Books / Subala Upanishad

9. नवमः खण्डः

नवमः खण्डः

Verse १

अथ हैन रैक्वः पप्रच्छ भगवन्कस्मिन्सर्वेऽस्तं गच्छन्तीति । तस्मै स होवाच चक्षरेवाप्येति यच्चक्षुरेवास्तमेति द्रष्टव्यमेवाप्येति यो द्रष्टव्यमेवास्तमेत्यादित्यमेवाप्येति य आदित्यमेवास्त-मेति विराजामेवाप्येति यो विराजामेवास्तमेति प्राणमेवाप्येति यः प्राणमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति यो विज्ञानमेवास्तमेत्यानन्दमेवाप्येति य आनन्दमेवास्तमेति तुरीयमेवाप्येति यस्तुरीयमेवास्तमेति तदमृतमभयमशोकमनन्तनिर्बीजमेवाप्येतीति होवाच॥

atha haina raikvaḥ papraccha bhagavankasminsarve'staṃ gacchantīti । tasmai sa hovāca cakṣarevāpyeti yaccakṣurevāstameti draṣṭavyamevāpyeti yo draṣṭavyamevāstametyādityamevāpyeti ya ādityamevāsta-meti virājāmevāpyeti yo virājāmevāstameti prāṇamevāpyeti yaḥ prāṇamevāstameti vijñānamevāpyeti yo vijñānamevāstametyānandamevāpyeti ya ānandamevāstameti turīyamevāpyeti yasturīyamevāstameti tadamṛtamabhayamaśokamanantanirbījamevāpyetīti hovāca॥

In the midst of the heart, is a mass of red flesh in which is the Dahara of Lotus (in shape), blossoming in many ways like lily - there are ten holes in the heart where the vital airs are established. 2. When the (Jiva) is connected with Prana, then he sees rivers and cities of many kinds; when with Vyana, he sees Devas and Rishis; with Apana, Yakshas etc.; with Udana, the celestial worlds, gods, Skanda and Jayanta; with Samana, wealth also; with Vairambha (Prana) sees what is seen, heard, eaten and not eaten, visible and invisible. 3. Then these Nadis become hundred; from these, branch out seventy two thousand Nadis, in which the self sleeps and makes noises, in the second sheath he sleeps and sees this world and the other, hears all sounds - this they call clarity. Prana defends the body. The Nadis are filled with green, blue, yellow, red and white blood. 4. This Dahara lotus is blooming in many ways like a lily and like hair, so also the Nadis are placed in the heart. The divine self sleeps in the great sheath when there are no desires, no sleep even, there are no Devas or their worlds, Yagas, Mother, Father, kinsmen, no thieves or Brahmana-killer. All this is water - Again by the same path, he returns to wakefulness, this Samraj.

इसके पश्चात् रैक्व ने घोराङ्गिरस से प्रश्न किया-हे भगवन् ! ये समस्त पदार्थ किसमें अस्त होते हैं ? (यह सुनकर) पौराङ्गिरस ने रैक्व को उत्तर दिया-जो पदार्थ चक्षु के प्रति प्राप्त (प्रकट) होते हैं (दिखाई देते हैं), वे चक्षु (अपने अन्तर्यामी) में ही अस्त हो जाते हैं। जो द्रष्टव्य पदार्थ आदित्य के प्रति प्रकट होता है, वह आदित्य में ही विलीन हो जाता है। जो आदित्य, विराजा (सुषुम्ना नामक नाड़ी का ही एक नाम) के प्रति प्रकट होता है, वह विराजा में ही विलीन हो जाता है। जो विराजा प्राण के प्रति प्रकट होती है, वह प्राण में ही विलीन हो जाती है। जो प्राण, विज्ञान के प्रति प्रकट होता है, वह विज्ञान में ही अस्त होता है। जो विज्ञान, आनन्द के प्रति प्रकट होता है, वह आनन्द में ही अस्त होता है। जो आनन्द, तुरीय के प्रति प्रकट होता है, वह तुरीय में ही अस्त होता है। वह तुरीय अमृत, अभय, अशोक,अनन्त और निर्बीज ब्रह्म को प्राप्त होता है ॥ [जिस-जिस संज्ञा वाली नाड़ियाँ मनुष्य में होती हैं, वे सभी मूलतः विराट् पुरुष में भी होती हैं, जिस तरह विराट् पुरुष-परमात्मा का अंश आत्मा है, वैसे ही नाड़ियाँ भी विराट् के नाड़ी तंत्र की अंग हैं। आदित्य आदि देवों का प्राकट्यऔर विलय उन्ही के प्रति कहा गया है। आगे के मंत्रों में भी अधिदेवता का विलय जिन नाड़ियों में कहा गया है, ये सभी विराट् की नाड़ियाँ ही मान्य हैं।]


