76. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — जंघारोमलक्षण
जंघारोमलक्षण
रोमहीने समे स्निग्धे यजद्वे क्रमवर्तुले। सा राजपत्री भवति विशिरे सुमनोहरे॥ २८ ॥ एकरोमा राजपत्री दविरोमा च सुखावहा। त्रिरोमा रोमकूपेपु भवेद्ैघव्यदुःखभाकू॥२६॥ जिसकी जंघाएँ रोमहान, समान, चिकनी क्रम से गोलाकार, नस- विहीन और मनोहर हो वह स्तरी राजपत्री होती है। जिसके रोमकूपों में एकही रोम हो वह रानी होती है। जिसके रोमकूपों में दो-दो रोम हों वह सुख पाती है। जिसके रोमकूपों में तीन-पीन रोम हों वह विधवाहोकर दुःखभागिनी होती है॥। २८। २३ ।।