Books / Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press)

83. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — पार्श्वलक्षण

पार्श्वलक्षण

समैः समांशैर्मृदुभिर्योषिन्मग्नास्थिभिः शुभैः । पार्श्वैः सौभाग्यसुखयोर्निधानं स्यादसंशयम् ॥४८॥ यस्या दृश्यशिरे पार्श्वे उन्नते रोमसंयुते। निरपत्या च दुश्शीला सा भवेहुःखशेवधिः॥४६॥ जिनकी पसुरियां समान, मांस समेत व कोमल व शुभदायक होकर छिपी इड्डियों वाली प्रतीत हों तो वे स्त्रियां निःसन्देह सुख व सौभाग्य की आश्रयरूपिणी होती हैं १ नाभि: प्रशस्ता गंभीरा दक्षिणावर्तिका शुभा। मत्स्योदरा बहुधना नाभिभि: सु- खनः स्मृताः ॥ विस्तीणाभिर्वहुलाभिर्निम्नाभि: क्केशभोगिनः । बलिमध्यगता नाभि: शूल- बाधां करोति हि॥ वामावर्ता च साध्यं वै मेधां च दक्षिएस्तथा। पार्श्वायता चिरायुः स्यान- रिष्ठाद्धनेश्वरः॥ अधोगवाढ्यं कुर्याच्च नृपत्वं पडाकर्णिका। सामुद्रिकशास्त्रस्य यानी खज़ानारूपही होती हैं और जिसके दोनों पार्श्व देखे नसोंवाले व ऊंचे हो रोमों से संयुत हों तो वह स्त्री सन्तानरहित व वुरे स्वभाववाली होकर दुःख का खज़ ही होती है।। ४८ । ४६ ।।