनो विषयातुरश्च १२३ साफ़ एवं छोटी भग्नीरेखा यदि अंगूठे की मूल में हो तो वह दीन, दरिद्री, विद्याहीन और विपयातुर होता है। १२३ ।। १५ समुत्थितं चेन्मणिबन्धदेशाद्रेखात्रयं नुद्रतमं विभाति। तदा जनोऽयं जलयानयायी सांयात्रिको वा मरणं प्रयाति १२४ यदि कब्जे से छोटा-सा तीन रेखाओंवाला निशान उठा हो तो वह सयुद्रो की यात्रा करता है अथवा जहाज़ी होकर मर जाता है ॥ १२४॥
- विदेशी विद्वान् समुद्र यात्रा के चिह्न दूसरे ही बताते हैं। कुछ कहते हैं कि पितृरेखा (आयुरंखा) से नीचे की ओर चंद्र स्थान की ओर जानेवाली रेखा बड़ी होने पर समुद्रयात्रा बताती है। कुछ लोगों का मत है कि कनिष्ठा के नीचे चंद्र के स्थान में बड़ी २ आड़ी रेखाएँ जलयात्रा का रेखाएँ कहाती हैं। इमने स्वयं अनेकोंबार इन दोनों ही कथनों को सत्य पाया है, किन्तु उपरोफ़त कही यात अ्भी तक कहीं पायी नहीं गई।-संपादक द्वितीयखड १६पितु: सुरेखा यदि नीचदेशे संवक्ररूपा मिलिता जनन्याम् दीर्घायुष तं पुरुषं करोति विद्यान्वितं वैद्यवरं विनीतम् १२५॥ मातृरेखा में मिली पितुरेखा निचले देश में टेही दिखे तो उसे बड़ी उम्रवाला, विद्यासंपन्र, वैद्यों में प्रधान एवं विनयवाला करती है १२५ ।। १७ भाग्यस्य रेखा मणिबन्धदेशात् पैत्रीं विभित्वा यदि याति मात्रीम्। भव्यान्वितं तं मनुजं करोति बन्धुप्रियं बोधरतं वरेययय् ॥ १२६। जिसकी भाग्यरेखा पितृरेखा को काटकर कब्जे से मातृरेखा के समीप चली जावे तो उसे कल्याणसंपन्न, भाइयों का प्यारा, ज्ञानी एवं प्रधान बना देती है॥१२६॥ (देखो चित्र नं० १७) चतुर्दशलच्णाङ्कित करतलफल १ कनिष्ठिकायास्तृतये परुष्के ऋज्वी सुरेखा यदि याति मध्यम्। तदा नरो मानसिको महौजाश्चातुर्यचञ्चुश्चपलस्वभावः। एक सीधी रेखा यदि कनिष्ठा की तीसरी पोर से बीच की पोर तक जावे तो वह मानसिक गुखशाली, चलशाली, चतुर तथा चपलस्वभाव- वाला कहाता है॥ १२७ ॥ २ गुरूपरिस्थं यदि भाति चिह्नं रेखात्रयं भुग्नतरस्वरूपम्। पित्ताधिकोडसौ पुरुषस्तदा स्यात् पाखएडकारी परुषस्वभावः॥ यदि गुरु के ऊपरी भाग में (तर्जनी की तीसरी पोर में) टेवा एवं तीन रेखाओंवाला चिह्न हो तो वह पित्तरोगी, पाखएडकारी और कठोर स्वभाववाला होता है॥ १२८ ॥ ३ दिवाकरस्थानगतं सुचिह्नं तिर्यग्विभिन्नं सरलं द्विरेखम्। संकोषभिन्नंयदिवामदक्षे तदा नरः शिल्परतः सुबुद्धि: १२६॥। सूर्य के स्थान (अनामिका की मूल) में सीधा एवं दो रेखाओंवाला निशान तिरछी लकीर से कटा हो और बाई एवं दहिनी तरफ़ कोयों से खषिडत दिखे तो वह शिल्पकार्य में प्रवृत्त तथा सुबुद्धि होता है ॥ १२६ ॥ सामुद्रकशास्त् ४ यदा गतं मध्यमिकासुमूले रेखाद्रयं चुद्रतरं चकास्ति। कष्टाधिकं वै लभते मनुष्यः पित्ताधिक: पापरतः कुवेषः १३०॥ जिसकी मध्यमा के मूल में दो रेखाओंवाला छोटा-सा चिह्न हो वह पित्तरोगी, पापी, बुरे वेपवाला होता और बहुत कष्ट पाता है॥ १३० ।। ५ सुभोगशाखा विशदा विनुद्रा पैत्रीं विभित्त्वा यदि याति भौमम्। वृथापलापी मनुजस्तदा स्पादिश्वासयुक्को विभुता- समेतः॥ १३१॥ यदि साफ़ व छोटी सुभोगरेखा की शाखा मातरेखा एवं पितृरेखा को काटकर मङगल के समीप जावे, तो वह वकवादी तथा विश्वासी और विभुता पूर्ण रहता है। १३१॥ ६ अङुष्ठशाखावृतशुद्धरूपं रेखाचतुष्कं समुपैति पैत्रीय्। वृथाभिमानी मनुजस्तदा स्यान्मोहाभिभूतो मदनातुरश्च १३२ अंगूठा की शाखा से घिरा हुआ, सीधा चार रेखाओवाला निशान यदि पितृरेखा के समीप चला जावे तो वह वृथाभिमानी, मोह से घबरानेवाला तथा काम-पीड़ित होता है॥ १३२ ॥ ७ भोगाघरस्थं विशदस्वरूपं नवाङ्कपञ्चाङ्मयुतं गुणाख्यम्। रक्ाभिपाते निरतो मनुष्यो मान्यो वदान्यो बलतासमेतः१३३ जिसकी भोगरेखा के नीचे साफ़ नव एवं पाँच का अंक गुख के निशान सहित हो तो वह फ़स्त खुलाने के कार्य में निपुण, मान्यवर, बड़ा दानी और बलवान् होता है।। १३३ ॥ = क्षपाकरस्योपरिंगं विभाति तिर्यग्विभिन्नं यदि चैकरेखम्। आयुंष्यमल्पं लभते मनुष्यः कुपथ्यसेवी सरलस्वभावः १३४।। चन्द्र के ऊपर यानी मातृरेखा के समीप एक रेखावाला निशान यदि तिरछी रेखा से कटा हुआ दिखे तो वह कुपथ्यों का सेवन करता, सीधे स्वभाववाला और अल्पायु होता है॥ १३४। १-छत्तीस ३६ वर्ष पर्यन्त अल्पायु को आचार्यों ने माना है। इसमें भी तीन भेद होते हैं। ६स्वल्पासशाखा यदि भाग्यरेखा पैत्रीं विभित्त्वा समुपैति मात्रीम्। बाणादिभिर्घातमुपैति प्राणी विद्यान्वितो बन्धुविव- र्जितश्च ॥ १३५ ॥ जिसकी शाखा समेत छोटी भाग्यरेखा (फेटलाइन) पितृरेखा को काट कर मातृरेखा के पास पहुँचे तो वह विद्यासंपन्न, बन्धुरहित होता और वाखादि से चोट पाता है॥ १३५ ॥ १०स्वल्पा सुपैन्नी मिलिता धरित्र्यां चुद्राविभिन्नश्च तदूर्ध्वदेशः तदा जनःसर्वजनप्रियस्स्याद्विश्वासयुको विभुतामुपेतः १३६। छोटी पितृरेखा मातृरेखा में मिल जावे और उसका ऊपरला माग छोटी रेखा से कटा दिखे तो वह विश्वासी, प्रभुतासंपन्न तथा सबका प्यारा होता है॥ १३६॥। ११ काव्यालये तिष्ठति वक्ररूपं रेखाचतुष्कं विशदस्वरूपम्। कान्तासमू हं लभते मनुष्यः कामीकलावान्कमलासमेतः १३७ शुक्रस्थान में टेढा एवं साफ़ चार रेखाओंवाला निशान हो तो वह कामी, कलावान, लक्ष्मीसंपन्न, और खतीसमुदाय को पाता है। १३७॥ १२ निशाकरस्थानगतं सुचिह्नं चुल्लीसरूपं यदि मध्यभिन्नम्। तदा जनोऽयं पतितो महोच्चात् संखारीडतं चेद्विपदाविमुक्क:१३८ चन्द्र के स्थान में चूल्हे के समान रूपवाला चिह्न बीन में कटा-सा प्रतीत हो तो वह बड़े ऊँचे स्थान से लुहक पड़ता है। यदि पूर्वोक़ निशान चुद्र रेखाओं से कटा दिखे तो वह विपदाओं से छूटता है ॥ १३८ ॥ १३ शुक्राधरस्थं विशदस्वरूपं वैशृङ्खलं चिह्नतमं चकास्ति। मिथ्याप्रलापी पुरुषस्तदा स्यात् सुखाभिलाषी सुषमासमेतः॥ विशृंखलनामक साफ़ चिह्न शुक्र के नीचे हो तो वह मिथ्यावादी, सुख का अभिलाषी और परम शोभासंपन्न होता है॥ १३६ ॥ १४ समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशाद्धक्रा कुरेखा समुपैति मात्रीम्। तदा जनोडयं जनतासमेतो ह्यृणी गुणी स्यादभिमानहीनः॥ सामुदकशास्त् यदि कब्जे से उठी टेढी छोटी रेखा मातृरेखा के सामने चली जावे तो वह जनसम्पन्न, ऋणी, गुखी और अभिमानहीन होता है॥ १४०॥ (देखो चित्र नं० १८) चतुर्दशलक्षपाङ्कित करतलफल १ कनिष्ठिकायास्तृतये परुष्के कोणद्यं चिह्नतमं चकास्ति। चौर्यानुरक्ो मनुजस्तदा स्यादृथाभिमानी विषयातुरश्च१४१ कनिष्ठा की तीसरी पोर में दो कोखोंवाला निशान दिखे तो वह दृथाभिमानी, विषयातुर और पक्का चोर होता है । १४?। २ अनामिकायास्तृतये परुष्के वृत्तार्धचिह्नं विशदं विभाति। दारिद्रययुक्को मनुजो मनीषी दुःखेन कालं नयते चुधालुः१४२ जिसका अनामिका की तीसरी पोर में अर्धव्ृत्त का साफ़ निशान हो वह बुद्धिमान्, दरिद्री और भूखा रहकर दुःख से अपना समय काटता है॥१४२। ३ छायासुतस्योपरिगं चकास्ति चुंद्रं सुचिह्नं सरलं त्रिरेखय्। तदा नरः स्याद्विजयाभिलाषी योद्धा विबोद्धा कलहातुरश्च।। जिसके शनि के ऊपर छोटा, सीधा एवं तीन रेखाओंवाला निशान हो वह विजयामिलापी, बड़ा शूरमा, विज्ञाता होता और लड़ाई लड़ने में लगा रहता है॥ १४३॥ ४ दिवाकरस्थानगतं सुरेखं तिर्यग्विभिन्नं युगरेखिकाभ्याय्। तदा जनोऽयं सुखदुःखमेति भुग्नं यदा चेच्छुभतामुपैति १४४ जिसका सीधी रेखावाला निशान सूर्य के स्थान में दो रेखाओं से तिरछा कटा-सा दिखे वह समय-समय पर सुख एवं दुःख पाता है। और यदि पूर्वोक़ निशान टेढा-सा दिखे तो वह शुभता को पाता है॥ १४४॥ ५ संभोगरेखा विशदा गभीरा पूर्णस्वरूपा यदि याति मन्दम्। सौभाग्यशाली पुरुषो विशाली संतोषकारी स्वजनापकारी॥ साफ़ एवं गहरी पूर्णरूपवाली सुभोगरेखा (आयुरेखा) शनैश्चर पर्यन्त १ -- युग्मन्तु युगलं युगमित्यमरः। जावे तो वह सौमाग्यशाली, विशाली, संतोपकारी तथा स्वजनों का बुरा चेतनेवाला होता है॥ १४५ ॥ ६बृहस्पतिस्थानगतं त्रिशुलं चिह्नं यदा चेदिशदं विभाति। तदा जनोऽयं कृशतामुपैति मूर्च्छादिरोगैःपरिपीडिताङः १४६ जिसके साफ़ त्रिशूल का निशान बृहस्पति के स्थान में हो वह मिरगी आदि रोगों से पीड़ित अंगवाला तथा दुर्बल होता है॥ १४६ ॥ ७ मातुः सुरेखा यदि नीचदेशे वेदाङटृत्तार्धयुता विभिन्ना। पदाभिलाषी पुरुषस्तदा स्याद्गर्वेण युक्को गुरुतामुपेतः १४७॥ यदि मातृरेखा निचले भाग में चार के अंक एवं दृत्तार्थ से संयुक्त तथा कटी-सी दिखे तो घमएडी, गुरुतासंपन्नऔर ऊँचा पदामिलाषी कहानेवाला सूचित करती है। १४७। ममातुः सुरेखा यदि मध्यवक्रा धन्वाकृतिर्भग्नतरा विभाति। चतुष्पदाघातमुपैति जन्तुर्जयाभिलाषी जनतासमेतः १४८॥ यदि मातृरेखा बीच में टेनी, धनुपाकार तथा बहुत कटी-सी हो तो वह जयाभिलापी जनसमूहयुक, और चौपाये की चपेट से चोट पाना सूचित करती है॥ १४८॥ हकाव्यालयस्योपरिगा विभाति भग्नीसुरेखा यदि चायुषीया। सुखाभिलाषी मनुजस्तदा स्याल्वज्ामुपेतो ललनासमेतः१४६॥ यदि आयुरेखा की भग्नीरेखा शुक्र के ऊपरले माग में हो तो वह लज्ा- बान्, ललनायुक्, तथा सुखाभिलापी होता है॥ १४६॥ १० अ ङ्गप्ठपृष्ठे विशदस्वरूपं रेखाविभिन्नं यदि वृत्तचिह्रम्। तदा नरो मजति वारिरशौ व्यायामसको व्यसनातुरश्च१५० यदि अँगूठे की पीठ पर रेखा से कटा हुआ वृत्त का निशान (यानी मोहर का सा निह्न ) हो तो वह कसरती, जुआ आदि खेल खेलता तथा नदी आदि में डूबता है ॥ १५० ॥ ११ अङ्ष्ठमूले परितो विभाति नाक्षत्रचिह्नं विशदस्वरूपम्। हर वामासमेतो मनुजो मनस्वी नानासुभोगं नितरां भुनक्रि१५१ साफ़ नत्तत्र (स्टार) चिह्न अंगूठे के मूल में हो तो वह मनस्व्री सुन्दरियों से युक्त होता और नाना भाँति के सुभोग अधिकतर भोगता है॥१५१॥ १ २ जैवातृकस्थानगतं विशालं विभाति चिह्नं यदि न्यूनकोणम् नायं नरः स्यात्परिणामदर्शी स्वकीयदोपान्मरणं प्रयाति १५२ न्यूनकोग का निशान यदि विशेपतः चन्द्र स्थान में हो तो वह अग्र- शोची नहीं होता, बरन् अपने ही दोप से मौत पाता है। १५२॥ १३ भाग्यस्य रेखोपरिगं विभाति विदङ्तुल्यं यदिशुद्धचिह्नय्। शूलार्तियुक्को मनुजस्तदा स्याद्वामाकरे चेद्ुजताविशेष: १५३। यदि कबूतरों के दरबा के समान साफ़ निशान भाग्यरेखा के ऊपर हो तो वह शूलपीड़ा से पीड़ित होता है। यानी उसके पेट में प्रायः पीड़ा बनी रहती है। और यदि पूर्वोक निशान सुन्दरियों के करतल में भाग्यरेखा के ऊपर दिखे तो रोग की विशेषता होती है। यानी शूलरोग अधिकता से होता है।। १५३।। १४ पितुः सुरेखा मणिबन्धमुक्का कौटिल्यरेखाद्रयसंयुता चेत्। आद्ये वयस्के शुभमेति प्राणी रेखात्रये सप्तति वत्सरं नो१५४ जिसके करतल में पितृरेखा कब्ज़े से छूटी हुई टेही दो रेखाओं से युक्क हो तो वह पहली अवस्था में शुमदायक फल पाता है। और यदि तीऩ रेखाओं से युक्त दिखे तो सत्तर वर्प पर्यन्त शुभदायक फल नहीं पाता है १५४ (देखो चित्र नं० १६) पोडशलक्षणाद्वितकर तलफल १चन्द्रात्मजस्थानगतं विभाति वृत्तार्धचिह्नं विशदस्वरूपम्। बुद्ध या विहीनो मनुजस्तदानीं प्रासभ्यदोपान्मरणं प्रयाति॥ यदि बुध स्थान में अरधवृत्त का निशान हो तो बुद्धिहीन तथा अपने इउदोष से मौत पाना सूचित करता है॥ १५५॥
- यह विदेशियों का मत भी है। शुक्रालय पर नक्षत्र चिह्न प्रायः भोग का ही दयोतक है। -संपादक २सौम्यालयान्ते दिनपालये वा रखा यदैका सरला विभाति। सत्कर्मकारी मनुजो महात्मा धर्माधिकारी श्रमतासमेतः १५६ बुध स्थान के समीन या सूर्य के स्थान में यदि एक साधी रखा हो तो वह प्राखी महात्मा, भले कामों का करनेवाला तथा धर्माधिकारी और परिश्रमशाली होता है॥ १५६॥ ३अनामिकामध्यमिकासुमध्ये रेखा सुवक्रा यदि याति भानुम् महाभिमानी मनुजस्तदा स्यान्मोढ्येन युक्को महसा विहीन:॥ अनामिका और मध्यमा के चीच के भाग में एक छोटी एवं मोटी-सी टेही रेखा यदि सूर्य के समीप जावे तो वह बड़ा अभिमानी, मूर्ख, और तेजहीन रहता है॥ १५७॥ ्मार्तएडपुत्रालयगा विभान्ति रेखाःसुचुद्रा रससंमिताश्चेत्। उद्योगशाली पुरुषस्तदा स्यात सौख्यादिहीनः श्रमताविहीन:॥ शनि स्थान में छोटी-सी छः रेखाएँ हों तो वह उद्योगशाली, परिश्रम रहित, और सौख्यहीन कहाता है॥ १५८॥ ५.संभोगरेखा गुरुमन्दिरस्था तस्याःसुशाखा यदि चैति मन्दम्। वित्तार्जक: स्यात्पुरुषः पवित्रो नारीविहीनो नयतामुपेतः१५६ संभोगरेखा (अस्मद्ेशीय आयुरेखा) यदि तर्जनी पर्यन्त चली जावे और उसकी एक शाखा शनि की तरफ़ जावे तो वह दौलत बटोरता, एवं नीतियुक् और स्त्रीहीन होता है॥ १५६ ॥# ६सुरेन्द्रपूज्यालयगं विभाति तिर्यग्विभिन्नं सरलं द्विरेखम्। धर्मी जनोष्यं शुभतामुपैति भिन्नं यदा चेच्छिरघातमेति१६०॥ बृहस्पतिस्थान में सीधा दो रेखाओंवाला निशान तिरछा कटा हो तो वह धर्मी तथा शुभ फल पाता है। और यदि पूर्वोक् निशान अन्य रेखाओं से कटा दिखे तो वह शीश में चोट पाता है ॥ १६० ॥ ७बृहस्पतिस्थानगता सुवक्रा रेखा यदेका यदि याति मात्रीम् *यह बड़े मार्के की बात यहाँ पर कही गई है। -संपादक सामुद्रकशास् उग्रस्वभावो मनुजस्तदा स्यादुन्मत्तरूपी मदनातुरश्च १६१।। बृहस्पतिस्थान में टेदी एक रेखा मातृरेखा के सामने चली जावे तो वह उग्रस्वभाववाला, मतवाला, और कामपीड़ित होना है।। १६१।। =संभोगरेखा यदि नीचदेशे भिन्ना यदा स्यादयुगरेखिकाभ्याम् शूरार्दितोडयं समरे मनुष्यः प्रामोति मृत्युंसहसा सहिष्णुः१६२ जिसके भोगरेखा (आयुरेखा) निचले भाग में दो रेखाओं से कटी प्रतीत हो तो वह लड़ाई में बीरों द्वारा सताया हुआ, सहनशील होता और एकाएकी मौत पाता है॥ १६२ ॥ ६संभोगरेखा यदि मध्यभागे खङ्नेन भिन्ना विशदा विभाति। द्रव्यावने घातमुपैति प्राणी शेषे विभिन्ना स्वधने क्षयासिम्१६३ स्पष्ट संभोगरेखा यदि बीच में खङ्गाकार (तलवार के समान ) निशान से कटी हो तो वह दौलत की रखवाली करने में चोट खाता है। और यदि पूर्वोंक निशान शेप भाग में कटा दिखे तो वह अपने ही माल की रखवाली में मारा जाता है।। १६३ ॥ १० मातुः सुरेखा यदि नी चभागे गुषत्रयेणाप्यवखसिडता स्यात् स्वमानरक्षानिरतः सुदुःखी इस्वा प्रशंसी द्विगुणावतंसी १६४ यदि मातृरेखा निचले भाग में तीन गुखा के निशानों से कटी दिख तो वह अपनी मान रक्ता करने में परायण और बड़ा दुःखी होता है। यदि पूर्वोक़ रेखा छोटी-सी हो तो वह बड़ाई पाता है। यदि पूर्वोक़ निशान दूना हो तो वह गौरवसंपन्र होता है॥ १६४॥ १ १अङ्वष्ठश।खावृतमध्यभागं रेखात्रयं पर्वयुगे विभाति। तदा नरो बन्धनभीतिमेति दीर्घं यदा चेत्फल मन्दता स्यात् १६५ अँगूठे की शाखाओं से घिरा मध्यभाग में तीन रेखाओं का निशान अँगूठे की दूसरी पोर में हो तो वह कैद का भय पाता है। यदि पूर्वोक़ निशान दीर्घाकार हो तो फल की अल्पता होती है॥ १६५ ॥ # *प्रसिद्ध फ्रेंच एवं अ्मेरिकन विद्वानों का मत है कि संसार से एक प्रकार रे अलग रहना अथवा जेलखाने में रहना, आयुरेखा (अस्मद्देशीय पितृरेखा) के भीतर शुक्र के स्थान में अथवा आयुरेखा के इधर-उधर चतु- ककोए चिह्न का परिणाम है।-संपादक ६५ू १ २अङ्ुष्ठपृष्ठे पथमे परुष्के रेखात्रयं चुद्रतरं चकास्ति। तदा मनुष्यो वधतामुपेति पाशेन विद्धो निजबन्धुहीन: १६६ जिसके अगूठे की पीठ पर पहली पोर में छोटा-सा तीन रेखाओं का विशान हो वह बन्धुहीन होकर फाँसी (मौत) पाता है॥ १६६। १३ कपाकरस्योपरिंगं विभाति नाक्षत्ररूपं विशदस्वरूपम्। विश्वासदानैःपथितो मनुष्यो दीनो दरिद्रो धनतामुपैति १६७ चन्द्र के ऊपरले स्थान में साफ़ नक्षत्र का निशान हो तो वह विश्वास और दान से विख्यात होता है। यदि पूर्रोक़ निशान दरिद्री के हाथ में दिखे तो वह दौलत पाता है। १६७ ।। १४ पितुःसुरेखा मिलिता जनन्या मध्ये सुकोएं यदि भाति चिह्नय्। अल्पायुषं तं मनुजं करोति नीचाश्रयं निन्दितकर्म- कारम् ॥ १६८॥ पितृरेखा मातृरेखा के बीच में मिली हुई दिखे और वहाँ पर कोख का निशान हो तो अल्पायु एवं नीचों का साथी तथा बुरे कामों का करने- वाला सूचित करता है॥ १६८ ॥। १५ पित्रा वियुक्का मणिबन्धदेशे वक्रा सुभाग्या यदियाति भोगाम्। बुद्ध्या विहीनो
स्त्रीपद्तललक्षण (Part 7)
मनुजो विवादी हासी विलासी कलहातुरश्च ॥ १६ ६ ।। जिसके कब्जे में पितृरेखा से छुटी व टेवी भाग्यरेखा भोगरेखा के सामने चली जावे तो वह बुद्धिहीन, विवादी, हासी एवं विलासी और लड़ाई लड़ने में लगा रहता है॥ १६६॥ १६ पितुस्सुरेखोपरिगा विभाति रेखा गभीरा विशदा विनुद्रा। भयंकरः स्यान्मनुजस्तदानीं दर्शी चिमर्शी विषयारतश्च १७० पितृरेखा के ऊपर प्राप्त हुई रेखा गहरी, साफ़ एवं छोटी हो तो वह भयंकर होता है और अशुभ देखने एवं विचारनेवाला तथा विषयों में फँसा रहता है ॥ १७० ॥ ( देखो चित्र नं० २०) सामुद्रकशास १ कनिष्ठिकायास्सकले परुष्के मध्ये त्रिरेखं सरलं विभाति। तदा नरो दर्शनशास्त्रवेत्ता विचारशीलो बुधवृन्दवन्द्यः१७१।। जिसकी कनिष्ठा की तीनों पोरों के बीच में तीन रेखाओंवाला सीधा निशान हो तो वह दर्शनशास्त्रवेत्ता, विचारशील तथा पशिडतों में वन्दनीय होता है।। १७१ ।। २ पैत्रीं सुमात्रीं च तथा सुभोगां भित्त्वा पताका यदि याति चान्द्रीम्। बाल्ये सुमध्ये च शुभाभिलापी वार्द्े प्रवृद्धिं पुरुषः प्रयाति॥ १७२॥ यदि पितृरेखा, मातृरेखा तथा सुभोगरेखा को काटकर पताका नामक रेखा बुध पर्यन्त चली जावे तो वह वाल्यावस्था एवं युवावस्था में शुभा- मिलाषी तथा दृद्धावस्था में बड़ी बढ़ती पाता है॥ १७२॥ ३ शनैश्चरस्थानगतं विनुद्रं चिह्नं त्रिरेखं सरलं विभाति। वक्षस्स्थलाघातमुपैति प्राणी सम्पत्तिशाली विपदाविहीन:॥। यदि शनि स्थान में तीन रेखाओंवाला छोटा एवं सीधा निशान हो तो वह संपत्तिशाली, विपद्हीन होता और वत्तस्स्थल में चोट पाता है १७३। ४ संभोगरेखाधिषणालयस्था कोऐन युक्का यदि चोर्ध्वभागे। स्वार्थी सुमानी मनुजस्तदानीं प्रासभ्यदोपान्निधनंप्रयाति१७४ यदि बुध से चली बृहस्पति के स्थान में स्थित संभोगरेखा ऊपरले भाग में कोख चिह्न युक्क प्रतीत हो, तो वह स्वार्थी (मतलवी), बड़ा मानी और इउद्रोप से मौत पाता है।। १७४।। ५ सुभोगरेखा गुरुगा विभाति त्रिकोणयुकश्च तदूर्ध्वदेशः। तदा जनोयं जनतामुपैति विनष्टवित्तो विविधामयश्च॥।१७५।। सुमोगरेखा (आयुरेखा) यदि बृहस्पति के स्थान में हो और उसका ऊपरला भाग त्रिकोखकार निशानयुक्क हो तो वह द्रव्यहीन, अनेक रोगों- वाला और जनसमूह से युक्क होता है॥ १७५॥ ६ भोगाघरस्थं विशदं विभाति चिह्नं यदा चार्द्धविसर्गतुल्यम्। संपूर्णकार्ये श्रमतासुपैति नार्या यदा चेत्प्रसवेऽतिकष्टम् १७६।। यदि साफ़ व आधे विसर्ग के समान निशान भोगरेखा के निचले भाग में हो तो वह परिश्रमी होता है। यदि पूर्वोक्त निशान त्रियों के करतल में हो तो वे मसवकाल में (बच्चा जनने में) बड़ा कष्ट पाती हैं ॥ १७६॥ ७ काव्यालयादुत्थितवक्ररेखा भोगां विभित्त्वा यदि याति चान्द्रिय्। तदा नरोडयं शिरसा विभिन्नः पाशाग्रविद्धो मरणं प्याति॥ १७७ ॥ जिसके शुक्र स्थान से चली हुई टेडी रेखा भोगरेखा को काटकर बुध के पास चली जावे तो उसका शिरच्छेद होता अथवा फाँसी द्वारा मौत पाता है १७७# = मातुस्सुरेखोपरिगं विभाति चिह्नं विनुद्रं एदि पञ्चरेखम्। सौशील्ययुक्ो मनुजो महात्मा कार्ये स्वकीये निरतो विवेकी। विशेपकर छोटा सा पाँच सीधी रेखाओंवाला निशान मातरेखा के ऊपर यदि हो तो वह बढ़ा शीलवान्, महात्मा और अपने कार्य में लगा हुआ विचारवान् होता है॥ १७८ ॥ ६पितुस्मुरेखोपरिगा सुवक्रा रेखा विचुद्रा यदि याति मात्रीम। तदा नरः सन्नपमृत्युभीतो विपप्रयोगान्मरणं प्रयाति १७६।। जिसे पितृरेखा के ऊपर छोटी सी टेही रेखा मातृरेखा के पास चली जाचे तो वह अकालमौत से डरता औरविप-प्रयोग से मौत पाता है। अर्थाव उसे विप खिला देने से मौत होती है ।। १७६।। १०जैवातृकस्थानगतं विभाति वृत्तार्धचिह्नं विशदं विशालम्। तदा जनोडयं जनयूथभिन्नोविभीतचित्तो निधनं प्रयाति १८० चन्द्र स्थान में साफ़ अरधवृत्त का विशाल निशान होतो वह जनसमूह द्वारा पिटता तथा डरपोक चित्तवाला होता है॥ १८० ।।
- कुछ आचार्यों का मत है कि ऐसी रेखा व्यक्ति के उस समय किसी प्रकार का डाक्टरी इलाज अथा आपरेशन आदि भी सूचित करती है। यह अन्य सहायक रेखाओं द्वारा देख लेना चाहिए। इसका कोई न कोई चिह्न ठीक उसी उम्र में स्वास्थ्य रेसा पर भी मिलेगा।-संपादक सामुद्रकशासत्र १ १ वुधालयस्था विशदा विनुद्रा रखा सुवक्रा यदि याति भोगाम् तदा नरो यौवनस्वस्थचित्तः क्रूरःसुलोभी परकार्यकारी१८१॥ बुध स्थान में साफ़, छोडी व टेढी सी रेखा भोगरेखा पर्यन्त जावे तो वह यौवनकाल में स्वस्थचित्त, निर्दयी, बड़ा लोभी तथा पराये काम का करनेवाला होता है।। १८१ ॥ १ २भाग्योत्थिता या मणिबन्धमेति रेखा गभीरा विशदा सुवक्रा पापानुसारी मनुजो मनस्वी पामोति मृत्युं निजकर्मदोषात् १८२ भाग्यरेखा से उठी रेखा गहरी, साफ़ व टेदी होकर मखिबन्ध के पास चली जावे तो वह मनमौजी (यथेच्छाचारी) पापी, छापने कर्मों के दोप से मौत पाता है।। १८२ ॥ (देखो चित्र नं० २१) १ कनिष्ठिकायास्तितये परुष्के वृत्तार्धचिह्नं विशदं विभाति। स्वीयापराधान्मृतिमेति प्राणी पाशेन विद्धश्शिरसा विभिन्नः॥ कनिष्ठा की तीसरी पोर में साफ़ अर्धवृत्त का निशान हो तो वह फाँसी पाता अथवा अपने ही अपराध से मौत पाता है।। १८३ ।। २भोगाधरस्था विशदा विनुद्राश्चुल्लीसरूपायदि भान्ति रेखाः। शैथिल्यकायो मनुजो मलाक्को मन्दस्वमावो ममतामुपैति १८४ मोगरेखा के नीचे साफ़ व छोटी सी होकर चूल्हे समान स्थित रेखाएँ यदि हों तो वह ढीले अंगवाला, मल से भरा हुआ, नीच स्व्रभावरला और मोही होता है।। १८४।। ३ ऋज्वी सुभोगा घिषणालयान्ता तस्या: सुशाखा समुपैति शौरिम। परिश्रमासक्कमना मनुष्यःकष्टेन कालं नयते करालम्।। सीधी सुमोगरेखा (आयुरेखा) बृद्स्पति स्थानपर्यन्त जावे और उसकी शाखा शनि के पास पहुँचे तो वह मेहनत में मन लगाता हुआ अपना काल बिताता है॥ १८५ ॥। ४ भोगाधरस्थं विशदं विभाति जिह्वासुमूलीयसमानरूपम्। वित्तं मनुष्यो लभते ह्यचिन्त्यं पूर्वोक्कमानेन विचारणीयम् १८६ जिहामूली रुपवाला साफ़ निशान भोगरेखा के नीचे हो तो वह अचिन्तनीय धन पाता है। यह विचार पूर्वोक पमाण से करना चाहिए ?= ६ ५मातुः सुरेखा यदि चोर्ध्वभागे शाखाद्याभ्यामुपसंगता स्यात् विश्वासयुक्को मनुजस्तदानीं दानी सुमानी धनतासमेतः १८७ यदि माता की रेखा ऊपरले भाग में दो शाखायुक हो तो वह विश्वासी, दानी, सुमानी तथा धनसम्पन्न होता है॥ १८७ ।। ६ मातु: सुरेखा यदि शेषभागे चुद्रा विभिश्रा विशदा विभाति। व्याजापदेशो मनुजो विकाशी हासी विलासी विषयारतश्च॥ यदि मातृरेखा निचले माग में छोटी रेखा से साफ़ मिली हो तो वह छल से महाना करता, मकाशी, हासी तथा विलासी और विषयों में आसक़ रहता है॥ १८८ ॥ ७पित्रा वियुक्का यदि मातृरेखा चुद्रा समेता नितरां चकास्ति। भविष्यवक्का मनुजस्तदा स्यात् प्रज्ञासमेतो ब हुशास्त्रविज्ञ:१८2 पितृरेखा से अलग हुई मातृरेखा तुद्ररेखायुक् हो तो वह होनहार का कहनेवाला होता तथा प्रतिभाशाली, बुद्धि-संपत्र और अ्नेक शाखतों का विज्ञाता होता है॥ १८६॥। * 5मात्रा वियुक्ा यदि पितृरेखा चुद्रा विभिश्रंच तयोस्समध्यम्। विरोधकारी कलही मनुष्यो विवादशाली जनयूथभिन्नः१६० यदि मातृरेखा से पितृरेखा छुटी हो और उन दोनों का मध्यमाग छोटी- छोटी रेखाओं से मिला हुआ देखा जावे तो वह विरोधकारी, लड़ाका, विवादशाली और जनता द्वारा पीड़ित होता है ॥ १६०॥ ६पितुःसुरेखोत्थितरेखिकाभ्यां मातुः सुरेखा यदि संयुता स्यात्। चाञ्चल्यबुद्धिर्मनुजो मनस्वी वृथाभिमानी भ्रमते नितान्तम्।। यदि मातृरेखा पितृरेखा से उठी हुई दो रेखाओं से युक्त हो तो वह चश्चल बुद्धिवाला, मनमौजी, वृथाभिमानी और हपेशा तमा करता है ॥ १३१ ॥
