70. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — पादतलेचक्रादिलक्षण
पादतलेचक्रादिलक्षण
चक्रस्वस्तिकशंखाव्जध्वजमीनातपत्रवत्। यस्याः पादतले रेखा सा भवेत्क्षितिपाङ्गना ॥। १२ ।। जिसके पादतल में चक्र व त्रिकोरकार रेखा प्रतीत हो तथा शंख, कमल, ध्बजा, मछली और छाता के निशान हों तो वह रानी होती है॥ १२।। ऊध्वरेखादिज्ञानमाह- रेखाखसर्पकाकाभा दुःखदारिद्र्यसूचिका ॥ १३ ॥ जिसके पादतल में ऊर्ध्वगामिनी रेखा यानी भाग्यरखेा चलकर मध्यमा अरगुली तब पहुँच गई हो तो स्त्रियों को अखएड भोग देती है व जिसके पादतल में मूपक (मूसा सांप और कौवा के आकारवाली रेखा प्रतीत हो तो उस स्त्री को दुःख व दारिद्रय के मदान करती है ।। १३ ।। पादाङ्रुष्टादिलक्षएमाह- उन्नतो मांसलोङ्गष्ठो वर्तुलोतुलभोगदः। पूर्वार्धः। वक्रो इस्वश्च चिपिटः मुखसौभाग्यभञ्जकः ॥१४॥ जिसके पैर का अँगूठा ऊंचा व मांसल होकर गोल हो तो उस स्त्री को अतुल भोग- हायक होता है और जिसका अँगठा ढेढ़ा व छोटा होकर चपठा हो तो सुख व सौभाग्य को बिनाशता है॥ १४ ॥ विधवा विपुलेन स्याद्दीर्घाङ्गष्ठेन दुर्भगा। सृदवोङ्गलयः शस्ता घनावृत्ताः समुन्नताः॥१५॥ जिसके पैर का अँगूठा बड़ा विशाल (चौढ़ा) प्रतीत हो तो वह स्त्री विधवा (रांड) होती है व जिसके पैर का अँगूठा लम्बा प्रतीत हो तो वह स्त्री दुर्भगा (अभागिनी) होती है और जिसके पैरकी अँगुलियां कोमल, घनी, गोल होकर बड़ी ऊंची प्रतीत हों तो वे शुभदायक कहाती हैं॥ १५ ॥ दीर्घाङ्गुलीभि: कुलटा कृशाभिरतिनिर्धना। इस्वायुष्या च इस्दाभिर्युग्नाभिर्सुग्नवर्तिनी॥ १६॥ जिसके पैर की अरँगुलियां दीर्घ (लम्बी) प्रतीत हों तो वह स्त्री कुलटा (छिनारि) होती है व जिसके पैर की अँगुलियां पतली प्रतीत हों तो वह स्त्री धनरहित होती है व जिसके पैर की अँगुलियां छोटीसी मतीत हों तो वह स्त्री कम उमरवाली होती है और जिसके पैर की अँगुलियां टेढीसी प्रतीत हों तो वह स्त्री कुटिल व्यवहारवाली होती है॥१६॥ चिपिटाभिर्भवेद्दासी विरलाभिर्दरिद्रिणी। परस्परं समारूढा: पादाङ्कुल्यो भवन्ति हि॥१७॥ हत्वा बहूनपि पतीन् परश्रेष्या तदा भवेत्। यस्याः पथि समायान्त्या रजो भूमे: समुच्छलेत् ॥१८॥ सा पांसुला प्रजायेत कुलत्रयविनाशिनी। जिसके पैर की अँगुलियां चपठी हों तो वह स्त्री दासी होती है व जिसके पैरकी अँगुलियां बिरल हों तो वह स्त्री दरिद्रिणी होती है व जिसके पैर की अँगुलियां परस्पर मिली हुई हों तो वह स्त्री बहुत से पतियों को मारकर पराधीन होती है और मार्ग में जिस स्त्री के चलते हुए भूमि से धूलि उबलती हो तो वह व्यभिचारिखी होकर तीनों कुलों को विनाशती है ॥१७ । १८। ३।। सामुद्रिकशास्त्रस्य