30. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — वक्षआदिहस्वादिलक्षण
वक्षआदिहस्वादिलक्षण
वक्षोऽथ कक्षानखनासिकास्यं कृकाटिका चेति पडुन्नतानि। इस्वानि चत्वारि च लिङ्गपृष्ठं ग्रीवाच जड्के च हितप्रदानि ॥६० ॥ जिनके वक्षःस्थल, कक्षा (बगल) नख, नासिका, मुख और घांटी ये छः ऊंचे हों और लिङ्ग, पीठ, घींच और जंघा ये चार छोटे हों तो उन पाणियों के लिये हितदायक होते हैं ॥। ६० । नेत्रान्तपादादीनां रक्कादिलक्षएमाह- नेत्रान्तपादकरताल्वधरौष्ठजिह्वा रक्कानखाश्च खलु सप्त सुखावहानि। सूक्ष्माणि पञ्चदशनाङ्गुलिपर्वकेशाः साकं त्वचा कररुहाश्र न दुःखितानाम्॥। ६१ ॥ जिनके नेत्रकोण, पादतल, करतल, तालु, निचला ओष्ठ, जिह्वा और नख ये सात लालवर्ण हों तो उन प्राणियों के लिये सुखदायक होते हैं और जिनके दांत, अँगुलियों २ के पर्व, केश ,वाल) खाले और नख ये पांच छोटे हों तो वे माणी दुःखी होते हैं॥ ६१॥