71. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — पादाङ्लिलक्षणा
पादाङ्लिलक्षणा
दीर्घाङ्कुलीभि: कुलटा कृशाभिरतिनिर्धना। इस्वायुष्या च इस्त्राभिर्भुग्नाभिर्भुग्नवर्तिनी ॥१६॥ जिसके पैर की अंगुलियाँ लम्ची हों वह ख्त्री कुजटा होती है। जिसके पैर की अंगुलियाँ पतली हों वह स्त्री धन रहित होती है। जिसके पैर की अंगुलियाँ छोटी हो वह स्त्री कम उमरवाली होती है। जिसके पैर की अंगुलियाँ टेही हों वह स्त्री कुटिल व्यवहारवाली होती है ॥ १६ ॥ चिपिटाभिर्भवेददासी विरलाभिर्दरिद्विणी। परस्परं समारूढा: पादाङ्गल्यो भवन्ति हि॥ १७ ॥ हत्वा बहूनपि पतीन् परश्ेष्या तदा भवेत्। यस्या: पथि समायान्त्या रजो भूमे: समुच्छलेत् ॥१८॥ सा पांसुला प्रजायेत कुलत्रयविनाशिनी। जिसके पैर की अंगुलियाँ चपटी हों वह सत्री दासी होती है। जिसके पैर की अँगुलियाँ बिरली हों वह स्त्री दरिद्रिग्ी होती है। जिसके पैर की अंगुलियाँ परस्पर मिली हों वह बहुत से पतियों को मारकर पराधीन होती है। मार्ग में जिस स्त्री के चलते हुए भूमि से धूल उब्जलती हो वह व्यभि- चारिखी होती और तीनों कुलों को नष्ट करती है ॥ १७। १८ । ३ ।।