Books / Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press)

86. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — रोमराज्यादिलक्षण

रोमराज्यादिलक्षण

कपिला कुटिला स्थूला विच्छिन्ना रोमराजिका। चौरवैधव्यदौर्भाग्यं विदध्यादिह योषिताम् ॥५४॥ पूर्वार्धः। निर्लोमहृदयं यस्याः समं निम्नत्ववर्जितम्। ऐश्वर्यं चाप्यवैधव्यं गरियश्रेम च सा लभेत्॥ ५५॥ जिसके रोमों की पांति कपिलवर्णवाली, टेदी व मोटी होकर छिन्न भिनसी पतीत हो तो उन स्त्रियों को इसलोक में चोरी, विधवापन और बुरे भाग्यको विधान करती है यानी TP बे स्त्रियां चोरी करती हुई विधवा होकर वुरे भागको भोगती हैं और जिसका हृदय रोम- रहित व समान होकर गहराई से वर्जित हो तो वह स्त्री ऐश्वर्य को भोगती हुई विधवा न होकर प्यारे के प्रेमको पाती है।। ५४।५५ ॥