69. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — ओष्ठकेशलक्षण
ओष्ठकेशलक्षण
यातूत्तरोष्ठेन समुन्नतेन रूक्षाग्रकेशी कलहप्रिया सा। प्रायो विरूपासु भवन्ति दोषा यत्राकृतिस्तत्र गुणा भवन्ति २४ जिन स्त्रियों का ऊपर का ओठ ऊँचा हो, केशों का अग्रभाग रुखा हो वे लड़ाई करने में प्रेम रखती हैं। मायः विरुप स्त्रियों में दोप होते हैं। जिन का अच्छा रूप होता है वे गुखी होती हैं॥ २४ ॥ दशाफलविचार में वर्षज्ञान पादौ सगुल्फौ प्रथमं प्रदिष्टो जङ्गे द्वितीयं च सजानुचक्रे। मेद्रोरुमुष्कं च ततस्तृतीयं नाभि: कटिश्रेति चतुर्थमाहुः॥२५॥ उदरं कथयन्ति पञ्चमं हृदयं षष्ठमतः स्तनान्वितम्। छथ स्तमं सजत्रुणी कथयन्त्यष्टममोठ्ठकन्धरे॥ २६॥ नवमं नयने च सम्रुणी सललाटं दशमं शिरस्तथा। अशभेष्वशुभं दशाफलं चरणादयेपुशुभेपु शोभनम् । २७ ।। नरनारी की देह दशभाग में विभक्क हैं। प्रतिभाग में बारह बारह वर्ष का एक एक दशा होती है। इस भाँति दश दशाओं के १२० वर्ष होते हैं। अच उन्हीं का क्रम कहते हैं। पाद व गुल्क (गंठे) यह प्रथमभाग पहली दशा होती है। इसकी संख्या वारह वर्ष की है। जानुओं समेत जंघा दूसरा भाग दूसरो दशा है। इसकी संरूया १३ से लेकर २४ तक है। भग, ऊरू व तृषण यह तीसरा भाग तीसरी दशा है। इसकी संख्या २५ से लेकर ३६ तक है। नाभि व कमर यह चौथा भाग चौथी दशा है। इसकी संख्या ३७ से लेकर ४८ तक है। उदर यह पाँचवाँ भाग पाँचवीं दशा है। इसका प्रमाख ४६ से लेकर ६० तक है। स्तनों समेत हृदय छठा भाग छठी दशा है। इसका प्रमाण ६१ से लेकर ७२ तक है। हँसुली समेत वाहें सातनाँ भाग सातवीं दशा कहाती है। इसका प्रमाण ७३ से लेकर ८४ तक है। श्रोठ और ग्रोवा यह आठवाँ भाग आठनीं दशा है। इसका प्रमाण ८५ से लेकर ६६ तक है। भौहें समेत आँखें यह नवां भाग नवीं दशा है। इसका प्रमाण ६७ से लेकर १०८ तक है। माल समेत शीश दशनाँ भाग, दशवीं दशा है। इसका प्माख १०६ से लेकर १२० तक है। यदि चरख आदि अङ्ग अशुभ लक्षण युक्त हों तो दशाफल अशुमदायक होता है, यदि चरणादि अंग शुभ लक्षणों से युक् हों तो दशाफल शुमदायक होते हैं॥ २५ । २७॥ इति बृह्दत्सामुद्रिके स्त्रीलक्षणम्। स्कन्द उबाच सदा गृही सुखं भुंक्े स्त्री लक्षणवती यदि। अतः सुखसमृद्यर्थमादौ लक्षणमीयते ॥ १॥* अगस्त्यजा से स्कन्दनी कहते हैं कि यदि स्त्री मुलक्षणा हो तो गृहस्थ पुरुष सदैव सुख भोगता है। इसलिए सुख व समृद्धि के लिए पहले लक्षणों को देखना चाहिए ॥ १ ॥ तत्र प्रथमं लक्षसाधिकरएं निर्दिशति वपुरावर्तगन्धारच छाया सत्त्वं स्वरोगतिः । वर्णश्चेत्यष्टधा प्रोक्ा बुर्धेरलक्षणभूमिका ॥२ ॥ हस्वादि अवयवों से रहित अंग, हाथ व नाभि आदि में लोमों का दत्षिखावर्त, गन्ध, कान्ति, शील, स्वर, गमन और गार आदि वर्ण, यह आठ प्रकार लक्षणों की भूमिका पलिडतों ने कही है॥ २ ।। आपादतलमारभ्य यावन्मौलिरुहं क्रमात्। शुभाशुभानि वच््यामि लक्षणानि मुनेशृणु ॥ ३॥ पैर के तलवों से लेकर बालों तक क्रप से शुभ व अशुभ लक्षणों को कहूँगा। मुनिजी ! सुनिय ॥३॥ आदौ पादतलं रेखास्ततोङ्गुष्ठांगुलीनखाः। पृष्ठं गुल्फदयं पाष्णी.जङ्गे रोमाषि जानुनी॥४ ॥
