84. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — उदरलक्षण
उदरलक्षण
उदरेणातितुच्छेन विशिरेण मृदुत्वचा। योषिद्रवति भोगाव्या नित्यं मिष्टान्नसेविनी॥ ५० ॥ कुम्भाकारं दरिद्राया जठरं च मृदङवत्। कूष्माएडाभं यवाभं च दुष्पूरं जायते ख्न्रियाः॥५१॥ जिसका पेट बहुत सूक्ष्म व नसों से रहित होकर कोमल त्त्रचावाला प्रतीत हो वह स्त्री भोगों से संयुत होकर हमेशा मीठे अ्न्न को सेवन करती है और जिसका घड़े के आकारवाला प्रतीत हो तो वह स्त्री दरिद्विणी होती है और जिसका पेट बृंदंग समान होकर कुम्हड़े वा यवों के आकार प्रतीत हो तो उस स्त्री का पेट बड़े दुःख भरता है॥५०। ५१।।