- यहाँ पर पितृरेखा तथा मातृरंखा आदि स्थान में अलग २ होने से गुण बताये गये है। इस पर अधिक जानने के लिये कृपाकर पुस्तक का प्रथमम्बगड देखिय। -- सम्पादक १० पित्रोस्सुमध्येयदि याति चिह्नं रेखाद्यं रेखयुगेन भिन्नस्। गर्भस्य पातं लभते मनुष्यो नार्या यदा चेत्पसवेतिसौख्यम्॥ मातृरेखा व पितृरेखा के बीच में दो रेखाओंवाला निशान दो रेखाओं से खसिडत दिखे तो उसकी भार्या गर्भसाव करती है। यदि पूर्वोक निशान खत्री के करतल में हो तो वह परचकाल में वड़ा सुख पाती है॥ १६२॥ ११ पितुःसुरेखा यदि कुञ्चिताआ मध्ये सुपीनामशिबन्धहीना। असत्यवादी पुरुषः प्रमादी कुवेषधारी मलिनस्वभावः॥।१ ६३।। पितृरेखा यदि अरग्रमाग में टेदी हो और बीच में मोटी तथा कब्जे से ह्ुटी हुई दिखे तो वह झूठा, जिदी, कुवेपी और मैले स्वमाव से रहता है।१६३॥ १२समुत्थिता चेन्मिवन्धदेशात् भाग्यासुरेखा समुपैतिसौन्यम् क्षणे प्रवृद्धिं लभते मनुष्यः क्षणे चयासिं परदेशवासी १६४।। भाग्यरेखा यदि मणिबन्ध से उठ बुधके पास चली जावे तो वह परदेश- निवासी होता तथा क्ण में बढ़ी बदती एवं क्षण में तय को पाता है १६४ १३ चन्द्रालयस्थं कुटिलं द्विरेखं विभाति रेखान्वितवामभागम्। निजव्ययेनापि युतो मनुष्यो देशे सुदूरे निकटे भ्रमेच्च १६५॥ चन्द्र के स्थान में टेहा एवं दो रेखाओंवाला निशान वामभाग में रेखा से जुड़ा हुआ दिखे तो वह अपने खर्चे से ही दूरदेश एवं निकट देश में चूमता है॥ १८५ ॥ # १४ भित्त्वा यदेयं मणिबन्धदेशं रेखा गभारा यदि याति काव्यम्। चञ्चत्मभावोमनुजो विलासी चातुर्ययुक्कश्चपलस्वभावः १६६ जिस समय मशिबं्ध को भेदनकर गठरी रेखा शुक्र के पास जावे तो वह बड़े प्रभाववाला, विलासी, चतुर और चपलस्वभाववाला होता है १६६ (देखो चित्र नं० २२ )
- यही यात्रा संबंधी रंखाएँ हैं। इनमें जो शुद्ध तथा साफ़ हो वे यात्राएँ निर्विध्न समाप होती है। अन्यथा फल में न्यूनता अथवा यात्राओं में दुःख होता है।-सम्पादक। १ चन्द्रात्मजस्थानगतं सुचिह्नं चुद्रं त्रिरेखं सरलं चकास्ति। चौय्यें पवृत्तो मनुजस्तदा स्यान्मिथ्यापवादी मदनातुरश्र१६७ बुध के स्थान में छोटा सा तीन रेखाओंवाला व सीधा निशान हो तो वड चोरी करने में दत्तचित्त तथा झूठा और कामातुर होता है।। १६७ " २ संभोगरेखोपरिगं विशुद्धं रेखात्रयं चुद्रतरं चकास्ति। वाह्ो: सुघातं लभते मनुष्यो मन्दस्वभावी ममतामुपेत: १६८ सुमोगरेखा के ऊपरले भाग में तीन रेखाओंवाला साफ़ व छोटा निशान डो तो वह नीच स्व्रभाववाला, ममता से संपन्न तथा भुजाओं में आघात पाता है॥ १६८ ॥ ३ वुधालयान्ते दिनपालये वा रेखाद्वयं वै कुटिलं विभाति। गाम्भीर्यशाली पुरुषः सुबोधःस्थूलं यदा चेत्कटिघातमेति१६६ यदि बुध की आखिरी जगह में या सूर्य के स्थान में दो रेखाऑवाला टेदासा निशान हो तो वह महाज्ञानी तथा गाम्भीर्यशाली होता है। यदि पूर्वोक़ निशान मोटासा हो तो वह कमर में आघात पाता है।। २६६ ।। ४ अनामिकामध्यमिकासुमूले रखाद्वयं वै सरलं विभाति। मनस्सुशक्किर्मनुजस्सुबुद्धि:संकर्तितं चेत्फलमन्यथा स्यात् २०० अनाभिका व मध्यमा के मूल में दो रेखाओंवाला सीधा निशान हो तो वह मानसी शककि रखनेवाला तथा बड़ा बुद्धिवाला होता है। और यदि पूर्वोक़ है॥ २०० ॥ निशान तिरछी रेखाओं से कटा दिखे तो कहे हुए फल की अल्पना होती ५ देवेन्द्रवन्द्यालयगा विभान्ति रेखा विचुद्राः सरलाश्च पञ्च। पामोति मृत्युं हठतो मनुष्यो मत्या विहीनो ममतासमेतः२०१ बृहस्पति की जगह में पहुँची हुई द्रोधे होकर सीधी पाच रेखायें यदि हों तो वह बुद्धिहोन ममतासम्पन्न होता तथा अपने हठ से मौन पाता है।। • चोरी की क्रिया में प्रवीणता प्राप्त किये हुए व्यक़ि के बुधालय पर इसी प्रकार के चिह्न होते हैं। इनका वर्णन अन्यत्र भी किया जा चुका है।-सम्पादक सामुद्रकशासत्र ६ मात्रीं सशाखां च सुभोगरेखां भाग्या विभित्वा यदि याति मन्दम्। वक्त्राभिघातं लभते मनुष्यो नार्या यदा चेत्मसवेऽतिकष्टम्॥२०२ ॥ मातृरेखा और शाखासमेत भोगरेखा (अस्मद्देशीय आयुरेखा) को काट- कर भाग्यरेखा (फेटलाइन) यदि शनैश्चर पर्यन्त जावे तो वह मुख में आघात पाता है। और यदि पूर्वोक़ निशान स्त्री के करतल में हो तो वह बच्चा जनने के समय बड़ा कष्ट पाती है॥। २०२॥ ७ पितुस्समुत्था कुटिला सुरेखा सविन्दुकोणद्यसंयुता चेत। तदा नरो दर्शनशास्त्रवेत्ता विपर्यये चेत्फलमन्यथा स्यात् २०३ पितृरेखा से उठी हुई टेढ़ो रेखा बिन्दु समेत दो त्रिकोगा निशानों से संयुक् दिखे तो वह दर्शनशास्त्र का ज्ञाता होता है। और यदि पूर्वोंक् निशान उलटा पतीत होवे तो उक्र फल का हास होता है। २०३॥ = भोगाधरस्था विशदा विचुद्रा विभान्ति रेखाः सरलाश्च षट्काः। भोगच्षयं वै लभते मनुष्यः पूर्वोक्कमानेन विचार- णीयम्॥२०४॥ भोगरेखा के निचले भाग में साफ़ एवं सीधी छोटी छः रेखाएँ हों तो वह भोगहीन होता है। यह विचार पूर्वोक़ मान से करना चाहिए २०४।। ६मातुस्सुरेखाधरगं विभाति गुणेन युक्कं यदि कोणयुग्मम्। तदा नरो दर्शनपारगामी नामी सुधामी धनतामुपेतः २०५ मातृरेखा के निचलेभाग में गुणा के निशान युक्त दोत्रिकोख चिह्न हों तो वह नामी, सुधामी, धनसंपन्न और दर्शनशास्त्र का पारगामी होता है २०५।। १०पितुः मुरेखा मिलिता जनन्यां रेखात्रयेणापि युतं तदूर्ध्वय्। पर्त्रियं वे भजते मनुष्यो विहाय नारीं सुभगां स्वकीयाम्॥ पितृरेखा मातृरेखा से मिल गई हो और उनका ऊपरला भाग देही तोन रेखाओं से जुड़ा दिखे तो वह अपनी वड़मागिनी भार्या को छोड़कर परमार्या को भजता है ॥ २०६ ॥ *े
- विदेशीं विद्वानों के मत के संबंध में जो उन्होंने समवर्ग अ्रथवा चिरुद्ध- वर्ग के प्रभाव के संबंध में दिये हैं हम अन्यत्र लिख चुके हैं।-सम्पातक। द्वितीयखरड ११ पितुस्सुरेखा यदि दीर्घरूपा मातुस्सुरेखा बहुस्वत्पगा स्यात्। तदा नरो जीवति दीर्घकालं विश्वासघाती म्रियते प्रवासे २०७ यदि पितृरेखा दीर्घाकार हो और मातृरेखा बहुत छोटी हो तो वह बहुत काल पर्यन्त जीवित रहता तथा विश्वासघाती होता और परदेश में मर जाता है॥ २०७ ॥ १२ भाग्याधरस्थं विशदंविभातिनन्दाङ्कचिह्नंयदि भासमानम्। सन्तुष्टचित्तो मनुजस्तदा स्याद्दाता दयालुर्निजवंशधाता २०८ भाग्यरेखा के निचले भाग में स्थित साफ़ न के अङ्क के समान निशान दिखे तो वह सन्तुष्टचित्त, दाता,दयालु तथा अपने वंश का धाता होता है२०८ १३ काव्यालयोत्था यदि याति रेखा पैत्रीं सुमात्रीं च विभिध्य भोगाम्। शूरो मनुष्यो द्विषतो विजित्य सौभाग्य- शाली लभते सुवित्तम्॥ २०६। शुक्र के घर से उठी रेखा यदि पितृरेखा व मातृरेखा को काटकर भोग- रेखा पर्यन्त चली जावे तो वह शत्रुओं को विजयकर शूरमा एवं सौभाग्य- शाली होता और बड़ा धन पाता है॥ २०६॥ १४ अांगुष्ठसीमाचलिते गभीरे रेखे विभुग्ने पितरं विभिन्तः । स्वेच्छानुसारी पुरुपो विहारी देशे सुदूरे भ्रमते नितान्तम् २१० जिसके अँगूठे की सीमा से चली हुई दो गहरी एवं टेढ़ी रेखायें पितरेखा को काटती हों तो वह अपनी इच्छानुसार विहार करता तथा बड़े दूर देश में जाकर इमेशा चूमा करना है॥ २१० ॥ *इसी प्रकार पितृरंखा (आयुरेखा) से उठी रेखा जिस ग्रह की ओर जावें तो उसा ग्रह के स्वभावानुसार फल जानना चाहिए। यदि शुक्कालय से उठी रखा पितरंखा तक आये और फिर उसी स्थान से कोई वारीक रेखा उठ- कर किसी ग्रह की ओर जाबे (ऊपर का ओर) तो फिर वह ऊपरवाली रेखा रंगरूप-रंखा हो जायगी। अर्थात् ग्रह के रंग-रूप के व्यक्ति का प्रभाव उस ड्यक़ि पर पड़ेगा। ये सब बातें ज़रा वारीको से इस पुस्तक के अध्ययन करने पर समझ में आजायँगी।-सम्पादक। सामुद्रकशास १५ ंगुष्ठमूलाच्चलिते विशुद्धे रेखे गभीरे मणिबन्धमेतः । लावएययुक्को मनुजो मनस्वी लोभाभिभूतो ललनासमेत:२११ जिसे अँगूठे के मूल से चती दो साफ़ एवं गहरी रेखाएँ मणिबन्ध के सामने आजावें तो वह सुन्दर, मनमौजी, ललनागण संपन्न तथा लोभी होने से आदर नहीं पाता है ॥ ११ ॥ (देखो चित्र नं० २३) १ सर्वाङ्गुलीनां युगरामपर्वके संभाति रेखा सरला गभीरिका। आत्मापघातान्मृतिमेति मानवो दुष्टस्वभावो निजदोपदर्पितः। समस्त अंगुलियों की दूसरी व तीलरी पोर में सोधी एवं गहरी रेखा हो तो वह बुरे स्वमाववाला, घमएडी और आत्मघात से ही मौत पाता है२१२ २ कनिष्ठिकामूलगतं विभुग्नं रेखाचतुष्कं विशदं विभाति। संभोगशाली मनुजस्तदानीं भोगाभिला पांरमणीमुपैति२१३ चार रेखाओंवाला, टेढ़ा व साफ़ निशान कनिष्ठिका की मूल में हो तो वह बड़ा भोगशाली तथा भोग की चाहनावाली रमखी पाता है।।२१३। ३ मध्यासुमूले यदि भाति रेखा आचारहीनःशुचमेति पाणी। बह्वीपु रेखासु च बन्धमेति म्लानासु पीडामधिकां भुनक्ि२ १४ यदि छोटी सी एक रेखा मध्यमा के मूल में हो तो वह आचारहीन तथा शोक को पाता है। यदि बहुतसी रेखायें हों तो वह जेलखाने में जाता है। यदि पूर्वोक्त रेखाएँ मैली सी हों तो वह अधिक पीड़ा भोगता है २१४॥ ४ संभोगशाखा विशदा गभीरा प्रदेशिनीमूलगता विभाति। मत्यस्वभावो मनुजस्तदानीं लोकाभिमान्योललनामुपैति॥ सुमोगरेखा की शाखा साफ़ एवं गहरी होकर तर्जनी के मूल तक हो तो वह सच्चे स्वभाववाला, माननीय होता तथा ललना (दुलारी प्यारी) को पाता है॥ २१५ ॥ ५. संभोगरेखा. विशदा सुपीना संरक्तवर्णा सरला विभाति। संक्रामरोगी पुरुषः सुभोगी शोथेन युक्को भ्रमते भयार्तः२१६ सुमोगरेखा (अस्मद्देशीय आयुरेखा) साफ़, मोटी, लाल तथा सीधी हो तो वह संक्रामक रोगवाला, बड़ा भोगवाला, सूजन से संयुक्त और भय से घबराता हुआ घूमता है। २१६ ।। ६ संभोगरेखोभयतो विभान्ति सूचमस्वरूपा बहुविन्दवश्च। क्कीवस्व्रभावो मनुजो मनीषी धातुक्षयं वै लभते नितान्तम्२ १७ जिसकी सुभोगरेखा के दोनों तरफ़ छोटे-छोटेबहुत से बिन्दु (नुझे) हों वह नपुंसक का सा स्व्रभाववाला, बुद्धिमान् और हमेशा धातुनीण होता है२१७ ७ बृहस्पतिस्थानगतं विभाति तिर्यग्विभिन्नं सरलं कुरेखम्। प्ज्ञाविहीन: पुरुषस्तदा स्यान्नार्या यदा चेत्कुलटा भवेत्सा २१८ बृहस्पति के स्थान में प्राप्त हुआ एक रेखावाला सीधा निशान तिरछा कटा हुआ यदि हो तो वह बुद्धिहीन होता है। यदि पूर्वोंक़ निशान जिस खतरी के करतल में हो तो वह व्यभिचारिी होती है ॥ २१८ ॥ = मातुस्सुरेखा यदि चोर्ध्वभागे नतस्वरूपा नितरां विभाति। अनिष्टकारी पुरुषो नराणां निर्बोधरूपो नयताविहीन:२१६। यदि ऊपरले भाग में मातृरेखा लचेरूपवाली हो तो वह अज्ञानी तथा नीविविहीन रहता है॥ २१६॥ ६मातुस्समुत्थं सरलं त्रिरेखं चिह्नं सुभोगाभिमुखं प्रयाति। विश्वासयुक्क: पुरुषः सुशीलः सत्ये रतः शान्तिपरो दयालु:२२० तीन रेखाऑवाला निशान मातरेखा से उठ सीधा सुभोगरेखा के सामने जावे तो वह विश्वासी, सुशील, सत्य में रत, शान्ति में परायख और दयालु बना रहता है॥ २२० ॥ १० पित्रा वियुक्का यदि मातृरेखा स्थूलस्वरूपा गुरुगा विभाति। जारोद्धवो वै मनुजस्तदा स्याच्चातुर्यशाली चपलस्वभावः २२१ पितृरेखा से छुटी हुई माता का रेखा मोटी होकर बृहस्पति के स्थान में यदि सोहती हो तो वह जारजात, चातुर्यशाली, और चपलस्वभाव- वाला होता है॥ २२१॥
- इस पर हम प्रथमखरड में भलीभाँति लिख चुके है। यदि आप अधिक जानना चाहते हैं, तो कृपाकर प्रथमखएड देखिए।-सम्पादक। सामुद्रकशास् ११ पित्रोस्सुमध्ये विशदं विभाति गुणाख्यचिह्नं यदि रक्तवर्णम्। उत्पातवृन्दं लभते मनुष्यो मायाविहीनो ममतासमेतः २२२ ।। मातृरेखा व पितृरेखा के बीच में साफ़ सुखा का लालवर्णवाला निशान X हो तो वह मायाहीन, ममतासंपन्न और सदैव झगड़ा का सामना करता है॥ २२२ ॥ १२ अङ्प्टशाखावृतरेखयुग्मं सकोणचिह्नं प्रयुते चकास्ति। तदा मनुष्यः शिरसा विभिन्नः पाशाग्रविद्धो मरणं प्रयाति २२३ दो रेखावाला निशान अँगूठे की शाखाओं से घिरा यदि कोणचिह्न समेत हो तो वह फाँसी की सजा भोगता है। २२३ ॥ १३ संभोगरेखा यदि नीचभागे चुद्राविमिश्रा विशदा विभाति। उत्पातयुक्को मनुजस्तदानीं क्वेशाभिभूतो भयतामुपैति २२४॥ सुभोगरेखा निचले भाग में छोटी रेखायुक हो तो वह उत्पाती, कष्टों से दुःख और भय पाता है॥ २२४ ॥ १४ मातुस्सुरेखोभयतो विभाति बिन्दुत्रयं वै विरलं विनुद्रम्। तदा जनो दुर्बलगात्रव्यष्टिर्व्ययाधिकं वै लभते नितान्तम्२२५ जिसे मातृरेखा के दोनों तरफ़ छोटे एवं बिरले तीन बिन्दु (तुक्े) हों वह दुर्बल शरीरवाला और खर्चीला होता है॥ २२५॥ १५ पितुस्सुभग्नी विशदा सुरेखा संवक्ररूपा समुपति शौरिम। संचीण कायो मनुजो मलाक्को मन्दस्त्रभावो ममतामुपैति २२६ साफ़ एवं टेढ़ी पितृरेखा की भग्नीरेखा शनैश्चर पर्यन्त जावे तो वह है।। २२६ ।। मल से भरा, दुबले शरीरवाला, नीच स्वभाववाला और ममतायुक् होता १६ मातुस्समुत्था मणिबन्धमेति सर्पानुरूपा विशदा सुरेखा। कारागृहं याति नरस्तदानीं स्व्रीयेन दोषेण समाकुलात्मा २२७ मातृरेखा से उठी साफ़ एवं सर्प के आकारवाली रेखा मशिबन्ध के सामने चली जाते तो वह अपने दोप से ही व्याकुल होता तथा जेलखाने को जाता है॥ २२७ ॥ (देखो चित्र नं० २४) द्वितीय खएड १ कनिष्ठिकामूलतलाच्चलन्ती सार्धा सुरेखा परुरेति चाद्यम्। चातुर्ययुक्को मनुजस्तदा स्यात् सर्वेपु शास्त्रेपु महाप्वीण: २८ कनिष्ठा के मूल से चलती हुई डेड रेखाएँ पहली पोर को पहुँच जाें तो वह चातुरीकलासंपन्न सब शार्खा में बड़ा प्रवीख होता है॥ २८॥ २ चन्द्रात्मजस्थानगतं विनुद्रं रेखाचतुष्कं सरलं चकास्ति। तदा जनो विन्दति जारजातान् पुत्रान्गुणढ्यान्गुरुतागतांश्च बुध स्थान में चार रेखाओंवाला छोटा एवं सीधा निशान हो तो वह गुणों से संपन्न गुरुतायुक्क होता और जारजात पुत्रों को पाता है॥ २६॥ ३ मार्तएडपुत्रालयगं विभाति चिह्नं विचुद्रं सरलं त्रिरेखम्। वक्षस्थलाघातमुपैति प्ाणी मान्यो वदान्यो विभुतासमेतः३० यदि शनि स्थान में तीन रेखाओंवाला छोटा व सीधा निशान हो तो वह मान्य एवं वदान्य (दाता) होता, विभुतायुक् होता तथा छाती में चोट पाता है॥ ३० ॥ ४ मातुस्समुत्था विशदासुरेखा भोगांविभित्वा यदियातिचान्द्रिम् धर्मेण युक्ो मनुजो धनाढ्यो धन्यो धरित्र्यां क्मतामुपैति३१ मातृरेखा से उठी साफ़ रेखा भोगरेखा को काटकर यदि बुध के समीप जावे तो वह धनान्य, धर्मयुक्क, धरामएडल में धन्पवाद देने के योग्य और सहनशील होता है। ३१ ॥ ५ भोगासमुत्था विशदा विनुद्रा मध्यासुमूलं समुपैति रेखा। सम्पत्तिवृन्दं लभते मनुष्यः सौभाग्यशाली सुषमासमेतः३२।। भोगरेखा से उठी हुई साफ़ व छोटी-सी रेखा मध्यमा के मून के पास पहुँचे तो वह सौभाग्यशाली, शोभासंपन्न, तथा संपत्तिशाली होता है ॥३२।
- बहुत से पाश्चात्य विद्वानों ने बुध स्थान पर स्त्री-योग रेखासे सम्बद्ध खड़ी रेखाओं को पुत्र-रेखाएँ कहा है। (देखिये, "अ" चित्र नं० २४) उप- रोक़ रूप से वुधस्थान में खढ़ी रेखाओं के संबंध में विद्वानों के विभिन्न मत है, जो यत्रतत्र इस पुस्तक में टिप्पणी के रूप में दिये गये हैं।-सम्पादक सामुद्रकशाख ६ भोगासुभग्नी विशदा विभिन्ना रेखा गभीरा यदि याति मन्दय् मन्दस्व्भावो मनुजो मलाक्ो दीर्घा यदा चेन्मलिनस्वभाव:३३ भोगरेखा की भग्नीरेखा गहिरी साफ़ व मिन होकर यदि ्शान पर्यन्त जावे तो वह मल से भरा हुआ और नीच स्वभाववाला होता है। और यूर्वोकक रेखा दीर्घाकार प्रतीत हो तो वंह मैले कुचैले स्वभाववाला होता है३३ ७ मातुस्सुरेखा यदि चोर्ध्वभागे रेखात्रयेणाप्यवकर्तिता स्यात। मिथ्याप्लापी मनुजस्तदानीं कार्ये पतारे निरतो नितान्तम्।। मातृरेखा ऊपरले भाग में तीन रेखाओं से यदि कटी दिखे तो वह मिथ्या- मापी और छल कार्य में हमेशा लगा रहता है।। ३४ ॥। ८ शीर्षे सुपैत्री यदि मातृवृक्णा चुद्राविभिन्ने च तयो: सुरेखे। विषप्रयोगे निरतो मनुष्यो मन्दे च कार्ये भमतामुपेति॥३५॥ पितृरेखा ऊपरले भाग में मातृरेखा से कटी हो और उन दोनों (पिता माता) की रेखाएँ छोटी रेखा से मिन्र हों तो वह विषमयोग में यानी विष खिला देने में प्रवीण होता तथा नीचकार्य में मन लगाता है।३५॥ ६मध्ये विभिन्ना सरला गभीरा मातुः सुरेखा शशिगा नता चेत आयुष्यमल्पं लभते मनुष्यो वृद्धे वयस्के श्रमतामुपैति॥३६॥ मातृरेखा बीच में कटी, सीधी, गहरी एवं लची हो तथा चन्द्रमा के स्थान में पहुँचे तो वह अलपायु होता है। और उसे वृंद्धावस्था में परिश्रम करना पड़ता है॥ ३६॥ १० पितुस्सुशेषाच्चलिता सुरेखाभाग्यां विभित्त्वायदियातिमात्रीम् दीर्घायुषं तं पुरुषं करोति सुतीव्रबुद्धिं सरलस्वभावम्॥ ३७॥ जिसकी पितृरेखा के शेपमाग से चली हुई रेखा भाग्यरेखा को मेदकर यदि मातरेखा पर्यन्त चली जावे तो वह दीर्घायु, तीचणदुद्धि एवं सीधे स्वमानवाला होता है। ३७ ॥ ११ पितुस्सुरेखा विशदा सुवक्रा भागदये चास्ति विभक्ररूपा। तदा नरोडयं निधनं प्रयाति पूर्वोक्कमानेन विचारणीयम्॥।३८॥। द्वितीयखराड पितृरेखा साफ़ एवं टेदी हो और दो भागों में चटी दिखे तो वह मृत्यु पाता है। इसका विचार पूर्व कथित हिसान से करना चाहिये॥। ३८ ॥।# १२ वगाधरस्थं विशदं विभाति वञ्रानुरूपं यदि भासमानय्। वार्द्धे मनुष्यः शुंभतामुपौति पूणं यदा चेच्छुभताधिकं च३६॥। पितृरेखा के नीचे स्थित बज्चाकार साफ़ निशान हो तो वह वृद्धावस्था में सुख पाता है। यदि पूर्वोक निशान पूर्णरूप से प्रतीत हो तो वह अ्परधिक सुख पाता है॥। ३६ ॥ १३ भाग्यासमुत्था मणिबन्धदेशात् कोएं सरन्ती समुपेति मात्रीम्। सुगुप्विद्यो मनुजस्सुवैद्यो रसायनज्ञो रमणीरतश्च४० मणिब्रन्ध से उठी भाग्यरेखा (ऊर्ध्बरेखा ) केण बनाती हुई मातरेखा के समीप पहुँच जावे तो वह गुप्त विद्यावाला, अच्छा वैद्य होकर रसायन का ज्ञाता, और रमखियों में रत रहता है॥ ४०.॥ १४ सुभोगरेखोपरिगं विशुद्धं गर्तानुरूपं यदि भाति चिह्हम्। तदा नरोऽयं कटिघातमेति कलासु पूर्णः कमलालयश्च॥४१॥ सुभोगरेखा (अस्मद्देशीय आयुरेखा) के ऊपरले भाग में साफ़ गड़हे के समान निशान हो तो वह चौंसठ कलापूर्ण लक्ष्मीवान् होता तथा कमर में आघात पाता है ॥ ४१ ॥ १५ सर्वाङुलीनां त्रितये परुष्के यवानुरूपं यदि भाति चिह्रम्। तदा जनो मज्जति वारिराशौ विद्याविहीनो विषयारतश्च४२ जिसकी समस्न अँगुलियों की तीसरी पोर (पूल) में यदि यवाकार निशान हो तो वह विद्या से हीन, व विषयासक होता तथा जल में दूबता है । ४२॥ १६ समुत्थिताचेन्मणिबन्धदेशात् स्वल्पा सुरेखासमुपैति पैत्रीम् कान्ताभिलाषी पुरुषस्तदानीं मातापितृभ्यां शुभतामुपति ४३ मशिबन्ध से उठी छोटी सी रेखा पितृरेखा के पास पहुँच जावे तो वह
- आयुक्रम हम पहिले ही बता आये हैं।-सम्पादक सामुद्रकशाख रमखी की चाहना करता तथा माता-पिता के द्वारा सुख पाता है।४३॥ (देखो चित्र नं० २५) चतुर्दशलक्षखाहित करतलफल १ सर्वाङ्ुलीनां त्रितये परुष्के तिर्यग्विभिन्नं सरलं कुरेखम्। रोगेण युक्को मनुजस्तदानीं नारोग्यभोगं लभते कदापि ४४।। जिसे सब अँगुलियों की तीसरी पोरमें एक सीधी रेखाआड़ी रेखाओंसे कटी हो तो वह रोगयुक्क होता और कमी आरोग्य भोग नहीं पाता॥।४४।। २संगर्तमध्यं गुरुगं विभाति तिर्यग्विभिन्नं सरलं दिरेखम्। पुत्राञ्जनो विन्दति जारजातानूर्ध्व यदा चेद्बहुकन्यकाश्च ४५ जिसे वृहस्पति के स्थान में बीच में गड़हे का निशान एवं सीधी दो रेखाएँ तिरछी रेखाओं से कटी दिखें तो वह जारजात पुत्र पाता है। यदि पूर्वोक्क निशान तर्ज्जनीमूल के ऊपरले भाग में दिखे तो बहुत सी जारजात कन्याएँ पाता है॥ ४५॥ * ३ शूरात्मजस्थानगता विभान्ति चुद्रस्वरूपाः कुटिलास्सुरेखा:। आलस्ययुक्को मनुजस्तदा स्यान्निष्कामकार्येनिरतोनितान्तम्॥ जिसके शनि स्थान में साफ़ छोटी छोटी टेही रेखायें हो वह आलसी होता तथा हमेशा बिना चाहनेवाले कार्य में लगा रहता है ४६ +
- एक अमेरिकन विद्वान् का कथन है कि यदि गुरु के स्थान में शड़ी टेढ़ी अनेक छोटी कटी सी रेखाएँ दिखें तो ऐसे व्यक्ति को आ्चरणह्दीन तथा गप्पी समझना चाहिये।
