Books / Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press)

56. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — नितम्वनाभिलक्षण

नितम्वनाभिलक्षण

विस्तीर्णमांसोपचितो नितम्बो गुरुश्च धत्ते रसनाकलापम्। नाभिर्गभीरा विपुलाङ्गनानां प्रदक्षिणावर्तगता प्रशस्ता ॥ ५ ॥ यदि स्तियों का नितम्ब (कटिपश्राद्भाग) विस्तीर् व मांसल होकर गुरुतर हो वह करधनियों के समूह को धारता है और यदि नारियों की नाभि गंभीर व विपुल हो पदक्षिणावर्त को पाप्त हो तो वह प्रशस्त होती है ॥। ५ ॥ मध्यं स्त्रियास्त्रिवलिनाथविरोमशं च वृत्तौ घनावविषमौ कठिनावुरस्यो पूर्वार्धः। रोमापवर्जितमुरो मृदु चाङनानां ग्रीवा च कम्बुनिचितार्थमुखानि घत्ते॥६॥ यदि स्त्रियों का मध्यभाग त्रिवलीयुक् होकर रोमों से रहित हो व दोनों स्तन बने व प्रविषम होकर कठिन हों व वक्षःस्थल कोमल होकर रोमों से विहीन हो और ग्रीचा (घींच) शङ्ध के समान हो तो दह नारी धनवती होकर सुखों को धारती है ॥ ६॥ स्त्रीणामधरलक्षखमाह- बन्धुजीव कुसुमोपमोधरो मांसलो रुचिर विम्बरूपभृत्। कुन्दकुड्मलनिभा: समादिजा योषितां पतिसुखामितार्थदाः॥७॥ जिन स्त्रियों का अधर दुपहरियाफूल के समान होकर मांसल हो अथवा पके कुंदरू फल के समान हो और दाँत कुन्दकली के समान होकर वराबर हों तो वे ख्ति्रियाँ पति को सुखी करती हुई वे प्रमाण धन को देती हैं ।। ७ ॥