Books / Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press)

9. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — पार्श्वकुक्षोदरलक्षण

पार्श्वकुक्षोदरलक्षण

अविकलपार्श्वा धनिनो निम्नैर्वक्ैश्र भोगसंत्यक्ाः। समकुक्षा भोगाढ्या निम्नाभिर्भोगपरिहीनाः ॥२३॥ उन्नतकुक्षा: क्षितिपाः कुटिला: स्युर्मानवा विषमकुक्षाः। सर्पोदरा दरिद्रा भवन्ति बहाशिनश्रैव ॥ २४॥ जिनकी पसुरियां अविकल हों तो वे प्राणणी घनी होते हैं व जिनकी पसुरियां गहरी होकर टेदी हों तो वे पाणी भोगों से विहीन होते हैं व जिनकी कोखियां समान हों तो ho oto iho The वे माखगी भोगों से संयुत होते हैं व जिनकी कोखियां गहरी हों तो वे पाणी भोगहीन होते हैं व जिनकी कोखियां ऊंची हों तो वे पाणी राजा होते हैं व जिनकी कोखियां विपम हो तो वे प्राणी कुटिल (टेढे ) होते हैं व जिनके पेट साप के उदर के समान हों तो वे पारणी दरिद्री होकर बड़े खानेवाले होते हैं ॥ २३ । २४। १ अशीघ्रमैथुन्यल्पायुः स्थूलस्फिग्घनोज्यितः। मांसलस्फिक्सुखी स्याचच सिंहस्फिक भूपतिः स्मृतः ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य