20. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — करतललक्षण
करतललक्षण
पितृवित्तेन विहीना भवन्ति निम्नेन करतलेन नराः । संवृतनिम्नैर्धनिनः प्रोत्तानकराश्च दातारः।।४४।। जिनके करतल गहरे हों वे पैतृकधन नहीं पाते। जिनके करतल गोला- कार तथा गहरे हों ने धनी होते हैं। जिनके करतल उन्नत हों वे दाता होते हैं॥ ४४॥ # विषमैश्च पापा निःस्वाश्च करतलैरीश्वरास्तुलाच्ाभै: । पीतैरगम्यवनितागामिनो निर्द्धना रूचैः ॥ ४५ ॥ जिनके हाथ वियम (असमान) हों वे पापी तथा निर्धन होते हैं। जिनके करतल लाख के समान लालवर्ग हो वे धनवान् होते हैं। जिनके करतल हल्दी के समान पीले हों वे अगम्या रमणी से रमण करते हैं। जिनके करतल रूखे हों वे धनरहित होने हैं ॥ ४५ ॥
- पतली नोक एवं जड़ में अधिक मोडी उँगली आलसी तथा आमोद- प्रमोदप्रियता की दयोतक है।-संपाइक। १. पितृवित्तविनाशश्च निस्ना करतलावराः । संवृतैश्चैव निम्नैश्च धनिनः परिकीर्निता। प्रोत्तानकरदातारो विपमैविपमा नरा इति॥कर: करतलश्चैव लाक्षाभैरीश्वरस्तनैः । परदाररताः पीतैरूक्षनिःस्वा नरा मताः ॥
- गहरी गदलीवाले हाथ की सूर्यरेखा तथा ऊर्ध्वरेख्ा का विशेष फल नहीं होना। यह कुछ पाश्चात्य विद्वानों का मन है। किन्तु हम इससे पूर्गरुप से सहमन नहीं।-संपादक। प्रथमखरड नखवर्णन तुषसदृशनखाः क्रीवाश्चिपिटैः स्फुटितेश्च वित्तसन्त्यक्काः। कुनखविवर्णै: परतर्कुकाश्च ताग्रैश्च भूपतयः ॥ ४६ ॥ जिके नख भूसी के समान हों (लम्बे छोटे) वे हिजड़े होते हैं। जिनके नख चपटे व फूटे से हों वे धनहीन होते हैं। जिनके नख कुत्सित तथा विवर्ण हों वे कुदृष्टि से निहारनेव्राले होते हैं। जिनके नख ताम्रवर्ण व लाल हों वे पृथ्वीपाल होते हैं ॥ ४६ ॥ दीर्घाङ्गुलिपर्वाणः सुभगा दीर्घायुपश्चैव ॥४७॥ जिनके अँगूठे में यब का चिह्न हो वे धनी होते हैं। जिनके अँगूठे की जड़ में यव का निशान हो वे पुत्रवान होते हैं। जिनकी अँगुलियों की पोरें लम्बी हों वे बड़ें भाग्यशाली तथा दीर्घजीवी होते हैं (देखिये ज. ब. चित्र नं० १२) ॥ ४७ ॥ स्निग्धा निम्ना रेखा धनिनां तव्यत्ययेन निःस्वानाम्। विरलाङ्गुलयो निःस्वा धनसंचयिनो घनाङ्गुलयः॥२८॥ जिनकी हथेली की रेखायें चिकनी व गहरी हों वे धनी होते हैं। इसके विरुद्ध निर्धनी होते हैं। जिनकी अँगुलियाँ बिरली हों वे धन- हीन और घनी अँगुलीवाले द्रव्य संग्रह करते हैं।। ४८॥
- अनेकों िदेशी विद्वानों ने नखों पर स्वतंत्ररूप से एक शास्त्र लिख डाला है। यथार्थ में नख्रों से बहुत कुछ भविष्य जाना जा सकता है। -- सं०। र्घाङ्गलिपर्वकः ॥ १. ताम्र भूपा धनाठ्याश्च अङ्भष्टैस्सयवैस्तथा। अ्ङ्गष्ठमूलजैः पुत्री स्याद्दी- २. हस्ताङ्गुलय एव स्युर्वायुद्धारनिभा: शुभा: मेधाविनां च सूक्ष्मा: स्युर्भृत्यानां चिपिटा: स्मृता:॥ स्थूलांगुलीभिर्निःस्था: स्युर्नरा: स्युः सुरुशैस्तथेति॥
