14. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — हृदयलक्षण
हृदयलक्षण
हैदयं समुन्नतं पृथुलमांसलं च नृपतीनाम्। धमानां विपरीतं खररोमचितं शिरालञ्च ॥ ३२ ॥ जिनका वक्षःस्थल ऊंचा व चौड़ा होकर मांसल हो तो वे प्राणी राजा होते हैं व जिनका वक्षःस्थल विपरीत व कर्कशरोमों से पूर् होकर शिराओं से व्याप्त हो तो वे माखी नराधम होते हैं ॥। ३२ ।। समवक्षसोर्थवन्तः पीनैः शूरास्त्वकिञ्चनास्तनुभिः। विषमं वक्षो येषां ते निःस्वाः शस्त्रनिधनाश्च॥३३॥ जिनका वक्षःस्थल समान हो तो वे पाणी धनवान् होते हैं व जिनका वक्षःस्थल १ समोन्नतं च हृदयमकम्पं मांसलं पृथु। नुपाणामधमानां च खररोमशिरालकम्॥ २ अर्थवान्समवक्षाः स्यात्पीनैर्वक्षोभिरूर्जितः । वक्षोभिर्निपमैर्निःस्व्राः शसत्रेण निधना- स्तथेति॥· पूर्वार्धः । मोटा हो तो वे माशी वीर होते हैं व जिनका वक्षःस्थल पतला हो तो वे पाणी दरिद्री पाते हैं ॥ ३३॥ होते हैं व जिनका वक्ष:स्थल विपम हो तो वे पाणी निर्धनी होकर शस्त्राघात से मौत को