- प्रसिद्ध अमेरिकन विद्वान् W. G. Benham इस प्रकार की छोटी २ आड़ी रेखाओं के संबंध में कहता है कि "इसे बहुत खराब चिह्न समझना चाहिये।" कारए कि ये रखायें रक़प्रवाह में वाधक होती हैं। और इस तरह रक़ केवल उपस्थित बाधक चिद्गों पर से वह जाने के अतिरिक् कोई चारा नहीं रखता। और ऐसे प्रवाह के लिये यह आवश्यक है कि वह रक़ आस पास के हिस्सों पर से भी वह जाये। इन बिह्गां का मानवजीवन पर बहुत बुरा असर पड़ता है। अतएव ये अशुभ चिह्न हैं और स्वास्थ्यकर नहीं हैं। जब इस प्रकार के चिह्न कहीं पर दिखें तो उन्हें ध्यानपूर्वक देखना चाहिये। अन्य रेखाओं की अपेक्षा वे कितने गहरे या कम गहरे प्रतीत होते हैं, उसी मात्रा में उनका प्रभाव न्यूनाधिक जानना चाहिय।-संपादक ४ संभोगरेखा यदि मध्यमान्ता भाग्येन-भिन्ना प्रतिभाति कोणम् दौर्जन्ययुक्को मनुजस्तदानीं संच्षीणकायो ममतामुपैति ४७। भाग्यरेखा से कटी डुई सुभोगरेखा (हार्टलाइन) यदि मध्यमा पर्यन्त पहुँचकर कोखचिह्न बनावे तो वह दुर्जन, चीखकायावाला, तथा ममता- सम्पन्न होता है।। ४७ ॥ ५ संभोगरेखोपरिंगं त्रिरेखं गर्तेन युक्कं यदि भाति चिह्रम। गुदामयं वै लभते मनुष्यो गर्भस्य घातं निजधर्मपत्न्याम्४८॥ जिसकी सुभोगरेखा के ऊपरले भाग में गड़हेयुक् तीन रेखावाला निशान हो वह गुदा रोगी होता तथा उसकी धर्मभार्या को गर्भपात होता है॥४८॥ ६ मातुस्सुरेखा यदि नीचभागे रेखाद्वयेनाप्यवखरिडता स्यात मातुस्सुमानं कुरुते मनुष्यो द्वेषी जनानां जनताविहीन: ४६ निचले भाग में मातृरेखा दो रेखाओं से कटी दिखे तो वह सबका द्वेपी हो अकेला रहता तथा अपनी माता का बड़ा मान सम्मान करता है४ह ७ भोगाघरस्थं चतुरस्रयुक्क त्रिकोणरूपं यदि भाति चिह्नम्। आत्मम्भरिस्स्यान्मनुजस्तदानीं लोभेन युक्को ललनासमेतः ॥ आयुरेखा (भोगरेखा) के निचले भाग में चतुष्कोण से संयुक्त त्रिकोण का निशान हो तो वह लोभी एवं ललनायुक़ होता और पेट कहलाता है ५० = मातुस्सुरेखोपरिंगं द्विरेखं चिह्नं गभीरं यदि याति भोगाम्। तदा नरोयं द्विषतां विजेता जायासमेतो जनतामुपैति ५१॥ मातृरेखा के ऊपर गहिरा दो रेखाओंवाला निशान यदि भोगरेखा के समीप चला जावे तो वह शत्रु विजेता, जायायुक होता तथा जनता को पाता है॥ ५१ ॥ ६पित्रो: सुमध्ये विशदं विभाति गुणत्रयेणापि युतं सुचिह्वम्। उत्पातकारी मनुजो विकारी वेश्याविहारी परवित्तहारी ५२॥ मातृरेखा व पिहृरेखा के बीच में तीन गुणों के निशान हों तो वह विकारी, वेश्याविहारी, परवित्तहारी, तथा उत्पातकारी होता है।। ५२ ॥ १ गर्तावटौ भुवि श्वभ्र इत्यमरः। सामुद्रकशास्् १० मात्रा वियुक्का यदि पितृरेखा कौटिल्यरूपा मणिबन्धमेति चतुष्पदाघातमुपैनि पाणी दन्दाख्ययुद्धे विपदां विवेति५ ३।। मातृरेखा से विलग हुई पितृरेखा यदि टेही होकर मणिबन्ध के पास पहुँच जावे तो वह चौपाये के द्वारा आघात पाता, तथा दन्द्युद्ध में विशेप विपत्ति पाता है।। ५३ ।। ११ काव्यालयोत्थासमुपैतिरखा पैत्रीं सुमात्रीं चविभिद्य भोगाम् तदा नरः सप्ततिवत्सरान्ते सौभाग्यशाली सुखतां समेतिप४॥ शुक्र के स्थान से उठी रेखा पितृरेखा व मातृरेखा को काटकर भोगरेखा के समीप चली जावे तो वह सत्तर वर्ष के बाद सौमाग्यशाली होता और सुख भोगता है॥ ५४ ॥ १ २ भिन्ना सुभाग्यायदियाति रेखामात्रां सुभोगांचविभिद्य मन्दम् मृत्योर्विशङ्की मनुजो वितङ्की दोर्बल्यगात्रो गुणतामुपैति ५५ छोटी रेखा से कटी भाग्यरेखा (फेटलाइन) मातृरेखा व मोगरेखा को भेदकर शनि स्थान में जावे तो वह मौत से डरता, वितङ्डी, दुबला और गुखी होता है॥। ५५ ॥ तदा नरोयं रमणीसमूहाद्धानिं भयं वै लभते नितान्तम् ५६॥ जिसे मशिबन्ध से उठी कटे मस्तकवाली रेखा बुध के समीप जाबे तो वह रमखियों द्वारा हमेशा हानि एवं भय पाता है॥.५६ ॥ १४ अबुष्ठमूले विशदं विभाति रखाचतुष्कं यदि तुर्यभिन्नम्। तदा भविष्ये समये मनुष्यो महाधिकारी विषये रतश्त॥५७।। यदि अँगूठे के मूल में साफ़ चार रेखाओं से कटा चार रेखाओंवाला निशान हो तो वह भविष्यकाल में महाधिकारी होना तथा विषय में रत रहता है। ५७ ॥ (देखो चित्र नं० २६) चतुर्दशलक्षणद्वितकर तलफल १ १ सवांहुलीनां युगरामपर्वके भूपक्षरेखं यदि भाति लच्मकम् १ भागुरिमत टाप् द्वितीयान्तं पदमिति बोध्यम्। वातुर्ययुक्कश्चपलस्वभावको ह्येकाक्षरूपो मनुजो विभरायते ५= सब अँगुलियों की दूसरी व तीसरी पोर में यथासंख्य एक एक व दो दो रेखायें में तो वह चातुरीकला संपन्न, चपलस्वभाववाला, तथा काना कहाता है॥ ५८ ॥ २ व्रध्नालयस्थं विशदं विभाति चिह्नं द्विरेखं विततस्वरूपम्। तदा मनुष्यः कटिघातमेति कामी कलावान्कलहातुरश्र ५६ सूर्य के स्थान में लचेरूपवाला दो रेखाओंवाला साफ़ निशान हो तो वह कामी, कलावान्, लड़ाई करने में आतुर, और कमर में आघात गाताहै५६ ३सुभोगरेखा गुरुगा विभाति तस्या:सुशाखा यदि याति शौरिम तदा नरः शत्रुगणादिमुक़: सम्पत्तिशाली सुखतामुपैति ६०॥ सुोगरेखा (अस्मद्देशीय आयुरेखा) गुरु के स्थान तक पहुँचे और उसकी एक शाखा शनि के स्थान तक जावे तो वह शत्रुद्वारा मुक्क, संपत्ति- शाली, और सुखसमूद पाता है॥ ६० ॥ ४ शुकालयाच्चेब्बलिता सुरेखा सञ्छित्नमस्ता गुरुगा विभाति महाधिकारी मनुनस्तदानीं मान्यो वदान्योऽभयतामुपैति ६१ जिसे शुक्र स्थान से चली कटे मस्तकवाली रेखा बृहस्पति के स्थान में पहुँचे तो वह बड़े ओइदेवाला, मान्य एवं वदान्य (दाता) होता और अमय रहता है॥ ६१ ॥ ५ मातुस्सुरेखोपरिगं विशुद्धं भिन्नं त्रिकोएं यदिभाति चिह्रम्। प्रामोति पाणी जननीविरागं तदास्य माता मृतिमेति जन्तोः।I यदि मातृरेखा के ऊपर साफ़ तीन कोग्ोंवाला कटा फटा निशान हो तो वह माता के विराग को पाता है। उसी से इसकी माना पहले मृत्यु पाती है॥ ६२॥।
- एक अमेरिकन विद्वान इसे ठीक ऐसा ही मानता है जैसा यहाँ कहा गया है। किन्तु उसका कहना है कि यह चिह्न गहरा है। तथा बहुत कुछ ऊपर जाय तब वह प्रेम संबंध में असफल रहता है। एक फ्रन विद्वान् भी इसे गुएासूचक चिह्न तभी तक मानता है जब तक वह शास्त्रा शनि का पूरा स्थान न पार करे। ऐसा रहने पर वह सदैव धोखा खाना, हानि उठाना तथा गलतियाँ करता है।-संपादक सामुद्रकशारर ६ मातुस्सुरेखा यदि नीचभागे स्वल्पस्वरूपा वितता तथोर्ध्वें। दौर्भाग्ययुक्को वयसि पवृद्धे संवक्रगा चेदतिलोभशाली ६३॥ यदि मातृरेखा निचले भाग में पतली हो तथा ऊपरले भाग में फैज्ा हो तो दृद्धावस्था में दौर्याग्ययुक्क और यदि पूर्वोक रेखा टेड़ी सीडो तो बड़े लोभ- सूचक है। ६३ ॥ ७ पितुस्सुरेखोपरिंगं विभाति तिर्यग्विगिन्नं समकोणयुक्कम् । मानस्य हानिं लभते मनुष्यस्तथा विनाशं विषयस्य नूनम्६४ यदि पितृरेखा के ऊपरले भाग में तिरछा कटा हुआ समकोख युक्त चिह्न हो तो वह महाहानि को तथा विपयविनाश को निश्चय कर पाता है।६४॥ = भाग्याधरस्थं विशदं विभाति चिह्नं विशालं सरलं दिरेखम्। दोर्जन्ययुको मनुजस्तदानीं विश्वासघाती विषयानुपैति ६५॥ यदि भाग्यरेखा के निचले भाग में साफ़, एवं सीधा दो रेखाओंवाला निशान हो तो बह दुर्जन, विश्वासयाती और विपयी होता है॥ ६५ ॥ ६पितुस्समुत्था यदि याति भाग्या मात्री सुभोगांचविभिद्य सूर्यम् क्षयार्तियुक्को मनुजस्तदा स्यात् चीणो दरिद्रो दयिताविहीन: जिसका पिता की रेखा से उठी हुई माग्यरेखा (धनरेखा) मातूरेखा व भोगरेखा को विशेपता से भेदकर यदि सूर्य के समीप चली जावे तो वह क्षय (कंजम्पशन्) रोगी, दुबला, दरिद्री, तथा प्यारी विदीन रहता है।६६।। १० अङ्ुष्ठशाखावृतमध्यभागा रेखा सुवक्रा यदि याति चोर्ध्वम् तदा जनो मजति वारिराशौ रामाभिभूतो रसिको रसायाम्६७ अँगूठे की शाखाओं से घिरी मध्यभागवाली रेखा टेढ़ी होकर यदि ऊपर को चली जावे तो वह प्रागी सुन्दरियों से अनादत होता हुआ पृथ्वीमएडल में रसज्ञाना होकर नदी व नाले आदिकों में डूब जाता है॥ ६७ ॥ ११ निश।करस्थानगतं विशुद्धं तारानुरूपं यदि भाति चिह्नम् कुशाग्रबुद्धिर्मनुजस्तदानीं महाधिकारी विपयान्भुनक्कि ६८॥ जिसके चन्द्रस्थान में साफ़ नाग का चिद्ध हो वह बुद्धिमान् (तीच्गाबुद्धिवाला) १ सुन्दरी रमणी रामेन्यमरः। बड़ा अधिकारी (नड़े ओहदेवाला) और भोगों को भोगनेवाला होता है॥ ६८ ॥ * १२ चपाकरस्थानसमीपवर्ति त्रिकोणचिह्नं विशदं चकास्ति। महाधिकारी मनुजो मनस्वी मायामयोयं ममतामुपैति ६९॥ जिसे चन्द्रस्थान के समीपवर्ती साफ़ त्रिकोण चिह्न हो वह महाधिकारी, यनमौनी, मायावी (रहस्यवादी) और मोही होता है॥ ६६ ॥ 1 १३ समुत्थितं चेन्मशिवन्धदेशात्सर्पानुरूपं समुपैतिभाग्याम्। तदा नरः चीएकलेवरोऽसौ दुःखाभिभूतो नितरां दुनोति७। मशिबन्ध से उठा सर्पाकार निशान भाग्यरेखा के पास पहुँचे तो दुबले शरीरवाला, दुःख से पीड़ित तथा अधिक शोक युक्र होना बताता है॥७०॥ १४ पैत्री सुवक्रा मणिबन्धगा चेत्तदन्तिके स्यात्सरलं दविरेखम्। तदा मनुष्यो मृतिमेति पूर्व पश्चात्स्वमाता मरणं प्रयाति७१।। पितृरेखा टेढी सी होकर यदि मणिबन्ध के पास पहुँचे और उसी के समीप सीधा दो रेखाओंवाला निशान हो तो प्रथम उसकी और पीछे से उसकी माता की मृत्यु होती है ॥! ७१ ॥ (देखो चित्र नं० २७) १ सौम्यालयाच्चेच्चलिता सुरेखा सर्पानुरूपा समुपैति चोर्ध्वम्। भार्याविहीनो मनुजस्तदानीं यज्वा परखीं भजते नितान्तम्।। बुध स्थान से चली रेखा सर्प के समान होकर कनिष्ठ की तीसरी पोर में पहुँच जावे तो वह भार्या रहित, विधान से यज्ञ करता, और सदैव परनारी (उपपत्नी) सेवन करता है॥ ७२॥ २ अनामिकामूलगतं विभाति च्छिद्रस्वरूपं विशदं सुचिह्नम। प्रणष्टदृर्टिर्मनुजो विशोकी विनष्टवित्तो विषयाद् विभेति७३।।
- प्रसिद्ध फ़रेच विद्वान् इसके अतिरिक़ उसे कफ या जल- की शीत के कारण उपजा हुआ, रोगी तथा जहाज या और किसी प्रकार जल में मृत्यु होना बताता है। -- संपादक
- एक फ़च विद्वान् भी ठीक यही बातें बताता है। तथा और भी कहता है कि ऐसे व्यक्ति को बुद्धिमान् तथा अंतर्शानी होना चाहिए।-संपादक सामुद्रकशास जिसकी अनामिका के मूल में साफ चंद्राकार निशान दा तो उसकी दृष्टि जाती रहती है। इसी से वह विशोकी, गँवाये धनवाला और विपयों से विभीत होता है।। ७३ ॥ 1 ३ अनामिकामध्यमिकासुमध्यं मातुस्समुत्था यदियाति रखा। तदा नरो दीनदशामुपेतः प्रामोति मृत्युं निजकर्मदोषात ७४ जिसकी मातृरेखा से उठी रेखा यदि अनामा व मध्यमा के बीच में पहुँचे तो वह वुरी हालत को पहुँचता और अपने कर्मदोप से ही मौत पाता है७४ ४ भोगासमुत्यं विशदस्व्ररूपं चन्द्राधँंचिहनं यदि याति मन्दम्। कारागृहं याति नरस्तदानीं कारुणयहीन: कलहे रतश्॥७५॥ जिसकी भोगरेखा (अस्मददेशीय आयुरेखा) से उठा हुआ सपष्ट रूपवाला अर्ध चन्द्राकार निशान शनि स्थान में दिखे तो वह दयाहीन, लड़ाई में रत और जेल जाता है॥ ७५॥ ५ संभोगरेखा यदि नीचदेशे पीना सुहीना गुरुगा विभाति। चएडाभिघातान्मृतिमेति प्राणी स्थूला यदा चेच्छ्वरघातपा़तात्।। जिसकी संछोगरेखा (अस्मद्देशीय आयुरेखा) निचले भाग में मोटी व ऊपरले भाग में पतली होकर बृहस्पति के स्थान में पहुँचे तो उसकी मौत बढ़ी भारी चीट लगने से होती है। यदि पूर्वोक रेखा मोटी-सी दिखे तो सिर में चोट लगने से उसकी मृत्यु होती है॥ ७६ ।। ६ भोगाधरस्थं विशदं विभाति रेखासमेतं यदि सपमाङ्य्। तदा जनः स्वीयजनाभिभूतो नी चोर्ध्वगा चेद्रिपुवृन्दपूर्णः७७।। भोगरेखा के निचले भाग में साफ़ व रेखायुक सात के अंक के समान निशान होतो वह अपने कुटुम्बी वर्गों से आदर नहीं पाता है। यदि पूर्ोक्क निशान निचले या ऊपरले भाग में दिखे तो उसके शत्रु अधिक रहते हैं॥। ७७॥ ७ मातुस्सुरेखोपरिगं सुचिह्नं गुणाख्यचिह्वेन युतं त्रिरेखम्। अनेकों पाश्चात्य विद्वानों ने चस्द्राकार चिह्न नेत्ररोगसूचक कहा है। यहाँ भी ठीक यही बात बताई गई है।-संपादक द्वीपान्तरं याति नरस्तदानीं दाता दयालुर्दयिताविलासी ७८ मातृरेखा के ऊपरले भाग में गुख X के चिह्नयुक्त तीन रेखाओंवाला निशान दिखे तो वह माखी दाता, दयालु, विलासी और द्वोपान्तर (दूसरे दीप) में चला जाता है॥। ७८ ॥ = भोगाधरस्थं विशदं विभाति गुणानुरूपं यदिभाति चिह्नम्। तदा नरो धर्मपदावलम्बी धन्यो धरित्र्यां धनतामुपैति॥७६॥ जिसकी मोगरेखा (अस्मद्देशीय आयुरेखा) के निचले भाग में साफ़ गुख के समान निशान हो वह ध पद का अवलम्बन करनेवाला, धरामएडल में धन्यवाद देने के योग्य होता और धनसमूर पाता है॥ ७॥* ६पितुस्लुरेखोपरिगा विभाति ह्यक्ुष्ठशाखासहिता सुरेखा। तदा नरो नीच नराभिलाषी ब्रीडाविहीनो वनिताविलासी प० यदि एक रेखा पितृरेखा के ऊपरले भाग में अँगूठे की शाखाओं से युक् हो तो वह निर्लज रमखियों में रमण करता तथा नीचों की चाहना रखने वाला सूचित करती है॥ ८० ॥ १० मातुरसुरेखाधरगं विशुद्धं त्र्यङ्कानुरूपं यदि भाति चिह्नम्। विश्वासहीनो मनुजो विलासी संधारणाशक्कियुतोऽमिषाशी॥ यदि तीन अंक के समान निशान मातरेखा के निचले भाग में हो तो वह विलासी, भली भाँति धारणाशक्ि युक्र, मांसमती और विश्वासहीन होता है।। ८ १ ।। ११ मातुस्सुरेखाधरगं विभाति गुणत्रयेशापि युतं सुचिह्रम्। वदा परखीं हरते मनुष्यो नार्या यदा चेत्कुलटा भवेत्सा ८२।। जिसकी मातृरेखा निचले भाग में तीन गुण के निशानयुक्र हो वह पराई भार्या भगाता है। यदि पूर्वोक् निशान खरी के करतज् में हो तो वहव्यभि- चारिखी होती है।। ८२ ।।
- इस प्रकार के चिह्न को अनेकों विदेशी विद्वानों ने Mystic Cross कहा है। यह भी एक छायावादी अथवारहस्यवाही कवियों की एकनिशानी है। साथ ही यदि मातृरेखा (सस्तकरेखा) चंद्रप्रह की ओर जावे तब तो उसके कषि होने में संदेह करना व्यर्थ है।-संपादक सामुद्रकशास्र १२ पितुस्सुरेखा यदि नीचभागे चिह्नेन गोलाकृतिना युता स्यात् नेत्राभिघातं लभते मनुष्यो मन्त्रे सुतन्त्रे निरतो नितान्तय्=२ जिसकी पितृरेखा के निचले भाग में गोलाकार चिह्न हो वह मन्त्र एव तन्त्रशास्त्र में हमेशा रत रहता है। तथा नेत्ररोगी होता है॥। ८३ ।। १ ३मातुससुरेखा यदि चोर्ध्वभागे स्थूलस्वरूपा मिलिता च वषे। निर्वोधरूपो मनुजस्तदानी व्याजेन युक्को व्यवसायपूर्ण: ८४ जिसकी मातृरेखा ऊपरले भाग में मोटी होकर पितृरेखा में मिल जावे वह अज्ञानी, छली तथा रोजगारी बना रहता है।। ८४ ।। १४ अहुष्ठमूले विशदं विशालं वृत्तार्धचिह्नं नियतं चकास्ति। लौहाग्निघातं लभते स्वनेत्रे मानी मनुष्योममताविहीन: ८५ यदि अँगूठे के मूल में अर्धव्ृत्त का साफ़ निशान हो तो बह मानी, ममताहीन होता है और उसे नेत्रों में लोहया अग्नि द्वारा आघात होता है ८५ १५ पितुस्सुरेखा मणिबन्धहीना कौटिल्य रूपा मिलिता जनन्याम् जल्पाकरूपो मनुजस्तदानीं स्वल्पेन कालेन मृर्ति प्रयाति प६ टेदेरूपवाली पितृरेखा कब्ज़े से ऊपर और मातृरेखा मिली दिखे तो ऐसा प्राखी बकवादी (बड़वड़िया) होता है और थोढ़ी उम्र में ही मर जाता है॥। ८६ ।। १६ पितुस्समुत्था यदि भाग्यरेखा वृत्तार्धयुक्का जननीमुपैति। आयुष्यहानिं लभते मनुष्यो ह्यानन्दहीनो निधनं प्रयाति८७ जिस की पितृरेखा से उठी हुई भाग्यरेखा (दौलत की रेखा) अर्धदृत्त चिह्न युक्त होकर मातृरेखा के समीप चली जाते तो वह आयुर्ायहीन होता तथा आनन्दहीन होकर मरता है ।८७॥ (देखो चित्र नं० २८) पश्चदशलक्षणाङ्गित करतलफल १ अनामिकायास्तिरितये परुष्के नन्दाङ्करूपं यदि भाति चिह्नम्। यदि अनामिका की तीसरी पोर में नौ के अङ्क का सा निशान होतो वह द्वितीयखरड चौपायों से काटे अंगवाला होता है। चञ्चल तथा पैरों का रोगी भी छोता है॥। ८८ ॥ २ भोगासमुत्था सरला सुरेखा सौम्यालयं याति गभीररूपा। सत्पात्रशीलो मनुजस्तदा स्यान्नार्या यदा चेत्तु भवेत्सती साकह जिसकी भोगरेखा से उठी हुई सीधी व गहरी रेखा बुध स्थान में चली जावे तो वह माखी सत्पात्रशाला होता है। पूर्वोक्क रेखा स्त्री के करतल में दिखे तो वह पतिव्रता होती है ।। ८६ ।। ३ चएडालयस्थं विशदं चकास्तिचिह्नं यदैकं यदि न्यूनकोषम्। तदा जनोयं जनयूथभिन्नः ामोति मृत्युं सहसा सुभीतः ६ै०॥ यदि सूर्य स्थान में एक न्यूनकोणवाला (acute angle) निशान हो तो वह जनता द्वारा पिटना और बहुत डरकर एकाएकमरजाना बताती है॥ह। ४ अनामिकामध्यमिकासुमध्यं भोगासमुत्था यदि याति रेखा। तापीसुशोकी मनुजोविदुःखी स्वल्या यदा चेत्फल ताल्पतास्यात् भागरेखा से उठी रेखा अनामिका व मध्यमिका के बीच में चली जावे तो वह संतापी, शोकी और विशेप दुःखी होता है। और यदि पूर्वोक़ रेखा छोटी सी हो तो अल्प फल होता है।। ६१।। ५ बृद्धाङ्कुलीतश्चलिते सुरेखे बृहस्पतिस्थानगते यदास्तः । तदाग्निदग्धो मनुजो विभीतः संमुग्धचित्तोभ्रमते नितान्तम्।। जिसके अँगूठे से चली दो रेखायें यदि बृहस्पति स्थान में पहुँचे तो वह आग से जलता, डरनेवाला और मुग्ध डुआ भ्रमगा करता है।। ६२ ॥ ६ भोगाघरस्थं विशदं विभाति वृत्तार्धचिह्नं यदि चोर्ध्ववत्त्तम्। तदा नरो वह्विविदग्धगात्रो विभ्रान्तचित्तो भयतामुपैति॥६३॥ मोगरेखा के निचले भाग में साफ ऊर्ध्वमुखवाला अरधव्ृत्त का निशान हो तो बह अग्नि से जलता तथा भ्रान्तचित्त हो भयभीत रहता है॥ ६३ ॥ ७ भोगाघरस्थं विशदं विभाति चिह्नं त्रिकोएं यदि चुल्लरूपम्। चतुष्पदाघातमुपैति प्राणी चञ्चत्मभावश्चपलस्वभावः॥। ६४ ।। छोटा त्रिकोख चिह्न भोगरेख़ा के निचले भाग में हो तो वह बड़े प्रमाव वाला, चपलस्वभाववाला, तथा चौपाये द्वारा चोट खाता है।। ३४ ।। -संभोगरेखा मिलिता जनन्यां चुद्राविभिन्ना यदिचोर्ध्वभागे। मिथ्याप्लापी मनुजः प्रमादी संयोगहीना यदिवा सशाखा। सुमोगरेखा मातृरेखा में मिल जाबे और ऊनरले भाग में छोटी रेखा से कटी दिखे तो वह मिथ्पामापी तथा मवादी हाना है। यदि पूर्वोक़ रेखा संयोगह्दीन तथा शाखा समेत हो तो भी उक्र फल होता है॥ ६५ ॥ # ६पितुस्सुरेखा मणिबन्धहीना संचिन्नमस्ता कुटिला विभाति। तदा नरो मस्तकघातमेति मूर्च्छादिरोगैः परिपीडिताङ्गः॥६ ६ै।। पितृरेखा मखिबन्ध से दूर तथा मस्तक पर कटी व टेढ़ी हो तो वह मूर्च्जा रेग से पीड़ित होता तथा मस्तक में चो: खाता है॥ ६६ ॥ १० निशाकरस्थानगतं सुचिह्नं संलग्नमस्तं सरलं दिरेखम्। चतुष्पदाघातमुपैति माणी वामाभिलाषी वनिताविलासी ६७ जिसके चन्द्र स्थान में सीधी दो रेखायें मिली दिखें तो वह सुन्दरियों की चाहनावाला, वनिताबिलासी और चौपार्यों द्वारा चोटोखाता है।।ह७।। १ १मातुस्सुरेखोपरिगा विभान्ति रेखाविचुद्रा: सरलाश्च पट्का: जङ्गाभिघातं प्रतिपद्य सदयः पादाभिघातं लभते मनुष्यः॥६८॥ जिसे सीधी व छोटी छः रेखायें यदि मातृरेखा के ऊपर हों वह जंघाओं में चोट खाता तथा शीघ्र ही पातों में भी आधान पाता है।। ३८ ॥ १२ पितुस्खुरेखा निकटे विभाति ह्यङ्ुष्ठशाखा सहितं त्रिकोणम्। संभ्रान्तचित्तो निजमानहीनो नरो भवेद्ध्वस्तपदाधिकार:६६ अँगूठे की शाखाओं समेन त्रिकोण चिह्न पितृरेखा के समीप यदि हो तो संभ्रान्तचित्तवाला, मानहीन, तथा ओहदे से पतित होना सूचित करती है॥ ६६॥।
- यदि पूर्वोक कथनानुसार संभोगरेखा मातृरेखा में मिल जावे, साथ ही कहीं यदि पितृरेखा भी मिल तो उसे बड़ा भयंकर व्यक्ति समझना चाहिये। उसकी मृत्यु भी आराकस्मिक होती है।-संपादक द्वितीयखयड १३ मातुस्सुरेखा यदि सर्वदेशे चुद्राविभिन्ना विशदस्वरूपा। वातार्तियुक्को मनुजो महौजा: पीडां कठोरां लभतेदिनान्ते१०० जिसकी मातृरेखा सर्वत्र छोटी छोटी रेखाओं से कटी दिखे वह महावली, वातरोग पीढ़ित, तथा सन्ध्या समय में कठोर पीड़ा पाता है॥ १००॥ १४ पितुः सुरेखाधरगं विभाति रेखाद्यं रेखयुगेन भिन्नम्। शोकाकुलोयं पुरुषस्तदानीं पाशाग्रविद्धो मरणं प्रयाति ॥१।। जिसे दो रेखाओंवाला निशान पितरेखा के निचले भाग में अन्य दो रेखाओं से कटा प्रतीत हो वह शूली द्वारा मौत पाता है ।। १॥ १५ काव्यालयान्ते यदिभाति चिह्नं वृत्तार्धरूपं विशदं गभीरम्। वेश्याविहारी मनुजो विकारी मित्रापकारी परवित्तहारी॥२।। जिसे शुक्र स्थान में (अँगूठे की मूल में ) अरधवृत्त का साफ़ व गहरा निशान हो वह वेश्याविहारी, विकारी, मित्रों का अपकारी, तथा परद्रव्य- हारी होता है । २ ॥ (देखो चित्र नं० २६) १ सर्वाङ्ुलीनां युगरामपर्वके एका विनुद्रा सरला च रेखिका। असाध्यरोगी मनुजः प्रकीर्तितो दौर्बल्यगात्रो बहुकोपकोपितः समस्त अँगुलियों की दूसरी एवं तीसरी पोर में एक छोटी व सीधी रेखा हो तो वह असाध्य रोगी, दुर्बल तथा महाक्रोधी होता है॥ ३ ॥ २क निष्ठिकामूलगता विभान्ति रेखा वि चुद्रा:कुटिलाश्च तिस्त्रः। तदा कुकाले जननं प्रयातो मानी मनुष्यो ममतामुपैति॥४। जिसकी कनिष्ठा के मूल में छोटी व ठेही सी तीन रेखायें हों तो वह कुसमय में जन्म पाता तथा मानी और ममतावाला होता है॥ ४ ॥ ३ सोमात्मजस्य सदने यति भान्ति रेखा- स्तावन्मिता विकथिताः शुभदा विवाहाः। पाणिग्रहैविरहिता यदि गर्तयुका भिन्ना यदा मृतिगतः प्रथमं नृनार्यः॥५॥ बुध स्थान (कनिष्ठा के मूलतल) में जितनी टेही व गंभीर रेखायें हों उतने ही नरनारीगणों के विवाह कहाते हैं। यदि पूर्वोक् रेखायें छिद्र- युकक हों तो उनका व्याह ही नहीं होता। यदि
स्त्रीपद्तललक्षण (Part 8)
पूर्वोक रेखायें भिन्न हों अर्थात् स्त्री पुरुप के करतल में उक़ रेखायें मध्य में भिन्न हों तो पहले पुरुप मर जाते हैं और यदि पार्श्व में कदी सी प्रतीत हों तो पहले ख्त्रियाँ मर जाती हैं॥ ५॥ # ४ संभोगरेखोपरिंगं विभाति वृत्तार्धचिह्नं विशदस्वरूपय्। मातापितृभ्यां रहितो मनस्वी प्रामोति प्राणी बहुदूरदेशम्॥६॥ जिस के संभोगरेखा (अस्मदेशीय आयुरेखा) के ऊपरले भाग में साफ़ अर्धवृत्त का निशान हो तो वह मनमौजी, तथा दूरदेश को जाता है।।६।। ५समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशाद् भाग्या सुरेखा समुपैति शौरिय। तदा ने दुःखशतानि भुङ्के संस्पृष्टमूला यदि याति काराम्७
