63. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — मणिबन्धादिलक्षण
मणिबन्धादिलक्षण
निगूढमणिबन्धनौ तरुणपद्मगर्भोपमौ करौ नृपतियोषितां तनुविकृष्टपर्वांगुलौ। न निम्नमतिनोन्नतं करतलं सुरेखान्वितं करोत्यविधवां चिरं सुतसुखार्थसंभोगिनीम् ॥१२ ॥ जिनके हाथ गंमार मणिबन्धवाले हों, नवीन कमलगर्म के समान हों, जिनमें सारी अंगुलियाँ पतली तथा चिरली हों वे स्त्रियाँ राजपत्नी होती हैं। जिनका करतल गहरा व ऊँचा न हो तथा सुरेखाओं से संयुत हो उन स्त्रियों को सौभाग्यवती, पुत्रवती, सुखबती और धनवती तथा संभो- गिनी बनाता है॥। १२ ।।