10. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — वलिलक्षण
वलिलक्षण
शस्त्ान्तं स्त्रीभोगिनमाचार्यं बहुमुतं यथासंख्यम्। एकद्वित्रिचतुर्भिर्बलिभिर्विद्यान्नृपं त्ववीलिम्॥ २६ ॥ जिसके उदर में एकही बलि हो वह शस्त्राघात से मौत पाता है। जिसके उदर में दो बलि हों वे उसे स्त्रीमोगी करती हैं। जिसके उदर में तीन बलियाँ हों, वे आचार्य बनाती हैं। जिसके उदर में चार बलियाँ हों वे उसे अनेक सन्तानोंवाला करती हैं। जिसके उदर में एकमात्र वलि देख ही न पड़े तो उसे नरपाल जानना चाहिये।। २६॥ विषमबलयो मनुष्या भवन्त्यगम्यागामिनःपापाः। ऋजुबलयः सुतभाजः परदारद्वेषिणश्चैव ॥ ३० ॥ जिनकी बलियाँ विषम हों वे मनुष्य अगम्यागामी होकर पापी होते हैं। जिन- की बलियाँ सीधी हों वे सुतभागी होकर परदाराओं से विरोध रखते हैं॥३॥ १. पको बलि: शनायुःस्याच्छ्रीभोगी द्वियलि: स्मृतः। त्रियलिः इमाप आचार्य ऋजुभिवंलिमिः सुखी । अगम्यगामी जिह्मावलिर्भूपः पाश्वैश्च मांसलैः ॥ ह