3. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — जङ्गलक्षण
जङ्गलक्षण
उपचितसमजानवश्च भूपा धनरहिताःश्वशृगालतुल्यजङ्घा: ६ जिनकी जाँघों में रोयें विरल और सूदम हों और जाँघें गोलाकार हों। जिनकी ऊरु (पतली जाँघें) हाथी की सूँड़ के समान हों। दोनों जानु (छुद्नू) मांसल और सम हों तो वे राजा होत हैं। और, जिनकी जाँघें कुत्ते वा सियार के समान (चौड़ी) हों तो वे दरिद्री होते हैं । ६। रोमलत्षय रोमैकैकं कूपके पार्थिवानां दे दे ज्ञेये परिडतश्रोत्रियाणाम् । जिनके रोमकप में एक-एक रोम हो वे राजा होते हैं। जिनके रोमक्रूपों में दो-दो रोम हों वे पलिडत वा वेदपाठी होते हैं। जिनके रोमकूपों में तीन-तीन या चार-चार रोम हों वे मनुष्य धनरहित और दुःखभागी होते हैं। इसी तरह केशों के भी शुभागुम लक्षण जानना चाहिए ॥ १० ॥