Books / Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla)

13. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — जत्रुलक्षण

जत्रुलक्षण

विषमैविषमो जत्रुभिरर्थविहीनोस्थिसन्धिपरिणद्धैः। उन्नतजत्रुभोंगी निम्नैरनिःस्वोर्ऽर्थवान्पीनैः॥ ३५ ॥ जिसकी हँसली असमान हो वह दुश्रित्र होता है। जिसकी हँसली अस्थिसन्धियों से बँधी हुई हो वह धनहीन होता है। जिसकी हँसली ऊँची हो वह भोगी होना है। जिनको हँसली निचली हो वह दरिद्री होता है। जिसकी हँसली मोटी हो वह धनवान् होता है॥ ३५॥