95. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — उत्तरोष्ठलक्षण
उत्तरोष्ठलक्षण
मसृणो मत्तकाशिन्याश्रोत्तरोष्ठः सुभोगदः । किश्चिन्मध्योन्नतो रोमा विपरीतो विरुद्धकृत्॥६७।। जिस उत्तम गुणवाली स्त्री का ऊपरला ओठ चिकना पतीत हो तो महाभोगदायक होता है और वीच में कुछेक ऊंचा होकर रोमरहित हो तो भी घने भोगों को देता है और तो पूर्वोक लक्षणों से विपरीत लक्षणोंवाला प्रतीत हो तो विरुद्धकारी होता है।। ६७।।