Books / Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press)

19. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — वाहुलक्षण

वाहुलक्षण

करिकरसदशौ वृत्तावाजान्ववलम्बिनौ समौ पीनौ। बाहू पृथिवीशानामधमानां रोमशौ हस्वौ ॥ ३६ ॥ जिनकी दोनों वाहैं गोलाकार, हाथीसूंड़के समान, परस्पर बराबर और मोटे होकर चुदुनुपर्यन्त लम्बे हों तो वे पराणी भूपाल होते हैं यानी पृथ्वीके पालक होते हैं और जिनकी दोनों वाहैं रोमों से व्याप्त होकर छोटी हों तो वे पाणी नराधम होते हैं यानी निर्धन दहाते हैं॥। ३६ ॥ हस्ताङ्गुलयो दीर्घाश्चिरायुषामवलिताश्र सुभगानाम्। मेघाविनां च सूक्ष्माश्रिपिटाः परकर्मनिरतानाम्॥४० ॥ जिनके हाथकी अँगुलियाँ दीर्घ हों तो वे प्राखी दीर्घजीवी होते हैं व जिनकी अँगुलियाँ बलियों से रहित हों तो वे पाणी बड़े भागवाले होते हैं व जिनकी अँगुलियाँ पतली हों तो वे पाणी वुद्धिमान् होते हैं और जिनकी अँगुलियाँ चपटी हों तो वे पाखी पराये कर्भ में परायण हेते हैं यानी दासकर्म के करनेहारे होते हैं ॥ ४०॥ स्थूलाभिर्धनरहिता वहिर्नताभिश्च शस्त्रनिर्याणाः। कपिसदृशकरा धनिनो व्याघ्रोपमपाणयश्च पापाः॥४१॥ जिनके हाथ की अँगुलियां मोटी हों तो वे पाणी निर्धनी होतेहैं व जिनकी अँगुलियों का अग्रभाग लचासा हो तो वे प्राणी शस्त्राघात से मौत को पाते हैं व जिनके हाथ वानर पूर्वार्धः । के हाथ के समान हों तो वे प्राणणी धनवान होते हैं और जिनके हाथ बाघ के हाथ के समान हों तो वे भाखी पापी होते हैं ॥ ४१॥ हीनैर्हस्तच्छेद: श्लथैस्सशव्दैश् निर्द्रव्याः।।४२।। जिनके मशिबन्ध (कब्ज़े) छिपे हुए मजबूत होकर सन्धियों से लिपटे हों तो वे पाणी पृथ्वीपति होते हैं व जिनके क़ब्ज़े हीन होकर सन्धियों से ढीले हों तो उन प्रा- शियों का हाथ काटा जाता है और जिनके क़ब्ज़े शब्द समेत हों तो वे प्राणी धनरहित होते हैं॥ ४२॥ करतललक्षएमाह- पितृवित्तेन विहीना भवन्ति निम्नेन करतलेने नराः। संवृतनिम्नैर्धनिनः प्रोत्तानकराश्च दातारः॥।४३।। जिनके करतल गहरे हों तो वे माशणी पैतृकथन से रहित होते हैं व जिनके करतल गोलाकार होकर गहरे हों तो वे पराणी धनवान होते हैं और जिनके करतल उन्नत हों तो वे पाणी दाता होते हैं ॥। ४३॥ विषमैश्र पापा निःस्वाश्च करतलैरीश्वरास्तुलाक्षामै:। पीतैरगम्य वनितामिर्गामिनो निर्द्धना रूक्षैः॥४४॥ जिनके करतल विपम (असमान) हों तो वे माणी पापी होकर निर्धनी होते हैं व जिनके करतल लाक्षावर्ण के समान लालवर्ण हों तो वे प्राणी समर्थ होकर धनवान् होते हैं व जिनके करतल हल्दी के समान पीले हों तो वे मागी अगम्या रमणी में रमण करते हैं और जिनके करतल रुखे हों तो वे धनरहित होते हैं ।। ४४॥ नखवर्णनमाह- तुपसदृशनखाः क्ीवाश्चिपिटैः स्फुटितैश्च वित्तसन्त्यक्राः। कुनखविवण: परतर्कुकाश्च ताग्रैश्च भूपतयः ॥ ४५ ॥ जिनके नखव तुपसदृश यानी भूसी के समान हों तो वे प्राणी हिजड़े होते हैं व जिनबे नख चिपिटे होकर फूटे से हों तो वे पाणी धनरहित होते हैं व जिनके नख बुरे वर्णवाले १ पितृवित्तविनाश्च निस्नात्करतलान्नराः । संवृतैश्चैव निम्नैश्च धनिनः परिकीर्तिता: प्रोत्तानकरदातारो विपमैर्विषमा नरा इति।। करे:करतलैश्चैव लाक्षाभैरीश्वरस्तनैः। परदार रताः पीतरूस्ैर्निःस्व्रा नगा मताः॥ सामुद्विकशास्त्रस्य होकर कुत्सित हों तो वे माणी कुदृष्टि से निहारते हैं और जिनके नख ताम्रवर्ण होकर लाल हों तो वे प्राखी पृथ्वीपाल होते हैं ।। ४५॥ दीर्घाङ्गुलिपर्वाण: सुभगा दीर्घायुषशैचव ॥४६ ॥ जिनके अँगूठे में जब का चिह्न हो तो वे भाणी धनी होते हैं व जिनके अँगूठे की जड़ में जब का निशान हो तो वे प्राणी पुत्रवान् होते हैं व जिनकी अँगुलियों की पतं दीर्घ हों तो वे माखी बड़े भागवाले होकर दीर्घजीवी होते हैं । ४६॥ स्निग्धा निम्ना रेखा धनिनां तद्यत्ययेन निःस्वानाम्। विरलाङ्गुलयो निःस्वा धनसंचयिनो घनाङ्गुलयः॥ ४७॥ जिनकी करतल की रेखायें चिकनी होकर गहरी हों तो वे प्राणी धनधान होते हैं व जिनकी रेखायें चिकनी होकर गहरी न हों तो वे प्राणी निर्धनी होते हैं व जिनकी अँगु- लियां बिरली हों तो वे भाणी धनहीन होते हैं और जिनकी अँगुलियां घनी हों तो वे भाणणी धनका संचय करते हैं।। ४७॥ तिस्रो रेखा मणिबन्धनोत्थिताः करतलोपगा नृपतेः। जिसके मरिणवन्धन (कब्ज़े) से उठी हुई तीन रेखायें करतल के समीप पहुँचगई हों तो वह भाणणी राजा होता है व जिसका हाथ दो मीनरेखाओं से अंकित हो तो वह भाखी सदैव अन्नका दान करता है।। ४८ ॥। वञ्राकारा धनिनां विद्याभाजान्तु मीनपुच्छनिभाः। शंखातपत्रशिविकागजाश्वपझ्मोपमा नृपतेः ॥४६॥ जिनके करतल में बज्र का निशान हो तो वे पाणी धनवान् होते हैं व जिनके करवल में मछली की पूँछ का निशान हो तो वे प्राणी विद्यावान् होते हैं और जिसके करतल में शंख, छाता, पालकी, हाथी, घोड़ा और पद्मका निशान प्रतीत हो तो वह प्राणी राजा होता है।। ४६ ।। १ ताम्रमूंपा धनाठ्याश्च- अङ्गष्ठैस्सयवैस्तथा। अङ्रुष्ठमूलजैःपुत्री स्याद्दीर्घाङ्कुलिपर्वकः॥ २ हस्ताङ्कुलय एवस्युर्वायुद्वारनिभा: शुभाः । मेधाविनांच सूक्ष्मास्युर्भूत्यानां चिपिटा: स्मृताः ॥ स्थूलांगुलीभिर्निःस्वा:स्युर्नरा: स्युः सुकशैस्तथेति।। पूर्वार्धः। कलशमृणालपताकांकुशोपमाभिर्भवन्ति निधिपालाः। दामनिभाभिश्राद्याः स्वस्तिकरूपाभिरैश्वर्य्यम् ॥५०॥ जिनके करतल में कलश, मृणाल=कमलकी नाल, पताका और अंकुश का निशान हो तो वे माणी धनाधिपति होते हैं व जिनके करतल में रस्सी या माला का शान हो तो वे प्राणी धनी होते हैं और जिनके हाथ में स्व्स्तिक का निशान हो तोवे पाणी ऐश्वर्य को पाते हैं ॥ ५० ॥ चक्रासिपरशुतोमरशक्किधनुःकुन्तनिभा रेखाः। कुर्वन्ति चमूनाथं यज्वानमुलखलाकाराः।।५१।। जिनके करतल में चक्र, तलवार, कुठार, शक्ति, धनुप और भाला के समान रेखां हों तो वे उन प्राणियों को सेनापति बनाती हैं व जिनके करतल में उखली के निशान हों तो उन पराणियों को यज्त्रा करते हैं यानी वे पाणी विधि से यज्ञ के करनेव्राले होते हैं ।। ५१ ॥ मकरध्वजगोष्ठगारसन्निभाभिर्महाधनोपेताः। वेदीनिभेन चैवाग्निहोत्रिणो ब्रह्मतीर्थेन॥ ५२॥ जिनके करतल में मकर, ध्वजा, गोष्ठ और मन्दिर के आकार रेखा हों तो वे भार बड़े धन से संपन्न होते हैं व जिनके ब्रह्मतीर्थ यानी अँगठा के मूलमें बेदी का निशान हो तो वे प्राणी अग्निहोत्री होते हैं ॥ ५२॥ वापीदेवगृहाद्यैर्धर्म कर्वन्ति च त्रिकोणाभिः। अङ्गष्टमूलरेखा:पुत्राः स्युर्दारिका: सूक्ष्माः॥५३॥ जिनके करतल में वावली, देवमन्दिर तथा त्रिकोण का चिह्न देखपड़े तो वे माय धर्म को करते हैं और जिनके अँगठे की मूल में बड़ी बड़ी जितनी रेखायें लक्षित हों उत ही पुत्र पैदा होते हैं व जिनके अँगुठे की मूल में छोटी छोटी जितनी रखायें पतीत उतनीही कन्यायें पैदा होती हैं ।। ५३॥ ऊर्ध्धरेखालक्षणमाह ।। रेखा: प्रदेशिनीगा: शतायुषां कल्पनीयमूनाभिः। चिन्नाभिर्धमपतनं बहुरेखारेखिणो निःस्वाः॥५४॥ जिनके करतल में ऊर्ध्वरखा तर्जनीपर्यन्त पहुँच गई हों तो वे पागी सौबरस की भ्र को पाते हैं और यदि तर्जनी तक ऊर्ध्वरेखा नहीं गई हो तो वे प्राणी कम उमर को प सामुद्रिकशास्त्रस्य हैं और यदि ऊर्ध्वरेखा छिन्न होगई हो तो वे माणी वृक्ष से गिरते हैं और जिनके करतल में बहुतसी रेखा हों अथवा रेखामात्र लक्षित हों तो वे प्ाणी धनरहित होते हैं॥ ५४ ॥