Verse २

श्रोत्रमेवाप्येति यः श्रोत्रमेवास्तमेति श्रोतव्यमेवाप्येति यः श्रोतव्यमेवास्तमेति दिशमेवाप्येति यो दिशमेवास्तमेति सुदर्शनामेवाप्येति यः सुदर्शनामेवास्तमेत्यपानमेवाप्येतियोऽपानमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति यो विज्ञानमेवास्तमेति तदमृतमभयमशोकमनन्त-निर्बीजमेवाप्येतीति होवाच॥

śrotramevāpyeti yaḥ śrotramevāstameti śrotavyamevāpyeti yaḥ śrotavyamevāstameti diśamevāpyeti yo diśamevāstameti sudarśanāmevāpyeti yaḥ sudarśanāmevāstametyapānamevāpyetiyo'pānamevāstameti vijñānamevāpyeti yo vijñānamevāstameti tadamṛtamabhayamaśokamananta-nirbījamevāpyetīti hovāca॥

The heart of all smells is Earth, of tastes water, of forms fire, of touchless air, of sounds ether. Avyakta is the heart of all movements, Mrityu of all Sattvas (living beings). Death indeed becomes one with the supreme Deity. Beyond it there is neither being nor non-being nor their combination - this is the doctrine of Nirvana of the Vedas.

इसी प्रकार जो श्रोत्र के प्रति प्रकट होता है, वह श्रोत्र में ही अस्त होता है। जो श्रोत्र, श्रोतव्य के प्रति प्रकट होता है, वह श्रोतव्य में ही अस्त होता है। जो श्रोतव्य, दिशाओं के प्रति प्रकट होता है, यह दिशाओं में ही अस्त होता है। जो दिशाएँ, सुदर्शना के प्रति प्रकट होती हैं, वे सुदर्शनी में ही अस्त होती हैं। जो सुदर्शना, अपान के प्रति प्रकट होती है, वह अपान में ही अस्त होती है। जो अपान विज्ञान के प्रति प्रकट होता है, यह विज्ञान में ही । अस्त होता है। यह विज्ञान अमृत, अभय, अशोक, अनन्त और निर्बीज ब्रह्म में विलीन हो जाता है ॥


Verse ३

नासामेवाप्येति यो नासामेवास्तमेति घ्रातव्यमेवाप्येति यो घ्रातव्यमेवास्तमेति पृथिवीमेवाप्येति यः पृथिवीमेवास्तमेति जितामेवाप्येति यो जितामेवास्तमेति व्यानमेवाप्येति । यो व्यानमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत............. होवाच॥

nāsāmevāpyeti yo nāsāmevāstameti ghrātavyamevāpyeti yo ghrātavyamevāstameti pṛthivīmevāpyeti yaḥ pṛthivīmevāstameti jitāmevāpyeti yo jitāmevāstameti vyānamevāpyeti । yo vyānamevāstameti vijñānamevāpyeti tadamṛta............. hovāca॥

इसी प्रकार जो पदार्थ नासिका के प्रति (गन्धरूप में) प्रकट होते हैं, वे नासिका में ही अस्त होते हैं। जो नासिका, घ्रातव्य (सूँघे जाने योग्य) पदार्थों के प्रति प्रकट होती है, वह घ्रातव्य में ही अस्त हो जाती है। जो घ्रातव्य, पृथिवी के प्रति प्रकट होता है, वह पृथिवी में ही विलीन हो जाता है। जो पृथिवी, जिता नामक नाड़ी के प्रति प्रकट होती है, वह जिता में ही अस्त होती है। जो जिता, व्यान के प्रति प्रकट होती है, वह व्यान में ही विलीन हो जाती है। जो व्यान, विज्ञान के प्रति प्रकट होता है, वह विज्ञान में ही विलुप्त हो जाता है। यह विज्ञान, अमृत, अभय, अशोक, अनन्त और निर्बीज ब्रह्म में लय हो जाता है॥


