15. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — जत्रुलक्षण
जत्रुलक्षण
विषमैविषमो जत्रुभिरर्थविहीनोस्थिसन्धिपरिणद्वैः। जिसकी हँसुली असमान हो तो वह पाणी दुश्रित्र होता है व जिसकी हँसुली अस्थि सन्धियों से बँधी हुई हो तो वह प्राखी धनहीन होता है व जिसकी हँसुली ऊंची हो तो वह माखी भोगी होता है व जिसकी हँमुली निचली हो तो वह माणी दरिद्री होता है और जिसकी हँसुली मोटी हो तो वह माणी धनवान् होता है।। ३४ ।।