Books / Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla)

78. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — नितम्बादिलक्षण

नितम्बादिलक्षण

नितम्बचिम्बो नारीणामुन्नतो मांसल: पृथुः । महाभोगाय संप्रोक्कस्तदन्योऽशर्मणे मतः ॥ ३1 ॥ कपित्थफलवद्धत्तौ मृदुलौ मांसलौ घनौ। स्फिचौ वलिविनिर्मुकौ रतिमौख्यविवर्धनौ॥३६॥ यदि स्तियों का नितम्बमएडल ऊँचा, मांम से भरा और चौढ़ा हो तो वह बड़े भोगों के लिए कहा है। जो इमसे विपरीत हो तो वह अमंगल माना गया है। यदि कूले कैथा फल की तरह गोल, कोमल, मांसल, घने और बलियों से रहित हों तो वे विशेपतः रतिसौख्य बढ़ाते हैं ॥३५३६॥ सामुद्रकशासर भगलक्षण शुभ: कमठपृष्ठाभो गजस्कन्धोपमो भगः। वामोन्नतस्तु कन्याजः पुत्रजो दक्षिषोन्नतः॥३७॥ जिसकी योनि कछुए की पीठ या हाथी के कन्धे के सदश ऊँची हो तो शुमदायक होती है। जिसकी योनि बाई तरफ़ ऊँची हो वह कन्याएँ उपजाती है। जिसकी योनि दाहनी तरफ़ ऊँची हो वह पुत्रवती होती है॥ ३७॥ आखुरोमा गूढमणिः सुश्लिष्टः संहतः पृथुः। तुङ्ः कमलपर्णाभः शुभोश्वत्थदलाकृतिः ॥३८ ॥ कुरङखुररूपो यश्चुल्लिकोदरसन्निभः । रोमशो विवृतास्यश्च दृश्यनासोऽतिदुर्भगः ॥३६॥ योनि मुसरिया के रोमों की तरह रोमयुक्त हो, मखि छिपी हो, जो लिपटी हुई पुष्ट तथा ऊँची हो, कमलपत्र के समान अथवा पीपल-पत्ते के आकारवाली हो तो गुभदायक होती है। हिरन के खुरके समान या चूल्हे के उदर के समान हो अथवा रोमोंवाली, फैले मुखवाली हो, जिसमें नाक हेख पढ़ती हो, ऐसी योनि दुःखदायक होती है।। ३८ । ३६ ।। शङ्धावर्तो भगो यस्या: सा गर्भमिह नेच्छति। चिपिटः खर्पराकारः किंकरीपददो भगः ॥ ४० ॥ वंशवेतसपत्राभो गजरोमोचनासिकः । विकट: कुटिलाकारो लम्बगल्लस्तथाऽशुभः॥४१॥ जिसकी योनि तीन रेखाओं से युक्क हो वह बाँफ होती है। जो योनि चपटी खपरे के आकारवाली हो तो दासीपद देती है। चाँसपत्र या वेतसपत्र के समान, हाथीरोम के समान रोमयुक जिसकी नासिका बढ़ी हो; विकट या कुटिल आकारवाली या लब्बे गलवाली (नीचे का भाग दार्घ मुखवाली) योनि अशुमदायक होती है। ४० । ४१॥ भगभाललन्षण भगस्य भालं जघनं विस्तीणं तुङ्गमांसलम्। मृदुलं मृदुलोमाव्यं दत्तिणावर्तमीडितम्॥४२॥ मथमखएड वामावर्त च निरमांसं भुग्नं वैधव्यसूचकम्। संकटं स्थपुटं रूक्षं जघनं दुःखदं तथा ॥४३॥ भगका ऊपरी भाग (जघनदेश) चौड़ा, ऊँचा, मांसल, कोमल तथा नरम रोमों से संयुक्र दहिनावर्त हो तो शुमदायक होना है। जो जघनदेश वामावर्त या निमीस टेहा हो वह विधवापने को सूचित करता है। जो जघनदेश सकरा, गहरा, रूखा हो वह दुःखदायक होता है।। ४२-४३॥।