66. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — नेत्रगएड कूपलक्षण
नेत्रगएड कूपलक्षण
नेत्रे यस्या: केकरे पिङ्गले वा सा दुः्शीला श्यावलोलेक्षणा च। कूपो यस्या गएडयोश्च स्मितेषु निःसंदिग्धं वञ्चकीं तां वदन्ति॥ २०। जिसके दोनों नेत्र ढेर्रे होकर पिंगलवर्ण (पीले) हों तो वह स्त्री दुश्चरित्रा होती है अथवा जिसके नेत्र पिङ़लवर्ण हों और चञ्चल चितवनि हो तो भी वह स्त्री दुश्चरित्र होती है और जिसके हँसने के समय गालों में गड़हे पड़जाते हों तो उस स्त्री क्र मुनियों ने निःसंदेह वश्चकी (असती) कहा है ॥। ३० ॥। ललाटलक्षएमाह- प्रविलम्बिनि देवरं ललाटे श्वशुरं हन्त्युदरे स्फिजोः पर्ति च। अप्रतिरोमचयान्वितोत्तरोष्ठी न शुभा भर्तुरतीव या च दीर्घा ॥ २१॥ जिसका ललाट बहुत लम्बा हो तो वह स्त्री देवर को विनाशती है व जिसका पे लभ्बा हो तो वह स्त्री समुर को नाशती है व जिसके कूले लम्बे हों तो वह स्त्री पति के मारती है व जिसके ऊपरले ओठ में बहुत से रोम होतें यानी मूछैं सी निकल आई हों ते वह स्त्री भर्ता (स्वामी) को शुभदायक नहीं होती है वरन अशुभों को बढ़ाती है औ र जो स्त्री पतति की अपेक्षा लम्नी हो तो वह स्त्रामी को अतीत्र दुःखदायक होती है॥ २१ पूर्वार्धः ।