- प्रायः सभी विदेशी पसिडत यही बात बताते हैं। कनिष्ठा के मूल की आड़ी रेखा यदि शुद्ध स्पष्ट तथा लम्बी सी दिखे तो विवाह सूचित करती है। यदि कुछ पतली या छोटी हो तो वह पुरुष अथवा स्त्री का प्रभाव या संबंध बताती है। एक अरमेरिकन विद्वान् कहता है कि यदि इस आड़ी रेखा पर कोई छिद या गोल गड्ढा दिखे तो वह प्रेम संबंध में वाधा सम- भना चाहिये। फ़ंच विद्वान कहता है कि यदि यह रेखा संभोगरेखा (आयुरेखा) की ओर झुके तो स्त्री के हाथ में रंडापा ( वैधव्य) तथा पुरुष के हाथ में विधुरता की सूचक है। इस रखा पर आड़े टेढ़े किसी प्रकार के निशान प्रेम में बखवेड़े या झगड़ं अ्थवा अंतर सूचित करते हैं। यदि यह रेखा प्रारंभ में एक छोटी रेखा से मिली है तो अमेरिकन विद्वान के कथनानुसार उसमें रकप्रवाह द्विगुण होने से उसका फल अधिक अच्छा समझना चाहिये। और यदि अंत में इसमें से शाखा निकले तो प्रेम संबंध में परस्पर विरोध जानना। यहाँ एक बात और भी विशेष ध्यान में रखना आवश्यक है। बुधस्थान की सभी आड़ी रेखाएँ विवाह नहीं बतातीं। पर वे पुरुष अथवा स्त्री का संबंध अवश्य ही प्रकट करती हैं। इनमें सबसे स्पष्ट और अच्छी रेखा ही विवाह कहाता है। एक और अंग्रेज लेखक कहना है कि बुध स्थान की इस आड़ी रेखा से यदि एक योग रेखा शुक्रालय की एक छोटी पितृरेखा (आयुरेखा) की समानान्तर रेखा से मिले तब उसे विवाह सम्बंध जानना चाहिये। अन्यथ जितनी छोटी २ रेखायें दिखें उतने सम्बंध जानना चाहिये। जो हो, उपरोक़ कथन सत्य है।-संपादक द्वितीयखरड जिसके मशिबन्ध (कब्ज़े) से उठी भाग्यरेखा शनि पर्यन्त जाने तो वह अनेक दुःख भोगता है। यदि पूर्वोक्त रेखा मध्यमा का मूल स्पर्श करे तो वह जेलखाने जाता है।७॥ ६ संभोगरेखा यदि मध्यमान्तं गम्भीररूपा कुटिला प्रयाति। कष्टेन कालं नयते मनुष्यः साहाय्यतो वित्तमुपैति नूनम्॥८॥ गहरी व टेडी संभोगरेखा यदि मध्यमा के समीप चली जावे तो कष्ट से समय विताना, और सहायता से निश्चय धन पाना बताती है॥८ ॥ ७ सुभोग रेखाधरगं त्रिरेखं वामेन मध्येन च भिन्नरूपम्। तदा नरो वह्विभयाद्विमीतो वित्तक्षयं वै लभते नितान्तम् ६ सुभोगरेखा के नीचे वामभाग और मध्य भाग में कटा तीन रेखाओंवाला निशान हो तो वह अग्निभय तथा धनक्षय सूचित करती है॥ ६॥ = भोगासमुत्था यदि वक्ररेखा भात्रीं विभित्त्वा समुपैति पैत्रीम्। तदा जनो वैरिगणाभिभूतः च्यार्तियुक्को भयतामुपैति॥१॥ जब एक टेढा रेखा भोगरेखा से उठ मातृरेखा को काट पितृरेखा के पास पहुँचे तो शत्रु से सताया जाना, तयीरोग, तथा भय बताती है १०॥ ६पितुस्सुशीपोपरिंगं विभाति रेखाद्यं रेखयुगेन भिन्नम्। तदाश्वपृष्ठात्पतितो मनुष्यः चुद्रं यदा चेत्फलमन्दता स्यात् ११ जिसकी पितृरेखा के सिर परदो रेखाओंवाला निशान अन्य दो रेखाओं से कटा हो तो वह घोड़े पर से गिर कर मर जाता है। यदि पूर्वोक्त निशान छोटा हो तो फल अल्प होता है ।। ११ ।। १०च्पाकरस्योपरिगा विभान्ति रेखा विचुद्रा यदि यान्तिमात्रीम् तदा नरो दुर्बलगात्रयष्टिः संक्रुद्धचित्तो धननाशमेति ॥१२॥ छोटी छोटी बहुत सी रेखायें यदि चन्द्रस्थान के ऊपरले भाग से बातृ- रेखा के पास पहुँचें तो वे दुर्वलता, क्रोध और धनत्य की सूचक हैं १२॥
- प्रसिद्ध फ्ंच विद्वान् भी चंद्र स्थान पर ऐसी रंखाओं को बड़ी भारी कमज़ोरी, सदा उदासी और पेट के विकार सूचक मानता है। ऐसा पुरुष कमज़ोर तवियत का हुआ करता है।-संपादक सामुद्रकशास ११ बृहस्पतिस्थानगता कुरेखा गम्भीररूपा यदियाति मन्दयू। शीतज्वरान्मृत्युमुपैति मर्त्यः सूच्मा यदा चेत्फल ताल्पता स्यात।। जिसके गुरु स्थान से गहिरा छोटी-सी रेखा शनि स्थान में पहुँचे तो वह शीतज्वर (जूड़ी व बुखार) से मृत्यु पाता है। यदि पूर्वोक रेखा पतली-सी हो तो अल्प फल होना है ।। १३ ।। १२ काव्यालयोत्थासमुपैतिरेखा पैत्रीं सुभाग्यांचविभिद्यमात्रीय् आाघातवृन्दं लभते मनुष्यश्चानन्दहीनो दयिताविहीन: १४ जिसके शुक्र स्थान से उठी रेखा पितृरेखा व भाग्यरेखा को काट कर गातृरेखा से मिल जावे तो वह आ्नन्द हीन, माखप्यारी से विहीन, तथा बहुत-सी चोटें खाता है ॥ १४ ॥ १३ भाग्यान्तिकस्थं धटदरडतुल्यं सप्ताङभिन्नं यदि भाति चिह्नम ख्रैणो मनुष्यो निरपत्रपः स्यान्नार्या यदा चेद्रणिका भवेत्सा १५ जिसकी भाग्यरेखा के समीप तराज की डएडी के समान तथा सात के अङ्क से भिन्न हुआ निशान यदि हो तो वह स्त्रीलम्पट, तथा निर्लज्ज होता है। यदि पूर्वोक निशान स्त्री के करतल में हो तो वह वेश्या होती है । १॥॥ १४ निशाकरस्थानगता सुरेखा चुद्राविभिन्ना कुटिलस्वरूपा। लज्जाकरस्स्यान्मनुजस्सुखेप्सुर्नार्यायदा चेदुपपत्रिकास्यात् १६ जिसके चन्द्र स्थान में एक टेही रेखा छोटी छोटी रेखाओं से कटी हो तो वह सुख की चाहवाला होता तथा लज्जाकारी होता है। यदि पूर्वोक रेखा स्त्री के हो तो याजक की उपपन्नी होती है॥ १६ ।। (देखो चित्र नं ३०)t सप्तदशल न् णाङ्गित करतलफल १ कनिष्ठिकायास्त्रितये परुष्के रेखा विचुद्राः सरला यदि स्युः। तावन्मिता बोधयुताःसुपुत्राःसंवक्रगाश्चेत्ततिकन्यकाश्च १७।। कनिष्ठा की तीसरी पोर में जितनी छोटी एवं सीधी रेग्वायें हों उतने ही
- चंद्र का राज्य सदा विचारधारा, कल्पनाओं आदि पर रद्दा करता है। -संपादक पुत्र होते हैं। और यदि पूर्वोक् रेखायें टेही-सी दीखें तो उतनी ही कन्या पैदा होती हैं ॥ २७ ॥ + २ कनिष्ठिकाया द्वितये परुष्के रेखाद्वयं चेद्गुरुणा समेतम्। पुत्रादिहीनं मनुजं करोति विद्याविहीनं वचसा विहीनम् १८॥ जिसकी कनिष्ठा की दूसरी पोर में 5 गुरुसमेत खड़ी दो रेखाओंवाला (यानी भगण का) निशान हो तो उसको विद्याविहीन, वचनविहीन, तथा पुनहीन जानना ॥। १८ ॥ ३ शनैश्चरस्थानगता कुरेखा कौटिल्यरूपा विशदा विभाति। श्खेष्मपधानो मनुजस्तदा स्यात कासादिरोगैःपरिपीडिताङ्गः।। जिसे शनि स्थान में छोटी, टेही व साफ़ रेखा हो तो श्वास रोग से पीड़ित तथा कफरगिवाला होता है। १६ ।। ४ चन्द्रात्मजस्थानगतं गभीरं चिह्नं त्रिरेखं सरलं चकास्ति। सोडयं जनःसजनसंगकारी संवक्रगं चेदधमानुगः स्यात् २०।। जिसके बुध स्थान में गहरी तीन रेखाओंवाला सीधा निशान हो तो वह सज्जनों का साथ करता है। यदि पूर्वोक निशान टेवा सा हो तो वह अधमों का अनुगामी होता है॥ २० ॥ ५. संभोगरेखा यदि मध्यप्रान्ता संभिन्नरूपा कुटिला विभाति। साधुस्वभावो मनुजस्तदानींसत्कर्मशालीसततं सुखीस्यात् २१ जिसकी संभोगरेखा (अस्मद्देशीय आयुरेखा) मध्यमा तक पहुँच शाखा युक् हो जावे तो वह साधुस्वभाववाला, सत्कर्मशाली तथा निरन्तर सुखी रहता है॥ २१! #
- यह कनिष्ठा की तीसरी पोर में संतान-रेखायें बताई हैं। किन्तु पाश्चात्य विद्वान् बुध-स्थान में खड़ी तथा स्पष्ट रेखाओं को पुत्र की और पतली छोटी रेखाओं को कन्या की रेखा बताते हैं। इन दोनों कथनों में अधिक अंतर नहीं है।
- एक विदेशी विद्वान् का कथन है कि यदि संभोग रेखा की एक शाखत्रा गुरु की ओर तथा दूसरी तर्जनी और मध्यमा के बीच में जावे तो ऐसा मनुष्य अधिक सुसत्री तथा घरेल जीवन व्यतीत करता है। साथ ही वह ऐसा वाता- वरण भी पाता है। संभोग रेखा का सबसे अच्छा और संतोपजनक रूप यही कहाता है।-संपादक सामुद्रकशास्न ६ प्रदेशिनीमध्यमिकासुमध्ये रेखा यदैका सरला विभाति। आघातपातान्मृतिमेति प्राण्णी संकर्तिता चेत्फलमन्यथा स्यात्॥ जिसकी तर्जनी व मध्यमा के बीच में एक सीधी रेखा हो तो वह चोट लगने से अचानक मौत पाता है। यदि पतोक़ रेखा भोगरेखा से कटी दीखे तो फल अन्यथा होता है।। २२।। ७ भोगाधरस्थं सरलं त्रिरेखं चिह्नं गभीरं विशदं विभाति। तदा जनश्शत्रुगणाभिभूतो शान्त्या विहीनो भयतामुपति २३ जिसकी भोगरेखा के निचले भाग में ( मंगलस्थान में) सीधा तीन रेखाओंवाला गहरा निशान हो वह वैरियों से अनादत इोता तथा शान्ति रहिन हो भय पाता है॥ २३॥ = मातुः सुरेखोपरिगं गभीरं वृत्तार्धचिह्नं विशदं विभाति। गुदामयं वै लभते मनुष्यश्चो्ध्वं यदा चेत्पशघातमेति ॥२४।। जिसकी मातृरेखा के ऊपरले भाग में साफ़ गहरा अर्धवृत्त का निशान हो वह गुदारोगी (भगन्दर, बवासीर आदि) होता है। यदि पूर्वोक़ विशान ऊर्ध्वमुख हो तो पशुघात पाता है ॥ २४ ॥ मातुस्सुशीर्षोपरिगं विभाति गर्ताख्यचिह्नं विशदं गभीरम्। नक्कान्ध्यरोगी मनुजः सुभोगी विद्याविशेषो विभुतामुपैति २५ जिसकी मातृरेखा पर गहिरा व साफ़ गड़हे का निशान हो वह रनौंधी- वाला, बड़े भोगवाला, विद्याओं में विशेप, तथा विभुता पाता है।२५॥* १० मातुस्सुशीर्षोंपरिगा सुरेखा गम्भीररूपा यदि याति मन्दम्। उद्धन्धयुक्को मृतिमेति जन्तुर्जायासमेतो जयतामुपेतः॥ २६॥ जिसकी मातृरेखा के शीश पर गहरी रेखा शनि पर्यन्त जावे तो वह जाया समेत जयता को प्राप्त हो उद्बन्धन (फाँसीआदि) से मौत पाता है॥२६॥ १ अङ्मानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविस्तरः। धर्मशाखत्रं पुराएं च विद्या होताश्षतुर्दश॥
- पाश्चात्य विद्वान् भी वृत्ताकार अथवा अर्धवृत्ताकार चिह्न नेत्ररोग- सूचक कहते है।-संपादक द्वितीयखरड ११ स्वल्पा सुमात्री विशदा सुरेखा संवक्ररूपा यदि याति वक्रम्। चतुष्पदाघातमुपैति प्राणी चञ्चत्परभावश्चपलस्वभावः॥२७। टेबी, छोटी व साफ़ मातृरेखा यदि मङल के समीप चली जावे तो बड़े पभाववाला, चपल स्वभाववाला, और चौपायों से चोट खानेवाला सूचित करती है॥२७॥ १२ वक्रा सुपैत्री मिलिता जनन्यां कोन युक्का मणिबन्धगाचेत् सोयं जनःशत्रुगणादिभिन्नः कारागृहं प्राप्य मृर्ति प्रयाति २८॥ पितृ रेखा टेदी तथा मातृरेखा में मिली हुई कोख चिह्न युक्क होकर कब्ज़े पर्यन्त जावे तो वैरिगणों द्वारा ताड़ित, जेल में मृत्यु पाना बताती है॥२८॥ १३ अङ्डष्ठशाखासहितं गभीरं कोणद्यं चिह्नतमं चकास्ति। श्लेष्माधिकोडयं मनुजस्तदानीं दोर्बल्यगात्रो दयितामुपेति२६ यदि अँगूठे की शाखाओं समेत गहरा दो कोणों का निशान हो तो कफीला, दुर्बल होता तथा सुन्दगी पाता है॥ २६॥। १४ वृद्धाङ्गुलेवैंनिकटे नखस्य मध्ये विभिन्नं यदि भाति वृत्तम्। चौर्ये प्रवृत्तो मनुजस्तदानीं स्तैणो महाव्याधियुतो विभेति ३० अँगूठे के नख के समीप या बीच में, गोल निशान एक छोटी रेखा से कटा हो तो चौरकर्म में परायण, स्त्रीलम्पट, महाव्याधि युक्त तथा भयसूचक है३० १५ समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशात्स्वल्पा सुभाग्या समुपैति मात्रीम्। तदा जनो जीवति दीर्धकालं दाता दयालुर्दयिताविहीनः ३१ जिसकी मशिबन्ध से उठी छोटी सी भाग्यरेखा यदि मातृरेखा तक जावे तो वह दाता, दयालु, पागप्यारी हीन तथा दीर्घायु होता है॥ ३१ ॥ १६ अङ्डुष्ठमूले विशदं विशालं कीटानुरूपं यदि भाति चिह्नम्। कफोर्तियुक्को मनुजस्तदा स्यात्कान्ताविहीनःकलहे रतश्च ३२ जिसके अँगूठे के मूल में साफ़ विच्छू के समान निशान हो वह स्रीहीन, लड़नेवाला तथा कफरोगी होता है॥ ३२ ॥ १७ पित्रो: सुमध्ये परिदृश्यमानं सर्पानुरूपं यदि भाति चिह्नय्। तदा कलङ्की मनुजो विशङ्की नार्या यदा चेत्कुलटा भवेत्सा ३३ जिसकी मातृरेखा व पितृरेखा के बीच में साँप के समान निशान ही तो वह कलङ्की तथा विशङ्गी होता है। यदि पूर्वोक निशान स्री के करतल में हो तो वह व्यभिचारिखी होती है ।। ३३ ॥ (देखो चित्र नं० ३१) सप्दशलच्त णाङ्गितकर तलफल १ कनिष्ठिकायास्तृतये परुष्के रेखाद्र्यं चेत्सरलं विभाति। जङ्गार्तिभीति लभते मनुष्यो जायाभिलापी जनतासमेतः ३४ जिसकी कनिष्ठा की तीसरी पोर में सीधा दो रेखाओंवाला निशान हो वह ख्ी की अभिलापा करता तथा जंघापीढ़ा के भय को पाता है ॥ ३४ ॥# २ अनामिकायास्त्रितये परुष्के रखाद्यं चेत्कुटिलं चकास्ति। चतुष्पदादष्टत नुर्मनुष्यो दीनो दरिद्रो दमतामुपैति॥ ३५ ॥ जिसकी अनामिका की तीसरी पोर में दो रेखाओं का टेहा निशान हो वह दीन, दरिद्री और चौपाये द्वारा डसा जाता है॥ ३५॥ ३ चन्द्रात्मजस्थानगता विनुद्रा स्थूलस्वरूपा यदि भाति रेखा। चौर्ये पवृत्तो मनुजस्तदा स्याच्ञ्चत्पभावश्चपलस्वभावः॥। ३६॥ बुध स्थान में छोटी एवं मोटी रेखा हो तो वह प्रभावशाली, चपलस्वभाव- बाला, और चोर होता है।। ३६।। + ४ ब्रध्नालये चेद्विशदे विनुद्रे स्यातां सुरेखे विरलस्वरूपे। कट्यार्तिभीतिं भजते मनुष्यो भाग्येन हीनो भ्रमतासमेतः३७।। सूर्य स्थान में साफ़, छोटी और सीधी बिरली दो रेखायें हों तो भाग्य हीन, भ्रम से घिरा तथा कमग्पीड़ा बताती है॥ ३७ ॥।
- कनिष्ठा की नीसगी पोर में पहिले संतान-रंखायें भी बना आये है। उपरोक्त रेखाओं को तथा संतान रंखाओं को ज़रा ध्यानपूर्वक देख कर विचार करना चाहिये अन्यथा गढ़यड़ हो जाने का भय हो सकता है। -संपादक
- कई विदेशी विद्वान भी यही वान कहते हैं। उनका कथन है कि बुध स्थान पर मोटी, साफ़ एवं खड़ी रंखा अथवा कनिष्ठा की पहिली या तोसरी पोर में यदि एक धन का चिह्न+या खड़ी रेखा ऐसे ही मनुष्य की सूचक है।-संपादक द्वितीयखयड ५. प्रदेशिनीमूलतलाचलन्ती रखा यदैका यदियाति चान्द्रिम। व्युत्पन्नबुद्धिर्मनुजस्तदा स्याद्वेदान्तभाषी व्यवसायपूर्णः।।३=।। जिसकी तर्जनी के मूल से चली एक रेखा बुध स्थान में पहुँचे तो वह वेदान्तभाषी, उद्यम पूर्ण, तथा व्युत्पन्न बुद्धिवाला होता है। यह रेखा प्रायः अखवार संपादकों के हाथों में पाई जाती है ॥ ३८ ॥ ६ संभोगरेखा यदि नीचभागे रेखाद्वयेनाप्यवखरीडता स्यात। तदा नरो बन्धुजनोपकारी प्रामोति वित्तं वनिताविहारी।३६ ।। जिसकी संभोग रेखा ( अस्मद्देशीय आयुरेखा) निचले भाग में दो रेखाओं से खिडत दिखे वह बन्धु उपकारी, वनिताविहारी तथा धनी होता है॥। ३६ ॥। ७ अम्बोत्थरेखा युतशीर्षदेशा संभोगरेखा गुरुगा विभाति। तदा नरो मृत्युभयाद्विभीतोव्यासक्चित्तःपरितःप्रयाति ४०॥ जिसके मातृरेखा से उठी रेखा संयुक्त शीशवाली भोगरेखा ब्ृह्दस्पति स्थान में पहुँचे वह मृत्यु से डरता, तथा विशेपता से आसकचित्त और चारों तरफ़ घूमता है॥ ४० ॥ = गुर्वालयोत्था विशदास्सुरेखा यावन्मिता मातृपदंप्रयान्ति। तावद्विवाहान्कुरुते मनुष्यो मान्यो वदान्योधनतासमेतः।४१।। जिसके गुरु स्थान से उटी जितनी साफ़ रेखायें मातृरेखा के पास पहुँचें वह मानी, दानी, धन सम्पन्न, तथा उतने ही विवाह करता है।४१॥ ६मातुस्सुरेखा यदि नीचभागे शाखासमेता गुरुगा विभाति। दाता दयालुर्मनुजस्तदानीं सुखाभिलाषी ललनामुपैति॥४२॥ जिसकी मातृरेखा निचले भाग में शाखायुक् हो यदि बृहस्पति स्थान में पहुँचे तो वह दाता, दयानान्, सुग्वाभिलापी, तथा प्यारी ललना पाता है ४२ १० मातुस्सुरेखा याद मध्यभिन्ना गम्भीररूपा गुरुगा विभाति। कट्यार्ति भीति लभते मनुष्यः पूर्वोक्कमानेन विचारणीयम् ४३ यदि मातृरेखा बीच में भिन्न एवं गहरी हो और बृहस्पति स्थान में पहुँचे तो कमरपीड़ा का भय बताती है। यह पूर्वोक्मान से विचारना चाहिए। ४३। ११ मात्रा वियुक्कायदिपितृरेखासञ्छिन्नमस्ताकुजगा विभाति। तदा नरःस्याद्ब हुजग्धिकारी पमत्चित्तः प्रमदाविहारी।।४४। यदि मातृरेखा से विलग होकर पितृरेखा कटे मस्तकवाली तथा मंगल के धर पहुँचे तो मतवाला, पमदाविहारी और बड्ड भोजी होता है॥ ४४॥ १२ वृद्धाङ्गुलेवैं निकटे नखस्य चापानुरूपं यदि भाति चिह्नम्। शस्त्रास्त्रविद्धो मनुजो मनस्वी मानी धनी स्याज्नतासमेत:४५ जिसके अंगूठे के नाखून के पास धन्ताकार निशान हो वह मनमौजी, मानी व धनी, जनसंपन्न होता और शस्त्रास्त्रों से वेधा जाता है॥ ४५॥ १३ मातुस्सुरेखाधरगं गभीरं त्रयङ्कानुरूपं यदि भाति चिह्नम्। तदा नरस्स्याच्छरजालबद्धो वामी सुकामी खलधामगामी ४६ जिसे मातृरेखा के निचले भाग में गहिरा तीन के आंक का सा निशान हो वह वामी, बड़ा कामी, खलधामगामी, और वाएसमूहों से बाँधा जाता है॥ ४६ ॥ १४ समुत्थितं चेन्मणिबन्धदेशात्सर्पानुरूपं समुपैति मात्रीम्। तदा नरःस्याद्व्यभिचारशीलो नार्या यदा चेत्कुलटाभवेत्सा ४७ मशिबन्ध से उठा हुआ सर्प के समान निशानमातृरेखा के समीप जावे तो वह व्यमिचारी होता है। यदि पूर्वोक़ निशान स्त्री के करतल में हो तो वह व्यमिचारिखी होती है। ४७ ।। १५ पैत्री सुरेखा यदि मध्यदेशे वृत्तार्धयुक्ा कुटिला विभाति। पामोति प्राणी हृदयाभिघातं पूर्वोक्कमानेन विदोहनीयम् ॥४८॥ जिसकी पितृरेखा मध्यभाग में गोल या अर गोलाकार निशान तथा टेवी हो वह हृदय में चोट पाता है। यह विद्वान् को पूर्वोक़ मान से विचारना चाहिए (अर्थात् समय-निर्गाय पूर्वोक़ मान से करना चाहिए) ॥ ४८॥ १६ निशाकरस्थानगतं सुचिह्नं चुल्लीसरूपं विशदं विभाति। तदा नरो मजति वारिराशौ व्यायामसको विषयातुरश्र॥४६॥ चन्द्र स्थान में चुल्ही के समान साफ़ निशान हो, तो कसरती, विषय- आतुर होता तथा नदी, नाले आदि में डूबता है॥ ४६॥ १७ पैत्री सुरेखा यदिनीचभागे संखगिडता भुग्नतरा विभाति। तदा महोच्चात्पतितो मनुष्यो मानी महौजा ममतामुपैति॥५०॥ पितृरेखा निचले तरफ़ भलीमाँति खषिडत होकर ठेही हो तो वह मानी व महावली तथा ऊँचे से गिरता है ॥५०॥ (देखो चित्र नं० ३२) १ सर्वाङ्ुलीनां युगरामपर्वके रेखाद्वयं वै सरलं विभाति चेत्। तदाजनोसौनिजवाक्यपालकःपारुष्यपूर्णःपरमार्थशालक: ५१ यदि सब अँगुलियों की दूसरी व तीसरी पोर में सीधी दो रेखाएँ हो तो अपने वाक्य का पालनेवाला, कठोर, परमार्थशालक सूचित करती हैं॥५?॥ २ सौम्यालय।च्चेच्चलिता सुरेखा चापानुरूपा यदि याति सूर्यम्। तदा नरोऽसौ वयसः क्रमेण प्रापोति वृद्धिं बलवीर्ययुक्काम्॥५२॥ वुध स्थान से चली धनुषाकार रेखा यदि सूर्य के पास पहुँचे तो वह अवस्था के क्रम से वल वीर्य-युक्त वृद्धि पाता है यानी बाल्यावस्था से युवावस्था में एवं युवावस्था से दृद्धावस्था में उन्नति को पाता है॥ ५२॥ ३्वक्रालयाच्चेच्च लितासुरेखापित्रोविभित्त्वायदियातिभोगाम्। रक्कातियुक्को मनुजो मनीषी सौजन्यपूर्णो मृतिमेति सद्यः॥३३॥ जिसे मंगल स्थान से चली रेखा मातरेखा व पितृरेखा को काटकर भोगरेखा पर्यन्त चली जावे वड बुद्धिमान्, सज्जन, रक्रपीड़ा से युक् होता और वेग ही मौत पाता है।। ५३॥ ४ संभोगरेखोपरिगं विभाति वृत्तार्धयुग्मेन युतं सुचिह्नम्। तदा नरोसौ गुणगौरवाढ्यो गुदार्नियुक्ो गुरुतामुपैति।।५४॥ भोगरेखा के ऊपर दो अरध गोलाकार निशान हो तो वह गुग गौरव सम्पन्न तथा गुदारोगी और गुरुता को पाना है ।। ५४ ।।
- यही बात विदेशी विद्वान् भीकहने हैं। वे जल में इबने के लिये चौकार निशान बताते हैं। पर चंद्र स्थान पर होना ही चाहिये।-संपादक सामुद्रकशास्त्न ५ मातुस्सुरेखा यदि मध्यभागे धन्वाकृतिभ्यामवषिडता स्यात्। दौर्बल्यगात्रो विकलस्वभावोमानेन हीनोमनुजो निभेति ५५ यदि मातृरेखा मध्यदेश में दो धन्वाकार निशानों से खषडित दिखे, तो दुर्बल शरीरवाला, विकल स्वावदाला, मानहीन तथा डरता रहनेवाला सूचिन करती है।। ५५ ॥ ६ पित्रा समेता यदि मातृरेखा कोणेन युक्ा कुटिला विभाति। विश्वासयुको मनुजोमनस्व्रीस्यात्ती चण चुद्धिविपयस्यगोप्ताप ६ पितृरेखा से मिली मातृरेखा यदि टेही एवं कोणचिह्न युक्क हो तो मनमौजी, तीखी बुद्धिवाला, विषय का छिपानेवाला तथा विश्वासयुक्क रहता है॥ ५६ ॥ ७ पितुः सुरेखोपरिगं सुचिह्नं भिन्नत्रिकोणं यदि वञ्रभिन्नम्। तदा नरो वह्निविदग्धगात्रो व्यासक्रचित्तः परितः प्रयाति॥५७॥ पितृरेखा के ऊपरले भाग में वञ्र से कटे हुए भिन्न त्रिकोख का निशान यदि दिखे तो उसकी देह अग्नि से जलती और वह विशेषता से या तो आसकचित्त होता या सबसे अलग चित्त रखता और चारों तरफ़ चूमता है५७ = काव्यालयाचचेच्चलिता सुरेखा नतस्वरूपा यदि याति चोर्ध्वम्। तदा नरो भिन्तुकवृत्तियुक्को नीचप्रवृत्तिर्नितरां विभाति ॥५=॥। शुक्र स्थान से चली लचेरूपवाली रेखा ऊपर को जावे तो वह नीचों में प्रवृत्ति रखता एवं भिनुकों की जीविकावाला होता है॥। ५८ ॥ ६आरालयोत्थं कुटिलं गभीरं रेखाद्वयं भ्रातृपदं प्रयाति। शीर्षच्छदाभीतियुती मनुष्यो मायामयोडयं ममतामुपैति५६ मंगल स्थान से उठा टेवा एवं गहिरा दो रेखाओं का निशान भ्रातस्थान को चला जावे तो वह मायावी शीश काटने के भय से युक्क होता तथा ममता पाता है॥। ५६॥
- स्मरण रहे कि उक़ चिह्न मङ्गल स्थान पर होगा, और मंगल का राज्य अग्नि पर है। रकवर्ण है। इस विषय पर पहले लिखा जा चुका है।-संपादक १० चन्द्रालयस्थं सधनंगभीरं रेखात्रयं चिह्नतरं चकास्ति। तदा नरोऽसी शठतामुपैति सम्पत्तिपूर्णों नितराम सभ्यः ॥६०।। यदि चन्द्र स्थान में धनचिह्न समेत गहिरा तीन रेखाओंवाला निशान हो तो वह सम्पत्तिपूर्ण रहता तथा बहुत अ्सभ्य और शठ होता है: ।६०।। ११ भाग्या सुरेखा खलु स्वल्परूपा शाखासमेता शशिनं प्रयाति। तदा जनोयं जठरामयारत्तों जाज्वल्यमानो ज्वरतामुपैति।।६१। शाखा समेत छोटी भाग्यरेखा यदि चन्द्र के सामने पहुँचे तो वह उदररोग से पीड़ित रहता तथा ज्वर आदि से घिरा रहता है॥ ६१ ॥ १२ समुत्थिता चेन्मशिवन्धदेशाद्वक्रासुरेखा यदि यातिमात्रीम्। तदा नरो घूर्णितशीर्षंदेशो दौर्बल्यगात्रो भयतामुपैति॥६२। मणिबन्ध से उठी टेढी रेखा मातृरेखा के पास चली जावे तो उसका सिर हमेशा चकर खाया करता है। इसी से दुबला और डरा करता है॥ ६२ ॥ ( देखो चित्र नं० ३३) पश्चदशलक्षणाङ्गितकर तलफल १मध्याङुलेवैं द्वितये परुष्के वक्रा सुरेखा विशदा विभाति। तदा नरोऽनिष्टतरं प्रयाति विषाद्युपायैविषयाभिभूतः ॥ ६३। जिसकी मध्यमा की दूसरी पोर में साफ एवं टेढी रेखा हो वह विषयों से टूटे अहंकारवाला होता और विपादि द्वारा अनिष्टता पाता है।। ६३ ॥ २ सौम्यार्कमध्ये विशदं विभाति तिर्यक्स्वरूपं यदि युग्मेरखम्। नेत्राभिघातं लभते मनुष्यो नारीविहीनो नयतासमेतः॥६४।। बुध व सूर्य के मध्य में (कनिष्ठा व अनामा के नीचे) साफ़ दो रेखाओंवाला तिरछा निशान हो तो वह प्राछप्यारी से विहीन होता एवं नीतिसंपन्न और लोचनों में चोट पाता है॥ ६४॥ ३ मन्दालयस्थं विशदंविभाति तिर्यकृत्रिभिन्नं यदि युग्मरेखम्। कारागृहं याति नरः कदापि ज्वरेण भग्नश्चतुराहिकेण ॥६५॥
- ऐसा व्यक्ति जल से डरता भी है-संपादक जिसके शनि स्थान में साफ़ तिरछी तीन रेखाओं से कटा दो रेखाओंवाला निशान हो वह चतुराहिक (चौथिया) जर से पीड़ित होता है और कभी जेलखाने भी जाता है॥ ६: ॥t ४ गुर्वालयस्थाकुटिला कुरेखा तिर्यग्विभिन्नायदियाति भोगाम्। पदाधिकारं लभते मनुष्यो ऋज्वी यदा चेद्धठतः पदासिम्६६ बृहस्पति स्थान म टेढ़ी एवं छोटी सी रेखा तिरछी रेखा से भिन्न होकर यदि भोग रेखा पर्यन्त जली जावे तो वह पदाधिकार पाता है, यदि पूर्वोक्क रेखा सीधी-सी प्रनीत हो तो वह हठ से पद को पाता है॥ ६६ ॥ ५ गुर्वालयान्ताच्चलितासुरेखा पित्रोविभित्त्वायदियाति भौमम्। रक्कार्तियुक्को मनुजो मनीषी मान्यो वदान्यो ज्वरतामुपैति६७ बृहस्पति स्थान के समीप से चली हुई रेखा मातृरेखा व पितृरेखा को काटकर यदि मङ्लार्यन्त चली जावे तो वह बुद्धिमान्, मान्य व वदान्य (अत्तिदानी ) तथा रक्कपीड़ा युक्त होता और जरपीड़ित रहता है॥ ६७ ॥ ६ समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशाड्डुग्ना सुरेखा समुपैति सौम्यम्। दीर्घायुषं तं मनुजं करोति विद्याधरं बोधवरं वरेएयम्॥६८॥। जिसके करतल में मशिबन्ध से उठी रेखा टेढी होकर यदि बुध पर्यन्त चली जावे तो उसको बड़ी उम्रवाला, विद्याधर, बड़े बोधवाला तथा सब में प्रधान चना देती है ॥६८ ॥#
