3. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — जङ्गलक्षण
जङ्गलक्षण
प्रविरलतनुरोमवृत्तजङ्गाद्विरदकर प्रतिमैर्वरोरुमिश्व। उपचितसमजानवश्च भूपा धनरहिताःश्वभृगालतुल्यजङ्गः ॥८॥ जिनकी जङ्गायें विरल व थोड़े रोमों से आवृटत होकर गोलाकार होवें व जिनकी ऊरु (पतली जांघैं ) हाथी की सूंड के समान होवें व दोनों जानु (घुट्ुनू) बड़े होकर परस्पर समान होवें तो वे पराणी राजा होते हैं व जिनकी जङ्गायें कुत्ते व सियार के समान होवें तो वे पारणी धनरहित यानी दरिद्री होते हैं ॥ ८ ॥ १ सूपांकारी विरूक्षौ च वक्री पादौ शिरालकी। संशुष्कौ पाएडुरनखरौ निःस्वस्यवि- रलाङ्गली। मार्गीयांत्कटकौ पादौ कपायसदशौ तथा। विच्छिन्नौ चैव वंशस्य ब्रह्मप्नौ पङ्कस- भनिभाविति॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य