18. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — स्कन्धलक्षण
स्कन्धलक्षण
निर्मासौ रोमचितौ भग्नावल्पौ च निर्धनस्यांसौ। विपुलावप्युन्नतौ सुश्लिष्टौ सौख्यवीर्यव ताम् ॥ ३॥ जिसके दोनों कन्धे मांसरहित, रोमों से व्याप्त व भग्न होकर क्षुद्र हों तो वह प्राणी निर्धन होता है व जिनके कन्धे चौड़े व ऊंचे होकर भली भाँति लिपडे हों तो वे भाणी पराक्रम समेत सौख्यशाली होते हैं ॥ ३८ ॥