9. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — कटि, उदरलक्षण
कटि, उदरलक्षण
सिंहकटिर्म नुजेन्द्र: कपिकरभकटिर्घनैः परिंत्यक्ः। समजठरा भोगयुता घटपिठरनिभोदरा निःस्वाः॥। २३।। जिसकी कमर सिंह की नाईं हो वह राजा होता है। जिसकी कमर वानर व ऊँट के वच्चे के समान हो वह दरिद्री होता है। जिनके पेट समान हों वे भोगी होते हैं। जिनका पेट घड़ा या बटलोही की तरह हो वे दरिद्री होते हैं ।। २३ ॥ पार्श्व, कुत, उदरलक्षग अविकलपार्श्वा धनिनो निम्नैर्वैक्ैश्र भोगसंत्यक्ाः। समकुच्षा भोगाढ्या निम्नाभिर्भोगपरिहीनाः॥२४॥ उन्नतकुक्षाः चितिपा: कुटिला: स्युर्मानवा विपमकुक्षाः। सर्पोदरा दरिद्रा भवन्ति वह्ाशिनश्वैव ॥ २५ ॥ जिनकी पसलियाँ अविकल हों वे धनी होते हैं। जिनकी पसलियाँ गहरी व टेही हों वे भोग-विहीन होते हैं। जिनकी कोखें समान हों वे भोगयुक होते हैं। जिनकी कोखें गहरी हों वे भोगहीन होते हैं। जिनकी कोखें ऊँची हों वे राजा होते हैं। जिनकी कोखें विपम हों वे कुटिल (टेढ़े) होने हैं। जिनके पेट साँप के उदर के समान हों वे दरिद्री तथा बहुन खाऊ ( खानेवाले ) होते हैं ॥ २४-२५ ॥ नाभिलक्षर परिमएडलोन्नताभिर्विस्तीर्णाभिश्व नाभिभि: सुखिनः । स्वल्पात्वदृश्यनिम्रा नाभिः क्केशवहा भवति ॥ २६ ॥ जिनकी नाभि बड़ी व चारों नरफ़ ऊँची हो वे सुखी होते हैं। जिनकी नाभि छोटी तथा अदृश्य होकर गहरी हो वह उन्हें क्लेशदायक होती है ॥ २६ ॥ ב बलिमध्यगता विषमा शूला बांधं करोति नैःस्वंच। शाठ्यं वामावर्ता करोति मेधां प्रदत्िषतः ॥२७॥ जिनकी नाभि बलियों के बीच प्राप्त होकर विपम हो वह उन्हें शूल- रोगी दरिद्री बनाती है। जिनकी नाभि वामावर्त हो वह शठताद्योतक है और जिनकी नाभि दत्षिखवर्त हो वह बुद्धिदायी है, यानी वे प्राणी मेधावी होते हैं॥ २७॥ पार्श्वायता चिरायुषमुपरिष्टाच्चेश्वरं गवाढ्यमधः। शतपत्रकर्रिकाभा नाभिर्मनुजेश्वरं कुरुते ॥ २८ ॥ जिसकी नाभि दोनों ओर चौड़ी हो तो वह उसे दीर्घजीवी होता है। जिसकी नाभि ऊपर के भाग में चौड़ी हो वह उसे धनी करती है। जिसकी नाभि नीचे की तरफ़ चौड़ी ही वह गोगणशाली करती है। जिसकी नाभि कमलकर्णिका के समान हो वह उसे राजा बनाती है॥ २८ ॥