- इन वाक्यों से स्पष्ट है कि प्राचीनकाल में प्रत्येक व्यक्ति सामुद्रकशास्त्र भलीभाँति जानता था, और यही कारण है कि शुभाशुभ लक्षणों तथा अनु- कूल ग्रह-नक्षत्रों की जाँच कर विवाहादि कार्य करने की प्रथा चली आ रही है। इस नियम का ठीक-ठीक प लन करने से गृहस्थी कदापि क्लेशमय नहीं हो सकती। सदा सुख, पश्व्यं एवं धर्म की प्रवृत्ति बनी रहती है। वर्तमान समय के बहुत से लोग कुराडली मिलाके शुभाशुभ लक्षण देखने के विरुद्ध है। परिशाम यह होता है कि वे अपनी जीवन नौका शांतिपूर्ण नहीं चला सकते। सदा कलह, विद्रोह और अशान्ति का: अड्डा एक गृहस्थ का घर बन जाता है। यह क्या हमारे दुर्भाग्य की बात नहीं? संसार में केवल भारत ही ऐसा देश है, जहाँ की जनता अपने शास्त्रानुकुल धर्ममार्ग पर चन इस लोक तथा परलोक में सुख भोगती थी। पर अब समय के फर से यह सब यहाँ आडंबर बताया जाने लगा है :- संपादक। ऊरू कटी निनम्बस्फिग्भगो जघनबस्तिके। नाभि: कृच्िद्वयं पार्श्वोदरमध्यवलित्रयम्॥ ५ ॥ रोमाली हृदयं वक्तो वत्तोजदयचूचुकम्। पाणिपृष्ठ पाणितलं रेखांगुष्ठांगुलीनखाः। पृष्टिः कृकाटिका कराठे चिवुकरंच हनुद्यम्॥७॥ कपोलौ वक्रमधरोत्तरोष्ठी द्विजजिद्विकाः । घरिटका तालुहसितं नासिका चुतमकिषी ॥ ८ ॥ पझ्मभ्रूकर्णभालानि मौलिसीमन्तमौलिजा: । पष्टिः षहुत्तरा योषिदङ्गलक्षणसत्खनिः॥ ६ ॥ पहले दोनों पादतल, उनकी रेखा, अँगूठा, अंगुलियाँ, नख, पीठ, दोनों गंठे, एँड़ियाँ, जंघायें, रोम, छुटनू, निरोह, कमर, नितंघ, कूल्हे, योनि, पेडू, मूत्रस्थान, नामि, दोनों कोखें, पसलियाँ, पेट के बीच की तीनों बलियाँ, रोमपंक्रि, हृदय, बन्तःस्थल, स्तन, कुचाग्र, हँसली, कन्धा, भुज, शीश, काँखें, वाहें, कब्जा, दोनों हाथ, हाथ की पीठ, दोनों करतल व उनकी रेवा, अँगूठा, अंगुलियाँ, नव, पीठ, चाँटी, कएठ, दाही, कन- पटो, करोल, मुग् निचला आंठ, ऊर का ओंठ, दाँत, जीभ, घसटिका, तालु, इसना, नामिका, छ्ींफ, आँखें, मौंहें, कान, ललाट, शीश, जूड़ा और केश, ये नारियों के छियासठ अंग लक्षगों की समीचीन भूमियाँ हैं॥ ४॥६॥ पादतल लक्षय स्त्रीणां पादतलं स्निग्धं मांसलं मृदुलं समम्। अस्वेदमुष्यमरुणं बहुभोगोचितं स्मृतम् ॥ १० ॥ जिन स्त्रियों के पैरों के तल्तवे चिंकने, मंम मे भरे, कोमल तथा सम १ दोनों करतल व दोनों पाइतल इस भाँति मानने से रमणियों के शङ्ग में सही सही ६६ लक्षण होते है। ४ ३ हा, उनमें पसीना न आता हो, गरम व लाल हो, उन्हें बड़ा भोग प्राप्त होता है॥ १० ॥ रूचं विवणं परुषं खसिडतप्रतिविम्जकम्। सूर्पाकारं विशुष्कं च दुःखदौर्भाग्यसूचकम् ॥ ११ ॥ जिनके पैर के तलवे रूखे, वर्गविहीन व कठोर हों, जिनके रखने पर बालू आदि में निशान न हो, सूप के समान हो, विशेषतः सूखे हो, ऐसी ख्रियों को दुः्ख व दुर्भाग्य मिलता है ॥ ११ ॥