87. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — हृदयलक्षण
हृदयलक्षण
विस्तीर्णहृदया योषा पुंश्चली निर्दया तथा। उद्विन्नरोमहृदया पति हन्ति विनिश्चितम्॥५६॥। अष्टादशाङ्कलततमैरः पीवरमुन्नतम्। सुखाय दुःखाय भवेद्रोमशं विषमं पृथु॥५७।। जिसका हृदय विस्तारवाला हो तो वह सी पुंथली (बिनारि) होकर दयारहित होती है और जिसके हृदय में रोम निकले हों तो वह त्री निश्यकर पतिको मारती है- और जिसका वक्षःस्थल अट्ठारह अंगुल चौड़ा व मोटा होकर ऊंचा मतीत हो तो वह सुखदायक होता है और जिसका वक्षःस्थल रोमों से संयुत तथा विपम होकर चौड़ा प- तीत हो तो दुःखदायक होता है॥ ५६। ५७॥