- सुप्रसिद्ध फ्रंच विद्धान् का मन है कि यदि शनि स्थान में इस प्रकार का कोई चिह्न हो तो उसे दुर्भाग्ययुक्र जीवन जानना चाहिए, खासकर बुढ़ापे में। अफ्सर ऐसा चिह् (grille) जेल बाने जाने की निशानी है। दूसरा फ्रेंत विद्रान कहता है कि शनि स्थान पर ऐसे चिह्न अथवा कोई भीं छोटी छोटी आड़टी टेह़ी इस प्रकार की रखाएँसदा भाग्यहीन व्यक्ि के हाथ में होनी हैं। हम्नरंख्ा विशास्ट्र को उपरोक विदों के साथ यह भी देख लेना चाहिए कि कोई अन्य जवरदस्त शुभ चिद्न इसका परिहार तो नहीं करता। यदि ऐसा होगा तब नो पूर्ण रुरण उपरोक फल नहीं होगा, पर संभव है, वंदी जीवन काटना पड़े। मणिबंध से बुध तक जानेवाली सीधी रेख्वा स्वास्थ्य रखा भी कहाती है। अतपत उसे और इसे भिन्न-भिन्न समझना चाहिये। जरा ध्यानपूर्वक देखने से ही अंतर जाना जा सकंगा। -संपादक ७ संभोगरेखा गुरुगा गभीरा शाखासमेता यदि नीचभागे। बाह्ये गुदे रोगयुतो मनुष्यः संखगिडता चेद् गुदमध्यरोगी ६६ भोगरेखा (हार्टलाइन) बृहस्पति स्थान में पहुँच गहरी होकर निचले स्थान में शाख्ा समेत दिखे तो बड गुदा स्थान में वाहिगी तरफ़ रोगों से संयुक्त रहता है। यदि पूर्वोंक रेखा निचले भाग में खिडत पाई जावे तो वह गुदा रोगवाला होता है॥ ६६ ॥ = संभोगमात्रोर्यदिनीचदेशे चिहं चतुष्कोणयुतं चकास्ति। तदा विवादी मनुजो विषादी महापरतापी खलु विभ्रेलापी ७० आयुरेखा (संमोगरेखा) व मातृरेखा के निचले भाग में चौकोण निशान हो तो वह विपाद करनेवाला, बड़े प्रतापघाला, छल से भापखकर आशा भंग करनेवाला और झगड़ालू होता है।। ७० ॥ ६मातुस्सुरेखा गुरुगा गभीरा चुद्रा विभिन्ना यदि मध्यदेशे। तदा मनुष्यः सुविचारशाली काले भविष्ये कुविचारपाली ७१ मातृरेखा बृहस्पति स्थान में पहुँच गहरी हो और यदि बिचले भाग में चुद्र रेखाओं से कटी दिखे तो वह वर्तमानकाल में बड़ा विचारशाली होता है। तथा भविष्यकाल में वुरा विचार किया करता है॥ ७१ ॥ १० मातुस्सुरेखा यदि नीचदेशे चुद्राविभिन्ना गुरुगा विभाति। छल्पायुपं तं पुरुषं करोति ह्यानन्दहीनं मतिमन्दपीनम्॥७२॥ बृहस्पतिस्थान में पहुँची मातृरेखा यदि निचले भाग में छोटी रेखासे कटीहो तो उसको आनन्दहीन, मोटी बुद्धिवाला तथा थोड़ी उमरवाला करती है७२ ११आरालयान्ताचलिते सुरेखे अङ्कुष्वपृष्ठाभिमुखं प्रयातः । तदा जनो मजति वारिराशौ कर्तव्यकार्ये बहुतर्ककारी।७३। मङलस्थान के निकटदेश से चली दो रेखायें अँगूठे की पीठ के सामने यदि पहुँचे तो वह योग्य कार्य में बह्डुत तर्क करनेवाला होता है। और नदी नाले आदि में डूबता है॥ ७३ ॥ * १ चिप्रलापो विसंबाद इत्यमरः॥
- विदेशी विद्वानों ने जल से भय केवल चंद्र स्थान पर ही माना है। उनका कहना है कि चू कि चंद्र का राज्य जल पर है, अतएच उस ग्रह पर अंकित विशेष चिह्नों द्वारा जल भय जानना चाहिए। संपादक सामुद्रकशास्न १२ वृद्धाझुलेवें निकटे नखस्य रखाद्यं चेद्ग्रथितं मिथः स्यात्। तदा नरे नास्तिकतामुपैति पाखरडकारी परवित्तहारी।।७४।। जिसके अँगूठे के नख के पास टेदी फनाकार दो रेखाओंवाला परस्पर (५) गुँथा हुआ निशान हो वह पाखएडी, परधनहारी और नास्तिक होता है।। ७४ ॥ १३ मन्दालयाचेचचलिता सुरेखा स्वल्पस्वरूपा समुपैति पैत्रीय्! तदा नरस्तूचपदं प्रयाति राज्यात्मतिष्ठां प्रतिपद्य सम्यक ।७॥ जिसकी शनिस्धान से चली छोटी रेखा पितुरेखा के पास पहुँचे वह किसी राज्य से अली भाँति प्रतिष्ठा पाकर ऊँचे पद का अधिकारी होता है। यानी बड़ी प्रतिष्ठा के साथ ऊँचा पद भता है। ७५ । १४ समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशाद् वक्रा सुरेखा पितरं प्रयाति। ज्वरार्दितः चीणतनुर्मनुष्यो दीनो दरिद्रो दयितासमेतः॥७६।। जिस के मणिबन्ध से उठीटेढी रेखा पितृरेखा के पास पहुँचे वह चीणकाया- वाला, दयितासमेत, दौन एवं दविद्री होना तथा बुखार से व्याकुल रहता है७६।। १५ काव्यालयस्थं परिभाति चिह्न वाणविभिन्नं यदि पट्करेखम्। हासी विलासी रतिरङ्गलासी ह्यानन्दराशी पुरुषः प्रकाशी ७७ यदि शुक्र स्थान में पाँच तिरछी रेखाओं से कटा हुआ छः रेखाओंवाला निशान हो तो वह हँसनेवाला, ऐयाश, रतिरंग में लसा हुआ, आनन्द राशि वाला और प्रकाश का करनेवाला कहाता है॥७॥ (देखो चित्र नं० ३४) १-रतिरक्के लसितुं शीलमस्येति। पाश्चात्य बिद्धानों का मत है कि भुगुस्थान में इस प्रकार के चिह्न होने का अर्थ है कि ऐसा मनुष्य वयाश तवियत तो होता ही है, साथ ही साथ निर्लज भी होता है। तिषय वासना ही उसका एक मात्र लक्ष्य रहा करता है। चूँकि यह स्थान शुक्र (वीर्य) का है इस पर ऐसे चिह्न होने से उक्र ग्रह (वीर्य) में कमी हो जाना एक अमेरिकन विद्धान् का फथन है। वह कहता है, कि ऐसी रखाओं द्वारा रक्तप्रवाह में बाधा उपस्थित होने के कारण वह तत्त्व शरीर में त्षीण हो जाता है। और फिर वैसा पुरुप प्रबल इच्छाओं का शिकार होने के कारण दीघायु नहीं हो सकेगा। वह विद्वान् विद्युत संचार (विचार प्रवाह अथवा रक्कप्रवाह) परभी अधिक ज़ोर देता है। तीए इन्द्रिय हो उहने से मनुष्य की इच्छायें उसे विषय में प्रबल हो जाती है। -संपादक चतुर्दशलक्तणङ्कितकर तलफल १ प्रदेशिनी चन्द्रमिते परुष्के रेखाद्यं चेत्कुटिलं चकास्ति। उग्रस्वभावो मनुजस्तदा स्यात्क्रोधातुरः चीणकलेवरथ्।।७८॥। जिसकी तर्जनी की पहली पोर में दो रेखाओं वाला टेवा निशान हो वह कठोर चित्तवाला, क्रोधी और तीखकाय होता है॥ ७८॥ २ मन्दालयाच्चेच्चलिते कुरेखे सन्तर्जनीमूलगते यदा स्तः। सम्पत्तिहीनो मनुजो विशोकी प्रासभ्यदोषान्मरणं प्रयाति७६ जिसकी शनिस्थान से चली छोटी सी टेही दो रेखायें तर्ज्जनी पर्यन्त चली जावें वह बड़ा शोच करनेवाला, संपत्तिहीन, तथा अपने हठदोप से मौत पाता है।। ७६ ॥। ३ संभोगशाखा गुरुगा गभीरा स्वल्पस्वरूपा कुटिला विभाति। तदा ह्यपस्मारयुतो मनुष्यो जलाग्निभीतो जडतामुपैति॥८॥ संभोगरेखा की आयुरेखा (शाखारेखा) बृहस्पति स्थान में पहुँच गहरी, टेदी तथा छोटी हो तो वह मिरगीरोग वाला, पानी व आगी से डरनेवाला और जड़ होता है॥। ८० ॥ ४ संभोगरेखा निजमध्यदेशे चुद्राविभिन्ना सरला विभाति। मानी मनुष्यो ममतासमेतो मन्दाग्निरोगं लभते नितान्तग्=१ सीधी संभोग रंखा (अस्मददेशीय आयुरेखा) अपने बिचले भाग में छोटी छोटी रेखाओं से कटी हो तो वह मानी, ममता संपन्न तथा हमेशा मन्दाग्निरोगी होता है ॥ ८ १ ॥ ५ संभोगरेखा यदि चोर्ध्वभागे शाखाविहीना शनिगा विभाति द्वीपान्तरंयाति नरस्तदानी रुम्भ्रान्तचित्तः परितो भ्रमेच ८२ जिसकी सुभोगरेखा (आयुरेखा, हार्टलाइन) ऊरी भाग में शख़ाहीन हो तथा शनि पर्यन्त पहुँचे वह संभ्रान्तचित्त होता तथा दूसरें द्वीप को चला जाता है और चारों तरफ़ चूमना रहता है॥ ८२ ॥ ६ काव्यालयाचेचलिता सुरेखा पित्रोविभित्त्वा भजते सुभोगाम् सोयं नरो वह्विविदग्धगात्रो ह्यापोति मृत्युं सहसासमेतः॥८३॥ शुक्र के स्थान से चली रेखा मातृरेखा एवं पितृरेखा को काटकर भोग रेखा तक पहुँचे तो वह बली होता है। वह अग्नि में जलकर मृत्यु पाता है।। ८३ ।। ७ मातुः सुरेखा सरला गभीरा शाखासमेता यदि चोर्ध्वदेशे। तदा नरो वैरिगणान्विजित्य विश्वासपात्रोविभुतामुपैति=४ सीधा एवं गहरी मातृरेखा ऊपरी भाग में शाखाओं समेत दिखे तो वह विश्वासी तथा वैरियों को विजयकर विभुता पाता है॥ ८४ ॥ = वृद्धाङ्गुलेवे निकटे नखस्य रेखात्रयं चेत्सरलं विभाति। विश्वासशाली मनुजस्तदा स्याद्रेखाद्वयं चेत्तु फलं तदेव द५ जिसके अँगूठे के नख के निकट-देश में तीन रेखाओंवाला सीधा निशान हो वह विश्वासपात्र होता है। यदि पूतोंक़ निशान दो रेखाओं वाला हो तो भी वही फल होता है॥ ८५ ॥ ६संभोगरेखाधरगं विभाति तिर्यक्स्वरूपं यदि युग्मरेखम्। तदा नरो रोगगणाभिभूतो रक्कातिसारं लभते रसज्ञः ॥८६ ॥ जिसकी संभोगरेखा (आयुरेखा) के निचले भाग में टेदा दो रेखाओं वाला निशान हो वह अनेक रोगों से व्याकुल होता है। और रसज्ञाता होता तथा रक्रानिसार (पित्तातिसार में गर्मवस्तु के खाने से होता है) से पीड़ित होता है॥ ८ ६ ॥ १० मातुःसुरेखा यदिनीचभागे शाखासमेता सरला विभाति। निर्वोंधरूपो मनुजस्तदा स्यात्सत्येन हीनो हनभिज्ञमुख्य := ७ जिसकी सीधी मातृरेखा यदि निचले भाग में शाखा समेत हो तो वह सत्यहीन, मूखों का मुखिया होता और अबोध रहता है।। ८७ ।। ११ पैत्री सुरेखामशिबन्धहीनावक्रा सकोणा मिलिता जनन्याम् दीर्घायुपं तं पुरुष करोति पारुष्य हीनं परमार्थलीनम्॥८८॥ पितृरेग्ा मगिबन्ध से हीन, टेढ़ी एवं कोण समेत होकर मातृरेखा में मिली दिसे तो उसको दयालु एनं परमार्थ में लीन तथा बड़ी उमरपाला बना दती है॥ ८८ ॥ १२स्वल्पासुभाग्याकुटिलाचकास्ति नुद्राविभिन्नायदि मध्यदेशे छल्पायुषं तं पुरुषं करोति ह्यानन्दहीनं वसुधाविहीनम्॥८६॥ छोटी एवं टेही भाग्यरेखा यदि मध्य भाग में छोटी छोटी रेखाओं से कटी दिखे तो उसको आनन्दहीन तथा अल्पायु करनी है॥८ ॥ १ ३भाग्या सुरेखा यदि चोर्ध्वभागे शाखासमेता जननीं प्रयाति। तदा नरो रोगचयाभिभूतो भोगाभिभूतो भयतामुपैति ६० यदि ऊपरी भाग में शाखा समेत भाग्यरेखा मातृरेखा के पास जावे या सामने ही रहे तो वह रोगपीड़ित व भोगों से व्याकुल रहना तथा डरता है।। ६० ॥ काव्यालये चेद्विशदंविभाति भिन्नोर्ध्वभागं गुणितस्य चिह्नम्। सोयं जनः स्याद्निताविलासी हासी विघासी च सदा सुखाशी जिसके शुक्र स्थान में गुखित X का साफ़ निशान ऊपरले भाग में कटा हुआ हो वह वनिताचिलासी, हँसनेवाला, बहुत खानेवाला, तथा इमेशा सुख की आशावाला होता है ॥ ६१ ॥ (देखो चित्र नं० ३५) पञ्चदशलक्षणाद्गितकरतलफल १ प्रदेशिनीभूमियुगे परुष्के धनाख्यचिह्नं विशदं विभाति। तदा नरः स्वं लभतेऽवलाया नार्या यदा चेत्कुलटा भवेत्सा ६२। तर्जनी अँगुली की पहली एवं दूसरी पोर में यदि धन का + साफ़ निशान हो तो वह किसी स्त्री से धन पाता है। यदि पूर्वोक़ निशान स्त्री के करतल में हो तो वह व्यभिचारिणी होती है॥ ६२॥ * २ अनामिकामध्यमिकासुमूले रेखाचतुष्कं यदि भाति स्वल्पम्। दाता दयालुर्मनुजस्तदा स्याद्विश्वासशाली विषयैविरक्र:६३।। १ भाग्यरेखा यदि छोटी है तो सुख भी कम समझना चाहिये। यदि लम्बी और साफ़ है तो सुखी जीवन जानना। यदि उक़् रेखा छोटी छोटी रेखाओं से कटी दिसे तब तो समय निकाल कर जानना कि अमुक २ समय में उसे धन संबंधी महाकष्ड होगा अथवा भयंकर बाधाएँ उपस्थित होंगी जिससे उसके विकास में अंतर पड़े।-संपादक
- किन्तु फ्रेंच विद्वान् ऐसे चिह्न को अच्छा नहीं कहता।-संपादक सामुद्रकशासत् अनामिका व मध्यमा के मूल में छोटासा चार रेखाओंवाला निशान हो तो वह दाता, दयावान्, विश्वासपात्र, तथा भोगों से बिरक्क रहता है ।।६३।। ३ मन्दालयाचेच्चलिता सुरेखा गम्भीररूपा समुपैति सूर्यम्। पापाधिकारी पुरुषस्तदा स्यात्पारुष्ययुक्क: पशुतुल्यबुद्धि:।।६४।। शनि स्थान से चली गहरी रेखा यदि सूर्यवर्यन्त जावे तो वह पापाधिकारी, कठोर और पशु बुद्धिवाला होता है।। ६४ ॥ १ सौम्यालयान्ताच्चलिता सुरेखा कौटिल्य रूपा यदि याति मन्दम्। मन्दस्वभावो घृणया समेतः पापे प्रवृत्तः पुरुषोऽधमःस्यात ६५ जिसके बुध स्थान से चली टेढी रेखा यदि शनिपर्यन्त जाबे वह मन्द स्वभाववाला, घृणायुक्क, पापपरायख तथा निन्दित होता है॥ ६५ ॥+ ५ गुर्वालयस्थं विशदं विभाति रेखात्रयं चेत्सरलस्वरूपम्। सोडयं जनो मस्तकघातमेति राज्याधिकारी रमणीविहारी ६ ६ जिसके बृहस्पति स्थान में तीन रेखाओंवाला साफ़ एवं सीधा निशान हो वह किसी महाराजा के राज्य में अधिकारी होता तथा रमखियों में विहार करता और मस्तक में चोट खाता है॥ ६६॥ ६ सौम्यालये चेत्सरला सुरेखा गम्भीररूपा विशदा विभाति। मान्योवदान्यो मनुजस्तदा स्यान्नार्या यदा चेत्सुरता भवेत्सा॥ जिसके बुध स्थान में सीधी, गहरी एवं साफ़ रेखा हो वह मान्य, बड़ा दानी या बोलनेवाला होता है। यदि पूर्वोक रेखा स्त्री के करतल में हो तो वह बड़ी रमनेवाली होती है॥ ६७ ।। # ७ भोगा सुरेखा यदि नीचदेशे गम्भीररूपा भगिनससिमेता। तदा नरःस्याद्दृढगात्रयष्टिःसंभोगशाली सुषमासमेतः॥६=॥ गहरी संभोगरेख। (आयुरेखा) यदि निचले भाग में भगिनीरेखा समेन । यह रखा भयंकर तथा बड़ी अ्शुभ कहाती है। सं० : यह रंखा भी अशुभ है। सं०
- इस पर हम अन्यत्र टिप्पणी दे चुके है। सं० द्वितीय खएड पतीत होवे, तो वह मज़बूत कायावाला, बढ़ा भोगी और परमशोभा वाला होता है।। ३८ ॥ ८ संभोगरेखा यदि मध्यदेशे चुद्राविभिन्ना कुजगा विभाति। कामातुरःकार्यरतो मनुष्यो ब्रीडाविहीनो वनितामुपैति॥६६॥। मङ्गल स्थान में पहुँची संभोगरेखा यदि बिचले भाग में छोटी-छोटी रेखाओं से कटी हो तो वह कामातुर, कार्य में परायण, निर्लज्ज होता और वनिता पाता है।। ६६ ॥ ६ संभोगरेखा यदि चोर्ध्वदेशे मातापितृभ्यां सहिता सकोणा। सत्येन हीनो विपदा समेतः संकष्टशाली मरणं प्रयाति॥१००। संभोगरेखा यदि ऊपरले भाग में कोणसमेत हो तथा मातृ व पितृरेखा से मिली दिखे तो वह झूठा, विपदाग्रस्त और महाकष्ट भोगनेवाला होता है॥ १०० ॥ १० अङ्कष्ठशाखानिकटे विभाति रेखात्रयं रेखयुगेन भिन्नम्। धूर्त: कुशीदी मनुजो मिथश्चेद्धिन्नं मृर्ति चैत्यधनी सचक्रम् १।। जिसके अँगूटे की शाखाओं के समीप ऊपरले भाग में तिरछी दो रेखाओं से कटा तीन रेखाओंवाला निशान हो वह जुआरी तथा व्याजखोर होता है। यदि पूर्वोक्क निशान परस्पर रेखाओं से कटा दिखे तो वह मृत्यु पाता है। यदि पूर्वोक्क निशान चक्राकार दिखे तो वह धनरहित होता है ॥ १॥ ११ शुक्रालये चेद्विशदस्वरूपं चिह्नं त्रिशूलानुमितं विभाति। सोयं नरो वहिविदग्धगात्रो यज्ञादिकार्यं कुरुते नितान्तम॥२॥ शुक्र स्थान में त्रिशूल् का साफ़ निशान हो तो वह आगी से जले हुए गात्रवाला होता तथा हमेशा यज्ञादि कार्यों को करता है ॥ २॥ १ २ समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशाद्रेखा गभीरा समुपैति सौम्यम्। सोडयं नरःस्याद्विनयी जयी च संक्षीणचेता यदि कर्तिता स्यात् मणिबन्ध से उठी हुई गहरी रेखा यदि बुध पर्यन्त जावे तो वह विनयी सामुदकशास्त्र नथा वैरियों का जीननेवाला होता है। यदि पूर्वोक रेखा कटी प्रतीत हो तो क्षीणचित्तवाला होता है॥ ३ ॥ समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशाद्धाग्या सुरेखा यदि याति शौरिम औत्कराठ्ययुको मनुजस्तदा स्याद्रेखा नता चेत्फलताविशेषः मणिबन्ध से उठी भाग्यरेखा शनैश्चर पर्यन्त जावे तो उत्कएठायुक होता है। यदि पूर्वोक़ रेखा लची हुई मनीत हो नो विशेष उत्कएठावाला होता है ।। ४ ॥ १४ अङ्गष्ठमूले विशदस्वरूपं वञ्रानुरूपं यदि भाति चिह्नम्। सोडयं नरः स्यात्कुविचारशाली ह्याचारहारी व्यभिचारकारी५ अँगूठे के मूल में साफ़ वज्र के समान निशान हो तो वुरे बिवारवाला, आचारहीन तथा व्यमिचारी होता है।। ५ ॥ पित्रो: सुमध्ये परिदृश्यमानं वस्वङ्कतुल्यं यदि भाति चिह्रम्। दुःखाकरः स्यान्मनुजो जनानामुदबन्धतो मृत्युमुखं पयाति॥ यदि मातृ एवं पितृरेखा के बीच में आठअरङ्ग के समान निशान हो तो मनुष्यों के लिए दुःबबकारी होता है। ऐसा मनुष्य फाँसी से मौत पाता है ॥। ६ ॥ ( देखो चित्र नं० ३६ ) पश्चदशलक्षणाङ्गितकगतलफल १ मध्याङगुलेवें प्रथमे परुष्के चिह्नं त्रिरेखं यदि वेदभिन्नम् । औत्करठ्ययुको मनुजस्तदा स्यादौदास्यपूर्णों नितरामुदार:७ जिसकी मध्यमा की पडली पोर में तिरछी चार रेखाओं से कटा
- आचाराल्लमते ह्यायुराचारादीप्सितप्रजाः । आचाराद्धनमक्षय्यमाचारो हन्त्यलक्षगामिति मनुः॥ भारतीयशास्त्रवेत्ताओं ने आचार को खासी प्रधानता दी हैं अन्यदेशों में विचार-धर्म है। किंतु यहां आचार तथा विचार दोनों है। कर्म सिद्धान्त पर आचार का पूर्ण प्रभाव है। यदि अच्छे आचार हैं तब तो विचार भी अच्छे होंगे, यदि युरे विचार हैं तब कहना ही क्या। अच्छे विचारों से अच्छा परिगाम होगा। कारण, तुम्हे अच्छे कर्म करने पड़ेंगे जिनका परिणाम भला होगा।-संपादक द्वितीयखरड सीधी तीन रेखाओंवाला निशान हो वह उत्कएठायुक्, उदासीनता पूर्ण तथा बहुतही उद़ार होता है।। ७॥। २ प्देशिनी चन्द्रमिते परुष्के वक्र त्रिरेखं यदि भाति चिह्नम्। सोयं नरो धर्मपरो नितान्तं धन्यो धरित्र्यां धनतामुपैति ॥८॥। जिसको तर्जनी की पहली पोर में टेढ़ा तीन रेखाऑवाला निशान हो वह धर्मपरायख, पृथ्वी पर धन्य कहाता और घनी होता है॥ ८ ॥ ३ मातुःसुरेखाधरतश्चलन्ती भिन्ना सुरेखा दिनपं प्रयाति। द्रव्यादिहेतो: पुरुपात्निहन्ति हूस्वा यदा चेत्तनुघातमेति॥६॥ जिसकी मातृरेखा के निचले भाग से चली हुई रेखा छोटी रेखा से कटकर सूर्यपर्यन्त जावे वह द्रव्यादिकों के लिए पुरुषों का वध करता है। यानी डाकेजनी करता है। यदि पूर्वोक रेखा छोटीसी तथा नुद्ररेखाओं से कटी दिखे तो वह अपने शरीर में चोट पाता है॥। ६। ४ संभोगरेखानिकटे विभाति भग्नीसुरेखा वितता गभीरा। सोऽयं जनःस्याद्निताविलासी संमोदराशी बहुधा महासी१० जिसकी सुभोगरेखा के समीप फैली एवं गहरी भग्नीरेखा हो वड ममदाविलासी, बड़ा आनन्दी और प्रायः बड़ा हँसनेवाला होता है॥१०॥ ५ संभोगरेखा यदि नीचभागे चुद्राविभिन्ना कृशतासमेता। व क्षस्थलाघातमुपैति जन्तुर्जायाविरोधी जनतासमेतः ॥११॥ यदि संभोगरेखा (आयुरेखा) निचले भाग में पतली तथा छोटी-छोटी रेखाओं से कटी हो तो प्यारी स्त्री का विरोधी, जनसंपत्न तथा छाती में चोट लगना सूचित करती है । ११ । ६ भोगा गभीरा मिलिता सुवपे तन्मध्यगास्वल्पतराच माता। रोगाभिभूतो मनुजस्तदानीं भूतादिदोषैरपमृत्युमेति ॥१२॥ जिसकी भोगरेखा ऊपरी भाग में गहरी हो और पितृरेखा में मिली दिखे तथा छोटी सी मातृरेखा उन दोनों रखाओं के बीच में हो तो बह रोग- पीड़ित और भूतादि दोपों से अकाल मौन पाता है ॥ १२ ॥ १ दिनपं दिनपर्ति सूर्यमितियावत्। सामुद्रकशास्त्न ७ पितुः सुशीर्षोपरिंगं विभाति तारानुरूपं युगलस्वरूपम्। तदा नरोऽसौ यशसा समेतो मान्यो वदान्यो बलतासमेतः१३ पितृरेखा के ऊपरले भाग में नक्षत्र (स्टार) के दो निशान हों तो वह बली, यशस्व्री, माननीय और दानी होता है।। १३ ॥। =अङ्ुष्ठशाखोपरिंगं विभाति रेखाचतुष्कं यदि स्वल्परूपम्। श्लेष्मार्दितोऽसौ मनुजःकृशाङ्गो भामाभिभूतोभ्रमतामुपैति १४ यदि अँगूठे की शाखा रेखा के ऊपरले भाग में छोटा सा चार रेखाओं- वाला निशान हो तो कफरोग, दुर्बलदेह, नारियों से शनादृत तथा भ्रम- युक्त होना बताती है॥ १४ ॥ हभोगाधरस्थं विशदं विभाति चिह्नं त्रिकोणं यदि दृश्यमानम्। कान्ताभिलाषी कलही मनुष्यः प्रापोति मृत्युं द्विषतः करेण १५ जिसकी भोगरेखा के निचले भाग में साफ़ त्रिकोण चिह्न हो वह कामिनी की अभिलाषा करता तथा लड़ाई लड़कर दुश्यन के हाथ से मृत्यु पाता है॥ १५॥ १० पितुःसुरेखोपरिगं चकास्ति चिहनं त्रिशूलानुमितं यदा चेत्। तदा नरो वहिविदग्धगात्रो व्यासक्चित्तो व्ययतामुपैति १६ पितृरेखा के ऊपरले भाग में त्रिशूल के समान निशान हो तो आग से जले अङ्गवाला, घबड़ाये मनवाला और बड़ा खर्चीला होना बताती है १६ ११ पैत्री समुत्था विशदा गभीर रेखा यदा भ्रातृपद प्रयाति। सोडयं जनः शत्रुपराजितः स्यात्संकर्तिता चेदरिवृन्दमुक्:१७॥ जिसे पितृरेखा से उठी साफ़ एवं गढरी रेखा यदि भ्रातृस्थान पर्यन्त पहुँचे वह शत्रुओं मे पराजित होता है। यदि पूर्वोक् रेखा कटी दिखे तो वह बैरियों मे छूट जाता है ॥। १७।।
- यह नक्षत्र चिह्न गुरु स्थान पर होना चाहिए। पाश्चात्य विद्वानों ने इस चिह को गुरु स्थान पर होने से वड़ा शुभ तथा उपरोक गुरशाली माना है। सं०
- वह मङगल स्थान है और मङल अग्नि आदि पर राज्य करता है। सं० १२ चन्द्रालयस्थं विशदस्वरूपं तिर्यकत्रिरेखं यदि भाति चिह्नम्। सोडयं जनःस्याजलयानयायी मायाविधायी ममतापहायी१८ जिसे चन्द्र स्थान में तिरछा तीन रेखाओंवाला साफ़ निशान हो तो वह मायाविधान करनेवाला, ममता त्यागी और जहाज की सतरारी यानी जलपथ में परिभ्रमण करता है ॥ १८ ॥ # १ ३भाग्यासमुत्थाविशदासुरेखावक्रागभीरामिलिताजनन्याम् जङ्घास्थिभङ्गं लभते जनो वै जाज्वल्यमानो ज्वरजार्तियुक्त: १६ भाग्यरेखा से उठी साफ़ व टेही रेखा मातृरेखा में मिले तो वह ज्वर- पीड़ायुक् होता तथा उसकी जाँघ की हड्डी टूट जाती है ॥ १६॥ १४ समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशाद्धाग्या सुरेखा समुपैति शौरिम। चौर्ये प्रवृत्तो मनुजस्तदा स्यादुष्टस्वभावो विगतप्रभावः॥२०। जिसके मरिबन्ध से उठी भाग्यरेखा यदि शमि पर्यन्त जावे वह दुष्ट स्वभाववाला, गतपभाववाला तथा चौरकर्म-परायण होता है॥ २०॥ १५. समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशाद्धक्रा सुरेखावरजं प्रयाति। तदाजनो बन्धुगणाभिभूतःप्रामोति दुःखं दयितासमेतः ॥२१॥ मरिबन्ध से उठी टेही रेखा यदि भ्रातृस्थान तक जावे वह बन्धु- गणों से अनादत होता यानी क्षति को पाता तथा भार्यासमेत दुःख पाता है॥ २१ ॥ ( देखो चित्र नं० ३७) पश्चदशलक्षणाङ्गित करतलफल १ कनिष्ठिकायाः प्रथमे परुष्के वृत्तार्धचिह्नं विशदं विभाति। राज्याभियोगे नियतो नरः स्याद्विवादशाली विषये रतश्र २२ जिसकी कनिष्ठा की पहली पोर में अर्धवृत्त का साफ़ निशान हो तो वह भगड़ालू, विपयी तथा वैरिस्टर या वकील होता है॥ २२॥
- प्रायः सभी हस्तरेखा विशारद्रों ने इस स्थान पर आड़ी लंबी रेखाओं को जलयात्रा माना है। हमें भी इसका खासा अनुभव हुआ है। छोटी छोटी रेखा थलयात्रा तथा बड़ी बड़ी जलयात्रा बताती हैं।-संपादक २ सौम्यालये चेद्विशदस्वरूपं चिह्न द्विरेखं सरलं चकास्ति। बाहौ विघातं लभते मनुष्यो विद्याविवेकी पथितःपृथिव्याम् २३ जिसके बुध स्थान में दो रेखाओंवाला साफ़ व सीधा निशान हो तो वह विद्वान्, विवेकी, विख्यात तथा भुनाओं में चोट पाता है॥ २३॥ ३ अनामिका मध्यमिकासुमध्ये वक्रा कुरेखा समुपैति सूर्यय्। जङ्गाभिघातं लभते जनो वै जञ्जप्यमानो जनतासमेतः॥२४।। अनामिका व मध्यमा के बीच में छोटी-सी टेदी रेखा सूर्य स्थान को जावे तो वह निन्दित मनुष्य का प्रेमी तथा जनसम्पन होता और जंघा में आघात पाता है।। २४ ।। ४ मन्दालये चेद्विशदं विभाति गुणाख्यचिहनं युगलस्वरूपय्। संपत्तियुक्को मनुजस्तदा स्पात्सौभाग्यशाली सुपमासमेतः २५ शनैश्वर स्थान में दो साफ़ गुण के X X निशान हों तो सम्पदा युक्क, सौभाग्यशाली और शोमावाला इंगित करती है॥ २५ ॥ * ५ संभोगशाखा विशदा गभीरा संतर्जनीमूलगता विभाति। सोऽयं जनो मध्यमवित्तशाली संरक्तमध्या यदि वित्तपाली २६ संमोगरेखा (आयुरेखा) की साफ़ एवं गहरी शाखारेखा तर्जनी अँगुली के मूल में भली-भाँति पहुँचे तो वह धनी होता है। यदि पूर्वोक रेखा बीच में लाल हो तो बढ़ा धनी तथा कृपख होता है।। २६ ।। ६ वक्रा सुभोगा शनिगा विभाति चुद्रा विभिन्ना यदि गर्तयुक्का। लाभं विना भ्राम्यति दूरदेशे दारिद्र्ययुक्को मनुजो भयार्तः।।२७।। जिसकी सुमोगरेखा (आयुरेखा) यदि टेदी एवं शनि स्थान में पहुँचे तथा छोटी-छोटी रेखाओं से कटी और गडहेयुक हो वह दरिद्रता-सम्पन्न, मय से घचड़ानेवाला और बिना लाभ ही के दूरदेश में चूमता है॥ २७ ॥
