2. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — पादलक्षण
पादलक्षण
अस्वेदनौ मृदुतलौ कमलोदराभौ श्लिष्टंगुली रुचिरताग्रनखौ सुपार्ष्णी। उष्णौ शिराविरहितौ मुनिगूढ गुल्फौ कूर्मोन्नतौ च चरणौ मनुजेश्वरस्य ॥ ६ ॥ १ अरपरस्वेदिती सृदुतलौ कमलोदरसननिमौ । श्लिष्टाझुली ताम्रनखौ पादावुष्णी शिरो डिभितौ । कूर्मोन्नतौ गूढगुल्फौ सुपार्ष्णीं नृपतेः स्मृतौ।। पूर्वार्धः। जिसके चरण पसीनारहित, कोमल तलवेवाले होकर कमलोदर के समान हों व जिनमें परस्पर अँगुलियां लपटी हों व मनोहर लालवर्णवाले नख हों व अच्छी एँड़ियां हों व गरम होकर नसों से रहित हों व बड़े छिपे हुए गएठोंवाले होकर कछुये के समान ऊंचे हों तो वह प्राणी मनुष्यों का स्वामी होता है यानी राजपद को पाता है॥ ६॥ शूर्पाकारविरूक्षपाएडुरनखौ वक्रौ शिरासन्ततौ संशुष्कौ विरलाङ्गुली च चरणौ दारिद्र्यदुःखमदौ। मार्गीयोत्कटकौ कषायसदशौ वंशस्य विच्छित्तिदौ ब्रह्मननौ परिपक्कमृद्द्युतितलौ पीतावगम्यारतौ॥७॥। जिसके दोनों पैर सूप के समान होकर विशेपता से रूखे हों व जिनमें पीले नख हों व टेढ़े होकर नसों से व्याप्त हों व भली भांति सूखे होकर विरल अँगुलियोंवाले हों तो वह भाणी दरिद्र व दुःख को भोगता है यानी उक्कचरण दरिद्ता व दुःख को देते हैं· व जिसके पैर बड़े हों तो वह अत्यन्त दूर पथमें गमन करता है व जिसके दोनों पैर कपाय वर्ण वाले हों तो उस भाणी के वंश को विनाशते हैं व जिसके पैर पकी हुई मिट्टी की कान्ति समान तलवोंवालेहों तो ब्राह्मणों को नाशते हैं यानी वह प्राणी ब्राह्मणों का मारनेवाला होता है व जिसके पैरतल पीले हों तो वह प्राणी अगम्या 액과은액획 रमखी में आसक़ होता है।। ७।।