42. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — संघातलक्षण
संघातलक्षण
उपचितदेहो विद्वान् धनी सुरूपश्च मांससारो यः। संघात इति च मुश्लिष्टसन्धिता सुखभुजो ज्ञेयाः।। ४ ॥ जिसकी देह भलीभाँति पुष् हो तो उसमें मांस का सार जानना चाहिये और वह पाणी विद्वान् व धनवान् होकर बड़ा रूपवान् होता है व जिनकी देहसमुदाय में समग्र सन्धियां मजबूत हों तो उन पाियों को सुखभोगी जानना चाहिये॥ ४ ॥