28. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — गात्ररूक्षतालक्षण
गात्ररूक्षतालक्षण
यद्यद्वात्रं रूक्षं मांसविहीनं शिरापनद्धं च। तत्तदनिष्ट प्रोक्कं विपरीतमतः शुभं सर्वम् ॥८७॥ देह में जो जो गात्र रूखा व मांसहीन होकर नसों से व्याप् हो वह वह अनिष्ट क गया है इससे विपरीत स्निग्ध, मांसविशिष्ट व अव्यक्क शिराविशिष्ट हो तो वह स शुभदायक होता है॥ ८७ ।।