Books / Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla)

12. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — हृदयलक्षण

हृदयलक्षण

हृदयं समुन्नतं पृथुलमांसलं च नृपतीनाम्। अधमानां विपरीतं खररोमचितं शिरालं च ॥। ३३ ॥ जिनका वक्षस्थल ऊँचा व चौड़ा होकर मांसल हो वे राजा होते हैं। जिनका वक्षस्थल विपरीत व कड़े वालों से युक्त हो वे पराखी नराधम होते हैं॥३३॥ समवैच्षसोऽर्थवन्तः पीनैः शूरास्त्वकिञ्चनास्तनुभिः। विषमं वक्षो येषां ते निःस्वाः शस्तनिधनाथ्च॥३४॥ जिनका वत्तस्थल समान हो वे धनी होते हैं। जिनका वक्षस्थल मोटा हो वे मागी वीर होते हैं। जिनका वक्षस्थल पतला हो वे दरिद्री होते हैं। जिनका वक्षस्थल विपम हो वे निर्धनी होकर शस्त्रायात से मृत्यु पाते हैं ॥ ३४॥ १. समोन्नतंच हृदयमकम्पं मांसलं पृथु, नृषाणामधमानांच खररोमशिरालकम्।। २. अर्थवान्समवत्षाः स्यात्पीनैर्वत्ाभिरूर्जित: । वक्षोभिर्विषमैनिःस्वः शस्त्रेण निर्धनस्तथेति॥