10. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — नाभिलक्षण
नाभिलक्षण
परिमडलोन्नताभिर्विस्तीर्णाभिश्च नाभिभि: सुखिनः। स्वल्पात्वदृश्यनिम्रा नाभिः क्केशवहा भवति॥ २५ ॥ जिनकी नाभि विस्तीर्य होकर चारों तरफ़ ऊंची हो तो वे परागी सुखी होते हैं। जिनकी नाभि छोटी तथा अद्टश्य होकर गहरी हो तो वह उन माखियों के लिये ब्े दायक होती है॥। २५ ।। बलिमध्यगता विषमा शूला बाघं करोति नैःस्वंच। शाठ्यं वामावर्ता करोति मेधां प्रदक्षिपतः॥२६॥ जिनकी नाभि बलियों के बीच प्राप्त होकर तरिपम हो तो वह उन पाणियों को शूल रोग व दरिद्रता को करती है व जिनकी नाभि वामावर्त हो तो वह उन माणियों के लिये शठता को करती है और जिनकी नाभि दहिनावर्त हो तो वह उन माणियों को वुद्धि करती है यानी वे पाणी मेधावी होते हैं ॥। २६ ॥ पार्श्वायता चिरायुषमुपरिष्टाचेश्वरं भवाव्यमघः। शतपत्रकर्षिकाभा नाभिर्मनुजेश्वरं कुरुते ॥२७॥ जिसकी नाभि दोनों ओर चौड़ी हो तो वह पाणी दीर्घजीवी होता है व जिसकी नाभि ऊपरले भाग में चौड़ी हो तो वह उस माणी को धनी करती है व जिसकी नाभि नीचे तरफ़ चौड़ी हो तो वह उस प्राणी को गोगणशाली करती है और जिसकी नाभि कमलकर्णिका की समान हो तो वह उस माणी को राजा बनाती है॥२७।।