Books / Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press)

68. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — शषठकेशलक्षण

शषठकेशलक्षण

यातूत्तरोष्ठेन समुन्नतेन रूक्षाग्रकेशी कलहप्रिया सा। प्रायो विरूपामु भवन्ति दोषा यत्राकृतिस्तत्र गुणा भवन्ति ॥ २४।। जिन स्त्रियों का ऊपरला ओठ ऊंचा हो और केशोंका अग्रभाग रूखा हो तो वे ख्तिरियां लड़ाई करने में प्रेम रखती हैं और प्रायः विरूप स्त्रियों में दोप होते हैं व जिनमें अच्छा रूप होता है उनमें गुण बसते हैं ॥ २४॥ दशाफलविचारे वर्षज्ञानमाह- पादौ सगुल्फौ प्रथमं प्रदिष्टौ जङ्गे द्वितीयं च सजानुचक्रे। मेद्रोरुमुष्कं च ततस्तृतीयं नाभिः कटिश्चेति चतुर्थमाहुः॥२५॥ उदरं कथयन्ति पञ्चमं हृदयं षष्ठमतःस्तनान्वितम्। अथ सप्तमं सजन्रुणी कथयन्त्यष्टममोष्ठकन्धरे ॥२६॥ १ संक्षेपतस्ते कथितं मयतद्विलक्षरं चारुनितम्बिनीनाम् । प्रायो विरूपासु भवन्ति दोषा यत्रा कृतिस्तत्र गुणा वसन्ति। सामुद्रिकशास्त्रस्य नवमं नयने च सख्जणी सललाटं दशमं शिरस्तथा। पशुभेष्वशुभं दशाफलं चरणादेषु शुभेषु शोभनम् ॥२७॥ ... अरहो मिये ! नरनारी गणों की देह दशभाग में विभक्क है प्रतिभाग में बारह बारह की एक एक दशा होती है इस भांति दश दशाओं की १२० वर्ष होती हैं अव उन का क्रम कहते हैं कि, पाद व गुल्फ (गंठे) यह प्रथमभाग पहलीदशा होती है इस संख्या बारह वर्ष की है, जानुओं समेत जंधा दूसराभाग दूसरी दशा कहाती है इसा संख्या १३ से लेकर २४ तक रहती है । भग, ऊरू व वृपरग यह तीसरा भाग तीस दशा कहाती है इसकी संख्या २५ से लेकर ३६ तक रहती है। नाभि व कमर ये चौथा भाग चौथी दशा कहाती है इसकी संख्या ३७ से लेकर ४८ तक रहती है। उद् यह पाँचवांभाग पाँचवीं दशा कहाती है इसका पमाणण ४६ से लेकर ६० तक रहता हैं हृदय स्तनों समेत होकर छठाभाग छठीदशा कहाती है इसका प्माण ६१ से लेकर ७' तक रहता है हसुली समेत वाँहैं सतवांभाग सातवीं दशा कहाती है इसका प्रमाण ७३ लेकर ८४ तक रहता है। ओठ और ग्रीचा यह आठवां भाग आठवीं दशा कहाती है इस का प्रमाण ८५ से लेकर ६६ तक रहता है। भौहैं समेत आँखैं यह नववां भाग नबां दशा कहाती है इसका पमाण ६७ से लेकर १०८ तक रहता है और भाल समेत शीर यह दशवांभाग दशवीं दशा कहाती है इसका पमाण १०६ से लेकर १२० तक रहत है और यदि चरगआदि अ्र अशुमलक्षणों से प्रतीत हों तो दशाफल अशुभदाय होता है और यदि चरखादि अ्र शुभलक्षणों से प्रतीत हों तो दशाफल शुभदाय होता है॥। २५। २७ ।। इति बृहत्सामुद्रिके स्त्रीलक्षणम् ।। अथ पुनरपि स्कन्दपुराखान्तर्गतकाशीखएडात्स्रीसामुद्विकमादाय स्रीलक्षणन्युच्यन्त इत्याह स्कन्द उवाच- सदा गृही सुखं भुङ्धे स्त्रीलक्षणवती यदि। अतः सुखसमृद्धचर्थमादौ लक्षणमीयते ॥ १॥ स्कन्दंजी अगस्त्यजी से कहते हैं कि यदि स्त्री लक्षणोंवाली हो तो गृहस्थ पुरुप सदै सुखको भोगता है इसलिये सुख व समृद्धि के लिये पहले लक्षणों को देखना चाहिये॥ १ तन्न प्रथम लक्षणाधिकरणं निर्दिशति- वपुरावर्तगन्धाश्च छाया सत्त्वं स्वरोगतिः। वर्णश्चेत्यष्ट्धा प्रोक्का वुधैर्लक्षणभूमिका ॥ २ ॥ पूर्वार्धः। हस्वादि अवयवों से रहित अंग, हाथ व नाभि आदिकों में लोमों का दक्षिणावर्त, बन्ध, कान्ति, शील, स्वर, गमन और गौर आदिवर्स यह आठ प्रकार लक्षणों की भूमिका वषिडतों ने कही है ॥ २ ।। आपादतलमारम्य यावन्मौलिरुहं क्रमाल्। शुभाशुभानि वक्ष्यामि लक्षणानि मुने शृख ॥ ३॥ पावों से लेकर वालोपर्यन्त क्रम से शुभ व अशुभ लक्षणों को कहूंगा अहो मुनिजी ! सुनिये ।। ३ ॥ आदौ पादतलं रेखास्ततोङ्गश्वाङ्गलीनखाः। पृष्ठं गुल्फदयं पार्ष्णी ज्डे रोमाणि जानुनी ॥।४ ॥ ऊरू कटी नितम्बस्फिग्भगो जघनबस्तिके। नाभि: कक्षिदयं पार्श्वोदरमध्यवलित्रयम्। ५ ॥ रोमाली हृदयं वक्षो वक्षोजद्यचूचुकम्। जन्नुस्कन्धांस कक्षादोर्मणिबन्धकरद्यम् ॥ ६ ॥ पाषिपृष्ठं पाणितलं रेखाङ्गश्ठाङ्गलीनखाः। पृष्टिः कृकाटिका कराठे चिबुकं च हनुद्यम् ॥७॥ कपौलौ वक्कमधरोत्तरोष्ठौ द्विजजिहनिकाः । घरिटकातालुहसितं नासिकाक्षुतमक्षिणी॥ ८॥। पद्मभ्जकर्णभालानि मौलिसीमन्तमौलिजाः। षष्टिः षडुत्तरा योषिदङ्गलक्षणसत्खनिः॥६॥ पहले दोनों पादतल, व उन्हों की रखा, अंगूठा, अँगुलियाँ, नख, पीठ, दोनों गंठे, एँड़ियां, जंघायें, 'रोम, बुडुनू, निर्रोह, कमर, चूतड़, कूले, योनि, पेंहू, मूत्रस्थान, नाभि,दोनों कोखि, पसुरियां, पेट के बीच की तीनों वलियां, रोमपंक्ि, हृदय, वक्षःस्थल, स्तन, कुचाग्र, हँसुली, कन्धा, भुजशीश, कांखैं, वाहैं, कब्जा, दोनों हाथ, हाथ की पीठ, दोनों करतल व उन्हों की रेखा, अँगूठा, अँगुलियाँ, नख, पीठ, घांटी, कएठ, दादी, कनपटी, कपोल, मुख, निचला होठ, ऊपरला होठ, दाँत, जीभ, घसिटका, तालु, हसना, नासिका, १ दोनों करतल व दोनों पादतल इसभांति मानने से रमशियों के अद्ग में सही सही ६६ लक्षण होते हैं।। सामुद्रिकशास्त्रस्य छींक, आँखं, भौहैं, कान, ललाट, शीश, जूड़ा और केश ये छांछठ नारियों के भ लक्षणों की समीचीन भूमियाँ हैं ।। ४ । ६ ॥