Books / Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press)

35. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — अरग्निच्छायालक्षण

अरग्निच्छायालक्षण

चराडा धृष्या पद्महेमाग्निवर्णा युक्का तेजो विक्रमैः सप्रतापैः। आ्ग्नेयीति प्रािनां स्याजयाय क्षिप्रं सिद्धिं वाञ्छितार्थस्य घत्ते॥६६॥ यदि शरीर की शोभा पचएड, भयजनक, कमल, सुवर्स व आगी के समान वर्णवाली होकर पताप समेत वेज व विक्रमों से संयुक्क हो तो उसे अग्नि की छाया जानना चाहिये वह पाखियों की जयके लिये होती है और शीघ्रही वाञ्छित अर्थ की सिद्धि को धारती है यानी निद्रा, क्षुधा, प्यास, क्रान्ति और आलस्य ये अग्नि के गुण हैं यदि अतीव रूपवान् होकर पुरुप सुकान्त हो तो सूर्य भौमकृत आग्नेयी छाया जानना चाहिये॥। ६६॥ मलिनपरुषकृष्णा पापगन्धानिलोत्था जनयति वधबन्धव्याध्यनर्थार्थनाशान्। स्फटिकसदशरूपा भाग्ययुक्कात्युदारा निधिरिव गगनोत्था श्रेयसां स्वच्छवर्णा॥ ६७। यदि शरीर की शोभा मैली, कठोर व काली होकर दुर्गन्धित हो तो उसे वायु की छाया जानना चाहिये जोकि पुरुषों के लिये वध, बन्ध, व्याधि, अनर्थ व अर्थनाश को उपजाती है यानी धावन, चालन, क्षेपण, संकोचन व प्रसारण ये ५ वायु के गुण हैं यदि पावों का स्पर्शन कोमल हो तो शनैश्चरकृत वायवी छाया जानना चाहिये और यदि शरीर की शोभा स्फटिकसदृश होकर निर्मल हो तो आकाश की छाया जानना चाहिये जोकि भाग्यसूचक, औदार्यशाली होकर निधि के नाई पुरुषों के लिये शुभदायक होती है यानी काम, क्रोध, लोभ, मोह व लज्जा ये पांच आकाश के गुणे हैं यादि पुरुष के वचन कानों को सुखकारी हों तो गुरुकृत नाभसी छाया मानना चाहिये।। ६७ ।। १ ईश्वर उवाच। अस्थि मांसं नखं चैव त्वग्लोमानि पञ्चमम् । पृथ्वपिश्चगुणा: प्रोक्का ब्रह्मज्ञानेन भापते १ शुक्कं शोणितमज्े च मलमूत्रं च पञ्चमम् । अपां पञ्चगुणाः प्रोक्का ब्रह्मज्ञानेन भापते २ निद्रा क्षुधा तृषा क्ान्तिरालस्यं चैव पञ्चमम् । तेजः पञ्चगुणाः प्रोक्का ब्रह्मज्ञानेन भापते ३ धावनं चालनं क्षेपः संकोचं प्रसरन्तथा । वायोः पञ्चगुणाः प्रोक्का ब्रह्मज्ञानेन भापते ४ कामः क्रोधस्तथा मोहो लजा लोभश्च पञ्चमम् । नभः पच्चगुणाः प्रोक्का ब्रह्मज्ञानेन भाषते ५ ।( इति ज्ानसंकलिनीतन्त्रे) ।I सामुद्रिकशास्त्रस्य