Verse ४

जिह्वामेवाप्येति यो जिह्वामेवास्तमेति रसयितव्यमेवाप्येति यो रसयितव्यमेवास्तमेति वरुणमेवाप्येति यो वरुणमेवास्तमेति सौम्यामेवाप्येति यः सौम्यामेवास्तमेत्युदानमेवाप्येति य उदानमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत............ होवाच॥

jihvāmevāpyeti yo jihvāmevāstameti rasayitavyamevāpyeti yo rasayitavyamevāstameti varuṇamevāpyeti yo varuṇamevāstameti saumyāmevāpyeti yaḥ saumyāmevāstametyudānamevāpyeti ya udānamevāstameti vijñānamevāpyeti tadamṛta............ hovāca॥

इसी प्रकार जो पदार्थ जिल्ला के प्रति प्रकट होते हैं, वे जिह्वा में ही विलीन हो जाते हैं। जो जिह्वा, रसयितव्य के प्रति प्रकट होती है, वह रसयितव्य में ही विलीन हो जाती है। जो रसवितव्य, वरुण को प्राप्त होता है, वह वरुण में ही विलीन हो जाता है। जो वरुण, सौम्या नामक नाड़ी को प्राप्त होता है. यह सौम्या में ही विलीन हो जाता है। जो सौम्या, उदान के प्रति प्रकट होती है, वह उदान में ही अस्त हो जाती है। जो उदान, विज्ञान के प्रति प्रकट होता है, वह विज्ञान में ही लय हो जाता है। वह विज्ञान अमृत, भयरहित, शोकरहित, अन्तरहित और बीजरहित ब्रह्म को प्राप्त होता है ॥


Verse ५

त्वचमेवाप्येति यस्त्वचमेवास्तमेति स्पर्शयितव्यमेवाप्येति यः स्पर्शयितव्यमेवास्तमेति वायुमेवाप्येति यो वायुमेवास्तमेति मोघामेवाप्येति यो मोघामेवास्तमेति समानमेवाप्येति यः समानमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत............ होवाच ॥

tvacamevāpyeti yastvacamevāstameti sparśayitavyamevāpyeti yaḥ sparśayitavyamevāstameti vāyumevāpyeti yo vāyumevāstameti moghāmevāpyeti yo moghāmevāstameti samānamevāpyeti yaḥ samānamevāstameti vijñānamevāpyeti tadamṛta............ hovāca ॥

जो पदार्थ त्वचा को प्राप्त होते हैं, वे त्वचा में ही विलीन हो जाते हैं। जो त्वचा, स्पर्शयितव्य के प्रति प्रकट होती है, वह स्पर्शयितथ्य में ही अस्त हो जाती है। जो स्पर्शयितव्य, वायु को प्राप्त होता है, वह वायु में ही विलीन हो जाता है। जो वायु मोघा के प्रति प्रकट होती है, वह मोघा नामक नाड़ी में ही विलीन हो जाती है। जो मोघा, समान के प्रति प्राप्त होती है, वह समान में ही अस्त हो जाती है। जो समान, विज्ञान को प्राप्त होती है,वह विज्ञान में ही अस्त हो जाती है। वह अमर, अभय,अशोक,अन्तरहित और बीजरहित ब्रह्म में विलीन हो जाता है ॥


Verse ६

वाचमेवाप्येति यो वाचमेवास्तमेति वक्तव्यमेवाप्येति यो वक्तव्यमेवास्तमेत्य-ग्निमेवाप्येति योऽग्निमेवास्तमेति कुमारामेवाप्येति यः कुमारामेवास्तमेति वैरम्भमेवाप्येति यो वैरम्भमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत.......... होवाच ॥

vācamevāpyeti yo vācamevāstameti vaktavyamevāpyeti yo vaktavyamevāstametya-gnimevāpyeti yo'gnimevāstameti kumārāmevāpyeti yaḥ kumārāmevāstameti vairambhamevāpyeti yo vairambhamevāstameti vijñānamevāpyeti tadamṛta.......... hovāca ॥

