Books / Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press)

75. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — जङ्गारोमलक्षण

जङ्गारोमलक्षण

रोमहीने समे स्निग्धे यजङ्वे क्रैमवर्तुले। सा राजपत्नी भवति विशिरे सुमनोहरे॥ २८ ॥ एकरोमा राजपत्री िरोमा च सुखावहा। त्रिरोमा रोमकूपेषु भवेदैधव्यदुःखभाकू॥ २६॥ जिसकी जंवायें रोमों से हीन, सनान, चिकनी व क्रम से गोलाकार व नसोंसे विहीन होकर मनोहर हों तो वह स्त्री राजपत्री होती है व जिसके रोमकूपों में एकही रोम प्रतीत हो तो वह स्त्री राजपत्री (रानी) होती है व जिसके रोमकूपों में दो २ रोम प्रतीत हों तो वह स्त्री सुखको पाती है और जिसके रोमकूपों में तीन २ रोम प्रतीत हों तो वह स्त्री विधवा होकर दुःखभागिनी होती है॥ २८। २६ ।। पू १ जङ्के च रोमरहिते सुवृत्ते विशिरे शुभे। रोमजङ्वे च नारीणं महादुःखप्रदायिके॥ १॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य