85. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — विशालजठरादिलक्षण
विशालजठरादिलक्षण
सुविशालोदरी नारी निरपत्या च दुर्भगा। प्रलम्बजठरा हन्ति श्वशुरं चापि देवरम् ॥। ५२॥ मध्यक्षामा च सुभगा भोगाव्या सबलित्रया। ऋज्वी तन्वी च रोमाली यस्याः सा शर्मनर्मभूः॥५३॥ जिसका पेट बहुत चौड़ासा प्रतीत हो तो वह स्त्री सन्तानरहित होकर बुरे भागवा होती है और जिसका पेट बड़ा लम्बा प्रतीत हो तो वह स्त्री ससुर व देवर को मारती है जिसका मध्यमाग पतलासा मतीत हो यानी जो स्त्री कशोदरी हो तो वह बड़े भागवा होती है व जिसका पेट तीन बलियों से संयुत हो तो वह स्त्री भोगवाली होती है श्र जिसके रोमों की पांति सीधी होकर पतलीसी प्रतीत हो तो वह स्त्री सुख व क्रीड़ा भूमि होती है।। ५२। ५३॥