जो पदार्थ वाक् को प्राप्त होते हैं, वे वाक् में ही अस्त होते हैं। जो वाक्, वक्तव्य को प्राप्त होती है, वह वक्तव्य में ही अस्त होती है। जो वक्तव्य, अग्नि को प्राप्त होता है, वह अग्नि में ही विलीन हो जाता है। जो अग्नि, कुमारा नामक नाड़ी को प्राप्त होती है, वह कुमारा में ही विलीन हो जाती है। जो कुमारा, वैरम्भ को प्राप्त होती है, वह वैरम्भ में ही अस्त हो जाती है। जो वैरम्भ, विज्ञान को प्राप्त होता है, वह विज्ञान में ही अस्त होता है। वह विज्ञान अमर, भयरहित, शोकरहित, अन्तरहित और बीजरहित ब्रह्म में विलीन हो जाता है॥


Verse ७

हस्तमेवाप्येति यो हस्तमेवास्तमेत्यादातव्यमेवाप्येति च आदातव्यमेवास्तमे-तीन्द्रमेवाप्येति य इन्द्रमेवास्तमेत्यमृतामेवाप्येति योऽमृतामेवास्तमेति मुख्यमेवाप्येति यो मुख्यमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत................... होवाच ॥

hastamevāpyeti yo hastamevāstametyādātavyamevāpyeti ca ādātavyamevāstame-tīndramevāpyeti ya indramevāstametyamṛtāmevāpyeti yo'mṛtāmevāstameti mukhyamevāpyeti yo mukhyamevāstameti vijñānamevāpyeti tadamṛta................... hovāca ॥

(ऐसा कहने के पश्चात् उन पोराङ्गिरस ने पुनः कहना प्रारम्भ किया कि) जो हाथ को प्राप्त कर लेता है. वह हाथ में ही विलीन हो जाता है। यह हाथ, लेने योग्य पदार्थ के प्रति गमन करता है, अतः यह लेने वाले पदार्थ में ही लीन होता है, यह पदार्थ, इन्द्र के प्रति प्रस्थान करता है, इस कारण से यह इन्द्र में ही विलीन हो जाता है, यह इन्द्र, अमृता नाड़ी के प्रति जाता है, इस कारण यह अमृता में ही अस्त हो जाता है, यह अमृता, मुख्य के पास जाती है, अतः मुख्य में हो अस्त हो जाती है, यह मुख्य, विज्ञान के पास जाता है, इस कारण से विज्ञान में ही अपने को विलीन कर लेता है और यह विज्ञान, तुरीय के प्रति गमन करता है, इस कारण यह अमर, निर्भय, अशोक एवं अन्तरहित तथा बीजविहीन तुरीयावस्था को ही प्राप्त कर लेता है॥


Verse ८

पादमेवाप्येति यः पादमेवास्तमेति गन्तव्यमेवाप्येति यो गन्तव्यमेवास्तमेति विष्णुमेवाप्येति यो विष्णुमेवास्तमेति सत्यामेवाप्येति यः सत्यामेवास्तमेत्यन्तर्याममेवाप्येति योऽन्तर्याममेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तद...................होवाच ॥

pādamevāpyeti yaḥ pādamevāstameti gantavyamevāpyeti yo gantavyamevāstameti viṣṇumevāpyeti yo viṣṇumevāstameti satyāmevāpyeti yaḥ satyāmevāstametyantaryāmamevāpyeti yo'ntaryāmamevāstameti vijñānamevāpyeti tada...................hovāca ॥

