12. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — पुनःपार्श्वलक्षण
पुनःपार्श्वलक्षण
मांसलमृदुभिः पाश्वैंः प्रदक्षिणावर्तरोमभिर्भूपाः। विपरीतैनिर्दव्या: सुखपरिहीनाः परपेष्याः॥३०॥ जिनके पार्श्वदेश मांसल व कोमल तथा प्रदक्षिणावर्त होकर रोमों से घिरे हों तो वे भाणी राजा होते हैं व जिनके पार्श्वदेश विपरीत हों तो वे प्राणी दरिद्री तथा सुख से विहीन होकर पराये दास होते हैं॥ ३० ॥