Books / Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press)

27. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — शिरोलक्षण

शिरोलक्षण

परिमएडलैर्गवाढ्याश्छत्राकारैः शिरोभिखनीशाः। चिपिटैः पितृमातृन्नाः करोटिशिरसां चिरान्मृत्युः ॥८३॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य जिनके मस्तक मएडलाकार (गोल) हों तो वे प्राणी गोधन से संपन्न होते हैं व जिन शीश छत्राकार (छाता के समान) हों तो वे पाणी पृथ्वीपाल होते हैं व जिनके शी चपटे हों तो वे माणी यौवनकाल में माता पिता के मारने वाले होते हैं और जिनके शी दीर्घ हों तो वे पराणी दीर्घजीवी होते हैं ॥। =३ ॥ निम्नन्तु शिरो महतां बहुनिम्नमनर्थदं भवति॥न४॥ जिसका शीश घड़ा के समान हो तो वह भाणी ध्यान में परायण रहता है व जिस दो शीश हों तो वह पराणी पापकारी होकर निर्धनी होता है व जिनका शीश लचा हो वे पाणी महन्त होते हैं और जिनका शीश बहुत ही गहरा हो तो उन पाणियों को नर्थदायक होता है।। ८४ ॥। एकैकभवैः स्निग्धैः कृष्णैराकुञ्चिनैरभिन्नागैः। मृदुभिर्न चातिबहुभिः केशैः सुखभाकू नरेन्द्रो वा ॥ न ५॥ जिनके मस्तक के एक एक रोमकूप में एक एक वाल हों यदि वे वाल चिकने काले व टेढ़े हों व जिनका अग्रभाग भिन्न न हो व कोमल होकर बहुतसे न हों तो वह पार्ख सुखभागी या राजा होता है॥। ८५ ।। बहुमूलविषमकपिला: स्थूलस्फुटिताग्रपरूपहस्वाश्च। अतिकुटिलाश्चातिघनाश्च सूर्धजा वित्तहीनानाम्॥ ८६॥ जिनके मस्तक के एक एक रोमकूप में बहुतसे वाल हों यदि वे समान न होक पीले हों व अग्रभाग में मोटे होकर टूटे हों व कर्कश, छोटे व बहुतसे टेढ़े होकर त घने हों तो वे प्राणणी निर्धनी होते हैं ॥ ८६ ॥