(इसी प्रकार) जो पैर के प्रति गमन करता है, वह पैर में ही विलीन होता है, यह पैर, गन्तव्य स्थान की ओर प्रस्थान करता है, इस कारण से यह गन्तव्य स्थान में विलीन हो जाता है, यह गन्तव्य स्थान विष्णु के प्रति जाता है, इस कारण से यह विष्णु में ही विलीन हो जाता है, यह विष्णु, सत्या नाड़ी की ओर प्रस्थान करता है, इसलिए यह सत्या नाड़ी में ही अपने को विलीन कर लेता है, यह सत्या, अन्तर्याम की ओर गमन करती है, इसलिए यह अन्तर्याम में ही लय हो जाती है, यह अन्तर्याम, विज्ञान की ओर गमन करता है, इसलिए यह विज्ञान में ही विलय हो जाता है तथा यह विज्ञान, तुरीय के समक्ष जाता है, इस कारण से यह मृत्युरहित, भयरहित, शोकरहित, अन्तरहित एवं अबीज तुरीयावस्था को प्राप्त कर लेता है॥


Verse ९

पायुमेवाप्येति यः पायुमेवास्तमेति विसर्जयितव्यमेवाप्येति यो विसर्जयितव्य-मेवास्तमेति मृत्युमेवाप्येति यो मृत्युमेवास्तमेति मध्यमामेवाप्येति यो मध्यमामेवास्तमेति प्रभञ्जनमेवाप्येति यः प्रभञ्जनमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तद्........ होवाच ॥

pāyumevāpyeti yaḥ pāyumevāstameti visarjayitavyamevāpyeti yo visarjayitavya-mevāstameti mṛtyumevāpyeti yo mṛtyumevāstameti madhyamāmevāpyeti yo madhyamāmevāstameti prabhañjanamevāpyeti yaḥ prabhañjanamevāstameti vijñānamevāpyeti tad........ hovāca ॥

(ऐसा कहने के अनन्तर फिर उन्होंने कहा-) जो गुदा को प्राप्त करता है, वह गुदा में ही विलय को पाता है, यह गुदा, विसर्जन योग्य मल त्याग को प्राप्त करता है, अतः यह त्यागने योग्य में ही विलय को प्राप्त करता है, यह मलत्याग, मृत्यु को प्राप्त करता है, इस कारण यह मृत्यु में ही विलीन हो जाता है, यह मृत्यु, मध्यमा नाड़ी को प्राप्त करती है, इसलिए यह मध्यमा में ही विलीन होती है,यह मध्यमा, प्रभञ्जन नामक वायु को प्राप्त करती है, अतः यह प्रभञ्जन वायु में ही विलय को प्राप्त होती है,यह प्रभञ्जन वायु विज्ञान को प्राप्त होती है, इस कारण प्रभञ्जन वायु का अस्त विज्ञान में ही होता है। यह विज्ञान, तुरीय के पास जाता है, इसलिए वह मृत्युरहित, भयविहीन, अशोक, अनन्त एवं निर्बीज तुरीयावस्था को प्राप्त हो जाता है॥


Verse १०

उपस्थमेवाप्येति य उपस्थमेवास्तमेत्यानन्दयितव्यमेवाप्येति य आनन्दयितथ्यमे-वास्तमेति प्रजापतिमेवाप्येति यः प्रजापतिमेवास्तमेति नासीरामेवाप्येति यो नासीरामेवास्तमेति कुर्मिरमेवाप्येति यः कुर्मिरमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत ............. होवाच ॥

upasthamevāpyeti ya upasthamevāstametyānandayitavyamevāpyeti ya ānandayitathyame-vāstameti prajāpatimevāpyeti yaḥ prajāpatimevāstameti nāsīrāmevāpyeti yo nāsīrāmevāstameti kurmiramevāpyeti yaḥ kurmiramevāstameti vijñānamevāpyeti tadamṛta ............. hovāca ॥

