11. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — वलिलक्षण
वलिलक्षण
शस्त्रान्तं स्त्रीभोगिनमाचार्य बहुसुतं यथासंख्यम्। एकद्वित्रिचतुर्भिर्वलिभिर्विद्यान्नृपं त्वबेलिम् ॥ २८ ॥ जिसके नाभि देश में एकही बलि हो तो वह पाणी शस्त्राघात से मौत को पाता है व जिसके नाभिदेश में दो वलियां हों तो वे उस पाणी को स्त्रीभोगी करती हैं व जिसके नाभिदेश में तीन बलियां हों तो वे उस मराणी को आचार्य बनाती हैं व जिसके नाभिदेश में चार बलियां हों तो वे उस प्राणी को अनेक सन्तानोवाल करती हैं व जिसके नाभिदेश में एकमात्र बलि नहीं देख पड़े तो उस प्राणी को नर पाल जानना चाहिये॥ २८॥ १ एको बलि: शतायुः स्याच्छ्रीभोगी द्विबलि: स्मृतः । त्रिबलिः क्ष्माप आचार्य ऋजुभि बलिभि: सुखी । अगम्यगामी जिह्मबलिर्भूपा: पार्श्वश्च मांसलैः।। सामुद्रिकशास्त्रस्य विषमबलयो मनुष्या भवन्त्यगम्यामिर्गाभिनःपापाः। ऋजुवलयः सुतभाजः परदारद्वेपिएश्चैव॥ २६॥ जिनकी बलियां विषम होंवे तो वे मनुष्य अगभ्यागामी होकर पापी होते हैं व जिन की बलियां सीधी होतें तो वे पाखी सुतभागी होकर परदाराओं से विरोध रखतेहैं ॥।२६।