- ऐसी रेखाएँ डाक्टर-की-रंखाएँ भी कहाती हैं। अथवा ऐसा व्यक्ति चीर फाड़ करने में प्रवीण होता है।-सम्पादक
- एक फ्रॅन विद्वान् का कथन है कि ऐसे चिह्न, लकवा, असाध्य रोग, आकस्मिक मृत्यु भी बनाने हैं। उसका कथन है कि प्रायः ऐसे चिह्न फाँसी पर चढ़नेवाले म्वनियों के भी होने हैं।-संपादक द्वितीय खएड ७ संभोगरेखाधरगं चकास्ति चन्द्राङ्कनन्दाङ्कयुतं सुचिह्वम्। सोडयं नरस्स्यान्नरघातकारी पापाधिकारी परवित्तहारी॥२८।। यदि संभोगरेखा (आयुरेखा) के निचले भाग में एकाङ्क एवं नवाङ्क युक्क निशान हो वह पापाधिकारी, परद्रव्यहारी और मनुष्य घात करनेवाला होता है।। २८ ॥ = मातुस्सुरेखा यदि नी चभागे भग्नीसमेता कुटिला चकास्ति। गर्वी गुणज्ञो मनुजस्तदा स्यादुष्टाशयश्चौर्यरतो नितान्तम्२ह जिसकी मातृरेखा निचले भाग में टेह़ी और भग्नीरेखा समेत हो वह बुरे मतलबवाला, हमेशा चोरी करने में लगता तथा गुखज्ञाता और घमएडी बना रहता है।। २६ ।। संभोगशाखा सरला गभीरा भग्नीसमेता गुरुगा विभाति। सोडयं नरे धर्मपरो मनस्वी दानी सुमानी धनतासमेतः॥३०॥ जिसकी संभोगरेखा (आयुरेखा) की शाखारेखा सीधी, गहरी पवं भग्नीरेखायुक्क बृह्दस्पति स्थान में पहुँचे वह धर्मपरायण, मनमौजी, दानी, मानी और धनसंपन्न होता है॥ ३० ॥ १० पितुः सुरेखोपरिगं विशुद्धं चिह्न दिरेखं सरलं चकास्ति । तदा जनो बन्धुविरोधकारी व्यासक्चित्तः प्रमदाविहारी॥३१॥ पितृरेखा के ऊपरले भाग में साफ़ एवं सीधा दो रेखाओंवाला निशान हो तो बन्धुवर्ग से विरोध रखनेवाला, घबड़ाये मनवाता औौर प्रमदाविहारी होता है॥ ३१ ॥ आयुष्यमल्पं लभते मनुष्यो भग्नीसमेता यदि दीर्घमायुः ३२ टेढ़ी, छोटी, गहरी एवं साफ़ पितृरेखा यदि मातरेखा में मिली हो तो अल्पायु होता है। यदि पूर्वोक़ रेखा भगिनी रेखा समेत दिखे तो दीर्घायु होता है॥ ३२ ॥ १२
स्त्रीपद्तललक्षण (Part 9)
चन्द्रालयाच्चेच्चलितासुरेखावक्रा सशाखायदियातिभाग्याम् आरातिभीतःस्वजनैर्विहीनःकान्तायदाचेन्मनुजोविजेता ३३ जिसे चन्द्र स्थान से चली टेढ़ी व शाखासमेत रेखा यदि भाग्यरेखा पर्यन्त जावे तो उसके कुदुम्बी लोग ही शत्रु हो जाते हैं। यदि पूर्ोंक रेखा किसी रेखा से अतिक्रमण करे तो वह चैरियों को विजय करता है। ३३ ॥ वातार्तियुक्को मनुजस्तदानीं जङ्गाभिघातं लभते ज्वरार्त: ३४ मणिबन्ध से उठी भाग्यरेखा बीच में कटी एवं शनि पर्यन्त पहुँचे तो वह जवरशेगी, वातव्याधि युक्क और जाँघों में चोट खाता है॥ ३४ ॥ १४ चंद्राधरस्थाकुटिला सुरेखाभाग्यांविभित्त्वायदियाति काव्यम् कौतूहलामक्कमना मनुष्य: कल्याणयुक्क: सुभगः सुशील: ३५ चन्द्रमा के निचले भाग में एक टेढ़ी रेखा भाग्यरेखा को काटकर शुक्र- स्थान के पास पहुँचे तो वह खिलाड़ीमनवाला, कल्याणयुक, ऐश्वर्यवाला और शीलवान् कहाना है॥३५॥ १५पित्रोस्सुमध्ये विशदस्वरूपं शैलाङतुल्यं यदिभाति चिह्नम्। दौर्जन्ययुक्को मनुजो मलाको ह्युदबन्धतो मृत्युमुखं प्रयाति ३६ जिसकी मातृ नथा पितृरेख्ा के तरिचले भाग में साफ़ सात के अंक का-सा निशान हो वह दुर्जन, मल से भरा, मौत के मुख में जाता है॥ ३६ ॥ (देखो चित्र नं० ३८) पोडशलन्रणांकितकरतलफल १ सौम्यालये चेद्िशदास्सुवक्राः चुद्रास्सुरेखा बहुशो विभान्ति। चौयें प्वृत्तो मनुजस्तदा स्याचञ्चत्मभावश्चपलस्वभावः॥३७॥ बुध स्थान में साफ़ व टेही बहुनसी छोटी रेखायें हों तो वह प्राखी दीप्त पभाववाला होकर चपल स्वमानवाला होता हुआ चोरी करने में लगा रहता है।। ३ ।#
- मसा पुरुष या स्त्री चौर-कर्म-प्रयोग होना है यह अ्नेक शास्त्रियों का मत है। इमें भी इस प्रकार के चिह् देखने को मिले है। संपादक २ चयडात्मजस्थानगतं सुचिह्न संमध्यभिन्नं वृजिनं द्विरेखम्। सम्पत्समेतो मनुजो विलासी सौभाग्यशाली मणिरत्रमाली॥ जिसके शनैश्चर स्थान में टेढ़ा व दो रेखाओंवाला निशान यदि बीच में सरल रेखा से कटा सा प्रतीत हो तो वह सम्पन्न, विलासी व सौभाग्य- शाली और मखिमालाधारी होता है॥ ३८ ॥ ३ संभोगरेखा यदि चोर्ध्वभागे चुद्राविभिन्ना गुरुगा विभाति। मस्ताभिघातं लभते मनुष्यो मानी मनीषी ममतासमेतः॥ ३६ जिसकी संभोगरेखा (आयुरेखा) ऊपरले भाग में छोटी-छोटी रेखाओं से भिन्न होकर बृहस्पति स्थान में पहुँचे, वह ज्ञानी व बुद्धिमान्, ममतासंपन्न और मस्तक में चोट खाता है ।। २६ ॥। ४ प्रदेशिनीमूलगतं सुचिह्नं ध्वजस्वरूपं विशदं विभाति। सोडयं जनः सज्नसङकारी धर्मी धरित्र्यां धनताविधारी ४०। जिसकी तर्जनी के मूल में ध्वजा के समान निशान हो तो वह सज्जनों का संग करनेवाला धर्मी और धनी होता है।। ४० ।। ५मातुः सुरेखा यदि वोर्ध्भागे संभिन्नशीर्षा गुरुगा विभाति। शोकाकुलस्स्यान्मनुजो गदारतो गम्भीरभावो विगताभिमानः जिसकी मातरेखा (हेडलाइन) ऊपरले भाग में कटी और बृहस्पति स्थान में पहुँचे, वह रोगपीड़ित, गम्भीर आशयवाला, निरभिमानी और शोकाकुल होता है।। ४१ ॥ ६भोगा सुरेखा यदि शृङ्धलाङ्गा गम्भीररूपा गुरुगा विभाति। भार्याविहीनो मनुजस्तदानीं गत्वा विदेशं समुपैति मृत्युम् ४२ सांकल के समान भोगरेखा वृहस्पति स्थान में पहुँचे तो स्त्रीरहित होता और परदेश में मरता है॥ ४२॥ ७ संभोगमांत्रोर्यदि मध्यदेशे गुणाख्यचिह्नं विपुल्ं विभाति। चिन्तातुरःस्यान्मनुजो मनस्वी पदाभिलाषी श्रमतासमेतः ४३ जिसकी संमोगरेखा व मातरेखा के विचले भाग में गुख का निशान हो, वह चिन्तातुर, मनमौजी, पद की अमिलाषा करता और बड़ा परिश्रमी होता है # ॥ ४३ ॥ = मातुः सुरेखा यदि नीचभागे भिन्ना सुभोगाभिमुखं प्रयाति। आयुष्यमल्पं लभते मनुष्यो ह्याचारहीनो व्याभिचारशील: ४४ यदि मातरेखा निचले भाग में कटी तथा सुमोगरेखा के सामने चली जावे तो अनाचारी, व्यभिचारा तथा अल्पायु की सूचक है।। ४४। ६भाग्यासुपित्रोर्यदि मध्यदेशे भिन्ना सुरेखा कुटिला विभाति। विश्वासघाती मनुजो विवादी दुष्टस्वभावो नृपदएडमेति ४५ भाग्यरेखा व पितृरेखा के विचले भाग में एक कटी टेढ़ी रेखा यदि हो तो विश्वासघाती, विवादी, वुरे स्वभाववाला, और राजदएड पानेवाला बतावी है॥। ४५ ॥ १० मातुस्सुरेखाधरगं विभाति मध्ये विभिन्नं कुटिलं द्िरेखम्। सोऽयंमहोचात्पतितो मनुष्यो मानी महौजा मदनातुरश्च४६ मातृरेखा के नीचे व बीच में कटा हुआ दो रेखाओंवाला टेढ़ा निशान हो तो मानी, महावली, कामातुर, और ऊँचे स्थान से गिरकर चोट पाना बताखी है॥ ४६ ॥ ११ पैत्री सुवक्रा मणिबन्धहीना वृत्तार्धमध्या गुरुगा विभाति। सोऽयं जनो विन्दति नेत्रघातं नारीविहीनो नयतासमेतः४७ टेढी पितृरेखा मग्िबन्ध से छुटी तथा मध्य में अरधवृत्तयुक्क हो और बृहस्पतिस्थान में पहुँचे तो स्रीहीन, नीतिसंपन्न, और नेत्रों में चोट खाता है॥। ४७ ॥ १२ वृद्धाब्ुलेवैं निकटे नखस्य वेदाङकतुल्यं यदि भाति चिह्नम्। चौर्ये रतः स्यान्मनुजः कुसङ्गी धर्मादिभङ्गी भयदोजनानाम् ४८ अँगूठे के नाखून के पास चार के अंक का-सा निशान हो तो वह दुरे
- इसे अंग्रेज़ी में (मिस्टिक क्रास) कहते हैं।-संपादक द्वितीय खएड लोगों का साथी वन धर्मभङ्ग करता, मयदायक और चौरकर्म-परायण रहता है॥। ४८ ॥ १३्वृद्धाङुलेवैं द्वितये परुष्के वक्रं द्विरेखं विरलं विभाति । विज्ञानहीनोमनुजोवलिष्ठोबालादिलीनो प्रृतिमेति पाशात् ४६ अँगूठे की दूसरी पोर में टेढ़ा दो रेखाओंवाला निशान हो तो विज्ञान- हीन, चलवान, और फाँसी से मृत्यु पाता है।। ४६॥ सौख्यान्वितोऽसौ सुभगो मनुष्योव्यापारशाली वसुधासुपाली मशिबन्ध से चली भाग्यरेखा नुद्ररेखाओं द्वारा कटी सूर्य के पास पहुँचे तो सुखसंपन्न, भाग्यवान्, व्यापारी, और पृथ्वीपाल होना बनाती है॥५०॥ १५वका सुवप्राधरतश्चलन्ती चुद्रासमेता यदि याति मात्रीम्। संभ्रान्तमस्तो मनुजो भयातों ह्युद्धिग्नचित्तो विफलं विवेति ५१ पितृरेखा के निचले भाग से चली छोटी रेखाओं समेत टेढ़ी रेखा मातृ- रेखा के समीप पहुँचे तो भययुक, कुन्दज़हन, और ऊबे दिलवाला तथा सच कामों में विफलता सूचक है।५१॥ १६ चन्द्रालयस्थं सरलं ध्वजाङ्कं तिर्यग्विभिन्नं ग्रथितं मिथश्रेत्। दुष्टस्वभावोऽधमतासमेतो ह्याप्ोति मृत्युं जनतापकारी॥५२। जिसके चन्द्र स्थान में सीधा ध्वजा का निशान तिरछा, कटा एवं परस्पर गुथा हुआ प्रतीत हो तो वह दुष्टस्त्रभाववाला, नीच, जन अपकारी होता तथा मौत पाता है॥ ५२ ॥ (देखो चित्र नं० ३६) चतुर्दशलक्षणाङ्गितकर तलफल १ भोगासमुत्था सरला गभीरा रेखा यदैका यदियाति चान्द्रिम्। ज्ञानी गुणी स्यादुपदेशदाता मानी महौजा: परवृत्तगोप्ता।।५३।। जिसकी भोगरेखा (आयुरेखा) से उठी सीधी व गहरी रेखा यदि बुधपर्तन्त जावे तो वह ज्ञानी, गुणी, उपदेशदाता, मानी, चलवान् और सब के चरित्रों को छिपाये रहता है।। ५३॥ सामुद्रकशास्त्न २ संभोगरेखोपरिगा गभीरा वक्रा सुरेखा समुपैति सूर्यम्। सोऽयंजनो विज्ञतमो गुपज्ञो नामी सुधामी धनतामुपैति॥५४॥ जिसकी संमोगरेग्ा (आयुरेखा) के ऊपरले भाग से एक गहरी एवं ठेढ़ी रेखा यदि सूर्य के समीप चली जावे वह महागुखज्ञाता, नामी, सुधामी, और धनी होता है॥। ५४॥। # ३ पैत्रीसमुत्था विशदा सुरेखा स्वल्पा गभीरा यदियाति मन्दम्। साँव्वत्सरो ना खलु पारदर्शी दैवज्ञवर्यो यदि दीर्घगा चेत् ५५ पितृरेखा से उठी साफ़, छोटी एवं गहरी रेखा यदि शनि पर्यन्त जावे तो ज्योतिर्वेत्ता, पारदर्शी होने की सूचक है। यदि पूर्वोक्क रेखा भारी दिखे तो दैवज्ञों में प्रधानता बताती है॥ ५५ ॥ ४ पैत्रीसमुत्थं विशदं गभीरं केतुस्वरूपं गुरुगं विभाति। शास्ता जनानांमनुजस्तदा स्याद्दाता दयालुरदयितासमेतः५६ यदि पैत्रीरेखा से उठा साफ़ एवं गहरा ध्वजा का निशान बृहस्पति के स्थान में पहुँचे तो प्राखप्यारी समेत दयालु, दाता, और सब पर शासन करनेवाला बताती है॥५६। ५ देवेन्द्रवन्द्यालयगं विभाति चिह्नं त्रिकोएं विशदस्वरूपय्। सोडयं जनः सर्वजनप्रधानः प्रख्यातकीर्ति लभते नितान्तम्५७ जिसके गुरु स्थान में साफ़ त्रिकोख चिह्न हो वह सब में प्रधान, विख्यात तथा किसी रियासत का एजएट होता है।। ५७। ६ भोगा सुरेखा यदि नीचदेशे वक्रा द्विशाखा खलु मध्यमान्ता। जिसकी भोगरेखा (आयुरेखा) निचले भाग में दो शाखाओंवाली तथा टेवी होकर मध्यमा तक जावे वह बीस वर्ष की आयु पाता है। यदि पूर्वोक रेखा में तीन शाखायें प्रतीत हों तो तीस वर्ष की आयु जाननाशट॥
- इस अन्य द्दस्तरंखाविशारद्रभी इ प्रकार बड़ी अच्छी रखा बताते है।-सम्पादक द्वितायखएड ७मातुः सुरेखा यदि नीचभागे शूलाख्यचिह्वेन युता यदा स्यात्। सोडयं विनीतो मनुजो महात्मा यज्ञादिधर्माङ्गयुतोजनानाम्५६ निचले माग में मातृरेखा त्रिशूल चिह्नयुक् हो तो उसे शित्तित, महात्मा और यज्ञादि धर्मयुक्क जानना चाहिये॥ ५६॥। =मात्री सुरेखा मिलिता सुपैत्र्यां संमध्यभिन्ना शशिगा विभाति। व्याजीविवादीमनुजोविलासीसम्पत्तिराशी च महाप्रकाशी ६० जिसकी पितृरेखा में मिसी एवं बीच में कटी हुई मःतुरेखा यदि चन्द्र- स्थान में पहुँचे तो वह छली, बहसी, विलासी, संपचिशाली और महा- प्रकाशी होता है ॥ ६० ॥ पैत्रीसमुत्था मिलिता सुमात्र्यां रेखा सकोणा कृशगा विभाति। विश्वासशाली मनुजोविशोकी वेदान्तभापीविदुषां वरेरयः६१ जब पितृरेखा से उठी तथा मातृरेखा में मिली एक रेखा त्रिकोण समेत पतली सी हो तो वह विश्वासी, विशोकी, वेदान्तवेत्ता, और विद्वानों में प्रधान कहाता है ॥ ६१ ॥ १० मातुस्सुरेखोपरिगा सुभोगा संभुग्नमध्या समुपैति शौरिम। अल्पायुषं तं पुरुषं करोति सौभाग्यवन्तं बहुभोगवन्तम् ॥६२। जिसकी मोगरेखा (आयुरेखा) मातृरेखा के ऊपरी भाग में बीच में टेढी हो और शनि पर्यन्त पहुँचे उसे सौभाग्यवान्व महाभोगवान् तथा अल्पायु करती है॥ ६२॥ ११ समुत्थितं चेन्मणिबन्धदेशात्साप्यं द्विरेखं जननीमुपैति। दौर्भाग्ययुक्ो मनुजो दुराशो दीनो दरिद्रो दुरितान्युपैति॥६३॥ मशिबन्ध से उठा हुआ सर्पाकार दो रेखाओंवाला निशान यदि मातृ- रेखा के पास पहुँचे तो बुरी आशावाला, दीन, दरिद्री तथा पापी होना बताती है॥ ६३ ॥ १२ वक्रा सुपैत्री मिलिता जनन्यां संमध्यभिन्ना भगिनीसमेता। सोऽयं जनो विन्दति देहघातं कराडूस मेतो ज्वरजार्तियुक्क:।६४। सामुद्रकशासत् जिसकी मातृरेखा से मिली पितृरेखा टेढी तथा बीच में कटी हुई भगिनीरेखा समेत दिखे वह खुजलीवाला, ज्वर पीढ़ायुक्क होता और देह में चोट खाता है ॥ ६४॥ १३ रेखा समुत्था मणिबन्धदेशाद्का गभीरा पितरं प्रयाति। संतीक्ष्णबुद्धिर्मनुजः सुकर्मा सौभाग्यशाली सुखतामुपति ६५ जिसके मशिबन्ध से उठी टेढ़ी एवं गहरी रेखा पितरेखा के पास पहुँचे वह तीव्र बुद्धिवाला, शोभन कर्मोंवाला, सौमाग्यशाली, और सुखी होता है।। ६५ ।। १४ अङ्कुष्ठमूले विशदं सुवक्रं रेगाचतुष्कं यदि याति काव्यम्। सोऽयं मनुष्यः प्रथमे वयस्के प्रामोति सौख्यं शुभतासमेतः ६६॥ जिसके अँगूठे के मूल में चार रेखाओंवाला साफ़ एवं टेढ़ा निशान शुक्र के पास चला जावे वह शुभसंपत्न तथा पहली उमर में सौख्य पाता है ॥ ६१॥ (देखो चित्र नं० ४० ) पोडशलक्षणङ्गितकर तलफल ३३ १ सुतर्जनीपर्वयुगे विभाति तिर्यग्विभिन्नं सरलैकरेखम्। यदि तर्जनी के पहिले एवं दूसरे पर्व में धन का चिह्न हो तो परिडतों का बान्धव होना, प्रधान लोगों का अनुगामी तथा क्षमाशील होना बताती है।६७॥ २ कनिष्ठिकायाः प्रथमे परुष्के संकर्तिता वै यतिसन्ति रेखाः। तावत्प्रमाण मनुजस्य नूनं नश्यन्ति गर्भा गदपीडिता वा॥ जिसकी कनिष्ठा की पहिली पोर में जितनी कटी हुई रेखाएँ हों तो उसके उतने ही गर्म. निश्चय कर नष्ट होजाते हैं, या रोग से पीड़ित होते हैं।। ६८ ।। ३ सोम्यालये चेत्सरलं त्रिरेखं तिर्यग्विभिन्नं श्रुतिसंमिताभिः। जिसके बुध स्थान में चार रेखाओं से तिरछा कटा तीन रेखाओं वाला सीधा निशान हो वह पिशाचरूपिणी नारी से छला जाता तथा दारिद्रय दुःख से तिरस्कृत होता है।। ६ ॥t १ सूरालये चेद्विशदं विशालं विभाति चिह्नं सरलं द्विरेखम्। दाराभिभूतो मनुजो मदान्धो ज्ञानेन मानेन धनेन हीनः७०॥ जिसके सूर्य स्थान में साफ़, सीधा दो रेखाओं वाला निशान हो तो वह भार्या से अनादत होता तथा मदान्ध डोकर ज्ञान, मान एवं धनहीन हो जाता है॥ ७० ॥। ५. भाग्या सुरेखा समुपैति सौरिं सञ्छिन्नमस्ता सरला गभीरा। कष्टार्दिताङ्वोमनुजस्तदानीं कारालयं याति करालरूपः।७१।। गहरी, सीधी तथा कटे शीशवाली मागरेवा यदि शनि के समीप पहुँ चे तो कष्टपीड़ित अङ्गाला करानरूपधारी तथा जेलखाने जाता है।७१॥ ६ भोगा सुरेखा जननीमुपैति कौटिल्यमस्ता यदि मध्यभिन्ना। सोयं जनःस्याद्वयभिचारशाली नार्यायदाचेत्कुल टातदासा ७२ बीच में कटी टेढ़े शीशवाली मोगरेखा मातरेखा के पास पहुँचे तो व्यभिचारी होता है। यदि पूर्वोक रेखा रमणी के करतल में हो तो वह कुलटा होती है॥ ७२ ॥X ७ भोगा सुरेखा यदि नीचदेशे चुद्रा विभिन्ना कृतचुल्लिरूपा। तदा सुतानां प्रसवे जनस्य प्रभूनपीडा स तु भोगशाली॥७३। यदि भोगरेखा निचले भाग में चुद्ररेखाओं से कटी हुई चूले का रूप बना ले तो उस स्त्री को म्रसवकाल में अधिक वेदना होनी है। और यदि पुरुष के हाथ में हो ता वह भोगशाली होता है॥। ७३ ॥ ८ चुद्रा गभीरा जननीसुरेखा संभिद्य भोगां यदि याति मन्दम्। सयोवने मृत्युमुखं प्रयाति स्पर्शेन हीना खलु पानमक्तः ७४।।
- इस प्रकार इस स्थान के चिह्न शुभ नहीं माने जाते।-सं०
- जेल जाना अथवा संसार से बिलग रहने के लिए अमेरिकन फ्रेंच तथा अनेंकों इंगलिश विद्धानों ने शुकालय पर चतुषकोग होना कहा है।-सं० x यह अशुभ चिह्न है।-संपादक सामुद्रकशास्त्न जिसकी छोटी एवं गहरी मातृरेखा यदि भोगरेखा को काटकर शनि के पास जावे तो वह युवावस्था में ही मृत्यु पाता है। यदि पूर्वोकरेखा भोगरेखा का स्पर्श न करे तो वह प्राणणी मद्यपायी होता है।। ७४। ६ पित्रावियुक्का यदि मातृरेखा तदन्तरे चुद्रतरा विभान्ति। विश्वासही नोमनुजो महौजा वेश्यारतः स्याद्विपयाभिभूत:७५ यदि पैत्रीरेखा से मातरेखा जुदा हो और उन दोनों के बीच छोटी छोटी बहुत सी रेखाएँ हों तो महावज्ञनान, विश्वासहीन होता हुआ वेश्या- रत तथा विपयों से अनादत होता है। ७५ ॥ १०काव्यालयाचचेच लिता सुरेखासंभिद्यपैत्री मभियातिभाग्याम्। कापटयसक्कोमनुजोहिलम्पटो दौर्भाग्ययुक्को दयया विहीन:७६ शुक्र स्थान से चली रेखा यदि पैत्रीरेखा को काटकर भाग्यरेखा के सम्मुख पहुँचे तो वह छलइन्दी, लस्पट, दौर्भाग्ययुक्क तथा दयाहीन होता है।। ७६ ।। ११पैत्रीसुरेखा यदि मध्यदेशे चुद्रा विभिन्ना कुटिला विभाति। चिन्ताभिभूतो मनुजस्तदास्यादौदास्ययुक्कोदयितासमेत:७७।। यदि पैत्रीरेखा विचले भाग में छोटी छोटी रेखाओं से कटी तथा टेढ़ी हो तो नारी समेत चिन्ताकुल और उदासीन बना रहता है॥ ७७॥ १२ वृद्धाङ्कुलेरूर्ध्वगतं सुचिह्नं तिर्यरिदिरेखं सरलं द्विरेखम्। चौर्ये प्रवृत्तो मनुजो मनस्वी विश्वासहीनो वनिताविहीन:७८ अँगूठा के नह के पास तिरछी दो रेखाएँ एवं सीधी दो रेखाएँ हों तो वह चोर, मनमौजी, विश्वास-रहित तथा वनिताविद्दीन होता है॥७८॥। # स्यान्मन्दभाग्योमनुजो जनानांमत्या विहीनो मदनातुरश्७६ मशिबन्ध से उठी छोटी छोटी रेखाओं से कटी हुई एक रेखा यदि बुधालय के पास जावे तो वह मन्दभागी, निर्बुद्धि तथा कामातुर होता है।।७ह।।
- चौर कर्म के अन्य चिह्न अन्यत्र भी कहे गये हैं।-सम्पादक १४ पित्रा वियुक्ा यदि चोर्ध्वरेखा तदन्तरे बाएसमा विभाति। सोयं जनः स्याद्थवसायशालीविश्वासहीनो बलतासमेत: ८० यदि पैत्रीरेखा से ऊर्ध्वरेखा जुदी हो और उन दोनों के बीच में बाख- कार-सी एक रेखा हो तो वह रोजगारी, अविश्वासी तथा बलसंपन्न बना रहता है॥। ८० ॥ १५ पैत्री सुरेखा यदिनी चदेशे शाखाप्रशाखासहिता विभाति। यदि निचले भाग में पैत्रीरेखा शाखा प्शाखाओं समेत हो तो वह निर्वुद्धि, रोगपीड़ित, तथा कठिन मस्तक पीड़ा पाता है।। ८१ ।। १ ६ आबुष्ठमूले विशदं विशालं चिह्नं त्रिकोणदियुतं यदा स्यात्। पवञ्चकोना जगतो जनानां मायारतो मानववृन्दवन्द्यः।।८२।। अँगूठे के मूल में साफ़ निशान यदि त्रिकोण आदिकों से संयुक्क हो तो वह माया में रत, छलिया, और वन्दनीय होता है ।। =२ ॥ (देखो चित्र नं० ४१) १ साम्यालये चेद्युगपङ्क्किसंस्था:नुद्राःसुरेखाःसरला विभान्ति। सोयं जन:स्याजनघातकारी हत्यासमूहैःसहितोऽपकारी॥८३॥ जिसे छोटी एवं सीधी बहुतसी रेखाएँ दो पंक्रिशों में बुधालय में हों तो वह घातकी या हत्याकारी, और बुराई करनेवाला होता है॥ ८३ ॥ २ व्रध्नालये चेद्विशदं विशालं चिह्नं त्रिरेखं सरलं विभाति। संस्थापकोयन्तु विना परीक्षांमतस्य नारीकृतहानिमेति ॥८४॥ जिसके सूर्य स्थान में साफ़ सीधा एवं तीन रेखाओंवाला निशान हो वह बिना परीक्षा किये हुए मत का चलानेवाला होता तथा रमणियों द्वारा हानि उठाता है॥ ८४ ॥ ३ भोगाद्यशाखा यदि याति मन्दं तथा द्वितीया धिषणं प्रयाति। मातापितृभ्यांघृषितोऽरिभीतो दीर्घा न चेन्नारिकृताविपत्ति:८५ सामुद्रकशास्र जिसकी सौमाग्यरेखा की पहिली शाखा शनैश्र के स्थान में और दूसगी शाखा गुरु स्थान में पहुँचे वह माता पिता से घृखित होता और वैरियों से डरता है। यदि पूर्वोक़रेखा फैली न हो तो वह नारीकृत विपत्ति भोगता है॥ ८५ ॥ ४ सोम्यालयान्ते विशदस्व रूपं चिह्नं त्रिकोएं यदिभाति भिन्नम्। सोयं श्रमासक्कमना मनुष्यो नारी तदीया मृतिमेति सूतौ ॥८६॥ जिसे बुधालय के समीप त्रिकोण का साफ़ निशान यदि भिन्न हो तो वह बड़ा परिश्रमी होता है। उसकी भार्या की मृत्यु संतान उत्पन्न होने के समय होती है॥। ८ ६ ।। ५ पैत्रीसमुत्था जननीं विभित्वा भोगां च रेखा समुपैति सूरम्। भूपालवन्धो मनुजो महात्मा मायारतः स्यान्ममतासमेत:८७ जिसकी पैत्रीरेखा से उठी रेखा मातृरेखा और भोगरेखा को काटकर सूर्य के पास जाते तो वह राजाओं द्वारा वन्दनीय, महात्मा, माया में रमता और ममता संपन्न रहता है॥ ८७ ॥ # ६ चिह्नं सकोएं सरलं द्विरेखं तिर्य कूत्रिरेखं गुरुगं विभाति। आचारहीनो मनुजस्तदानीं वित्तस्य हा निलभतेनितान्तमृदद जिसके गुरु स्थान में कोखयुक्त सीधा दो रेखाओंवाला एवं तिरछी तीन रेखाओंवाला निशान हो वह आचारहीन तथा धनहानि भोगता है॥८८॥ ७ भोगा सुरेखा यदि नीचभागे भग्नस्व्रूपा विशदा विभाति। विश्वासहीनो मनुजो महौजामत्याविहीनोमदनातुरःस्यात्८६ यंदि सौमाग्यरेखा निचले भाग में भग्न हो तो वह महावलवान्,विश्वास हीन, निर्वुद्धि और कामी होता है।। ८६ ।। =भोगा सुरेखा भगिनी समेता कुबिन्दुमध्या शनिगा विभाति। सन्तानहीनो मनुजस्तदा स्याद्दौर्बल्ययुक्को दयितो दयालु: ६० कुछ विद्वानों का मत है कि ऐसी रंखा आकस्मिक प्राप्ति का चिह्ह है। कुछ का कथन है कि वह उस समय कीर्ति तथा धन देती है।-सम्पादक १ ५ ६ भगिनीसमेत भोगरेखा चीच में छोटे बिन्दुओंवाली होकर शनि के पाम पहुँचे तो वह अपुत्री, दुर्वल, सबका प्यारा, और दयावान् होना है॥ह०॥। ६ पैत्रीमुखे चेद्विशदं विशालं जालस्वरूपं यदि भाति चिह्नम्। सोयंजनःसज्जननिन्दक:स्यादाचारहीनोव्यभिचारशाली ६१ पैत्रीरेखा के मुख के समीप साफ़ जालरूप निह्न हो तो वह सज्जनों का निन्दक, आचारहीन और व्यमिवार्ग होता है। ६१ ॥ १०मात्रीविभिन्नायदिनी चभागेचुद्राःसमीपेकुटिलाविभान्ति। नामोति सौख्यं पुरुषःकदा पिसंत्षीण बुद्धिःसरलस्वभावः॥६२।। यदि निचले भाग में मातृरेखा कटी हो और पास ही छोटी छोटी तिरछी बहुत-सी रेखायें हों तो वह कमी सुख नहीं पाता है। नीखवुद्धि तथा सीधे स्वभाववाला बना रहता है॥ ६२ ॥ ११ वगरस्य रेखा यदि कराठदेशे शाखात्रयेणापियुतायदास्यात्। सोयं म तालम्बनतो हि पीडां प्राप्ोति जन्तुर्जनताविहीन: ६३ यदि कएठदेश में पितृरेखा तीन शाखा युक हो तो वह जनहीन और विमत से पीड़ित होता है ॥ ६३ ॥। १२चन्द्रालये भाति मिथोविभिन्नं गुणस्वरूपं यदिचिह्नयुग्मम्। सोयं जनः कृत्रिमबन्धुयुक्को भुग्नंन चेत्स्यादुपकारहीनः॥। ६४।। चन्द्र स्थान में परस्पर कटे दो निशान हों तो वह बने भाइयों युक्र होता है। अथवा पूर्वोक़ निशान क्रम से गमन करें तो वह अनेक भाइयोंवाला कहाता है। यदि दोनों निशान टेढ़े न हों तो वह किसी की भलाई नहीं करता है॥ ६४॥ १३ पैत्री समुत्थाभगिनीसमेतारेखागभीरायदियाति चान्द्रिम्। सोयं नरःस्याच्चपलस्वभावोभग्नायदा चेत्फलमन्यथास्यात्६५ जिसकी पैत्रीरेख्ा से उठो भणिनीसहित गहरी रेखा बुध के पास जाचे वह चपलस्त्रमावत्राला होता है। यदि पूर्वोक रंग्ा कटी पनीत हो तो फल अ्रन्यथा हो जाता है॥ ६५ ॥ १ ४मात्रा वियुकाकुटिलासुपैत्रीह्यधोद्विशाखा मणिबन्धमेति। स मन्दभाग्य:पुरुषस्तदानी दारिद्रयदुःखाभिभवं प्रयाति॥६६।। मातृरेखा से जुदी एवं टेड़ी पैत्रीरेखा निचले भाग में दो शाखाओंवाली होती हुई मशिबन्ध के पास पहुँचे तो वह मन्दभागी तथा दारिद्रय से उपजा दुःख और अनादर पाता है।। ६६ ॥ १५ सञ्छिन्नमस्तं मणिबन्धगं चेचिह्नं दिरेखं समुपैति मात्रीम्। मिथ्याभ्रमेणापि युतो मनुष्यो दारिद्र्ययुक्कोविगताभिमान:६७ कटे शीशवाला एवं मणिबन्धगामी दो रेखाओंवाला निशान यदि मातृ- रेखा के पास पहुँचे तो वह मिथ्याभ्रम युक्र, दरिद्री और घमएड रहिस होता ईै। ३७ ॥ (देखो चित्र नं० ४२) १ कनिष्ठिकानामिकपर्वयुग्मे रेखाद्वयं चेत्सरलं विभाति। सोयं जनो विन्दति बाहुघातं भ्राता विहीनो भ्रमतासमेतः ६= कनिष्टिका और अनामिका की पहली व दूसरी पोर में सीधी दो रेखाएँ हों तो वह भुजाओं में चोट खाता है। और भ्रमसंपन्न तथा भ्रातृ- हीन रहता है॥। ३८ ॥। २ सुनर्जनीपर्वयुगे द्विरेखं मध्यापरुष्के यदि द्वित्रिरेखम्। शोफार्दितायं मनुजस्तदा स्याज्ज्वरादिरोगैःपरिपीडिताङ्: ६६ नजनी की पहली व दूसर्गी पोर में सीधी दो रेखाएँ तथा मध्यमा की पोगें में दो तीन रेखाएँ हो तो वह ज्वर से व्याकुल तथा शोथरोग से पीड़ित होना है ।। ह6ै ।। ३ मौम्यालयान्नेऽमरलैकरेग्वें तिर्यग्विभिन्नं यदि भानि चिह्नम्। ज्ञानीसुमानी पुरुषम्तदानीं स्याह्दोत्यकारीदयिनापहारी १०० बुधालय में एक रेखावाजा निरछदा कटा हुआ निशान हो नो वह ज्ानी, मुमाना, दनकर्म को करना और किसी विजानीय की द्यारी को हगने- वाला होता है॥ ३० ॥ द्वितीयखरड ४ समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशात्सर्पानना वै समुपैति मध्याम् । धूर्तस्व्रभावो मनुजो धनाव्यः धन्यो धरित्रयां धरया समेतः ॥१॥ मश्िबन्ध से उठी सर्प के समान मुँहवाली रेखा यदि मध्यमा की पहला पोर में पहुँचे तो वह धूर्तस्व्रभाववाला, धनी, भूमि का मालिक तथा धन्य गिना जाता है। १ ॥ ५ भोगाद्यशाखा समुपैति सौरिं तथा द्विशाखे जननीमुपेतः । सोऽयं मनुष्यःशुभकर्मकारी दानी सुमानी तु महोपकारी।२। भोगरेखा की पहली शाखा शनि के पास जावे तथा दो शाखायें मातृरेखा के आमने सामने हां तो वह शुभ कर्म करनेवाला, दानी और उप- कारी होता है॥ २ । ६ लूतासुजालं विशदंविशालं चिह्नं यदा चेज्गुरुगं विभाति। सोऽयं जनो मज्जति वारिवाहे वाल्ये वयस्के बलतासमेतः॥३॥। बृहस्पति स्थान में मकड़ी के जाल के समान साफ़ निशान हो तो वह बाल्यावस्था में ही बलसंपत्न होता तथा जल में डूब जाता है॥ ३॥ . ७ चन्द्रालयान्ते परिभाति चिह्नंभिन्नत्रिकोएं यदि बाहुभिन्नम्। सोऽयं नरः स्यान्निगमागमज्ञः सत्यप्रवक्का सरलस्वभावः॥४॥ चन्द्रालय के समीप मिन्न त्रिकोणवाला तथा भिन्नवाहुवाला निशान हो तो वह वेद शास्त्र ज्ञाता, सत्यवक्का, तथा सरलस्त्रभाववाला कहाता है॥४॥ = वृद्धाझुलेवैं द्वितये परुष्के वेदाङ्कतुल्यं यदि भाति व्यस्तम्। सोयं जनःस्याद्व्यभिचारशाली ह्याचारहीनः कुविचारपालीप यदि अँगूठे की दूसरी पोर में चार ४ अङ्क के समान उलटा निशान हो तो वह व्यभिचारी, आचारहीन तथा निन्दित विचार रखनेवाला होता है॥ ५ ॥ ६मात्रीस्वशीर्षे मिलिता सुपैत्र्या तदन्तरे चापममा विभाति। दुःखार्दितोडयं पुरुपस्तदानीं मृत्युं स्वतो वाञ्छति सर्वर्देव ॥ ६ ॥ सामुद्रकशासत माहरेखा अपने शिरोभाग में पैत्रीरेखा से मिलाप करे और उन दोनों के बीच में धन्वाकारसी एक और रेखा हो तो वह दुःख से घचराता तथा सदैव मृत्यु चाहता रहता है ॥ ६ ॥ १०भोगासमीपेहि मिथोविभिन्नंगुणानुरूपंयदिल दमयुग्मय्। दारिद्रययुक्को मनुजो विबन्धुश्चिह्वपमाणैरपि बन्धुता वा ॥७।। जिसकी सौभाग्यरेखा के पास परस्पर कटे हुए गुखकार दो निशान हों वह भाईरहित या सहायताहीन और दरिद्री बना रहता है। अथवा जितने ही चिह्न हों उतने ही भाई होते हैं ॥ ७ ॥ ११ समुत्थितं चेन्मणिबन्धदेशाचिह्नं द्विरेखं यदि यातिचान्द्रिम्। सोयं जनःस्यात्परदास्ययुको भग्नं यदा चेत्परवन्दिमेति॥८॥ मशिबन्ध से उठी दो रेखाओंवाला निशान यदि वुधालय में चला जावे तो वह परपुरुपों का सेवक होता है। आर यदि पूर्वोक़ निशान कटा हो तो वह बन्धन पाता है॥ ८ ॥ १२ अङ्कुष्ठमूले यदि भाति चिह्नं रेख।सुपट्कं कुटिलं विशुद्धम्। सोयं नरः स्यात्पमदाविलासी ह्यानन्दराशी महतामुपासी 2 अँगूठे के मूल में साफ़ ऋः रेख्वाओंवाला टेहा निशान हो तो वह प्रमदा- विलासी, आनन्दराशि तथा महात्माओं का सेवक बना रहता है ॥ ६॥ १३ अब्जालयान्ते विशदं गभीरंघनस्वरूपंयदिभाति चिह्नय्। सोयं निमग्नो हि जलप्रवाहे वाधिर्ययुक्को विधुरस्वभावः॥१०।। चन्द्रालय के पास साफ़ एवं गहरा हथौड़े के समान निशान हो तो वह बडिग होना है। और टेढे, स्वभाववाला तथा जल में डूब जाता है ॥ १० ॥# १४ तिम्रः सुरेखामणिबन्धमंस्थास्तामां विभिन्ना यदि चाद्यरेखा। सोयं यशस्त्री मनुजो नराणां प्राज्ञःप्रशंसी परमायुषाढ्यः॥११।। जो तीन रेखायें मग्गिबं्ध में रहनी हैं उनमें से पहली रेखा कटी हो तो वह यशस्व्री, पशंसापात्र और परमायु संयुक्त होना है ॥११। ( देग्वोचित्र नं० ४३)
- जल में डयने के अ्न्य चिद्न भी अन्यत्र बनाये गये हैं।-सम्पादक द्वितीयखगड १ भोगासमुत्था सरलैकरेखा संमध्यभिन्ना यदि याति सूरम्। मान्यो वदान्यो मनुजस्तदानीं सद्धर्मशाली धनतामुपैति १२ भोगरेखा से उठी एक सीधी बीच में कटी रेखा यदि सूर्यालय में पहुँचे तो वह मानी, दानी, सद्धर्मशाली और धनी होता है ।। १२।। २ मन्दालये बेद्धिशदं गभीरं चिह्न त्रिरेखं सरलं विभाति। शान्तस्वभावो मनुजो हि नूनमुद्धेगहीनः समयं समेति॥१३॥ शनिश्वर स्थान में साफ, गहरा, एवं सीधा तीन रेखाओंवाला निशान हो तो वह निश्रम शान्त रवभाववाला, और अपने समय को व्याकुलता रहित व्यवीत करता है ॥ १३ ॥ ३ पूज्यालये चेत्सरलं त्रिरेखं रेखात्रतुष्कैस्तु तिरो विभिन्नम्। सोयं मनुष्यो विधनो विदीनो हीनो जनैर्गच्छति सर्वदेशम्१४ वृहस्पति स्थान में सीधी तीन रेखाएँ तिरछी चार रेखाओं से कटी हों तो वह दरिद्री, जनहीन और देशदेश में चूपता है ॥ १४ ॥ ४ सौम्यालयान्ताच्चलिता सुभोगा रेखा गभीरा गुरुगेहमेति। कोपान्वितोडयंपुरुषस्तदानींपारुष्ययुक्त: खलु साहसी स्यात् १५ बुध स्थान से चली गहरी भोगरेखा वृडस्पति स्थान पर्यन्त जावे तो वह कोपशाली, कठोर और साहसी होता है। १५॥ ५ देवेन्द्रवन्द्यालयगा सुभोगा संकर्तिता चेद्यदि करठदेशे। धर्मेण हीनो हि नरो नराणां भूप/दिभीत्या नितरां विभेति १६ जिसके बृहस्पति स्थान में पहुँची भोगरेखा यदि करठदेश में कटी हो वह अधर्मी तथा राजा, शग्नि और चोर के डर से बहुत डरता रहता है॥ १६ ॥ ६ चन्द्रालये चेत्सरलं द्विरेखं चिह्नं सुभोगाभिमुखं प्रयाति। विश्वासहीनो मनुजोविबन्धुर्वेश्याविलासी वनिताविहीन:१७ जिसके चन्द्र स्थान से सीधी दो रेखाएँ यदि भोगरेखा के सामने जावें वह अविश्वासी, भाईरहित, वेश्यागामी, और स्तरीहीन होता है। १७।। ७ मात्री सुरेखा यदि नी चभागेचुद्राविभिन्नामिलिता सुपैत्र्याम्। मात्रानिरस्तो मनुजो हि त्रस्तो विध्वस्तमानो ममतामुपैति १८ यदि मात्रीरेखा निचले भाग में छोटी रेखाओं से कटी हो तथा पैत्रीरेखा से मिल जावे तो माताद्वारा निकाला जाता तथा घवराता और टूटे मानवाला होता है॥। १८ ।। = भोगासमीपे करवालचिंह्न भित्त्वा सुमात्रीं समुपैति पैत्रीम्। सांघातिकं मृत्युमुपैति मत्यों मत्याविही नो मदनातुरात्मा॥१६॥ भोगरेखा के पास तलवार का निशान यदि मातृरेखा को भेदकर पैत्रीरेखा के सामने चला जावे तो वह निर्बुद्धि, कामपीड़ित तथा सांघातिक मृत्यु पाता है॥ १६ ॥ ध्पैत्रीस्वशीरषें मिलिता सुमात्र्या चिह्नंविधत्ते यदि कोए रूपम्। सोयं जनः स्याद्गणितागमज्ञो गौरस्वरूपो ह्वतिगौरवाढ्य: २० शिरोभाग में पैत्रीरेखा मात्रीरेखा के साथ मिलाप कर कोण चिह्न बनावे, तो वह गणितशास्त्र ज्ञाता, गौराङ, और गौरवसंपन्न बना रहता है २० सोयं विवादी मनुजो विषादी कष्टपदायी तु महजनानाम् २१ भाग्यरेखा बीच में कटकर मातृरेखा में मिल कोय चिह्न बनावे तो वह विवादी, विपादी, तथा महज्जन लोगों को बढ़ा कष्टदायक होता है ।।२१।। ११ करठत्रिशाखाविनता गभीरा पैत्री सुरेखासमुपैतिभा ग्याम्। सोयं जनो विन्दति वित्तवृन्दं संस्थासमेतः सरलस्वभावः ॥२२।। कएठ में तीन शाखाओंवाली, लची हुई तथा गहरी पैत्रीरेखा माग्यरेखा से मिल जावे तो वह मर्यादायुक़, सीधे स्वभाववाला, और धनी होता है॥२२। १२ अङ्ुष्ठमूले च पितुः समीपे त्रिपुराड्ररूपं यदि भाति चिह्नम्। सोयं मनुष्यो बलवीर्यहीनो दीनो ह्यधीनो ललनाविहीन: २३ अँगूठे के मूल एवं पैत्रीरेखा के पास त्रिपुएड्ररूपवाला निशान बलवीर्य- हीन, दीन, अधीन और रमखीदीन होने का सूचक है।। २३ ।। १३ चन्द्रालयान्ते विशदं गभीरं तारानुरूपं यदि भाति लच्ष्म। सोयं नरोमजति नीस्मध्ये मानापमानेन युतो यविष्ठः ॥२४।। चन्द्रालय के पास गहरा साफ़ तारा का निशानहो तो वह जल में डूब- जाता है। उसका छोटा भाई मानापमानयुक् होता है॥ २४ ॥ ( इसे पहले समझा चुके हैं।) १४ विद्योतते चेन्मणिबन्धदेशे गुणनुरूपं यदि लच्मयुग्मम्। सत्येन हीनो मनुजो मलाढ्यो मान्योऽधमानांधनतासमेतः२५ मशिबन्ध के ऊपरले भाग में गुखकारवाले दो निशान हों तो वह धनान्य, मैला, अधमजनों द्वारा माननीय तथा सत्यददीन होता है॥२५॥ १५ सर्पानुरूपं मणिबन्धसंस्थं वक्रं सुचिह्नं सुतरां विभाति। सोयं नरः स्यात्परिणामदर्शी ज्ञानाधिकारी परकार्यकारी २६ सर्पाकार, टेदा निशान मणिबन्ध में हो तो वह ज्ञानाधिकारी, परकार्य- कारी, तथा परिखामदर्शी होता है॥ २६ ॥ (देखो चित्र नं० ४४) १ कानेष्ठिकापर्वयुगे विभाति कोणर्धरूपं यदि लचम शुद्धम्। चौर्ये प्रवृत्तः पुरुषस्तदा स्याच्चातुर्ययुक्कश्चपलस्वभावः ॥ २७॥ कनिष्ठा की पहली व दूसरी पोर में शुद्ध अरधकोण चिह्न हो तो वह चतुर, चपलस्वभाववाला तथा चौरकर्म में लगा रहता है।। २७।। २ सुमध्यमायाः प्रथमे परुष्के त्रिकोणरूपं यदि भाति चिह्नम्। सोयं मनुष्यः सकले स्वकार्ये प्राप्ोति हानि न सुखं कदापि२८ मध्यमा की पहली पोर में यदि त्रिकोण चिह्न हो तो वह सब कार्यों में हानि तथा कभी सुख़ नहीं पाता है॥। २८ ।। • जल संबंधी भयंकर दुर्घटना के लिये यह चिह्न विदेशी विद्वानों ने भी कहा है। ३ पूज्यालयस्योपरिंगं विभाति पार्श्वत्रिरेखं सरलद्धिरेखय्। पित्तार्दितोयं लभते सुशोथं दीर्घापरा चेद्रमणीकृतार्थय॥२६॥ जिसके बृहस्पति स्थान के ऊपरी भाग के पार्श्व में तीन रेखावाला तथा खड़ी दो रेखावाला निशान हो वह पित्तरोगी होता है। और यदि पूर्वोक़ दो रेखाओं में से कोई रेखा दीर्घ हो तो नारीकृत धन पाता है।। २६॥ ४ सूरालये चेत्कुटिला सशाखा भोगां विभित्वा जननीं प्रयाति। सोयं जनः संशयसक्चित्तो भूपादिकोपाद्रहुहानिमेति॥३०॥ सूर्यस्थान में टेडी शाखापमेत रेखा भोगरेखा को काटकर मातुरेखा के सामने पहुँचे तो वह सन्देहो तथा राजा-महाराजादि बड़े-पड़े लोगों के कोप से हानि उठाता है॥ ३० ॥ ५भोगा सुरेखायदिनीचभागे संकर्तिताचेन्मिलिताजनन्याम्। सोयं श्रमासक्कमना मनुष्यो विश्रामहीनो विपदामुपैति।३१। यदि निचले भाग में कटी हुई भोगरेखवा मातुरेखा में मिल जावे तो वह विश्रामरहित-परिश्रमी तथा विपद्ग्रस्त होता है॥ ३१ ॥ ६ संभोगरेखासरला गभीरा शीर्षे नता चेन्मिलिता सुमात्र्याम्। उग्रस्वभावो मनुजो महोंजा विख्यातकीर तिर्विजितारिपक्ष: ३२ सीती एवं गडरी भोगरेखा शिरोभाग में लची तथा मातृरेखा में मिली हो तो वह उग्रस्व भाववाला, बड़ा बली, विख्यात कीर्तिवाला और शत्रुपक्षपर विजय पाता है॥ ३२॥ सोयं जनोविन्दतिवित्तनाशंशाखायुताचेत्खलुमाहसी स्यात् ३३ चन्द्रालय के समीप से चली मातृरेखा भोगरेखा के शिरोभाग में मिली हो तो उसका धननाश होता है। और यदि पूर्वोक् रेखा शाखायुक़ हो तो साइसी होता है॥ ३:॥ = चन्द्रालये चेन्मिलितं स्व्शीर्षे रेखाद्यं वै विर्रलं विभाति। तत्प्राणनाशं कुरुते विपक्षो दीर्घापरा चेत्खलु वैरिजेता ॥३४॥ १. "पेलयं चिरलं तन" इत्यमरः। चन्द्र स्थान पर दो रेखाओंवाला निशान यदि शिरोभाग में मिला हो तो वैरीलोग उसके माण हरते हैं। यदि पूर्वोक रेखाओं में से कोई रेखा दीर्घ हो तो वह वैरियों को विजय करता है॥ ३४॥ ध्वृद्धाजुलेवैं द्वितये परुष्के रेखाद्यं चेत्सरलं सशाखम्। सोयं ह्यगम्यागमनं करोति गम्भीरबुद्धिर्गणितागमज्ञः।३५।। अँगूठे की दूसरी पोर में दो रेखाओंवाला यदि सीधा होकर शाखा- सहित निशान हो तो वह गंभीर, बुद्धिशाली, गणितशास्त्र ज्ञाता तथा अगम्या रमखियों में गमन करता है।। ३५ । १० रेखाचतुष्कं सरलं विभाति रेखाचतुष्कैस्तु तिरेविभिन्नम्। सोयं निमग्नो मनुजो जलोघे जायाजितो जल्पति जन्तुवादम्।। सीधी चार रेखाएँ तिरछी चार रेखाओं से कटी हों तो वह निजनारी से पराजित होता तथा जल में डूबता है ॥। ३६ ॥ * ११ काव्यालयान्ते विशदं सकोणं गुणनुरूपं यदिभाति चिह्नम। सोयं मनुष्यो धनधान्ययुक्को मायारतो मानववृन्दमुख्यः॥३७॥ यदि शुक्रालय के पास साफ़ कोगों समेत गुखाकार निशान हो तो. वह धन-धान्य-युक्क, मायारत तथा मुखिया गिना जाता है॥ ३७ ॥ १२ भुग्ना चलन्ती मणिवन्धदेशाद्भाग्यां सपैत्रीं प्रविभिद्ययाति प्रेमास्पदो वै पुरुषस्तदानीं प्रापोति पारं भवसागरस्य ॥ ३८ ॥ मशिबन्ध से चली टेही रेखा भाग्यरेखा और पितृरेखा को काटकर शुक्र के पास पहुँचे तो वह प्रेम धाम होता तथा भवसागर पार होता है ॥३८॥ १ ३ समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशाद्रेखा गभीरासमुपैति सौम्यम्। नारीकृतापत्तियुतो मनुष्यो मित्राभिभूतो हि समेति काराम् ३६ जिसकी मणिबन्ध से उठी गहरी रेखा वुधालय पर्यन्त जावे वह मित्रों से अनादत होता, स्त्रीकृत विपदायुक़ तथा जेलखाने जाता है॥ ३६ ॥ (देखो चित्र नं० ४५०)
- चंद्र स्थान पर ऐसे चिह्न जलाघात बताते हैं, यह मत अनेक विदेशी पंडितों का भी है।-सम्पादक पश्चदशलक्षणङ्गितकरतलफल १ ब्रध्नालयस्योपरिगं विभाति रेखाद्यं चेत्सरलं सुदीर्घम्। सोयं महात्मा मनुजस्तदा स्याज्ज्ञानेन मानेन धनेन धन्य:४० यदि लम्बा दो रेखावाला सीधा निशान अनामिका की पहली पोर से उठकर दूसरी पोर के मध्य में पहुँचे तो वह महात्मा, ज्ञानी-मानी, धनी और प्रशंसनीय होता है॥ ४० ॥ २ सौम्पालये चेद्विशदं च सूच्मं रेखाचतुष्कं सरलं विभाति। सोयं निमग्नो हि जलपवाहे वृद्धे वयस्के बहुसौख्यमेति॥४१॥ साफ़ लोटासा चार रेखावाला सीधा निशान यदि बुघालय में हो तो वह जल में डूबता तथा दृद्धावस्था में सुख पाता है ॥ ४१॥ ३ सूरालये चेत्सरलं विभाति रेखाचतुष्कं खलु स्वल्परूपम्। पुत्रपपौत्रादियुतो मनुष्यो महामनीषी ममताविहीनः ॥४२ ।। यदि सीधा चार रेखाओंवाला छोटांसा निशान सूर्यालय में हो तो बह पुत्र एवं प्रपौत्र-संपन्न होता तथा बड़ा बुद्धिमान् और ममताहीन होता है ४२t ४ देवेन्द्रवन्द्ालयगं विभाति चिह्नं त्रिकोएं विशदस्वरूपम्। संस्थासमेतो मनुजो धनाढ्यो धन्यो धरायां सरलस्वभावः ४३ जिसके बृहस्पति स्थान में साफ़ त्रिकोण चिह्न हो वह मर्यादायुक्, धनाव्य, प्रशंसनीय और सीधे स्वाभाववाला होता है॥ ४३॥ ५ पूज्यालये चेद्विशदस्वरूपं तारानुरूपं यदि भाति चिह्नम्। सोयं मनोव्याधियुतो मनुष्यो मस्तिष्कपीडां लभते सशोक: ४४ बृहस्पति स्थान में (भोगरेखा के कएठदेश के पास) ताग का चिह्न हो तो बड मानसी पीड़ा से पीड़ित, शोकी तथा माथे की पीड़ाटपाता है॥४४॥ ६ पैत्रीसुशीर्पोपरिंगं विशुद्धं गुणनुरूपं यदि भाति चिह्नम्। पुरोहिताचार्यनिपीडिताङ्गो बाधा समेतो बहुदुःखमेति॥४५॥ यह अत्युत्तम चिह्न है।-सम्पादक पैत्रीरेखा के शिरोभाग के ऊपरी भाग नें साफ़ गुगाकार निशान हो तो वह पुरोहित, आचार्य, या गुरु द्वारा पीड़ित अङ्गवाला तथा बहुत दुखी होता है।। ४५ ॥ ७ भोगासुशीषे मिलिता सुपैत्री भोगा मुखं चैति यदा सुमात्री। धूर्तस्वभावो मनुजो नराणां कार्यं विधत्ते सततं समस्तम्॥४६।। भोगरेखा के शिरोदेश में यदि पितृग्खा मिलाप करे और यदि भोग- रेखा के मुख के समीप मातृरेखा चली गई हो तो वह धूर्तस्व्रभाववाला (छलछन्दी) होता है॥ ४६॥ = भिन्नासुमात्री यदि नीचभागे गोलार्धरूपं कुरुते हि चिह्नम्। सोयं नरः स्यान्निजबन्धुवर्गे विश्वासही नो बहुसेव काढ्य: ४७ यदि निचले भाग में मात्रीरेखा छ्िन्नभिन्न होकर अरधगोलाकार निशान बनाती हो तो बन्धुवर्गों में अविश्वस्त होना तथा अनेक दासगों से सेव्यमान होना सूचित करती है॥ ४७ ॥ ६मन्दालये चेत्खलु भोगरेखा चुद्राविभिन्ना समुपेति सौम्यम्। नानापदार्थैःसहितो मनुष्यो भूपादिभीत्या बहुहानिमेति४८ जिसके शनिस्थान के पास यदि भोगरेखा छोटी २ रेखाओं से कटकर बुधालय पर्यन्त जावे तो वह नाना वस्तुयुक् होना तथा राजा-महाराजा आदि के डर से हानि उठाता है॥ ४८ ॥ १० मात्रीसुरेखा यदि मध्यदेशे चुद्राविभिन्ना विनता विभाति। अल्पायुष तं पुरुषं करोति सौभाग्यवन्तं बहुपुत्रवन्तम् ४६ यदि मातृरेखा मध्यभाग में (शनैश्चरालय के सामने) छोटी २ रेखाओं से कटी तथा लचीसी पतीन हो तो उसको सौभाग्यवाला, अनेक पुत्रोंवाला तथा अल्पायु करती है॥ ४०ै ॥ ११ पैत्रीसमुत्था खलु चोर्ध्वरेखा शेपे सशाखा शशिनं प्रयाति। सांघातिकं मृत्युमुपैति मर्त्यों मत्या विहीनो ममतासमेतः५० जिसकी पैत्रीरेखा से उठी ऊर्ध्बरेखा शेप भाग में शाखा समेत चन्द्रा- लय में चली जावे वह निर्बुद्धि तथा सांघातिक मृत्यु पाता है॥ ५० ॥ सामुद्रकशास्न १२ भौमालयान्ते मिलितं गभीरं तिर्यकृत्रिरेखं समुपैति काव्यम् अपव्ययेनापि युतो मनुष्यः शेपेनुतापं कुरुते संदैव ५१॥ मङ्गल स्थान से मिला गहरा तथा तिरछी तीन रेखाओंवाला निशान शुक्रालय के पास पहुँचे तो वह वुरे कामों में पैसा खर्चना है। जब धन चुक जाता है तो सदैव पछनाया करता है॥ ५१ ॥ १ ३ भाग्यासुरेखा मिलिता सुपैत्र्यां तदन्तरे चेत्समकोणचिह्रय्। साधारणोयं पुरुषस्तदा स्यान्नार्या यदा चेत्तनयं मसूते५ २।। जिसकी भाग्यरेखा पैत्रीरेखा से मिली हो (ऊर्ध्वरेखा पितृरेखा से मिली हो) और उनके बीच में समकोण का चिह्न हो तो वह साधारण पुरुप होता है। यदि पूर्वोक निशान रमखी के करतल में हो तो वह पुत्र पैदा करती है॥ ५२ ॥ १४ समुत्थिता चेन्मिबन्धदेशाद्रेखागभीरा समुपैति भाग्याय्। सर्वग्ियो वै पुरुषस्तदानीं विजित्य बन्धुं सुखतांसमेति ५ ३॥ मगिबन्ध से उठा गहरी रेखा भाग्यरेखा के पास पहुँचे तो वह पाखी सबका प्यारा होता तथा बैरी का विजय कर सुख पाता है॥ ५३ ॥ १५ चन्द्रालये चेद्विशदस्वरूपं चिह्नं चतुष्कोणयुतं विभाति। सोयं यशस्वी मनुजोमनस्वीविश्वासशाली बहुवित्तमेति५४ जिसके चन्द्रालय के निकट साफ़ चार कोगायुक़ निशान हो वह यशस्वी, मनमौजी, विश्वामी और धनी होता है। ५४ ॥ (देखो चित्र नं० ४६) १ सौम्यालयान्ते सरलैकरेखं संमध्यगोलं यदि भाति चिह्नय्। दुर्द्ृष्टियुक्ो विकलो मनुष्यो विक्षीएवीर्यों विषयानुरागी ५५ वुधालय के पास सीधी एक रेखावाक्षा व बीच में गीलाकार निशान हो तो वह न्षीणवीर्यवाला, विपयानुरागी, दुर्बलदृष्टियुक्क तथा व्याकुल बन। रहता है॥। ५५ ॥