(यह कहने के पश्चात् पुनः उन्होंने कहना प्रारंभ किया कि) जो उपस्थ को प्राप्त करता है, वह उपस्थ में ही लीन हो जाता है और यह उपस्थ, आनन्द स्वरूप विषयों को प्राप्त करता है, इस कारण यह आनन्द में विलय हो जाता है। यह आनन्द, प्रजापति के पास जाता है, इस कारण यह प्रजापति में विलीन हो जाता है। यह प्रजापति, नासीरा नाड़ी की ओर प्रस्थान करता है, अतः यह नासीरा में ही विलीन हो जाता है। यह नासीरा, कुर्मिर नाड़ी की ओर गमन करता है, इस कारण से यह कुर्मिर नाड़ी में ही लय होती है। यह कुर्मिर विज्ञान की ओर जाती है, इसलिए इसका विलय विज्ञान में ही हो जाता है। यह विज्ञान तुरीय को प्राप्त करता है, इस कारण यह मृत्युरहित, भयरहित, शोकविहीन, अनन्त एवं अबीज तुरीयावस्था को ही प्राप्त करता है॥


Verse ११

मन एवाप्येति यो मन एवास्तमेति मन्तव्यमेवाप्येति यो मन्तव्यमेवास्तमेति चन्द्रमेवाप्येति यश्चन्द्रमेवास्तमेति शिशुमेवाप्येति यः शिशुमेवास्तमेति श्येनमेवाष्येति यः श्येनमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत................होवाच॥

mana evāpyeti yo mana evāstameti mantavyamevāpyeti yo mantavyamevāstameti candramevāpyeti yaścandramevāstameti śiśumevāpyeti yaḥ śiśumevāstameti śyenamevāṣyeti yaḥ śyenamevāstameti vijñānamevāpyeti tadamṛta................hovāca॥

(इसके बाद उन्होंने पुनः कहा कि) जो मन को प्राप्त करता है, वह मन में ही विलीन हो जाता है। यह मन, विचारणीय विषय को प्राप्त करता है, इस कारण से यह विचारणीय विषयों में लीन हो जाता है, यह विचारणीय, चन्द्रमा की तरफ गमन कर जाता है, इसलिए यह चन्द्रमा में ही लय हो जाता है, यह चन्द्रमा, शिशु नाड़ी की ओर गमन करता है, इस कारण यह शिशु में ही विलीन हो जाता है, यह शिशु नाड़ी श्येन की ओर गमन करती है, इस कारण वह श्येन में ही लय होती है, यह स्येन, विज्ञान की तरफ गमन करता है. इस कारण से यह विज्ञान में ही विलीन हो जाता है तथा यह विज्ञान, तुरीय के प्रति गमन करता है, इस कारण से यह मृत्युरहित, भयरहित, अशोक, अनन्त एवं अबीज तुरीयावस्था को प्राप्त होता है॥


Verse १२

बुद्धिमेवाप्येति यो बुद्धिमेवास्तमेति बोद्धव्यमेवाप्येति यो बोद्धव्यमेवास्तमेति ब्रह्माणमेवाप्येति यो ब्रह्माणमेवास्तमेति सूर्यामेवाप्येति यः सूर्यामेवास्तमेति कृष्णमेवाप्येति यः कृष्णमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत.......................होवाच॥

buddhimevāpyeti yo buddhimevāstameti boddhavyamevāpyeti yo boddhavyamevāstameti brahmāṇamevāpyeti yo brahmāṇamevāstameti sūryāmevāpyeti yaḥ sūryāmevāstameti kṛṣṇamevāpyeti yaḥ kṛṣṇamevāstameti vijñānamevāpyeti tadamṛta.......................hovāca॥

(ऐसा कहने के उपरान्त उन्होंने फिर कहा कि) जो बुद्धि को प्राप्त करता है, वह बुद्धि में ही विलीन हो जाता है। यह बुद्धि, जानने योग्य विषयों की ओर प्रस्थान कर जाती है, इस कारण यह जानने योग्य विषयों में ही विलीन हो जाती है। यह जानने का विषय, ब्रह्मा की ओर गमन कर जाता है, इसलिए यह ब्रह्मा में ही अस्त हो जाता है, यह ब्रह्मा सूर्या नाड़ी को प्राप्त करता है, इसलिए इसका विलय सूर्या में ही हो जाता है, यह सूर्या कृष्ण को प्राप्त करती है, इसलिए यह कृष्ण में हो विलीन हो जाती है, यह कृष्ण, विज्ञान को प्राप्त करता है, इसलिए इसका विलय विज्ञान में ही हो जाता है और यह विज्ञान, तुरीय को प्राप्त हो जाता है, इस कारण यह मृत्युरहित, भयरहित, अशोक, अनन्त एवं अबीज तुरीयावस्था को ही प्राप्त करता है॥


