22. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — ओष्ठ, दशन, दंश्रलक्षण
ओष्ठ, दशन, दंश्रलक्षण
औष्ठैः स्फुटितविखगिडतविवर्णरूक्षैश्च धनपरित्यक्ाः। स्निग्धा घनाश्र दर्शना: सुतीचणदंष्रास्समाश्र शुभाः।५७।। जिनके ओठस्फुटित, विखषिडत, विवर्स और रूखे हों वे धनहीन होते हैं। बड़ी तीखी दाहोंवाले, चिकने, सघन व सम दाँन शुभसूचक होते हैं॥ ५७॥ जिद्दा, तालुलक्षगा जिह्वा रक्ा दीर्घा श्लच्षा सुसमा च भोगिनां जेया। श्वेता कृष्णा परुषा निर्द्रव्याणां तथा तालु॥।५८ ॥ १. द्वात्रिशददशनो राजा भोगी स्पादेकद्दीनकः । त्रिशद्न्ता: स्युः सुखिनो विनैकेन सुदुःखिनः ॥ दन्तास्तु विकटा यस्य नीचवन्नीचकर्मकृत्। प्रगल्भो दन्तुरः सत्यं देशान्तररतो भवेत् ॥ दुःखितैर्विकतैरूत्तैर्दन्तमूषिक सन्निमैः । सौमाग्यं मिलितैर्दन्तैर्िद्यावान्दन्तुरः पुनः ॥ कदाचिदन्तुरोमूर्ख: कदानिल्लो मशोऽसुसरी॥ २. यस्य जिह्वा भवेहीर्घा नासाग्रं लेढि सर्वदा। योगी भवति निर्धाणः पृथ्वीं स्रमति सर्वदा॥ जिह्वेप्टमिष्टभोक्त्री स्याच्छोण मृद्दी तथा सिता। दुःखाय मंध्यसंकीर्ण पुरोभागसुविस्तरा॥ कृष्णजिह्वा भवैद्यस्य स नरो दुःखभाजनः । यः स्पूशेजिड्वया नासां सभवेत्पापकारकः । स्थूलजिह्वा करजिह्वा स नरोऽनृत- भाषितः । श्वेतजिह्वा नग ये च तेष्याचारविवर्जिताः ॥ रक्कजिद्वा भवेद्यस्य विद्यां लक्ष्मी स चाम्रयात्॥ ३. कृष्णतालुनरा ये तु भवन्ति कुलनाशकाः । पद्मपत्रसमस्तालु: स नरो भूपतिर्भवेत्॥ श्वेततालुनरा ये तु धनवन्तो भवन्ति हि। रक्कतालुनरा ये तु धनाळ्या मानवाधिपा: ।। पथमखएड जिनकी जीभ लाल, लम्बी व पतली और सम हो उन्हें भोगी जानना चाहिये। जिनकी जीभ सफ़ेद या काली तथा कड़ी हो वे प्राणी निर्धन होते हैं। वैसे ही जिनका तालु लाल, लम्बा व कोमल होकर समान हो वे प्राणी भोगी होते हैं। सफ़ेद या काला तथा खरखरा तालू दरिद्रता का सूचक है॥। ५८ ॥ मुखलक्षगा वंक्रं सौम्यं संवृतममलं श्लचणं समं च भूपानाम्। विपरीतं क्वेशभुजां महामुखं दुर्भगाणां च॥ ५६ ॥ जिनका मुख सुशोभन, गोल, अमल व कोमल तथा समानाकार हो वे राजा होते हैं। जिनका मुख पूर्वोक् लक्षणों से विपरीत हो वे क्लेशभागी होते हैं। जिनका मुख बड़ाभारी हो वे बुरे भाग्यवाले होते हैं।। ५६ ।। स्त्रीमुखमनपत्यानां शाठ्यवतां मएडलं परिजेयम्। दीर्घं निर्द्व्याणां भीरुमुखाः पापकर्माणः ॥ ६० ॥ जिनका मुख स्त्रीमुख के समान हो वे सन्तानरहित होते हैं। मएडला- कृति मुख शठता का द्योतक है। लम्बा मुख निर्धनी का और मयावना- सा मुख पापकर्मकारी का होता है ॥ ६० ॥ चतुरसं धूर्तानां निम्नं वक्रं च तनयरहितानाम्। कृपणानामतिइस्वं सम्पूर्ण भोगिनां कान्तम् ॥ ६१ ॥ चौकोन मुखवाले धूर्त होते हैं। जिनका मुख नीचे की ओर भुका हो वे प्राणी सन्तानरहित होते हैं। छोटे मुखवाले कृपण होते हैं। जिनका मुख सम्पूर्ण मनोरम हो वे भोगी होते हैं॥ ६१ ॥