Books / Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla)

11. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — पुनः पार्श्वलक्षण

पुनः पार्श्वलक्षण

मांसलमृदुभि: पार्श्वैः प्रदत्िणावर्तरोमभिर्भूपाः । विपरीतैनिर्दव्या: सुखपरिहीना: परप्ेष्याः॥ ३१॥ जिनके बाजू मांसल व कोमल तथा प्रदक्षिणणावर्त होकर रोमों से घिरे हों वे राजा होते हैं। जिनके वाजू विपरीत हो वे दरिद्री तथा सुख- विहीन होकर दास हाते हैं॥ ३१ ॥ चूचकलक्षर सुभगा भवन्त्यनुदबद्ध चूचका निर्धना विषमदीघैः । पीनोपचितनिमग्नैः चितिपतयश्चूचकैः सुखिनः ॥३२। जिनके स्तनशिर ऊँचे न हों तो वे लोग सौमाग्यशाली होते हैं। जिनके स्तनशर विपम होकर बड़े हों वे निर्धन होते हैं। जिनके स्तन- शिर मोटे व ऊँचे हों वे राजा होकर सुखी रहते हैं॥ ३२ ॥