- जिस तरह चेहरा, आँख, मस्नक आदि देखफुर लोग बहुत कुछ बातों का ज्ञान प्राप्त कर लेने है इसी प्रकार अँगूठे से मनुष्य के आचरण का भली भाँति पता लग जाता है। हाँ, इसे बड़े और से देखना चाहिये। अँग्ठे की सची जॉन होजाने पर बहुत कुछ वातें आगे चलकर सरल हो जानी है।-सं०। तिस्रो रेखा मणिबन्धनोत्थिता: करतलोपगा नृपतेः। जिसके मिबन्ध (कब्ज़े) से उठी हुई तीन रेखायें करतल के समीप पहुँच गई हों वह राजा होता है। जिसका हाथ दो मीनरेखाओं से अंकित हो तो वह सदैव अन्रदान करता है।। ४६॥ वञ्राकारा धनिनां विद्याभाजां तु मीनपुच्छनिभाः । शंखातपत्रशिविकागजाश्वपझ्मोपमा नृपतेः ॥५० ॥ जिनके करतल में वज्र का निशान हो वे धनी होते हैं। जिनके कर- तज्ञ में मछली की पूँछ का निशान हो वे विद्यावान् होते हैं। जिसके करतल में शंख, छाता, पालकी, हाथी, घोड़ा और पद का निशान हो वह राजा होता है॥ ५० ॥ # कलशमृणालपत/कांकुशोपमाभिर्भवन्ति निधिपालाः । दामनिभाभिश्चाव्या: स्वस्तिकरूपाभिरैश्वर्यर्यम् ।। ५१॥ जिनके हाथ में कलश, मृगाल (कमल की नाल), पताका और अंकुश का निशान हो वे धनाधिपति होते हैं। जिनके करतल में रस्सी या माला का निशान हो वे धनी होते हैं। जिसके हाथ में स्वस्तिक का निशान हो वे ऐश्वर्य पाते हैं ॥ ५१ ॥ चक्रासिपरशुतोमरशक्किधनुः कुन्तनिभा रेखाः। कुर्वन्ति चमूनाथं यज्वानमुलूखलाकाराः॥५२॥ जिनके करतल में चक्र, तलवार, कुठार, शक्ति, धनुप और भाला के समान रेखायें हों वे सेनापति होते हैं। जिनके करतल में उखली निशान हों वे विधि से यज्ञ के करनेवाले होते हैं ॥ ५२॥
- हमें आाजतक हाथी, घोड़ा, छाता, पालकी, मकर, तलवार आदि के निशान हाथों में नहीं मिले। हमने जहाँ तक खोज की है उससे यही पता चल सका है कि उक्र सभी बातें प्रायः रूपक है। हमारा प्राचीन सामुद्रिक यथार्थ में लुमप्राय है। इस विषय में खोज की बहुत आवश्यकता प्रतीत होती है। -संपादक। वेदीनिभेन चैवाग्निहोत्रिणो ब्रह्मतीर्थेन॥ ५३॥ जिनके करतल में मकर, ध्बजा, गोष और मन्दिर के आकार की रेखाएँ हों वे धनसंपत्र होते हैं। जिनके ब्रह्मतीर्थ (अँगूठे के मूल) में बेदी का निशान हो वे अग्निहोत्री होते हैं।। ५३ ॥ * वापीदेवगृहाद्यैर्धमं कुर्वन्ति च त्रिकोणाभिः । अङ्ञष्ठमूलरेखा: पुत्रा: स्युर्दारिका: सूच्मा:॥ ५४ ॥ जिनके करतल में बावली, देवमन्दिर तथा त्रिकोण का चिह्न देख पड़े वे धर्मशील होते हैं। जिनके अँगूठे के मूल में बड़ी-बड़ी जितनी रेखायें लक्षित हों उतने ही पुत्र पैदा होते हैं। जिनके अँगूठे के मूल में छोटी- छोटी जितनी रेखायें हों उतनी ही कन्याएँ पैदा होती हैं।। ५४।।