Verse १३

अहंकारमेवाप्येति योऽहंकारमेवास्तमेत्यहंकर्तव्यमेवाप्येति योऽहंकर्तव्यमेवास्तमेति रुद्रमेवाप्येति यो रुद्रमेवास्तमेत्यरामेवाप्येति योऽसुरामेवास्तमेति श्वेतमेवाप्येति यः श्वेतमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत................ होवाच ॥

ahaṃkāramevāpyeti yo'haṃkāramevāstametyahaṃkartavyamevāpyeti yo'haṃkartavyamevāstameti rudramevāpyeti yo rudramevāstametyarāmevāpyeti yo'surāmevāstameti śvetamevāpyeti yaḥ śvetamevāstameti vijñānamevāpyeti tadamṛta................ hovāca ॥

(इस प्रकार कहने के पश्चात् उन महर्षि ने कहा कि) जो अहंकार को प्राप्त करता है, वह अहंकार में ही विलीन हो जाता है। यह अहंकार, कर्तव्य को प्राप्त करता है, इसलिए यह कर्त्तव्य में ही लय हो जाता है। यह कर्तव्य, रुद्र को प्राप्त करता है, इस कारण इसका लय रूद्र में ही होता है, यह रुद्र, असुरा नाड़ी को प्राप्त करता है, इसलिए इस रुद्र का विलय असुरा नाड़ी में ही हो जाता है। यह असुरा नाड़ी श्वेत को प्राप्त करती है, अतः इस असुरा का विलय श्वेत में ही होता है। यह श्वेत, विज्ञान को प्राप्त करता है, इसलिए इसका विलय विज्ञान में ही हो जाता है। यह विज्ञान, तुरीय को प्राप्त करता है, इस कारण यह मृत्युरहित, भयरहित, अशोक, अनन्त एवं अबीज तुरीय को ही प्राप्त होता है॥


Verse १४

चित्तमेवाप्येति यश्चित्तमेवास्तमेति चेतयितव्यमेवाप्येति यश्चेतयितव्यमेवास्तमेति क्षेत्रज्ञमेवाप्येति यः क्षेत्रज्ञमेवास्तमेति भास्वतीमेवाप्येति यो भास्वतीमेवास्तमेति नागमेवाप्येति यो नागमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति यो विज्ञानमेवास्तमेत्यानन्दमेवाप्ये ति यआनन्दमेवास्तमेति तुरीयमेवाप्येति यस्तुरीयमेवास्तमेति तदमृतमभयमशोकमनन्तं निर्बीजमेवाप्येति तदमृत.................. होवाच॥

cittamevāpyeti yaścittamevāstameti cetayitavyamevāpyeti yaścetayitavyamevāstameti kṣetrajñamevāpyeti yaḥ kṣetrajñamevāstameti bhāsvatīmevāpyeti yo bhāsvatīmevāstameti nāgamevāpyeti yo nāgamevāstameti vijñānamevāpyeti yo vijñānamevāstametyānandamevāpye ti yaānandamevāstameti turīyamevāpyeti yasturīyamevāstameti tadamṛtamabhayamaśokamanantaṃ nirbījamevāpyeti tadamṛta.................. hovāca॥

(इस प्रकार कहने के बाद पुन: उन्होंने कहना शुरू किया कि) जो चित्त को प्राप्त कर लेता है, वह चित्त में ही विलीन हो जाता है। यह चित, चिन्तन योग्य को पा लेता है. इस कारण यह चिन्तन करने योग्य में ही लय हो जाता है। यह चिन्तन करने योग्य, क्षेत्रज्ञ को प्राप्त कर लेता है, इस कारण इसका विलय क्षेत्रज्ञ में ही होता है। यह क्षेत्रज्ञ, भास्वती नाड़ी में गमन कर जाता है, इस कारण यह भास्वती नाड़ी में ही विलीन हो जाता है। यह भास्वती, नाग वायु के पास जाती है, इस कारण यह नाग वायु में ही अस्त हो जाती है। यह नाग वायु, विज्ञान की ओर जाती है, इस कारण यह विज्ञान में विलय हो जाती है। यह विज्ञान, आनन्द को प्राप्त कर लेता है, इस कारण यह आनन्द में ही विलीन हो जाता है और वह आनन्द मृत्युरहित, भयरहित, अशोक, अनन्त एवं निर्बीज तुरीय में जाता है, इस कारण से यह तुरीयावस्था को प्राप्त कर लेता है॥


