63. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — परमायुर्लक्षण
परमायुर्लक्षण
कनिष्ठिकामूलभवा गता या प्रदेशिनी मध्यमिकान्तरालय्। करोति रेखा परमायुषः सा प्रमाणसूना तु तदूनमायुः॥१४॥ जिन स्त्रियों के करतल में कनिष्ठा अँगुली की मूल से उपजीहुई जो रेखा तर्जनी व मध्यमा के बीच में विद्यमान हो तो वह उन त्रियों को परमायु करती है और जो प्रमाण से कम हो तो कम आयु को देती है ।। १४ ।। अंगुष्ठ मूलरेखाज्ञानमाह- अंगुष्ठसूले प्रसवस्य रेखा पुत्रा बृहत्यः प्रमदास्तु तन्व्यः। अच्छिन्नदीर्घा बृहदायुपां ता अल्पायुषां छिन्नलघुप्माणाः॥ १५॥ स्ियों के अँगूठे की मूल में सन्तान की रखायें होती हैं उनमें जो बड़ी रखा हो तो पुत्रकी रेखा जानना चाहिये और जो छोटी रेखा हों तो कन्याओं की रेखा जानना चाहिये और जो रेखा छिन्न भिन्न न होकर दीर्घ हो तो बड़े उमरवालों की होती हैं और जो द्िन्नभिन होकर छोटी रेखा प्रतीत हों तो कम उमरवालों की कहाती हैं ॥१५॥ इतीदमुकं शुभमङ्गनानामतो विपर्यस्तमनिष्ठमु क्ष्। विशेपतोनिष्ट्फलानि यानि समासतस्तान्यनुकीर्तयामि॥१६॥ इसग्रकार जो स्तिरियों के शुभदायक लक्षण कहे हैं उनसे जो उलटे हैं वे अनिष्ट- दायक कहे गये हैं इसलिये विशेषता से जो अनिष्टफलदायक हैं उनको मैं संक्षेप से कहता हूं ॥ १६ ।।