- वुधालय पर गोलाकार चिह्न श्रराकस्मिक मृत्यु-सूचक होता है। नेत्रीं की दृष्टि कमज़ोर भी होती है, ऐसा कहा गया है।-संपादक २भोगागभीरा गुरुगा विभाति शाखातदीया यदियाति मन्दम् सोयं मनुष्यो वनिताविलासाह्ौर्भग्ययुक्कोधन हानिमेति ५६ गहरी सौभाग्यरखा बृद्स्पति स्थान में पहुँ चे और यदि उसकी शाखा शनि स्थान में गई हो तो उसकी रमशियों में आसक्कि होने से धनहानि होती है ॥५६॥ ३ मात्रीसमुत्या विशदा विभुग्ना रेखा यदेका धिषएं प्रयाति। स मन्दभाग्यो मनुजस्तदानीं पामोति सौख्यं चरमे वयस्के५७ मातृरेखा से उठी टेढी साफ़ रेखा यदि बृहस्पति स्थान पर्यन्त जावे तो वह मन्दभागी तथा अन्तिम अवस्था में सुख पाता है॥। ५७ ॥ ४ आारम्भदेशे खलु भोगमात्र्योस्तारानुरूपं यदि भाति चिह्नम्। सोऽयं गतो वै मनुजो विदेशं गापोति भद्रं भयताविहीन:५८ भोगरेखा एवं मातूरेखा के आरम्मदेश में तारा का चिह्न हो तो वह विदेश जाता तथा निडर और कल्याणायुकक होता है॥ ५८॥ ५ भोगासुमध्ये सरलं त्रिरेखं तिर्यग्विभिन्नं खलु चन्द्रमित्या। सोयं मनुष्यो रिपुतासमेतो मातापितृभ्यां कुरुते विवादम्५६ भोगरेखा के मध्यभाग में एक रेखा से तिरछा कदा हुआ तीन रेखाओं वाला सीधा निशान हो तो वह याता-पिता के साथ झगड़ा करनेवाला होता है॥ ५६॥ ६ चिह्नं गभीरं जठरे जनन्या वृत्तार्धरूपं विशदं विभाति। मातूरेखा के मध्य में गहरा साफ़ बृत्तार्धरूप (अर्धगोलाकार) निशान होतो वह अपने माता-पिता को छोड़ स्वात्मा पालता तथा विदेश में चूमता है॥ ६०॥ ७ मात्रीसुरेखा शशिनं समति पैत्री विभुग्ना मणिबन्धमेति। एवं विधे गर्ततरे प्रयाते करोति चौयं चपलस्वभावः ॥६१।। मातूरेखा चन्द्रालय के पास चली जावे और टेवी पैत्रीरेखा मगिबन्ध से मिले और गड़हे का सा निशान हो तो वह चपल स्वमाववाला तथा चोरी करता है।। ६१ ॥ सामुद्रकशास्र = पैत्रीगले चेत्सरलं त्रिरेखं रेखाचतुष्कैस्तु तिशेविभिन्नम्। सोयं जनो वै कुरुते कुकृत्यं विषप्रयोगेंर्विषयानुरक्ः॥६२॥ सीधा तीन रेखावाला चार रेखा से तिरछा कटा निशान पैत्रीरेखा के कएठदेश में हो तो विपयी तथा विपमयोगों सरीखे निन्दित कार्य करना बताती है॥ ६२ ! पित्रा वियुक्का यदि म।तृरेखा द्विधा विभक्का खलु चाग्रभागे। सोयं नरे भिन्नतरस्वभावो ह्यामोति खञ्जं खलतासमेत: ६३ जिसकी मातृरेखा पैत्रीरेखा से बिलग हो और अग्रभाग में दो प्रकार से बँट जाय वह खल, भिन्नस्व्रभाववाला तथा लँगड़ा होता है॥ ६३॥ १० नतद्धिरेखं मेंणिवन्धसंस्थं तडूतच्रिह्नं सरलद्धिरेखम्। सांघातिकं मृत्युमुपैति मत्यों मन्दस्वभावो मदनाकुलात्मा ६४ मशिबन्ध में दो लची रेखाएँ तथा उस पर सीधी दो रेखाएँ हों तो वह नीच स्वभाववाला, कामपीड़ित तथा सांघातिक मृत्यु पाता है ॥६४॥ ११ अङ्गुष्ठमूले विशदं विभाति कोणस्वरूपं यदि युग्मचिह्नम्। सोयं दरिद्रः परिवारयुको भिक्षासुवृत्तिं कुरुतेऽप्यजस्रम् ६५ जिसके अँगूठे के मूल में साफ़ दो कोण चिह् हों वह परिनारयुक्, दरिद्री तथा भित्ताृटत्ति से निर्वाह करता है॥ ६५॥ १२ पैत्रीसुरेखा यदि नीचभागे वृत्तार्धभिन्ना मणिबन्धमोति। सोयं हठान्मृत्युमुपेनि मत्यों मत्या विहीनो विपदासमेतः६६ यदि पैत्रीरेखा निचले भाग में अरधवृत्ताकार निशान से कट मशिबन्ध के पास पहुँचे (अँगूठे के मूल में समा जाये) तो वह विपदयुक, निर्बुद्धि तथा हठ से मृत्यु पाता ईै ॥ ६६ ॥। १ सर्पाननाभा मणिबन्धमंस्थाह्येवंविधाश्चेद्यतिसन्ति रेखाः। तावांन्मतं वे भ्रमते विदेशं व्यापद्ग्रहग्रस्तमना मनुष्यः।६७।। मांगत्रन्ध के ऊपर के भाग में सर्प मृखवाली रेखा हो । स्रकया ऐसी ही द्वितीयखरड जितनी रेखाएँ प्रतीत हों) तो बह उतने बार विशिष्ट आपदग्रस्त मनवाला होता और निश्चय विदेश में घूमता है॥ ६७ ॥ १४ सर्वाङ्ुलीनां त्रितये परुष्के सार्प्यं द्विरेखं यदि भाति चिह्नम्। बाल्याद्यवस्थाङ्गुलिकक्रमेण नूनं नरो मज्जति वारिवाहे॥६८ ॥ जिसकी समस्त अँगुलियों की तीसरी पोर में सर्प समान वक्राकार दो रेखाएँ हों वह बाल्यादि अवस्था और कनिष्ठादि अँगुलियों के अनुक्रम से निश्चय जल में डूचता है। [यानी पूर्वोक निशान यदि कनिष्ठा में हो तो वाल्यावस्था में, अनामिका में हो तो युवावस्था में, मध्यमा में हो तो यध्यावस्था में, तर्जनी में हो तो वृद्धावस्था में और अँगूठे में हो तो अति- दृद्धानस्था में जल-निमग्न होता है। ॥ ६८ ॥ (देखो चित्र नं० ४७) पश्चदशलक्षणाङ्गित करतलफ़ल 5० १ सर्वाङ्गुलीनां त्रितये परुष्के वक्रकं द्विरेखं यदि भाति चिह्रम् । सोयं मनुष्यो चलवीर्यहीनो दौर्बल्ययुक्को दयितो दयालुः॥६६ ॥ समस्त अँगुलियों की तीसरी पोर में वक्राकार दो रेखाएँ हों तो वह प्राखी वल, एवं चीर्यहीन तथा दुर्बल शरीरवाला और प्यारा तथा दयालु होता है॥ ६६ ॥ २ सौम्यालये चेत्मरलं सकोएं संमध्यरेखं विशदं विभाति। सोयं नरो नीतिपरो भयातों भिक्षासुदृत्तिं कुरुतेऽप्यजसम्७०॥ साफ़ सीधा कोगा समेत एवं चीच में रेखावाला निशान यदि बुधालय में हो तो वह नीतिपरायगा, भयाकुल तथा निरन्तर भिन्तावृत्ति करता है ७०॥ ३ भोगासुरेखा खलु नी चभागे शाखा द्रयेनापि युता यदास्यात्। सोयं विवादी मनुजो विपादी व्यासकचित्तो व्यव मायशाली ७१ यदि भोगरेखा निचले भाग में दो शाखायुक़ हो तो वह विवादी, विपादी, विपयामक और रोजगागी होना है॥ ७? ॥ ४ भाग्यासुरेखा रविगा विभाति त्वर्धार्धवृत्तेन युना सुशीषे। दोष्कर्म्यदोपान्मनुजस्तदानीं कारालयं याति करालरूप: ७२ सामुद्रकशास्त्न यदि गहरी भाग्यरेखा सूर्यालयपर्यन्त जाये और यदि शिरोभाग में अर्धार्धद्टत्तयुक्त हो तो वह दुष्क्मीं से जेलखाने जाता है॥ ७२॥ ५. भोगासमुत्या गुरुगेहमेति संकर्तिता चेत्खल करठदेशे। सोयं जनो वै भ्रमते विदेशं प्रापोति मृत्युं ममतासमेतः ॥७३ ॥ भोगरेखा से उठी शाखारेखा बृहस्पति स्थान पर्यन्त जाते और यदि कएट- भाग में कटी सी पतीत हो तो वह विदेश में छूमता तथा मरता है॥७३॥ ६ द्विधा विभक्ा खलु शेषभागे सौभाग्यरेखा गुरुगा विभाति। प्वञ्चयित्वा पितरौ स्वकीयौ ह्यनारतं कुप्यति कोपशाली ७४।। शेपभाग में दो प्रकार से बटी सौमाग्यरेखा बृह्दस्पति स्थान में पहुँचे तो वह अपने माता-पिता को छलता, तथा सदैव कुपित होता है।। ७४।। छभाग्या विभिन्ना खलु भोगरेखा कोएं विधत्ते यदि मध्यदेशे। वित्ताभिलाषी मनुजो विलासी प्रामोति कामं कलयासमेतः ७५ यदि गोगरेखा मध्यभाग में कोएा बनावे तथा भाग्यरेखा से कटी हो तो वह धनामिलापी, काम-कलायुक तथा विलासी होता है। ७५॥ =मात्रीसुरेखा मिलिता सुपेत्र्यां वृत्तार्धयुक्का खलु करठदेशे। सोयं विदीनो दयिताविहीनो भङ्कत्वा स्ववाटिं भयतामुपैति। पेत्रीरेखा में मिली मात्रीरेखा कएठदेश में अरधगोलाकार निशानयुक् हो तो वह दरिद्री, दयिताविहीन, तथा अपनी बाड़ी नाश कर भयातुर रहता है॥७६॥ ६्भौमालयान्ते सरलं द्विरेखं संवृक्णमध्यं यदि भाति चिह्नम्। उच्चस्थलाद्वे पतनं जनस्य नो कर्तितं चेन्मरणं प्रयाति॥७७॥ भौमालय के पास साधा दो रेखाओंवाला तथा बीच में कटा हुआ निशान हो तो उसका ऊँचे से गिरना होता है। और यदि पूर्वोक़ निशान चीच में कटा न हो तो वह गिरकर मर जाता है। ७७ ॥ १० पेत्रीसमुत्था मिलिता सुमात्र्यां कोएं विधत्ते विशदस्वरूपम्। दोर्जन्ययुक्कोमनुजोतिलु्धो लावरयहीनोललनांममेति ७=॥
- मंगल सदा लड़ाई-भगड़े, चोट लगना. गिरना, रक्कपातादि का सचक हैं। -संपादक पैत्रीरेखा से उठी एवं मात्रीरेखा में मिली साफ़ रेखा कोग्ाचिह्न बनावे नो वह दुर्जन, कुरूप, बड़ा लोभी तथा रमग्ी पाता है। ७८ ॥ ११ समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशात्सर्पानुरूपा जननीमुपैति। बिना प्रयासं लभते हि वित्तं विश्वासघाती जनवञ्चकश्च७६॥। मशिबन्ध से उठी सर्पाकाररेखा यदि मातृरेखा के पास पहुँचे तो वह छलिया, विश्वासघाती तथा बिना परिश्रम के ही धन पाता है॥ ७६॥ १२ मातुःसमीपे विशदस्वरूपा रेखा यदैका भगिनी विभाति। संलव्धवित्तो मनुजोऽधिकारी दीर्घा यदा चेद्ब हुवित्तमेति ८० साफ़ मुथरी एक भगिनीरेखा यदि मातृरेखा के पास हो तो वह अधि- कारी होकर धन पाता है। यदि पूर्वोक्क रेखा दीर्घाकार हो तो वह बडुतसा धन पाता है॥ ८० ॥ १३ पूज्यालयाच्चेच्चलिता सुरेखा चापस्वरूपा शशिजं समेति। धूर्तस्वभावोमनुजो हि लम्पटो दान्योवदान्योध्वजभङ्गमेति ८१ बृहस्पति स्थान से चली धनुपाकार रेखा यदि बुधालय पर्यन्त जावे तो वह धूतस्वभाववाला, व्यभिचारी, दाता, बड़ा वक्ा होता तथा उसकी ध्वज- भङ्र होती है॥ ८ १ ।। १४ मात्रीसमुत्था कुटिला सुपैत्री ह्यधोद्विभिन्ना मणिबन्धमेति। सोयं जनःस्यात्परिमाणभोजी प्रमाणपायी दयितानुयायी द२ मात्रीरेखा से उठी टेही पैत्रीरेखा यदि निचले भाग में छोटी दो रेखाओं से कटती मशिबन्ध में समा जावे तो वह परिमाखभोजी, परिमांख- पायी और अपनी प्यारी का अनुगामी होता है॥ ८२॥ १५ सर्वङगुलीनां द्वितये परुष्के कोणस्व्र रूपं यदि भाति चिह्नम्। नानार्तियुक्को मनुजोऽतिदुर्बलोमूरच्छामयं वैलभतेऽलसाङ:८३ सब अँगुलियों की दूमरी पोर में कोणचिह्न हो तो वह
स्त्रीपद्तललक्षण (Part 10)
नानाव्या- धियुक्, दुबज्ा, आलसी तथा मूर्च्छारोगी होता है ।। ८३ ॥ (देखो चित्र नं० ४८) सापुदकशार १ इज्यालयाच्ेच्चलिता कुरेखा मित्वा सुभोगां समुपैति सौरिम। शीर्षाभिघातं लभतेमनुष्यो लावरायलीलालसितोडलसाङ:८४ बृहस्पति स्थान से चली एक छोटीसी रेखा सौभाग्यरेखा को काटकर यदि शनैश्चरालय पर्यन्त जाये तो वह सुन्दर लीला से विलसित होता तथा सुस्त देहवाला और मस्तकपीड़ा भोगता है॥ ८४ ॥ भोगाविभुग्ना शनिगाविभाति चुद्राविभिन्ना यदि नीचभागे। विसूचिका क्रान्तवपुरज्वरार्तो जृम्भायुतो याध्यपदं प्याति दप॥ टेढी भोगरेखा शनि स्थान में पहुँच एवं निचले भाग में एक छोटी सी रेखा से कटे तो वह हैजारोग से तथा उ्वर से पीड़ित होता और जँमुहाई लेने में मरता है॥ =५ ॥ ३ मात्रीसुरेखा भगिनीसमेता स्वल्पस्वरूपा पितरं समेति । तदास्थिभङ्गंलभते नरे वै त्वन्या यदा चेदधिकाङ्कनःस्यात्-६। भगिनीसमेन छोटीसी मात्रीरेखा पैत्रीरेखा में समा जांवे (पैत्रीरेखा से मिलाप करे) तो वह हड्डी टूटने की पीड़ा पाता है। यदि दूसरी भगिनीरेखा प्रतीत हो तो वह अनेकानेर रमखियों में रमता है॥ ८६ ॥ ४ पैत्रीसमुत्थां शनिगांस्वशीषे संयुज्य भाग्या मणिबन्धमेति। सोयं मनुष्यः कलहानुरक्तः प्रामोति कारां कमलाविहीन:८७ अपने शिरोभाग में पैत्रीरेखा से उठी एवं शन्यालय में पहुँची रेखा से मिली भाग्यरेखा मशिबन्ध (कब्जे) के पास आ जाने तो वह लढ़ाका तथा लक्ष्मीहीन होता और जेलखाने जाता है॥ ८७॥ ५अङ्ुष्ठशाखा यदि सन्तु तिस्रस्तासांसुमध्या खलुकर्तिता चेत्। सोयं जनौ वैरिगणान्विजित्य सत्यप्रतिज्ञः च्षमतामुपैति॥ == ॥ अँगूठे की यदि तीन शाखाएँ हों और उन में से बीचवाली शाखा कटी हो तो वह सत्यसंकल्पवाज्ञा, वैरियों के. वय करता और तमाशील होता है॥। ८८ | ६ समुत्थितं चेन्मणियन्धदेशामितं सिनें यदि गाति चन्द्रम्। सोयं नरो मूढतरो नराणां विश्वासछाती वनितारतः स्यात् नह मशिबन्ध से उठी दो रेखाएँ यदि नम्द्राराय में जावें तो वह महामूर्ख, विश्वासघानी तथा वनिता में रत रहता है॥। ८३॥। ७पैत्री विभुग्ना मणिबन्धमेति शाखाचतुष्केन युता स्वमध्ये। सोयं जनः स्यानिजबन्धुवर्गे विश्वासहीनो विषमस्वभाव: ६० टेही पैत्रीरेखा अपने विचले भाग में चार शाखाओं से मिले तथा मरिबन्ध के पास जावे तो वह स्व्रबन्धुवर्गों कें अविश्वासी और कठिन स्वभाववाला होता है।। ६० ॥
- बृद्धा ङुलेवें द्वितये परुष्के तिरोद्धिभिन्नं सरलं द्वि रे ख व म् । विश्वासराहित्यमुपैति जन्तुर्जाज्वल्यमानःखलुनास्तिकश्र६१ अँगूठे के दूसरे पोर में तिरछी दो रेखाओं से कटी सीधी दो रेखाएँ कोपाग्नि से जलना, नास्तिकता तथा विश्वासहीनता की सूचक हैं।ह?॥ ६वृद्धाहुलवैं नखतः समुत्यं द्विपर्वगं चेत्मरलं द्विरेखम्। विश्वासशाली मनुजो रसाली पजासुपाली जनदुःखदाली ६२ अँगूठे के नाखून से उठ दूसरी पोर तक गया सीधा दो रेखाओंवाला निशान विश्वासी, मिष्टभाषी होकर सन्तान पालनेवाला, जनदुःखविदारक बताती है ॥ ६२ ॥ १० सुतर्जनी चेद्द्वितये परुष्के धत्ते सकोणं यदि बाहुभिन्नम्। सोयं मनुष्यो रसनारसज्ञो रामारतो द्यृतयुतो दयालुः ॥ ६३ ॥ जिसकी तर्जनी की दूसरी पोर में कोणयुक़ भुजाभिन्र चिद्न हो वह जिडा के स्वाद का ज्ञाता, दयालु, सुन्दरियों में रत, और जुवाड़ी होता है।।६३। ११ सुमध्यमाया द्वितये प्ररुष्के चिह्नं सकोएं यदि मध्यकोषम। दुरोदरक्रान्तमना मनुष्यो मान्योवदान्यो बलतामुपैति॥६४॥ : जिसकी मध्यमा की दूसरी पर्व में कोण समेत एवं बीच में कोए रखने- सामुद्रकशास्त्न वाला निशान हो वह जुवाड़ी, माननीय, वक्का तथा वलवान् बना रहता १२ अनामिकाया द्वितये परुष्के चिह्नं सकोएं यदि बाहुभिन्नम्। द्यूते रतो वै मनुजो विलासी ह्यानन्दराशी खलु सुद्धच्युपासी ६५ जिसकी अनामिका की दूसरी पोर में कोण समेत भुनाभिन्न चिह्न हो वह जुाड़ी, भोगी, आनन्दराशि और विद्वानों का उपासक होता है ५॥ * १३ कनिष्ठिकाया द्वितये परुष्के चिह्नं सकोणं यदि मध्यकोणम्। सोयं नरी द्यृतपरोऽप्युदारो ह्यामोति शङ्गां निजजीवनेप्सुः ६६ जिसकी कनिष्ठा की दूसरी पोर में कोण समेत एवं बीच में कोख रखनेव्राला निशान हो वह जुवाड़ी, उदार, अभिलापी तथा सन्देही होता है ६६ (देखो चित्र नं० ४६) दशलक्षणाङ्गितकरतलफल १ पेत्री विभुग्ना मणिबन्धमेति वृत्तार्धयुक्का खलु चोर्ध्वभागे। श्वामादिरोगान्मृतिमेति मत्यो न्यूना यदा चेद्य सोऽनुमानात्। यदि टेढ़ी पैत्रीरेखा मग्िबन्ध के सपीप चली जावे और ऊपरी भाग में ृत्तार्धयुक्र हो तो वह शासरोगी एवं कृमिरोग से मृत्यु पाता है। यदि पूर्वोक़ रेखा स्वल्परूप हो नो वह अवस्था के अनुमान से मरता है ६७ २ पैत्री समीपाच्लितं सरेखं वेत्रस्वरूपं शशिजं समेनि। सोयं नरो मूढतरो बलीयान् वामाजितो वै भ्रमते विदेशम् ६=॥ जिसकी पैत्रीरेखा के निकटदेश से चला रेखा समेत बेत के समान निशान बुधालय-पर्यन्त जावे वह महामूर्ख, बड़ा बली तथा वनिता से परा- जित होता और विदेश में घूमता है॥ ६७ ॥ ३ चन्द्रालयाच्चेच्चलितं द्विरेखं भित्त्वा सुमात्रीं गुरुमभ्युपैति। सोयं सुभाग्यो मनुजो मनस्वी धन्यो यदा चेन्मणिबन्धसंस्थम्।।
- यदि अनामिका मध्यमा बराबर लम्बी हो अथवा कुछ छोटी हो तो भी जुवा खेलना सूचित करती है।-सम्पादक द्वितीयखरड जिसके चन्द्रालय से चला दो रेखाओंवाला निशान मात्रीरेखा को काटकर डुइस्पति स्थान के सामने पहुँचे वह बड़ा भाग्यशाली तथा मनमौजी होता है। यदि पूर्वोक चिह्न कब्ज़े के पास हो तो वह धन्य कहाता है । ६६ ॥ १ समुत्थितं चेन्मणिवन्धदेशाचिह्नं द्विरेखं बुधमभ्युपैति। गाम्भीर्यशालीगणको गरिष्ठो ज्येष्ठो वरिष्ठोजनतामुपैति१० मशिबन्ध से उठा दो रेखाओंवाला निशान यदि बुधालयपर्यन्त जावे तो वह गाम्भीर्यशाली, ज्योतिर्वेत्ता, गरिष्ठि, ज्येष्ठ, श्रेष्ठ और जनसमूह पाना सूचित करता है ॥ १०० ॥ ५. शेषे सुभागे खलु मातृकाया मध्ये विभिन्नं यदि भाति सार्प्यम्। आत्माभिमानी पुरुषोति लु्धो मन्दो मलाढ्यो मदनातुरश्च।। जिसकी मातृरेखा के शेषभाग में बीच में कटा सर्पाकार निशान हो वह आत्माभिमानी, बड़ा लोभी, मूर्ख, मलिनस्वभाववाला, तथा काम से व्याकुल रहता है॥ १ ॥ ६ मात्रीसमीपे विशदं विभाति सर्पानुरूपं यदि युग्मचिह्नम्। सोयं नरो मजति वारिवा हे मध्ये वयस्के सुखतामुपैति २॥ जिसकी मात्रीरेखा के समीपवर्ती साफ़ सर्पाकार दो निशान हों तो वह जल में डूबता और मध्यावस्था में सुख पाता है ।। २ ।। ७ सुमध्यमायास्तृतये परुष्के चिह्नं त्रिशूलं वृजिनं विभाति। श्वासावरोधात्खलुपाशतोवापाप्नोतिमृत्युं भुविचौरमुख्यः॥३। मध्यमा की तीसरी पर्व में टेवा त्रिशल चिह्न हो तो मुखिया, चोर, श्वासारोध या फांसी से मृत्यु पाता है॥ ३ ॥ = अनामिकायास्तृतये परुष्के संमध्यगोलं वृजनैकरेखम्। सोयं नरश्चौरवरोऽतिलम्पटो विसंकटो वै विकटोनराणाम् ४॥ जिसकी अनामिका की तीसरी पर्व में स्थित बीच में गोल एवं तिरछी सामुद्रकशास्त्न एक रेखावाला निशान हो वह चोरों में मुखिया, व्यभिचारी मनुष्यों में विकट, तथा संकट में रहता है॥। ४ ॥ ६सौम्यालयाचेचलिता गभीरा भोगा सुरेखा गुरुगा विभाति। जैवातृकोयंमनुजोजवाढ्योह्यामोतिनित्यंललनासुभोगस् ५॥ जिसे वुधालय से चली गहरी भोगरेखा बृह्स्पति स्थान पर्यन्त हो बह वेगवान्, दीर्घजीवी तथा नित्य रमणियों को भोगता है।। ५ ॥ १० चन्द्रालयाच्चेचलिता विभुग्ना मात्री सुरेखा पितरं परैति। सोयं मनुष्यो निजवमजातो मान्यो वदान्योविभुतामुपैति ६ चन्द्रालय से चली टेही मातरेखा यदि पितृरेखा से मिले तो वह कुलीन, मान्य, बक्का और विभुता पाता है ॥ ६ ॥ (देखो चित्र नं० ५० ) एकादशल क्षणाङ्गितकरतलफल १ सोम्यालये चेद्विशदं विशालं यवानुरूपं यदि भाति चिह्नय्। नैजे कुटुम्बे कुरुते विवाहं त्वन्यालये चेत्फलमुक्कमेव ७॥ बुधालय में साफ़ यव के आकारवाला निशान हो तो वह अपने कुटुम्च या बन्धुगणों में व्याह करता है। और अन्य घरों में हो तो भी कहा हुआ ही फल होता है। ७॥ २ समुष्टिका चेत्करवालरूपा भोगा सुरेखा गुरुगा विभाति। सोयं ह्यगम्यागमनं करोति चेत्थं सुपैत्री तुफलं तदेव =॥ जिसकी मुठिया समेत तलवार के समान आकारवाली भोगरेखा वृद्ध- स्पति स्थान में पहुँचे वह मौसी, चाची, दादी, बेटी या बहू आदि में गमन करता है। यदि ऐसे ही पैत्रीरेखा भी हो तो भी अगम्यागमन करता है॥ = ॥ ३ भाग्या सशाखा शनिगा विभाति वृत्तेन युक्का खलु नीचभागे। नीचाङ्गनां वैभजते मनुष्यो वाश्री यदीत्थन्तु फलं तदेव ६।।
- इसी प्रकार कनिष्ठा की पोरों में चौकोन, त्रिकोए, गोलाकार अ्थवा धन चिह्न भी चौरकर्मपरायण सूचित करते हैं। -- संपादक जिसकी भाग्यरेखा शनि स्थान में पहुँचे तथा निचले भाग में शाखा समेत वृत्ताकार निशान से संयुक हो तो वह नीचं रमखी सेवन करता है। यदि ऐसी ही पैत्रीरेखा पतीत हो तो भी पूर्वोक फल होता है॥ ६ ॥ 2 अङ्ुष्ठमूले विशदस्वरूपं वेदाङतुल्यं यदि भाति भिन्नम्। संतापशाली मनुजो विशोकी दीर्घ यदा चेद्बहुशोकमेति १० जिसके अँगूठे के मूल में शुद्ध चार अङ्क के समान भिन्न निशान हो तो वह विशोकी तथा सन्तापशाली होता है। यदि पूर्वोक चिह्न लम्बायमान हो तो घना शोक पाता है॥ १० ॥ ५ अंगुष्ठशाखा यदि सन्तु तिस्रो वृत्तार्धयुक्का प्रथमा हि तासाम्। लोके भ्रमन्वै मनुजस्तदानीमुद्धाह्य पत्नीं पितरं समेति॥ ११॥ अँगूठे की तीन शाखाएँ हों उनमें से पहली शाखा अर्धवृत्ताकार युक् हो तो वह लोक भ्रमणकर विजातीय रमखी के साथ व्याहकर पिता के पास पहुँचता है॥ ?? ॥ ६ मात्रीसमीपे सरलं त्रिरेखं रेखाचतुष्कस्तु तिरोविभिन्नम्। सोयं नरो मज्जति वारिवा हे प्रामोति मृत्युं मदनातुरश्च॥१२॥ सीधा तीन रेखाओंवाला तिरछी चाररेखाओं से कटा निशान मात्रीरेखा के पास हो तो वह जल में हूय जाता है या कामातुर होकर मर जाता है॥१२॥ ७ रेखाचतुष्कं सरलं विभाति रेखाचतुष्कैस्तु तिरोविभिन्नम्। सोयं निमग्नो हि जलप्रवाहे नानार्तियुक्को मरणं प्रयाति १३ चन्द्रालय के समीप सीधा चार रेखाओंवाला एवं तिरछी चाररेखाओं से कटा निशान हो तो वह जल में डूब या अनेकानेक व्याघियों से घिरकर मरता है ॥ १३॥ = चिह्नं यदाचेन्मणिबन्धसंस्थं तिर्यकृत्रिभिन्नं सरलं त्रिरेखम्। सोयं जनो वैपतितो जलौघे जायाजितो याम्यपदं प्रयाति १४ मखिबन्ध में तिरछी तीन रेखाओं से कटा हुआ सीधा तीन रेखाओं वाला निशान हो तो वह भार्या से पराजित होकर जल में गिर यमालय जाता है ॥ १४ ॥ सामुद्रकशास्त् ६ कनिष्ठिकायाः प्रथमे परुष्के समद्धिकोएं यदि भाति चिह्नम्। चौर्याभियोगे लभते हि शास्ति न मन्यते ना निजदोषजालम्। कनिष्ठा की पहली पर्व में समद्विकोण चिह्न हो तो वह चोरी के मुकइमा में सज्ा पाता है। परन्तु वह अपने दोपजाल को तो नहीं स्वीकार करता॥१५॥ १० चन्द्रालयाच्चेच्चलिता सुमात्री संयुज्य पैत्रीं कुजमभ्युपैति। भ्रात्रा युतो वै मनुजो धनाढ्यो धन्यो धरायां धरया समेतः १६ यदि चन्द्रालय से चली मात्रीरेखा पैत्रीरेखा से मिलकर मङ्लालय में पहुँचे तो वह धरा एवं भाई युक्त तथा धनात्य और धन्य होता है ॥ १६। ११ मात्रीसमुत्था कुटिला सुपैत्री संवृत्तकरठा मणिबन्धमेति। सोयं मनुष्यो वनितावियुक्ो रामे रतो रामपदं प्रयाति॥१७॥ मात्रीरेखा से उठी व टेढी पैत्रीरेखा के कएठ में बृत्ताकार निशान हो और मगिगिबन्ध के पास जावे तो वह रमखी वियोगी, राम-परायण और रामालय को जाता है ॥ १७ ॥ (देखो चित्र नं० ५१) ग्रन्थ का उपसंहार और कविवंशवर्न शाके शैलंगुंणार्ष्टभूंपरिमिते वर्षे द्विंगोत्राङ्कको भाद्रे मास्यसिते ग्रहेशतिथिके भूनन्दने वासरे। नानाग्रन्थमतानुगोतिविशदो ग्रन्थो मया भाषितो भूयाद्गव्यतराय सर्वविदुषां सामुद्रिको नित्यशः ॥ १ ॥ शाके १७३७ संवत् १६७२ माद्रमास कृष्यपत्त षष्ठी मङलवार दिवस में नानाग्रन्थमतानुयायी विशदरूप सामुद्रिक ग्रन्थ को मैंने कहा है वह सदैव सर्वविद्वान्महोदयों के मङ्रल के लिये होवे ॥ १॥ सामुद्रिकं शास्त्रवरं विशुद्धं प्रोक्कं शिवायै शशिशेखरेण। आदाय सर्व भषितं मयैतद् भूयान्मुदे मसिडतपरिडतानाम्॥२॥ वरिशुद्ध, शास्त्रों में श्रेष्ठ जिस सामुद्रिकशास्त्र को चन्द्रचूड शिवजी ने शिवा
- ऐसा अनेक विद्वानों ने भी कहा है। संपादक (पार्वती) जी से कहा है वह सब लेकर इस सामुद्रिक की मैंने बनाया है वह गुणगखमसिडत पसिडत महोदयों की प्रीति के लिये होवे ॥ २ ॥ सामुद्रिकं शास्त्रमिदं मनोजं द्वाविशमब्दं मृगितं नितान्तम्। नो. देयमेतत्सुधिया कदापि लोकद्ुहां निन्दनतत्पराणाम् ॥३। यह सामुद्रिकशास्त्र मनोज् है कि जिसको बाईस वर्ष पर्यन्त पुराण, अंग- रेज़ी, फ़ारसी तथा बंगला व महाराठी आदिकों में अत्यन्त ही गवेषण किया है इसको लोकद्रोही निन्दकजनों के लिये विद्वानों को कदापि नहीं देना चाहिये॥ ३॥ शान्ताय शाक्काय शिवप्रियाय शिष्याय देयं गुरुभक्ककाय। वाणी भवेन्नो विफला कदापि स्वधर्मपालात्सफलं समस्तम्॥।४। शान्त, शाक्क, शिवमिय, गुरुभक्क शिष्य के लिये देना चाहिये उसकी वाखी कदापि निष्फल नहीं हो सकी है क्योंकि अपने धर्म की पालना से सबही सफल होता है।। ४ ।। सामुद्रिकाभ्यासपरा नितान्तं सत्येन युक्काः सरलस्वभावाः। सद्धर्मवन्तो मनुजा हिनूनं कीर्ति लभन्तांविमलां दिगन्ते॥५॥ सत्यवान् सरलस्वभाववाले जो मनुष्य सामुद्रिक के अभ्यास में अत्यन्त परायख होवेंगे वे लोग अवश्य सच्चे धर्मवाले होकर दिगन्तों में विमल कीर्ति को पावेंगे ।। ५ ॥ फलन्ति वाययो मनुजस्य तस्य सत्येन युक्कं हृदयं हि यस्य। तेनोदितं वै वचनं जनेभ्यःप्रापोति सिद्धिं न मृषा कदापि॥ ६॥ जिस मानव का हृदय सत्यसम्पन्न होता है उसकी वाखियां सफल होती हैं उस कस्के जनों के लिये जो वचन कहा जाता हैं वह सिद्धि को पाता हुआ भूठा कभी नहीं होसक़ा है।। ६ ॥ पठन्तु नित्यं सुधियो महान्तो धनं लभन्तां जनयूथकेम्यः। पुत्रप्रपौत्रादियुता भवन्तु चायुष्यवन्तो नितरामुदाराः।।७।। जो विद्वान्लोग इसको सदैव पढ़ेंगे वे महन्त होकर जनसमूहों से धन सामुद्रकशास्त्न को पावेंगे और पुत्र, प्रपौत्र आदिकों से संथुक् होवेंगे व आयुर्दायवाले होकर बड़े ही उदार गिने जावेंगे।। ७ ॥ श्रीमत्माज्ञनरायणेन प्रभुषा सद्धर्मविद्याविदा सर्वेषामुपकारकाय नितरामाज्ञापितोहं मुदा। नाम्रा शक्किघरः सदाशिवपदद्न्द्े रतो नित्यश- श्रक्रे ग्रन्थमनुत्तमं मतिमतां सामुद्रिकं सौख्यदम् ॥८ ॥ श्रीमान् रायवहादुर मुंशी पयागनारायणजी भार्गव मेरे स्वामी जोकि सच्चे धर्म व विद्या के जाननेवाले हैं उन्हों से सर्वों के उगर के लिये आज्ञापित, सदाशिवजा के युगल पदारविन्द के सेवक शक्किधरनामक मैंने मतिमानों को सदैव सौख्यदायंक सर्वोत्तम सामुद्रिक ग्रन्थ को बनाया है॥८॥। पुरे मुरादाबादाख्ये शुक्कवंशोद्धवः सुधीः। आसीददुर्गाप्सादाख्यो बलभद्रस्तु तत्सुतः ॥ ६ ॥ तस्यात्मजः शक्किघरः शिवपादार्चने रतः। चक्रे सामुद्रिकं शास्त्रं सरलं सर्वसम्मतम् ॥ १० ॥ सामुद्रकः समार्सि पफाेति शम् । समाप्तोऽयं ग्रन्थः । पण्डित वेणीराम शर्मा मोड फृत -(१) ग्रह शान्ति विधि (२) - शु० य० मन्न संहिता मू० ३५/- (३) शु० ग्र० शिवाचन पद्धति २०/- (४) रुद्राष्टाध्यायी 5/- पण्डित उमेश मिश्र गौड कृत १५/- (१) यज्ञ कर्म पद्धति (4) प्रत: नित्य कर्म पद्धति २५/- १०/- te) आक सूत्रावली र) काण्डम् (गुटका) क भसप्तशती (गुटका) १५/ धर शुवल कृत 5/- 1ो. सामुद्रकशास्त्र रसिव पुराण भाषा टोका पचारार ८०/- १००- म पीक्षा प्रकाशिका १२५/- चद्रस्तुति १५/- श्ीधरी एवं श्रीधरी प्रकाशक्याळ्या २०/- (र) अष्टाविशतोपनिषद, २८ उप० मू० गृ. (१०) ईषाद्यष्टोत्तर शतोपनिषद मू० १५/- (११) सांख्यकारिका ५०/- तत्वकामुदी एवं किस्णावलि १५०/- (१२) भुवनेशलौकिक न्याय साहस्त्री ठाकुरदत्त शर्मा ८0/- (१३) तक संएह =दीपिका किरणावलि, न्यायलोशनो एवं पदकृत्य ३५/- टीका एवं टिप्पड़ियाँ (१४)- न्यायसिद्धान्तमुक्तावली श्रीनृसिंह देवशास्त्री २००/- (१५) वैशेषिकदर्शन उपष्कार, विवृत्ति एवं वैशेषिक भाष्य ३००/- (१) सप्तवर्गी जन्म पत्रिका (२) -अयश्री जन्म पत्रिका ३/५० =(शे १/७५ जन्माक्षर (४)टिप्पणो फार्म ( २५x१)= १/५० (५) कुण्डलो फार्म ७/५० सैकड़ा ३५/- व्यास प्रकाशन =डी० १६/१३ मानमन्दिर, वाराणसी खण्डेलवाल प्रेस, मानमन्दिर वाराणसी