21. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — ऊर्ध्वरेखालक्षण
ऊर्ध्वरेखालक्षण
रखा: प्रदेशिनीगा: शतायुषां कल्पनीयमूनाभिः। छ्िन्नाभिर्द्टमपतनं बहुरेखारेखिणो निःस्वाः॥ ५ ५ ॥ जिनके करतल में ऊर्ध्बरेखा तर्जनीपर्यत पहुँच गई हों (देखो चित्र नं० १२ क. ख.) वे सौ वरस की आयु पाते हैं। यदि तर्जनी तक ऊर्ध्ब- रेखा नहीं गई हो तो वे प्राणी कम उमर पाते हैं। यदि ऊर्ध्बरेखा छ्िन्र हो गई हो तो वे वृक्ष से गिरते हैं। जिनके कर तल में बदतसी रेखाएँ हों अथवा रेखामात्र लन्षित हों तो वे प्राणी धन-रहित होते हैं॥ ५५ ॥
- मनुस्मृति में करतल में तीनों तीर्थ कहे हैं। साथ ही अँगूठे के भी तीन तीर्थ कहे गये हैं। अनेक विदेशी विद्वानों ने अँगठे को दो भागों में विभाजित किया है और अनेकों ने तीन भागों में। पहला है नाखूनवाला भाग (पोर) और दूसरा बीच की गाँउ से लेकर मूल तक और तोसरा मूल से लेकर कलाई तक। पहला आत्मवल, दूसग विवेकशक्ति तथा तीसरा प्रेम एवं सहानुभूति का द्योतक बताया गया है। -सं०। नोट :- हस्तरेखा तथा इस विषय पर अधिक जानने के लिए इस पुस्तक का "द्वितीय खएड" देखिये । -- संपादक चित्रुक, अधरलन्षगा अतिकृशदीर्घैश्चिबुकेनिर्रव्या मांसलैर्घनोपेताः। जिनकी चित्रुक (दाह़ी) बहुत पतली या लम्बी हो तो वे प्राणी दरिद्री होते हैं। जिनकी चित्रुक मांस से भरी हो वे धनवान होते हैं। जिनके अधर कुँदरू के सदृश हों तथा टेढ़े न हों वे पृथ्वीपाल होते हैं। जिनके अधर पतले हो वे निर्धनी होते हैं ॥ ५६ ॥