94. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — अधरलक्षण
अधरलक्षण
पाटलो वर्तुलः स्निग्धो लेखाभूषितमध्यभूः। सीमन्तिनीनामधरो धराजानिप्रियो भवेत्॥ ६५ ॥ कृश: प्रलम्ब: स्फुटितो रूक्षो दौर्भाग्यसूचकः । श्यावः स्थूलोधरोष्ठः स्याद्ैधव्यकलहप्रदः॥६६॥ जिनका अ्परधर (निचला ओठ) रक्वर्ण व गोल होकर चिकना पतीत हो व जि बीचमें रेखा भपित हो तो वे ख्िियां राजाओं की रानी होती हैं और जिनका अधर पत पूर्वार्धः। तम्बा व फूटा होकर रूखासा प्रतीत हो तो उन ख्रियों को दौर्भाग्यसूचन करता है यानी से अधरवाली त्तियां अभागिनी या बुरे भागवाली होती हैं और जिनका अधर कपिल र्र होकर मोटासा प्रतीत हो तो उन स्त्रियोंके लिये वैधव्य व लड़ाईको देताहै।६५/६६॥ २0