61. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — भ्रुललाटलक्षण
भ्रुललाटलक्षण
नो संगते नातिपृथू न लम्बे शस्ते ्ुवौवालशशाङ्कवक्रे। अर्ेन्दुसंस्थानमरोमशं च शस्तं ललाटं न नतं न तुङ्गम्॥६॥ स्त्रियों की दोनों भौँहेँ यदि असंलग्न, पतली, छोटी, वाल चन्द्रमा के समान टेनी हों तो प्रशस्त कहाती हैं। जिनका लल्ाट अर्धचन्द्राकार, लोम- रहित और सम हो तो प्रशस्त जानना चाहिये ।। है ।। कर्णकेशल क्षण कर्णयुग्ममपि युक्कमांसलं शस्यते मृदुसमं समाहितम्। स्निग्धनीलमृदुकुञ्चितैकजा मूर्धजा: सुखकराः समंशिर:१० स्तियों के दोनों कान मांसल, कोमल समान तथा अचल हों तो प्रशस्त कहाते हैं। केश चिकने, काले, कोमल और टेढ़े तथा रोमकूवों से एक एक निकले हों तो सुखकारी होते हैं। यदि शिर समान हो तो सुखदायक होता है॥ १०