34. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — जलच्छायालक्षण
जलच्छायालक्षण
स्निग्धासिताच्छहरितानयनाभिरामा सौभाग्यमार्दवसुखाभ्युदयान्करोति। सर्वार्थसिद्धिजननी जननी च चाप्या छायाफलं तनुभृतां शुभमादधाति॥ ६५ ॥। यदि किसी पाखी के शरीर की शोभा चिकनी, सफ़ेद, साफ़ व सब्ज़ होकर नयनों रमानेवाली हो तो उसे जलकी छाया जानना चाहिये वह माणियों के लिये सौभा कोमलता, सुख व ऐश्वर्य को करती है और माता के समान होकर समग्र अथों पूर्वार्धः। सिद्धिको उपजाती हुई शुभदायक फलको धारती है यानी शुक्र, शोखित, मज्जा, मल और मूत्र ये पांच जल के गुण हैं यदि माणी मिष्टरसभोजी हो तो चन्द्रशुक्र कृत जल की छाया मानना चाहिये।। ६५ ॥।