Verse १५

य एवं निर्बीजं वेद निर्बीज एव स भवति न जायते न म्रियते न मुह्यते न भिद्यते न दह्यते न छिद्यते न कम्पते न कुप्यते सर्वदहनोऽयमात्मेत्याचक्षते ॥

ya evaṃ nirbījaṃ veda nirbīja eva sa bhavati na jāyate na mriyate na muhyate na bhidyate na dahyate na chidyate na kampate na kupyate sarvadahano'yamātmetyācakṣate ॥

(उन घोराङ्गिरस जी ने पुनः कहा कि) जो भी मनुष्य इस तरह से निर्बीज रूपी तत्त्व को जान लेता है, । वह निर्बीज हो जाता है। वह अजन्मा हो जाता है, मृत्यु एवं मोह को भी नहीं प्राप्त करता। उसका भेदन नहीं होता, जलता भी नहीं, छेदा भी नहीं जाता, कम्पायमान भी नहीं होता तथा कुपित भी नहीं होता है। इस प्रकार सभी कुछ दग्ध करने वाली यह आत्मा ही है, ऐसा शास्त्रवेत्ताओं का मत है॥


Verse १६

नैवमात्मा प्रवचनशतेनापि लभ्यते न बहुश्नुतेन न बुद्धिज्ञानाश्रितेन न मेधया न वेदैर्न यज्ञैर्न तपोभिरुग्रैर्न सांख्यैर्न योगैर्नाश्रमैर्नान्यैरात्मानमुपलभन्ते प्रवचनेन प्रशंसया व्युत्थानेन तमेतं ब्राह्मणाः शुश्नुवांसोऽनूचाना उपलभन्ते शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्यति सर्वस्यात्मा भवति य एवं वेद ॥

naivamātmā pravacanaśatenāpi labhyate na bahuśnutena na buddhijñānāśritena na medhayā na vedairna yajñairna tapobhirugrairna sāṃkhyairna yogairnāśramairnānyairātmānamupalabhante pravacanena praśaṃsayā vyutthānena tametaṃ brāhmaṇāḥ śuśnuvāṃso'nūcānā upalabhante śānto dānta uparatastitikṣuḥ samāhito bhūtvātmanyevātmānaṃ paśyati sarvasyātmā bhavati ya evaṃ veda ॥

यह आत्मा सैकड़ों तरह के प्रवचन करने मात्र से नहीं प्राप्त होता, अनेकों शास्त्रों का अध्ययन करने से भी नहीं मिलता, बुद्धि तथा ज्ञान का सान्निध्य प्राप्त कर लेने से भी यह आत्मा प्राप्त नहीं होता। वैसे ही मेधा, वेदों, यज्ञों, उग्र-तपश्चर्या, सांख्यज्ञान, योग, आश्रम अथवा अन्य दूसरे प्रयत्नों से भी वह आत्मा प्राप्त नहीं होता। ब्रह्म में निष्ठा रखने वाला जो मनुष्य प्रवचन के द्वारा, प्रशंसा (गुरु सेवा) के द्वारा तथा व्युत्थान (सामान्य जीवन क्रम से ऊपर उठकर) के द्वारा आत्मज्ञानपरक शास्त्रों का श्रवण करता हुआ शम, दम, उपरति एवं तितिक्षा में स्थित होकर समाधिनिष्ठ हुआ आत्मा को आत्मा में ही देखता है, वही आत्म तत्व को प्राप्त कर पाता है। जो भी मनुष्य इस तरह से आत्मतत्त्व को जानता है, वह सभी का आत्मा हो जाता है ॥